समकालीन जनमत
ज़ेर-ए-बहस

फ़िरक़ा और जातिप्रथा आधुनिक मुस्लिम समाज के निर्माण में एक बड़ी अड़चन हैं

मुहम्मद उमर 

( इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र मुहम्मद उमर  का कालम  ‘ मियों का मोहल्ला’ ‘ की दूसरी किस्त )
कमरुद्दीन भाई और जमाल भाई के बीच इधर बीच दुआ सलाम बन्द होने की चर्चा बेगमवार्ड चौराहे पर जोरों पर है। दोनों एक बेहतरीन दोस्त और दोनों का ताल्लुक़ राइन बिरादरी से है। इतना ही नहीं बल्कि बिरादरी में दोनों की एक खास अहमियत है। दोनों करीब के रिश्तेदार हैं और साथ ही साथ बिरादरी के पंच भी। किसी का भी हुक्का पानी बंद करने की ‘वीटो पॉवर’ इन्हीं के पास है। लेकिन बोलचाल बन्द होने को लेकर कोई ठोस कारण किसी को नहीं दिख रहा है। न कोई झगड़ा हुआ, और न ही कोई खास वजह कि जिसके चलते ये अटकलें लगाईं जाएँ कि, फलाने-फलाने वजहों से सलाम दुआ बन्द है।
लेकिन, बेगमवार्ड मुहल्ले कोई बात ढकी छिपी नहीं रह सकती। और उस वक़्त तक, जब तक कि चौराहे पर खलिहरों और फ़तवेबाजों का अड्डा जमता रहेगा। लेकिन इस बार इस अड्डे ने नहीं बल्कि मस्जिद ने वजह साफ़ कर दी थी। आख़िर यह बात पकड़ ली गयी और जल्द ही समझ भी आ गयी कि आख़िर सलाम दुआ बन्द होने की वजह क्या है।
जमाल भाई ने नमाज़ के लिए मस्जिद बदल ली है। हालांकि घर के ठीक बगल मस्जिद है, जिसमें वह हमेशा नमाज़ अदा किया करते हैं। लेकिन इधर बीच वह घर से कुछ दूर पर मौजूद दूसरी मस्ज़िद जा रहे हैं। कभी-कभी घर के बगल वाली मस्ज़िद में आ जाते हैं लेकिन अब वह बिना टोपी के नमाज़ पढ़ रहे हैं और नमाज़ पढ़ने के शैली में एक विशेष बदलाव भी है।
जमाल भाई से सलाम दुआ बन्द करने वालों की लंबी संख्या है और कुछ और नए लोगों से राब्ता कायम हो गया है। मस्जिद में जमाल भाई और कमरुद्दीन भाई अजनबियों सा बगल-बगल बैठे रहते हैं लेकिन एक दूसरे के हाल ख़ैरियत से कोई मतलब नहीं।
बेगमवार्ड चौराहे पर इस मसले पर जब भी चर्चा हो रही तो लोगों में कई धड़े बँटते नज़र आ रहे हैं। बातचीत धीरे-धीरे एक जोर शोर से होने वाली बहस में बदल जा रही, और कई दफ़े नौबत मारपीट तक की आ गयी थी। कोई कमरुद्दीन भाई को सही कह रहा तो कोई जमाल भाई को तो कोई दोनों को गलत बता रहा। कल रात की बहस के बाद कलीमुल्लाह और मकसूद भाई के बीच भी सलाम दुआ बन्द दिखी।
यह बहस ऐसी हो रही कि हर तरफ का पक्षकार क़ुरान हदीस खोल दे रहा है। मुनाफ़िक़, काफ़िर, दीन और ईमान से ख़ारिज, जन्नती, जहन्नुमी….जैसे लफ्ज़ चौराहे की तनाव भरी हवा में गूँज रहे हैं। बहस करते-करते आपसी यारों के बीच चरम तनाव देखने को मिल रहा।’
सम्भव है कि मुस्लिम समुदाय के बारे में गहराई से जानकारी न रखने वालों के मन में एक अजीब सी उलझन होगी कि किन्हीं दो शख़्स के बीच के सम्बंध बिगड़ना और लोगों के बीच के झगड़े का विषय क्यों बन गया। फिर इस घटना में मस्जिद और जमाल भाई का जरा सा परिवर्तन, दूर की मस्जिद में जाना, नमाज़ पढ़ने की शैली में परिवर्तन..इत्यादि कोई ऐसा ठोस कारण नज़र नहीं आ रहा जो दो लोगों के बीच के सम्बन्ध को बिगाड़ दे और फिर मुहल्ले के व्यापक लोगों के बीच बहस का विषय बन जाए।
लेकिन फिर भी यह बात कुछ न कुछ साफ़ हो गयी होगी कि सलाम दुआ के बन्द होने की वजह कोई ज़मीनी झगड़ा या कोई और वजह नहीं बल्कि धार्मिक ज्यादा नज़र आ रही। इसे मुसलमानों के बीच फ़िरक़ावारियत या मसलक की लड़ाई कहा जाता है।
फ़िरक़े की लड़ाई पहले मौलवियों के बीच थी। यह सैद्धान्तिक शेखी बघारने की जंग है जो इस कौम में बहुत पहले से चली आ रही है। यह मौलवियों, मुफ़्तियों के बीच इस्लाम की समझ को लेकर वैचारिकी के वर्चस्व की लड़ाई है, लेकिन इसने आज एक मुसलमान को दूसरे मुसलमान के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया है।
यह लड़ाई बहसबाज़ी से लेकर सिर फुटौव्वल तक चली आती है, जिसमें सिवाय आपसी दूरियों के कुछ हासिल नहीं होता। यह लड़ाई मुस्लिम पोंगापंथी मुल्लाओं की दुकानों को खूब ऑक्सीजन मुहैया कराती है। यह नए मुस्लिम मज़हबी ठेकेदारों को इस समाज को ठगने के नए अवसर देती है। यह मौलवियों की आम लोगों को इस्लाम की सैद्धान्तिक बहसों में उलझाकर अपनी जेब गर्म करने की नायाब चाल है, जिसमें वह बखूबी कामयाब रहे हैं।
हिन्दू समाज में अगर जाति प्रथा नाम का कोढ़ है तो मुस्लिम समाज में जातिवाद और फ़िरकावारियत का कोढ़ है। यही कारण है कि मुस्लिम समाज तरक़्क़ी के मामले में बैकफुट पर है। अगर हिंदुओं में विवाह और सम्बन्ध जाति के आधार पर बनाये जाते हैं तो मुस्लिमों में जातीय और फ़िरक़े के फार्मूले के आधार पर।
फ़िरक़ों में बँटना मुस्लिम समाज के लिए बहुत ही घातक साबित हुआ है। एक तो पहले वह मौलवियों, मुफ्तियों से शोषित होते ही हैं, और दूसरी तरफ़, इस देश का हिंदूवादी संगठन आरएसएस और उसके इशारों पर देश को हिंदुत्व के रंग में रंगने वाली सत्तासीन पार्टी की मुस्लिम विरोधी चालों का भी शिकार होना पड़ा है।
हमें बताना ये है कि, दरअसल संघ परिवार मुस्लिमों के बीच इस विभाजन को गहराई से समझता है और वह ऐसे मुद्दों को उखाड़ता है ताकि मुस्लिमों के बीच कई फाड़ हो जाये। इसका नायाब उदाहरण कोरोना काल के दैरान देखने को मिला। कोरोना काल के दौरान किस तरह निवर्तमान सत्तासीन पार्टी के नेताओं, संघ परिवार और गोदी मीडिया ने सरकार की नाकामी को ढकने के लिए कोरोना संक्रमण फैलाने का सारा ठीकरा तब्लीगी जमात के सिर फोड़ दिया था।
इस प्रकार, एक ही तीर से कई निशाने साधे गए। एक फिर से तब्लीगी जमात के रूप में मुस्लिम को विलेन बनाकर मुस्लिम विरोधी मानसिकता की फिर से खेती कर दी गयी। दूसरी तरफ, मुस्लिमों के बीच फ़िरक़ों को आपस में भी भिड़ा दिया गया। अब बरेलवी, शिया और अहले हदीस जैसे तमाम फ़िरक़ों के मौलवियों ने भी मौके को हाथ से गवाया नहीं। उन्होंने इसका भरपूर इस्तेमाल किया और कई मस्जिदों से एलान हो गया कि तब्लीगीयों से दूर रहें।
संघ परिवार को मुस्लिमों के और फ़िरक़ों की तरफ से सहानुभूति हासिल हुई। जबकि बाद में महाराष्ट्र हाइकोर्ट ने सरकार और गोदी मीडिया को इस अफ़वाह के लिए फटकार लगाई। लेकिन संघ परिवार का काम तो बन ही गया।
इस अफ़वाह के फैलने से मुस्लिमों को काफ़ी मुश्किलातों का सामना करना पड़ा। कितने निजी अस्पतालों में इलाज कराना मुश्किल हो गया। लॉकडाउन के दौरान हमारे एक रिश्तेदार की तबीयत बिगड़ गयी। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन उनकी बगल के बेड पर भर्ती गैर मुस्लिम मरीजों ने आपत्ति जताई कि इस मुस्लिम मरीज को उनसे दूर रखा जाए। इस मामले के हम प्रत्यक्षदर्शी गवाह बने। ऐसे ही कितने मुस्लिमों की इस तरह की मुश्किलात से दो-दो चार होना पड़ा, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है।
इसी तरह कुछ समय पहले तीन तलाक़ के मुद्दे को उछालकर मुस्लिमों के बीच कई फाड़ कराया गया। संघ परिवार और उसकी सत्तासीन पार्टी मुस्लिमों के बीच गहराए हुए इन तमाम अंतर्विरोधों को समझती है, जैसा कि हम ऊपर कह आये हैं। उसका उद्देश्य दरअसल इस समाज के कुरीतियों और रूढ़ियों को दूर करना नहीं है। बल्कि, वह मुस्लिमों को बहुसंख्यक समाज के सामने एक विलेन के रुप में रखती है जो कि उसकी राजनीति रही है। इसके साथ वह मुस्लिमों को आपस में भी तक़सीम कर रही है। मौलवियों द्वारा लगाए फ़िरक़े के पेड़ को वह और हरा भरा कर रही, जिसमें दोनों का लाभ है। उसे इस समाज से कोई सरोकार नहीं है।
एक बार में तीन तलाक कहना बिल्कुल कुप्रथा है। यह वाकई एक समस्या है। इस समस्या का इलाज जरूरी है। लेकिन इसे उछालकर समाज को बदनाम करना, और सभी मुस्लिम मर्दों की छवि को ऐसा पेश करना कि गोया सभी तीन तलाक़ के हिमायती और अपनी आम ज़िंदगी में इसी तरह तलाक़ देते फिरते हैं, गलत और पूर्वाग्रहों से ग्रसित होना था।
देश में मुसलमानों के कुछ ही ऐसे फ़िरक़े हैं जहाँ एक बार में तीन तलाक़ कहने से शादी टूट जाती है। लेकिन अधिकतर मुसलमान फ़िरक़े इससे सहमत नहीं हैं। लेकिन बीजेपी और संघ परिवार की इस राजनीति में मुस्लिम व्यापक रूप से महिलाविरोधी छवि के साथ देखे गए। इसके साथ फिर मस्जिदों में मौलवियों ने संघ की तरह इस मुद्दे को मुसलमानों को बाँटने में उनसे भी कहीं बेहतर तरीक़े से भुना लिया।
यह बात जगजाहिर है कि मुख्यधारा के समाज का आचरण पितृसत्तात्मक होता है। धर्म, समाज के बाहर की उपज नहीं है। इससे साफ जाहिर है कि धर्म का रवैया पितृसत्तात्मक होता है और यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जड़ों को और गहरी बनाता है। यह बात मुख्यधारा के समाज के किसी भी धर्म को लेकर कही जा सकती है।
संघ परिवार और बीजेपी अगर इतनी ही मुस्लिम महिलाओं की हिमायती बन रही है तो उसे हलाले और इद्दत की कुप्रथा को समाप्त करने की लड़ाई लड़नी चाहिए, जो कि ऐसी समस्या है कि जिस पर सभी फ़िरक़े अडिग और एकमत हैं। और भी समस्याएं हैं मुस्लिम समाज में जहाँ महिलाओं का शोषण होता है। कितने परिवारों में मुस्लिम महिलाओं को धर्म के नाम पर नौकरी नहीं करने दी जाती। इसे वह भारतीय मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग की राष्ट्रीय समस्या बनाकर उसका इलाज कर सकता है। मुस्लिम समाज का पढ़ा लिखा तबका तब बीजेपी के एक झूठे जुमले को सच मान सकता है–‘सबका का साथ, सबका विकास।’
कहना न होगा कि बीजेपी और संघ परिवार का एजेंडा सिर्फ़ इतना नहीं है कि मुस्लिमों को देश बदर करना है बल्कि वह उन्हें आपस में भी इतना तोड़ देना चाहती है कि वह अपनी लड़ाई भी न लड़ सकें। इस प्रकार उसे ‘फ़िरक़ा’ नाम की कमजोर कड़ी मिल गयी है।
संघियो और मनुवादियों की महिलाओं को लेकर क्या सोच है वह भी किसी से ढकी छिपी नहीं है। एक तरफ वह सबरीमाला के मामले में एक ठेठ मर्दवादी पुरुष की तरह बोलता है तो दूसरी तरफ मुस्लिमों के मसले में प्रगतिशील चौधरी बना फिरता है। उसके नायक सावरकर और गोलवरकर को पढ़ने के बाद और उसके वर्तमान रवैये को देखने बाद साफ पता चलता है कि उसकी सोच मनुस्मृति को संविधान के स्थान पर रखना है।
ऊपर हमने यह दिखाया कि मुस्लिमों के बीच के विभाजन को किस प्रकार संघ और बीजेपी अपना हथियार बना रही है। इधर मुस्लिम समाज के भीतर यह मुस्लिमों पर शासन करने का मौलवियों और मुफ़्तियों का कमाल का हथकंडा है।
मुस्लिम तबके को दो ओर से मार पड़ रही है। एक तरफ हिंदू कट्टरपंथी ताक़त की मार झेल रहे तो दूसरी तरफ़ भीतर के कट्टरपंथी ताकतों की मार पड़ रही है। इससे समाज अधमरा हो गया है। भीतर से खोखला हो चुका है। जो शिक्षित हैं वो भी फ़िरक़े के गिरफ्त में हैं। इतना ही नहीं, शिक्षित मुस्लिम ही फ़िरक़े के झंडे को बुलंद किये हुए आगे बढ़ रहे।
जिस तरह कोई शूद्र और स्त्री हिन्दू धर्मग्रंथों को नहीं पढ़ सकता उसी तरह कोई आम मुसलमान अपने धर्मग्रंथ को अपने मुताबिक नहीं समझ सकता। उसके पहले मौलवियों ने अपनी किताबों के बैरियर लगा रखे हैं। उसे मौलवियों की ही व्याख्या को मानना पड़ेगा और यदि मतभेद प्रकट करता है तो उसका जहन्नुम का मुफ़्त में टिकट कट जाता है।
सुन्नी मौलवियों का फ़तवा है कि शिया मुसलमान नहीं हैं तो शिया मौलवियों का यही फ़तवा सुन्नियों को लेकर है। यही कारण है कि इन दोनों तबकों के बीच शादियां और रिश्तेदारी दुर्लभ ही देखने को मिलती है। इतना भर नहीं बल्कि दोनों तबकों के कट्टरपंथी एक दूसरे के यहाँ खान पान से लेकर तमाम मसलों में भेदभाव मानते हैं।
‘बेगमवार्ड मुहल्ले में रमज़ान के दिनों में इफ़्तार देने का चलन है। जो कि, आमतौर पर हर जगह है। और बेगमवार्ड मुहल्ले में तो शिया और सुन्नी घरों के बीच भी इफ्तार लिया दिया जाता है। लेकिन अंदर का सच तो ये है कि कट्टरपंथी लोगों के यहाँ खाई नहीं जाती, बल्कि फेंक दी जाती है। जो शिया कट्टरपंथी हैं वह सुन्नी तबके के घरों का कुछ नहीं खाते और सुन्नी कट्टरपंथी शियों के घर का।’
आगे सुन्नी और शियों के भीतर भी फ़िरक़ों का विभाजन है, और फिर उस विभाजन का भी उप विभाजन मौजूद है। जैसे सुन्नी में वहाबी और बरेलवी फ़िरक़े आते हैं, जिसमें वहाबियों और बरेलवियों के भीतर भी दर्जनों जमातें और फ़िरक़े मौजूद हैं। हम फ़िलहाल इस लेख में उनके ऊपर रोशनी डालना जरूरी नहीं समझते।
फ़िरक़ों के अलग-अलग ईदगाह हैं और यहाँ तक कि, अलग-अलग कब्रिस्तान भी मौजूद हैं। एक फ़िरक़े के कब्रिस्तान में दूसरे फ़िरक़े के मरहूमों को सुपुर्द-ए-खाक़ नहीं किया जा सकता, जाने क्या पता कि बाक़ी मरहूम अपनी कब्रों से उठ खड़े होंगे!
फ़िरक़ों की खाईं इतनी गहरी है कि फ़िरक़ों में बँट चुके मुस्लिम देखकर पहचाने जा सकते हैं, कि कौन मुस्लिम किस फ़िरक़े का है। सिर पर पहने जाने वाली टोपी का रंग, छोटाई बड़ाई ऊँचाई से पहचाना जाता है कि वह बरेलवी है या फिर देवबंदी है! कुर्ता सलवार धारण किये हुए मुस्लिमों की सलवार अगर टखनों के ऊपर है तो किसी अलग फ़िरक़े का है और अगर उससे नीचे है तो अलग फ़िरक़े का है। कुछ मुस्लिम फिरकों के हिसाब से दाढ़ी रखते हैं और अगर दाढ़ी एक मुश्त से बड़ी है तो फ़िरक़ा बदल जाता है और छोटी है तो फ़िरक़ा बदल जाता है!
लेकिन सीएए एनआरसी के विरोध के दौरान ही मुस्लिम फ़िरक़ों में क्षणिक एकजुटता दिखी थी। क्योंकि उसमें फ़िरक़े हिसाब से नहीं देश बदर किया जाना था। बल्कि उसमें मुस्लिम होना ही काफ़ी था। लेकिन सीएए एनआरसी के विरोध के दौरान महिलाओं का बाहर आना किसी फ़िरक़े के मौलवियों और कट्टरपंथियों को भाया नहीं था। लेकिन समय की मजबूरी के चलते वह चुप रहे। मुस्लिम समाज में वह इस लोकतांत्रिक विरोध के हिमायती नहीं थे। उनके मुताबिक तो खुदा नाराज़ है, और यह आजमाइश का वक़्त है जिस वक़्त सभी को कुरान पर अमल करना चाहिए।
शाहीनबाग़ में होली समारोह और लगातार जिस सौहार्द की मिसाल देखने को मिली वह कट्टरपंथी ताकतों के सीने पर साँप लोटवाने के लिए काफ़ी थी। भीतर से दबी ज़ुबान में मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों में एक गुस्सा था कि मज़हबी मूल्य ध्वस्त हो रहे हैं और कयामत करीब है!
जिस तरह फ़ासीवादी और हिंदूवादी ताकतों ने मुस्लिम ही नहीं बल्कि शाहीनबाग़ में शामिल सभी मज़हबों की औरतों पर झूठे चारित्रिक आक्षेप लगाए उसी प्रकार मुस्लिम समाज के भीतर के कट्टरपंथी ताकतों ने भी दबी ज़ुबान में यही काम किया और अपनी औरतों को जाने से रोका।
फ़िरकापरस्त कट्टर ताकतों को पता था कि कल को ये महिलाएँ उनके बनाये हुए पितृसत्तात्मक मूल्यों के ख़िलाफ़ भी फुँफकारती हुई खड़ी हो सकती हैं। सम्भव है, कि ऐसा हो सकता है। महिलाओं का आगे आना दोनों ओर के कट्टरपंथियों को जँचा नहीं। क्योंकि सभी मज़हबों के पोंगापंथी चरित्र एक से होते हैं। लड़ाई तो उनके वर्चस्व की है कि कौन हावी होता है, प्रगतिशीलता के तो दोनों विरोधी हैं।
वैसे इस मुद्दे पर तो अलग से स्वतंत्र लेख लिखने की जरूरत है, लेकिन एक आखिरी बात यह कहनी है कि इस आंदोलन को जामिया, अलीगढ़ और देश के तमाम विश्विद्यालयों के भीतर पढ़ रहे तमाम प्रगतिशील मुस्लिम छात्र छात्राओं और तमाम प्रगतिशील संगठनों ने आगे बढ़ाया था। इसका नेतृत्व कट्टरपंथियों के हाथ में नहीं रहा। बागडोर लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा के प्रति कटिबद्ध प्रगतिशील धड़े के मुस्लिमों, अम्बेडकर के विद्यार्थियों के हाथ में थी। इसीलिए सबकुछ इतनी शांतिपूर्ण तरीके से हो सका।
यह आंदोलन एक मुस्लिम समाज के बीच आशा की नई किरण बनकर आया। मुस्लिम समाज के भीतर से प्रगतिशील तत्त्व निकलकर सामने आए और नई इबारत रचने को निकल पड़े। विश्वविद्यालय में पढ़ रही मुस्लिम छात्राओं ने मशाल को घरेलू मुस्लिम महिलाओं के हाथ में थमा दी। दलित भी साथ थे। प्रगतिशील संगठनों से लेकर जेएनयू और आईआईटी तक से आवाज़ उठी। दोनों तरफ के कट्टरपंथी दंग थे। शाहीनबाग़ और मंसूरपार्क दोनों की आँखों में चुभा। एक ने हालात देखते हुए फ़न नहीं उठाए।
लेकिन अभी भी मुस्लिम समाज के भीतर फ़िरकावारियत की जड़ें गहरे में व्याप्त हैं। तब्लीगी जमात के कोरोना जिहाद के प्रोपगैंडे के साथ जो एकजुटता बनी थी, वह टूट गयी। दोनों ओर की कट्टरपंथी ताकतें कामयाब रहीं। लेकिन उनकी जीत क्षणिक है। वह भूल में हैं।
‘कमरुद्दीन और जमाल भाई बोले न बोलें लेकिन हक़ की लड़ाई के लिए अब उनकी ख़ातूनें कंधे से कंधा मिलाकर लड़ेंगी। बस प्रगतिशील तत्त्वों को और मेहनत करने की जरूरत है ताकि, फ़िरक़ों में बाँटकर इस समाज को अशिक्षा और कुरीतियों की माँद में धकेलने वाले कठमुल्लों के हाथों से इस समाज को बाहर निकाला जाए।
भले ही शिक्षा प्राप्त करने के बाद अच्छी खासी संख्या में मुसलमान धर्मांधता और फ़िरक़ों का झंडा बुलंद कर रहे हों लेकिन मौजूदा हालात और परिस्थितियों में बहुत से मुस्लिम शिक्षा पाकर मुस्लिम न बनकर इंसान बनें हैं। उनके लिए फ़िरकावारियत ‘ऐसे दस्तूर को सुबहे बेनूर को मैं नहीं जानता, मैं नहीं मानता’ वाली बात है। और यह एक खुशी की बात है।
फ़िरक़े की गणित से बाहर आने के लिए मुस्लिम समाज को संकीर्णताओं के घेरे से बाहर आना होगा। उसे आधुनिक युग के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाना होगा। किसने कहा धर्म छोड़ दीजिए, बस सड़े गले आचारों विचारों को छोड़ दीजिए। मौलवियों की दुकानें बन्द करानी होगी। मौलवीमुक्त समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना होगा। आलिम और मौलवी वह होता है, जो इल्म रखता है न कि वो सड़े-गले विचारों का प्रचारक हो।
फ़िरक़ा और जातिप्रथा दोनों आधुनिक मुस्लिम समाज के निर्माण में एक बड़ी अड़चन हैं। दोनों इंसानियत के ख़िलाफ़ जाने वाली संस्थाएं हैं जिसका खामियाजा मुस्लिमों को हर स्तर पर भुगतना पड़ता है। फ़िरकावारियत मुस्लिमों के भीतर मौजूद प्रगतिशील तत्त्वों को नष्ट करती है। यह कौम को मुख्यधारा के समाज के साथ आगे बढ़ने से रोक देती है।
फ़िरकावारियत ने ही आज मुस्लिमों के बीच एक नए किस्म की कट्टर और अराजकतावादी राजनीति का जन्म दिया है। इस क़िस्म की मुस्लिम राजनीतिक पार्टियाँ जो उभरी हैं, वह लगातार संघ परिवार का काम आसान कर रही हैं। उसके लिए रास्ते में पड़े झीड़ झाँकड़ो को हटा रही हैं। इससे एक तरफ़ व्यापक समाज में मुस्लिमों की छवि वैसी तैयार हो रही है जैसी कि बहुलता में है नहीं। कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों की इस ओछी राजनीति ने मुस्लिमों के बीच विभाजन को बढ़ाया है। उसकी राजनीति का उद्देश्य मुस्लिमों के बीच शिक्षा और ग़रीबी मिटाने का नहीं है बल्कि यह हिंदूवादी ताकतों की प्रतिक्रिया में खड़ा हुई उग्रवादी राजनीति है जिसका लोकतंत्र से कोई सरोकार नहीं है।
जब मुफ़्तियों की तरफ़ से फ़तवा आता है कि मुस्लिम औरतें नौकरी नहीं कर सकतीं तो यह ताकतें उनके ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाती हैं बल्कि भीतर से समर्थन में दिखती हैं। चुप्पी मौन सहमति होती है। यही वह सांठगांठ है जिसकी बात हमनें इस कड़ी के पहले लेख में की थी।
अब यह मुस्लिमों को तय करना है कि उन्हें फ़िरक़ा आधारित राजनीति का दामन थामना है या फिर उनके बीच से उभरे हुए उन प्रगतिशील तत्त्वों का, जो लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना चाहते हैं और सौहार्द को बनाये रखना चाहते हैं। ‘अमन, चैन और भाईचारे का ही पैग़ाम तो पैगम्बर लाये थे न कि फ़िरक़े का पेड़ लगाया था। फ़िरकावारियत की खेती मुहम्मद साहब की अमन, चैन और इंसानियत वाली खेती से कोई मेल नहीं खाती।’
मुस्लिम समाज को समझना होगा कि फ़िरक़ावारियत वो माठा है जो कि सौहार्द के पेड़ की जड़ में पड़ जाए तो उसे सूखा कर देगा। यह एक पूरे समाज की मौत है। यह प्रगतिविरोधी तत्त्व है, जो अंधकार युग के संसार में ले जाता है और उन्हें स्वतंत्रता, समानता, बन्धुत्व जैसे आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों से काटता है।
फ़िरक़ावारियत के साथ जातिप्रथा की जड़ें भी इस समाज में बहुत गहरी है जिस पर अलग से कहने की जरूरत है। मुस्लिमों में जातिप्रथा ऊपर से समझ आने वाली इतनी सरल और सहज नहीं है। इसके लिए इस समाज का गहराई से अध्धयन करना होगा। जाति और फ़िरक़े एक दूसरे के पूरक हैं। एक का नष्ट होना एक के प्रभाव को हल्का बना देगा।
बिरादरी, पंच… ये सारी चीजें इस समाज में भी देखने को मिलेंगी। आज भी बिरादरी की पंचायतें लगती हैं जिसमें पंचों का फैसला कमजोरों के ख़िलाफ़ आता है। गोदान के होरी सिर्फ़ हिंदू नहीं मुस्लिम समाज में भी हैं। हुक्का पानी बंद करने की नीति का भीतर बखूबी निर्वहन होता है। यह समस्या मुस्लिम राजनैतिक नेतृत्व तक पर (पालिका, पंचायत चुनाव से संसदीय चुनाव तक) गहरा असर रखती है। मुस्लिम पोलिटक्स और वोटबैंक का जातिप्रथा से क्या कनेक्शन है, इसे हम कड़ी के अगले लेख में तथ्यों और उदाहरणों से स्पष्ट करेंगे। भीतर का यह सच बाहर लाया जाना है कि मुस्लिम वोटबैंक और मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति कैसे होती है।
फ़िलहाल हम इतना ही कहेंगे कि वर्तमान मुस्लिम समाज को दो समस्याओं से जूझना पड़ रहा है, पहला तो आंतरिक मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों से दूसरा बाहरी मुस्लिमविरोधी कट्टरपंथी ताकतों से। ये दोनों ताकतें एक सिक्के के दो पहलू हैं। लेकिन आन्तरिक मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों पर व्यापक कार्य करने की जरूरत है ताकि अल्पसंख्यक वर्ग को इस किस्म की फांसीवादी ताकतों से बचाया जा सके जो मज़हब की आड़ में खड़ी हैं।
सीएए एनआरसी के दौरान प्रगतिशील नेतृत्व ने एक नई ऊर्जा इस कौम को मुहैया करायी है। विशेषकर, महिलाओं ने घर की चौखटे अब लाँघ दी हैं। सच कहा जाए तो बाबा साहेब की तस्वीरों के साथ जिस तरह लोकतांत्रिक मूल्यों की लड़ाई लड़ी गयी उसने इस कौम के बहुत से मुस्लिमों को बाबा साहेब के विचारों से परिचित कराया। मुस्लिमों को लगा कि इस देश की दलित आबादी उनके साथ है और दलित समाज सिर्फ अपने समाज की ही नहीं बल्कि मुस्लिमों के हक़ की लड़ाई में भी उनके साथ खड़ा है। वही दलित जो उनके लिए भी कभी अस्पृश्य था।
अब मुस्लिम फ़िरकों के नेताओं और मौलवियों को मनुवादियों की तरह बाबा साहेब अप्रिय लगते हैं तो लगा करें। जैसे किसी कट्टर जातिवादी हिन्दू के लिए बाबा साहेब महार हैं वैसे ही किसी जातिवादी मुस्लिम के लिए भी हैं। और अगर वह फ़िरक़ापरस्त और कट्टर है तो बाबा साहेब काफ़िर हो जाते हैं! लेकिन ऐसे लोगों के फ़न पर वार उनके घरों की पर्दानशीं औरतों ने कर दिया। उनके हाथ में बाबा साहेब की तस्वीरें थीं। बाबा साहेब हर जाति धर्म से ताल्लुक रखने वाले दमितों और पीड़ितों के नायक हैं। वह पीड़ित अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज के नायक भी हैं। कट्टरपंथियों की कमर टूटनी तय है। फ़िरक़ा और जातिप्रथा का जनाजा उठेगा।
इन्हीं कमरुद्दीन, जमाल, कलीमुल्लाह, मकसूद और रमज़ान भाई के घरों के बच्चे और औरतें लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने के साथ ही साथ फ़िरक़े और जाति पर चोट करते हुए, पितृसत्तात्मक व्ययस्था को ध्वस्त करेंगे। कितने भी फ़तवे आ जाएं, लेकिन अब इन सबके जवाब में प्रगतिशील मुस्लिम, महिलायें और आधुनिक पीढियां ‘स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व’ के मंत्र से सभी फतवों और बंदिशों को काट देंगी।

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