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आदिवासी लोकचेतना, संस्कृति और प्रकृति का जीवंत केंद्र लुगू बुरू

सुरेन्द्र कुमार बेदिया

झारखंड की धरती पर अनेक स्थल हैं जहाँ प्रकृति, संस्कृति और लोकचेतना का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड अंतर्गत ललपनिया स्थित ‘ लुगू बुरू घांटा बाड़ी धोरोम गाढ़ दोरबारी चट्टान ’ झारखंड की लोकसंस्कृति और सामुदायिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह स्थल संताल समाज की सांस्कृतिक अस्मिता, ऐतिहासिक स्मृति और सामाजिक संगठन की निरंतर धारा को अभिव्यक्त करता है।

लुगू बुरू केवल एक आस्था-स्थल नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आत्मनिर्भर सोच, प्रकृति के साथ उसके संतुलित संबंध और सामूहिक जीवन-दर्शन का केंद्र है ,जहाँ लोकचेतना और प्रकृति-समरसता का अद्भुत संगम दिखता है।

पाँच नवंबर, 2025 की दोपहर थी। सूरज सिर के ऊपर जरूर था, पर नवंबर की हल्की नरम धूप यात्रा के लिए बिल्कुल ठीक लग रही थी। जीवन साथी धनमती संग अपने आत्मीय जनों देवकीनन्दन बेदिया, नीता बेदिया, विक्रांत बेदिया, सोनी बेदिया तथा दो प्यारे बच्चे कुहू और वीर के साथ ललपनिया की ओर करीब डेढ़ बजे निकल पड़े। मेले का आखिरी दिन और वीआईपी आगमन से होने वाली सड़क जाम के कारण हमलोगों को वहां पहुंचने के लिए सड़क मार्ग में बदलाव करना पड़ा था जिससे दूरियां बढ़ गई थी। 3-5 नवंबर तक चल रहा अंतरराष्ट्रीय संताल जनजाति का सामाजिक एवं धार्मिक-सांस्कृतिक महासम्मेलन अपने अंतिम पड़ाव पर था। उसकी ऊर्जा व उत्साह हमें जाने के लिए प्रेरित कर रही थी। संताल जनजातीयों का यह अंतरराष्ट्रीय सरना धर्म महासम्मेलन औपचारिक रूप से 2001 से शुरू हुई है।

उस दिन दोपहर की यात्रा का अपना अलग ही एहसास हो रहा था। सड़क के दोनों ओर फैले पेड़ों की छाँह कभी साथ चलती, कभी अचानक छूट जाती। बीच-बीच में धूप की चमक आंखों पर पड़ती, लेकिन हवा में पत्तों की सरसराहट और आसपास का शांत वातावरण मन में एक सुखद लय पैदा कर रहा था।

रास्ते में कुछ ही दूरी तय करने के बाद लुगू बुरू का विराट स्वरूप दिखाई देने लगा। दोपहर की धूप में उसका हरियाली से ढका बदन चमक रहा था मानो पर्वत स्वयं किसी दिव्य आभा में नहा कर खड़ा हो गया है। दूर-दूर तक फैली ढलानों पर धूप और छाँह का खेल चलता रहता और हम उसे निहारते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ते गए।

जैसे-जैसे हम करीब आते गए, प्रकृति की ध्वनियाँ भी बदलने लगीं। कहीं झरने की मद्धिम कलकल, कहीं हवा के झोंके और इसी बीच दूर से सुनाई देती मांदल की थाप। यह थाप केवल संगीत नहीं थी, यह सम्मेलन के ऊर्जा-सागर से उठती हुई सम्मिलित चेतना की पुकार थी ।

लुगू बुरू की तलहटी पर पहुँचते-पहुँचते दोपहर की धूप नरम होने लगी थी। उस समय की रोशनी, वातावरण में घुली विश्वास और प्रकृति की सहज आत्मीयता ने मिलकर एक ऐसा दृश्य रचा था जिसे शब्दों में बाँधना नामुमकिन है। ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं लोकसंस्कृति की ताल पर मुस्कुरा रही हो और हम उसके हिस्सा बन गए हों।

“ लुगू बुरू घांटा बाड़ी ” नाम अपने भीतर गहरी सांस्कृतिक व्याख्या समेटे हुए है। ‘लुगू’ का अर्थ केवल देवता’ भर नहीं, बल्कि लोकआस्था और सामूहिक चेतना का प्रतीक है।‘बुरू’ का अर्थ है पर्वत या पहाड़ी स्थल, और ‘घांटा बाड़ी’ वह स्थल है जहाँ लोकआस्था और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव प्रकट होता है। यह वास्तव में जीवन और संस्कृति की आराधना का पर्वत-स्थल है।

संताल समुदाय के लोग मानते हैं कि यही वह स्थल है जहाँ उनके पूर्वजों ने लुगू बाबा के नेतृत्व में सामूहिक सहमति से सामाजिक जीवन की दिशा तय की थी। दोरबारी चट्टान पर हुई उस ऐतिहासिक सभा में लोगों ने अपने सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक आचरण के नियम स्वयं गढ़े, जो जनतांत्रिक सोच और आत्म-शासन की मिसाल थे। कहा जाता है कि सदियों पूर्व बारह वर्षों तक चली उस “ दोरबारी सभा ” में समाज की रीति-नीति, विवाह-पद्धति, जन्म-मरण संस्कार और सामुदायिक संविधान का निर्माण हुआ था। यह परंपरा आज भी लोक-चेतना, समानता और सामाजिक न्याय की जड़ों को मजबूत करती है।

“ दोरबारी चट्टान ” से “ लुगू गुफा ” तक की यात्रा आसान नहीं है। लगभग सात किलोमीटर लंबा यह दुर्गम पहाड़ी मार्ग हर यात्री की धैर्य, जिजीविषा और आत्मबल की परीक्षा लेता है। कहीं तीखे पथरीले मोड़ तो कहीं घने जंगलों की छाया, जहाँ सूरज की किरणें भी पत्तों की ओट से छनकर आती हैं। हर मोड़ पर झरनों की कलकल, पक्षियों की चहचहाहट और मांदल की मद्धिम गूंज वातावरण में एक जीवंत संगीत रचती है। मानो प्रकृति स्वयं इस यात्रा की सहभागी हो।

लोग पगडंडियों से होते हुए ऊपर की ओर बढ़ते हैं। रास्ते में पत्थरों पर अंकित संताली शब्द और लोकगीतों की स्वर-लहरियाँ उन्हें अपने इतिहास और पहचान से जोड़ती हैं। यह केवल एक चढ़ाई नहीं, बल्कि आत्म-खोज और सांस्कृतिक संवाद की यात्रा है। जैसे-जैसे गुफा का द्वार सामने आता है, अपने पूर्वजों, अपनी मिट्टी और अपनी परंपरा के प्रति गहरा सम्मान से मन में एक नई ऊर्जा का संचार होता है ।

जैसे-जैसे हम मेले की ओर बढ़े, लुगू बुरू घांटा बाड़ी की भूमि अपनी पूरी चेतना और ऊर्जा के साथ जीवंत होती गई। चारों ओर फैले लाल और सफेद झंडों की लहराती कतारें, टेंट सिटी की झिलमिल रोशनी, मांदल की गूंजती थाप और आती-जाती गाड़ियों की आवाज़ें सब मिलकर इस आयोजन को जनजीवन के उत्सव में बदल रही थीं। यह सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि लोक-परंपरा, सामाजिक पहचान और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का विराट प्रदर्शन था।

मेला परिसर में प्रवेश करते ही संताली भाषा और ओलचिकी लिपि की उपस्थिति ने मन को छू लिया। हर बैनर, हर झंडा, हर शब्द अपनी अस्मिता का घोष कर रहा था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के स्वागत में लगे होर्डिंग केवल राजनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि स्वाभिमान और जनभागीदारी के प्रतीक लग रहे थे। लोगों के चेहरों पर अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास के प्रति गर्व स्पष्ट झलक रहा था मानो सदियों से दबे स्वर अब खुलकर गूंज उठे हों।

जगह-जगह ढोल, मांदल, नगाड़े और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की तालें एकता का संदेश दे रही थीं। रंगीन परिधान, झंडे और साज-सज्जा पूरे क्षेत्र को सांस्कृतिक लोकतंत्र के उत्सव में बदल चुके थे। मुख्य मंच पर निरंतर संताली गीत और नृत्य की प्रस्तुति हो रही थी, जिनमें सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि इतिहास, संघर्ष और सामूहिक पहचान का स्वर भी गूंज रहा था।

पास ही रघुनाथ मुर्मू की ओलचिकी लिपि में लिखी पुस्तकें, संताली साहित्य और लोक कविताओं की बिक्री जारी थी। युवा, स्कूली बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सभी उनमें अपनी जड़ों की खोज कर रहे थे। यह मेला वास्तव में एक जीवंत विश्वविद्यालय बन गया था, जहाँ ज्ञान, संस्कृति, इतिहास और लोकचेतना का संगम दिखाई दे रहा था।

मेला का दृश्य बताता था कि आदिवासी समाज केवल परंपरा का संरक्षक नहीं, बल्कि आधुनिकता का निर्माता भी है। लुगू बुरू की यह धरती अब एक तीर्थ से आगे बढ़कर सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र बन चुकी थी, जहाँ आस्था, पहचान और प्रगतिशील चेतना एक साथ सांस ले रही थीं।

रात का दृश्य किसी जीवंत चित्र की तरह और भी मनंमोहक था। “ मुख्य सड़क से लुगू गुफा की ओर उठते मार्ग पर, पत्थरीली चट्टानों के बीच उलगुलान के महानायक धरती-आबा बिरसा मुंडा की प्रतिमा गर्व से विराजमान थी जिसके चारों ओर फैली रोशनियाँ उनके संघर्ष और साहस की याद ताज़ा कर रही थीं। ललपनिया के मेला-क्षेत्र से कुछ ही दूरी पर स्थित छरछरिया झरना, घने जंगलों और पहाड़ी श्रृंखलाओं के बीच से बहता हुआ नीचे उतर रहा था। लगभग चालीस फीट ऊँचाई से गिरता यह झरना रोशनी और ध्वनि का ऐसा संगम रच रहा था, जिसमें प्रकृति अपनी कविता स्वयं गा रही थी। रंग-बिरंगी रोशनियों से नहाया झरना किसी स्वर्गिक सौंदर्य का नहीं, बल्कि धरती की सजीवता का प्रतीक लग रहा था।

पास में बरगद की लटकती जड़ों के बीच से टपकता पानी धरती से टकराने से पहले लोग प्लास्टिक के बोतलों में संग्रह कर रख रहे थे, यह दृश्य एक जीवंत संवाद जैसा लगता था मानो प्रकृति मनुष्य से कह रही हो कि शांति और शक्ति दोनों इसी मिट्टी में बसती हैं। वहाँ की ठंडी बयार, झरने की कलकल और पेड़ों की फुसफुसाहट मिलकर वातावरण में एक गहरी मानवीय शांति और आत्मीयता घोल रही थी।

संकरी पगडंडियों और चट्टानी रास्तों से गुजरते लोग उस स्थान तक पहुँच रहे थे, जहाँ भीतर बैठने और आत्म-चिंतन में डूबने की जगह थी। वहाँ पेड़ की जडे़े , दीपों की मद्धिम रोशनी, पानी की गिरती धारा और मौन का गहरा संगीत था।

यह स्थान केवल पूजा का स्थल नहीं था, बल्कि सामूहिक स्मृति और आंतरिक जागरण का केंद्र था, जहाँ लोग अपनी थकान, भय और संघर्षों को प्रकृति की गोद में रखकर फिर से नई ऊर्जा और जीवन-दृष्टि के साथ लौटते हैं।

जैसा कि सर्वविदित है, आदिवासी समुदाय का जीवन दर्शन मनुष्य और प्रकृति के गहरे सह-अस्तित्व की घोषणा है। उनके लिए धरती केवल उपजाऊ भूमि नहीं, बल्कि जीवित माँ है; जंगल केवल संसाधन नहीं, बल्कि संबंध हैं। वे मूर्ति या कृत्रिम प्रतीकों के उपासक नहीं, बल्कि प्रकृति के सच्चे साधक हैं,क्योंकि वही उनका आश्रय, पनाह और जीवन का मूल स्रोत है।

उनकी आस्था गुफाओं, पर्वतों, वृक्षों, नदियों और डहरों में बसती है; जहाँ खुला आसमान ही मंदिर की छत है। उनके देवता निराकार पत्थरों, बारिश की बूंदों, पेड़ों की पत्तियों और झरनों की धुन में जीवित हैं।

आदिवासी जीवन-दर्शन में प्रकृति और मानव के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि जीना केवल उपभोग करना नहीं, बल्कि संतुलन और साझेदारी का अभ्यास है। उनके धर्म में आडंबर या प्रदर्शन नहीं, बल्कि सादगी, आत्मीयता और पर्यावरण के प्रति गहरा सम्मान दिखाई देता है।

इसीलिए आदिवासी आस्था को किसी “ संगठित धर्म ” के साँचे में ढालना बेमानी होगी और उनके विश्वास का ही नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के एक प्राचीन, समावेशी और प्रगतिशील ज्ञान-स्रोत का अपमान होगा।

आदिवासी जीवन की यह चेतना हमें याद दिलाती है कि जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब उनके जीवन से ही हम टिकाऊ जीवन और सह-अस्तित्व की सच्ची शिक्षा पा सकते हैं। यही दर्शन भविष्य की दुनिया का सबसे बड़ा नैतिक पाठ है, धरती के साथ मिलकर जीना न कि उस पर अधिकार जमाना।

ललपनिया की इस यात्रा के दौरान कुंदरिया गाँव के रामसिंह मांझी से बातचीत एक नई दिशा खोलती है। उन्होंने बताया कि कभी यह स्थान अज्ञात और उपेक्षित था, परंतु 1985 में उड़ीसा के किशन मूर्मू ने इसकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिकता को पहचान दिलाई। उसी वर्ष से यहाँ सामूहिक रूप से आराधना और सांस्कृतिक आयोजन प्रारंभ हुए। यहां देश -विदेश – नेपाल, अफ्रीका, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ से संताल आते हैं। यह केवल धार्मिक शुरुआत नहीं थी, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पुनर्जागृति का प्रारंभिक घोषणापत्र थी। जो मेला उस समय कुछ हजार लोगों से शुरू हुआ था आज लाखों की भागीदारी के साथ जनसांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले चुका है।

वर्ष 2018 में झारखंड सरकार द्वारा इसे राजकीय मेला घोषित किया जाना, केवल सरकारी मान्यता नहीं, बल्कि आदिवासी परंपरा को सामाजिक स्वीकृति और गर्व के प्रतीक में बदलने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। आज यह आयोजन न केवल झारखंड का बल्कि विश्व के संताली समाज का सांस्कृतिक संसद बन चुका है ,जहाँ गीत, नृत्य, साहित्य और जीवन-दर्शन एक साथ जीवंत हो उठते हैं। रात के समय तेनुघाट थर्मल पावर स्टेशन की रोशनी में नहाया मेला परिसर मानो एक नई ऊर्जा से धड़कता है। जहाँ प्रकृति की गोद में तकनीक भी सह-अस्तित्व की भूमिका निभा रही थी।

मेले के अंतिम दिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन का आगमन भी इस चेतना का प्रतीक बना। संताली में दिया गया उनका संबोधन जनसमूह के लिए अपनी मिट्टी की महक, अपनी सामुदायिक पहचान और साझी उम्मीदों की सशक्त आवाज़ बनकर उभरी थी।

मेला-स्थल पर मड़ुआ रोटी, महुआ चाय और छिलका पुआ जैसे अनेकों जनजातीय पारंपरिक व्यंजन न केवल स्वाद दे रहे थे, बल्कि आत्मनिर्भरता और स्वदेशी अर्थव्यवस्था की जीवित मिसाल भी थे। आज धर्म के नाम पर जिस तरह से तांडव देखने को मिलता है इससे इतर लाखों की भीड़ के बीच आदिवासियों की जो शालीनता और अनुशासन इस मेले में दिखा वह इस समुदाय की सामूहिक संस्कृति और नैतिक आचरण का प्रमाण है जो बिना किसी बाहरी नियंत्रण के अपनी मर्यादाओं में जीना जानता है।

लौटते समय तेनुघाट डैम के शांत जल में ढलते सूरज की परछाई मानो इस यात्रा का प्रतीकात्मक समापन थी और फाटक के मुहाने से झर झर झर झर बहता पानी बता रही थी कि हर अंत एक नई शुरुआत है।

“लुगू बुरू” अब केवल एक पर्वत नहीं है वह आस्था, पहचान, एकता और आत्मगौरव का जीवित प्रतीक बन चुका है। यह स्थल हमें याद दिलाता है कि आदिवासी संस्कृति कोई बीता हुआ इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान की सांस लेती हुई जीवनदृष्टि है, जो प्रकृति, समानता और साझेदारी पर आधारित है।

लुगू बुरू की यह गुफा जल, जंगल, जमीन और जीवन के प्रति ज़िम्मेदारी का भाव उत्पन्न करती है और यही सच्ची प्रगतिशीलता भी है। जहाँ मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है, प्रकृति से मिलाती है और समाज को नई दिशा देती है।

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