डॉ डी एम मिश्र के ग़ज़ल संग्रह का लोकार्पण
लखनऊ। जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से डॉ डी एम मिश्र के नये ग़ज़ल संग्रह ‘सच कहना यूॅं अंगारों पर चलना होता है’ का विमोचन एक मार्च को यूपी प्रेस क्लब में आयोजित किया गया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ जीवन सिंह ने कहा कि डी एम मिश्र ने ग़ज़ल रचना में अपनी एक ऐसी ज़मीन तैयार की है जो आज के अन्य ग़ज़लकारों से बहुत अलग है। वे उन ग़ज़लकारों में हैं जिनकी आवाजाही मध्यवर्ग से आगे किसान -श्रमिक वर्ग तक है।
डॉ जीवन सिंह ने मिश्र जी की ग़ज़लों को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि आज जब सच कहना असंभव सा हो गया है तब मिश्र जी छिपे हुए सच को खोजकर लाते हैं और उसे कहने का साहस भी दिखलाते हैं। वे अवध इलाके से हैं इसलिए उसकी सूफियाना प्रेम की संस्कृति को खुले मन से ग़ज़ल में रचते हैं और उस संस्कृति को रचते हैं जो कल की नहीं,आज की संस्कृति है।

मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए “मुक्तिचक्र” के संपादक डॉ गोपाल गोयल ने कहा कि डाॅ डी एम मिश्र की गजलों का स्वर कहीं करुण, कहीं तीखा, कहीं व्यंग्यात्मक और कहीं क्रांतिकारी हो उठता है; किंतु हर जगह उसकी जड़ में मानवीय संवेदना और नैतिक ईमानदारी मौजूद रहती है। उनकी ग़ज़लें यह प्रमाणित करती हैं कि कविता अभी मरी नहीं है; वह अब भी अन्याय के विरुद्ध खड़ी हो सकती है, सच का परचम उठा सकती है और जन-संघर्ष की आवाज़ बन सकती है।
जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि कौशल किशोर ने कहा कि डी एम मिश्र की ग़ज़लें समकाल से मुठभेड़ करती हैं। इनकी गजलें ऐसे समय की हैं जहां झूठ को ही सच के रूप में पेश किया जा रहा है। यह ऐसा आईना है जिसमें हम जनतंत्र के क्षरण, आम आदमी की दुर्दशा, विकास के नाम पर विनाश, प्रेम की जगह नफरत, दमन और विभाजन देख सकते हैं। अमृत काल के खौफनाक सच से हमें रूबरू कराती हैं। ये कलम में धार और वाणी में ललकार की यानी इंकलाब की बात करती हैं। कहती हैं ‘परचम उठा लो हाथ में अब इंकलाब का /सब ताज तख्त छीन लो बिगड़े नवाब का’।

परिचर्चा का आरंभ करते हुए जसम लखनऊ के सचिव फरजाना महदी ने कहा कि डी एम मिश्र की गजलें अहद की सच्चाइयों से मुठभेड़ करती है। इसमें इश्क़ भी है, इंक़लाब भी; मोहब्बत भी है, प्रतिरोध भी; तन्हाई भी है, और अवाम से गहरा रिश्ता भी। यह मजमुआ हमें याद दिलाता है कि अदब अगर ज़माने से कट जाए तो बेजान हो जाता है, और अगर सच के साथ खड़ा हो जाए तो अंगारों पर चलते हुए भी रौशन रहता है।
इस मौके पर डीएम मिश्र ने अपनी कुछ ग़ज़लें और चुनिंदा शेर सुना। वे कहते हैं – ‘क़ातिलों के नगर में ज़िंदा हूँ/भीड़ है साथ मगर तन्हा हूँ/मुरदा होता तो पूछता ही कौन/ज़िंदा हूँ इसलिए तो ऐसा हूँ’। विकास की आंधी चल रही है। परन्तु कैसा है विकास? – ‘ऐसी चली विकास की आँधी न पूछिए/दिल थाम के बैठा हूँ तबाही न पूछिए/आरा लिए तो कोई कुल्हाड़ा लिए खड़ा/कितनी हुई पेड़ों की कटाई न पूछिए’। डी एम मिश्र की समझ है कि चुप रहना बुजदिली है । चाहे जैसे भी हालात हों, उनका डटकर मुकाबला करना है – ‘अगर क़लम में धार नहीं तो क्या मतलब/वाणी में ललकार नहीं तो क्या मतलब’ और ‘सच कहना यूँ अंगारों पर चलना होता है/फिर भी यारो सच को सच तो कहना होता है’।
कार्यक्रम का संचालन सुचित माथुर ने किया। इस मौके पर उमेश पंकज, विमल किशोर, अवन्तिका सिंह, अशोक मिश्र, डॉ अनीता श्रीवास्तव, राजीव ध्यानी, अजीत प्रियदर्शी, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, विनय श्रीवास्तव, धर्मेन्द्र कुमार, रिज़वान अली, आशीष सिंह, अनिल कुमार श्रीवास्तव, शांतम निधि, कलीम खां, ए शर्मा, हेमंत बुंदेली, रामायण प्रकाश, अशोक मौर्य आदि मौजूद थे।

