चित्रकला

कोयले की कालिमा और प्रभाकर पाचपुते की कला

कवि धूमिल के लहजे में कहा जाए तो

कोयला कितना काला है
यह उनसे न पूछिए जिसके लिए यह सोना है
कोयला कितना काला है
यह उनसे पूछिए जिसका सब कुछ काला हो गया

यह सच है कि कोयले के खदान से बहुतों को फायदा हुआ , कितने तो अरबपति खरबपति हो गये लेकिन यह भी सच है कि इस नामुराद ने अपने आस पास के मूल निवासियों के जीवन में कालिख पोत दिया।  यही हाल लगभग हर खनिज की है | मूल्यवान खनिज से सम्पन्नता आनी चाहिए थी मगर वास्तव में ये सब मूल निवासियों के लिए अभिशाप ही साबित हुए | सम्पन्नता की जगह विपन्नता कैसे आई , सम्पन्नता कहां हड़प ली गई ? उस भूमि की संतान आखिर कैसे उजड़ गयी जिसके गर्भ में हीरे जवाहरात भरे थे।  निश्चित तौर पर अर्थनीति में ही कहीं ऐसी कलाकारी की गई कि उसका सोना किसी और के हिस्से और कालिख किसी और के हिस्से।  अर्थव्यवस्था की यह बदकारी किसी भी संवेदनशील कलाकार को झकझोर कर रख देगा। एक ऐसे ही संवेदनशील कलाकार हैं प्रभाकर पांडुरंग पाचपुते।

 

यथार्थ जब विचलित करता है , उद्वेलित करता है कलाकार के कोमल मन पर गहरा असर पड़ता है जिसकी अभिव्यंजना कला में अतियथार्थ को जन्‍म देती है। यद्यपि किसी भी कला आंदोलन के विभिन्न पक्ष और पहलू होते हैं लेकिन एक चीज समान्य है। प्रत्येक कला आंदोलन और तत्कालीन राजनीति व अर्थनीति एक दूसरे से अंतर्सम्बंधित रहते हैं तथा एक दूसरे को प्रभावित व निर्देशित करते हैं। विषमता पैदा करने वाली अर्थनीति और कूटनीति ने दुनिया में क्या क्या गुल खिलाए यह सभी जानते हैं | हां यह भी सच है कि परिस्थितियां और परिघटनाएं किसी कलाकार को गहराई से संवेदित करती है तो किसी को हल्के से छू कर निकल जाती है।

प्रभाकर पाचपुते एक ऐसे रचनाकार हैं जिन्हें आस पास की दारुण परिस्थितियों ने बहुत गहराई से प्रभावित किया | जिसकी अभिव्यक्ति वे चित्र , मूर्ति शिल्प , प्रोजेक्ट वर्क यानि दृश्य कला की विविध आयाम , विधाओं व माध्यम में बहुत ही प्रभावशाली तरीके से करते हैं।

कला की अजनबी दुनिया में प्रभाकर का प्रवेश

कला की दुनिया आम लोगों के लिए एक अजनबी किस्म की दुनिया होती है। यह प्रभाकर के लिए भी अजनबी थी। इस अजनबी दुनिया में प्रवेश के रास्ते अनजाने , अनगढ़ और कठिनाइयों से भरे हुए हैं | यहां हर एक कलाकार को तमाम कठिनाइयों को पार करते हुए अपने तरीके से अपने रास्ते बनाने होते हैं |

प्रभाकर पांडुरंग पाचपुते का जन्म 1986 में सास्ती , चन्द्रपुर के पास महाराष्ट्र राज्य में हुआ था। पिता पांडुरंग नारायण पाचपुते एक किसान थे तथा माता कौशल्याबाई पांडुरंग पाचपुते एक सधारण गृहणी हैं | बचपन से ही उन्हें कला में गहरी रुचि थी | पढा़ई के दौरान वे अक्सर चित्रकारी किया करते | उच्च विद्यालय में पढा़ई के दौरान उनकी चित्रकारी से कवि और लेखक मनोज बोबडे काफी प्रभावित हुए तथा उन्हें उचित तरीके से प्रोत्साहित तथा निर्देशित करने लगे | उस समय तक प्रभाकर पाचपुते को कला की विधिवत पढ़ाई के बारे में कोई खास जानकारी नहीं थी | एक दिन मनोज बोबडे जी ने उनका परिचय श्रीकांत पुराणिक से करवाई जो उस समय खैरागढ़ से कला की पढ़ाई कर रहे थे | जिनकी प्रेरणा से प्रभाकर ने कला की पढ़ाई करने की ठानी फलतः उन्होंने इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से 2009 में मूर्तिकला में स्नातक तथा 2011 में एम एस यूनिवर्सिटी बडौ़दा से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की।

स्नातकोत्तर की पढ़ाई के बाद वे अपने अगले कदम के बारे में सोच ही रहे थे कि एक दिन उन्हें कलाकार तुषार जोग ने कॉल किया | वे बडौ़दा में प्रभाकर के ‘ विजटींग फैक्लटी ‘ थे तथा मुम्बई में रह कर काम करते थे | उन्होंने प्रभाकर को अपने साथ काम करने के लिए आमंत्रित किया | प्रभाकर मुम्बई रवाना हो गये | मुम्बई जाना प्रभाकर पाचपुते के लिए एक तरह टर्निंग पाइंट साबित हुआ | प्रभाकर बताते हैं कि ” तुषार जोग जी ने मेरी बहुत मदद की | एक तरह से उन्होंने मेरे लिए मेन्टर की भुमिका निभाई | ” मुम्बई आने से पहले वे कला जगत के बाहर बाहर ही भटक रहे थे | एक तरह से यहां उनके लिए कला की दुनिया के दरवाजे खुल गये | यहां उनका अनेक तरह के विलक्षण कलाकारों से परिचय हुआ तथा उनके काम से प्रेरणा मिली | अपनी कलात्मक प्रतिभा को ऊंचाई देने के लिए वहाँ उन्हें तरह तरह के अवसर मिले | फिर क्या था कठिन मेहनत और अपनी परिणामकारक सर्जना की बदौलत कला की दुनिया में प्रभाकर ने अपनी खास पहचान बनानी शुरु कर दी।

प्रभाकर की रचनाशीलता और सौन्दर्य दृष्टि

मुम्बई में प्रभाकर पाचपुते का जुड़ाव कलार्क हाउस इनिशियेटिव से बना जिसमें दो क्यूरेटर और सात कलाकार जुड़े हुए थे। फिर उन सात कलाकारों ने शून्य कॉलेक्टिव नाम से एक समूह बनाया | यहां निरंतर कला के हर पहलू पर विचार विमर्श व गहरी बहसें हुआ करती | इन बहसों ने प्रभाकर पाचपुते की कला दृष्टि को विकसित करने में महत्ती भूमिका निभाई | इस समुह में विचार विमर्श के साथ ही एक दूसरे से सिखने सिखाने व एक दूसरे के कला के स्वतंत्र विकास के लिए हर संभव प्रयास किए जाते।

प्रभाकर पाचपुते शुरुआत से ही विषय केंद्रित और आकृति मूलक काम करते हैं ।  कोयला खदान और खनिक मजदूरों को केंद्रित कर उन्होंने कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण काम किये हैं | खनिकों की दुर्दशा व उसके पीछे की वजह को वे अपनी कलाकृतियों में अतियथार्थवादी तरीके से अभिव्यक्त करते हैं। पर्यावरण की भारी क्षति , घातक प्रदुषण , जैव विविधता का संकट इन खदानों के सहउत्पाद है | इन खदानों ने मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए संकट तो उत्पन्न किये ही है इसने मनुष्य के लिए सामाजिक , आर्थिक व सांस्कृतिक संकट भी पैदा किया है। इसे प्रभाकर पाचपुते रचनात्मक रुप से व्यक्त करते हैं।

उनकी कला परियोजना को देखते हुए महत्वपूर्ण कला आंदोलन अतियथार्थ वाद की याद आती है  जन पक्षीय विषय को केंद्रित कर काम करते हुए प्रभाकर पाचपुते प्रभावशाली सम्प्रेषणीयता के लिए आकृतियों को अपनी कल्पनशीलता से प्रभावोत्पादक बनाते हैं और यहीं उनकी सृजनात्मक प्रतिभा अपने उत्कृष्टता को छूती हैं। आकृतियों के बनावट में , दृश्य- लघुता , दृष्टिक्रम या परिप्रेक्ष्य ( perspective ) का कल्पनाशील प्रयोग , प्रभाकर की कला को एक नया आयाम देते हैं।

उनकी कलाकृतियों को देखते हुए शुरु में प्रेक्षक को लगता है यह समान्य सी रचना है लेकिन जैसे ही प्रेक्षक की नजर ठहरती है वह समान्य सी लगने वाली आकृतियां नये नये अर्थ खोलने लगती है तब पता चलता है यह समान्य सी चीज नहीं है यह तो बहुत गूढ़ बात है | बहुत ही गूढ़ और इसके अंदर ढे़र सारी जरुरी चीजें हैं जिस पर हमारा ध्यान नहीं गया |

तकनीकी स्तर पर समान्य और रचनात्मक स्तर पर खास होना प्रभाकर की रचना की खासियत है | वास्तव में प्रभाकर के काम का मूल आकृतियों की कल्पनाशील मगर सारगर्भित बनावट में है | ये कल्पनाशील आकृतियां अर्थपूर्ण तरीके से जब संयोजित होती है तो जैसे प्रेक्षक के सामने वस्तुस्थिति का पूरा यथार्थ सकार हो उठता है। उनका चारकोल का प्रयोग तो गजब का होता है। यथार्थ सादृश्य आकृतियों के माध्यम से प्रत्यक्ष के साथ अप्रत्यक्ष की अभिव्यक्ति प्रेक्षक पर गहरा प्रभाव डालती है। आकृतियों के विभिन्न अंग को अर्थपूर्ण तरीके परिवर्तित कर देना, किसी खास अंग को विषय के अनुसार बड़ा या छोटा कर देना , परिप्रेक्ष्य ( दृष्टिक्रम ) का भावपूर्ण इस्तेमाल करना , उनकी कलाकृतियों को खास बनाता है।

उनकी रचना में छाया प्रकाश का इस्तेमाल प्रसंगानुकुल होता है। यद्यपि कला में प्रतीकात्मक तरीके से मानवाकृतियों या पशुआकृतियों में परिवर्तन करने का पूराना चलन है लेकिन प्रभाकर पाचपुते इसका इस्तेमाल समकालीन संदर्भ में करते हैं।  खनिक मजदूरों की दुर्दशा , उनके संघर्ष , उनके प्रतिरोध को दर्ज करते हुए पाचपुते भावुक हो जाते हैं जो उनकी कलाकृतियों में परिणामकारक प्रभाव उत्पन्न करता है। किसी चित्र की पृष्ठभूमि समान्य होती है तो किसी चित्र की पृष्ठभूमि भूदृष्य सा विस्तारित।
वैसे प्रभाकर पाचपुते चित्रकला , मूर्तिकला , एनिमेशन ‘ साइट स्पेसीफिक परियोजना ‘ जैसे कलात्मक कार्य समान्य रुप से करते हैं | लेकिन उन सब की मिश्रित प्रस्तुति बेजोड़ होती है। किसी खास स्थान पर , पूरे दीवार पर , फर्श सहित सीधे चारकोल से चित्रण कर , पूरे परिवेश को एक समेकित कला कक्ष में तब्दील कर देने की अद्भुत कला तो उनमें है। उनका यह हुनर पूरे परिवेश को ही कलात्मक रुप में बदल देता है , उसे देखते हुए ऐसा लगता है जैसे किसी अलग ही दुनिया में आ गए हैं।

 

वे प्रदर्शनी के दौरान , प्रकाश व ध्वनि के खास प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं  जो उनकी भावपूर्ण कलाकृतियों को और प्रभावोत्पादक बना देता है।  प्रभाकर पाचपुते की कलाकृतियों को देखते हुए जो खास चीज दिखाई पड़ती है वह है विषय वस्तु का चयन , उसकी संरचना और उसकी सम्प्रेषणीयता। रुढ़ व बुर्जुआ सौन्दर्य शास्त्रीय दृष्टिकोण से भिन्न वे अपनी कला रचना के लिए वंचित , मेहनतकश व संघर्षशील लोगों का चयन करते हैं। इसके साथ ही उनकी आकांक्षा और अभिलाषा को एक कलात्मक और सांस्कृतिक विस्तार देते हैं। यह सौन्दर्य दृष्टि प्रभाकर पांडुरंग पाचपुते की कला को मानवतावादी आयाम प्रदान करता है ।  रचनाशीलता और सौन्दर्य दोनों लिहाज से प्रभाकर पाचपुते एक मानवतावादी और एक सुलझे हुए रचनाकार हैं जिसमें रचनात्मक विकास की असीम संभावनाएं मौजूद है।

रचनाशीलता के साथ उपलब्धि की धरातल पर भी देखा जाए तो समकालीन कला परिदृश्य में प्रभाकर पाचपुते ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की है। देश व विदेश के अनेक प्रतिष्ठित प्रदर्शनी में उनकी सराहनीय भागीदारी रही है | साथ ही देश विदेश की प्रसिद्ध कला दीर्घा के साथ अनेक जगह उनकी कलाकृतियां प्रदर्शित हो चुकी हैं।  प्रभाकर पांडुरंग पाचपुते एक ऐसे प्रतिभाशाली युवा कलाकार हैं जिसमें समकालीन कला को समृद्ध करने की प्रतिभा भी है और सार्थक दिशा देने की दृष्टि भी।

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