लखनऊ, 26 अक्टूबर। जन संस्कृति मंच (जसम) की लखनऊ इकाई ने संगठन का 40वां स्थापना दिवस ‘उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के खतरे’ के आह्वान के साथ मनाया। रविवार को जगत नारायण रोड स्थित एक निजी सभागार में इस आह्वान के नाम से आयोजित कार्यक्रम में हिंदी-उर्दू की तीन महिला कहानीकारों कंचन जायसवाल, इशरत नाहिद और विमल किशोर ने अपनी कहानियों का पाठ किया। इन कहानियों की समीक्षा भी महिला आलोचक अमिता यादव ने पेश की।
कहानी पाठ से पहले उत्तर प्रदेश जसम के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर ने जसम के चार दशक का सफर बयान किया।
कौशल किशोर ने कहा कि जैसा कि नाम से जाहिर है इस संगठन का उद्देश्य जनता की संस्कृति को आगे बढ़ाना और जन-विरोधी संस्कृति से संघर्ष करना है। जसम की गतिविधियां समतावादी, क्रांतिकारी, धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील विचारों को मजबूत बनाने और प्रतिगामी विचारों जैसे ब्राह्मणवाद, मनुवाद, पितृसत्ता, सांप्रदायिकता इत्यादि को परास्त करने के लिए हैं। यह वही लड़ाई है जो युगों से चलती आ रही है – लुटेरों की संस्कृति और कमेरों की संस्कृति के बीच संघर्ष।

उन्होंने इस बारे में रोशनी डाली कि क्यों प्रलेस, जलेस, इप्टा, जनम जैसे प्रगतिशील संगठनों की मौजूदगी के बावजूद एक नये संगठन की जरूरत महसूस हुई। एक तो यह कि ये संगठन या तो साहित्यकारों के थे या फिर प्रदर्शन कलाओं के। जसम ने महसूस किया कि एक ऐसे मंच की जरूरत है जहां तमाम साहित्यिक, सांस्कृतिक और कलात्मक अभिव्यक्तियों के बीच सीधा संवाद हो सके। यानी साहित्य, सिनेमा, ललित कलाओं, प्रदर्शन कलाओं, लोक व आदिवासी कलाओं, पत्रकारिता वगैरह से जुड़े लोग एक ही संगठन में हों। दूसरा, 1970 के दशक में राजनीति से मोहभंग की मुखर अभिव्यक्ति मुक्तिबोध, धूमिल, दुष्यंत जैसे कवियों-शायरों की रचनाओं में हो रही थी। इसने एक नये संगठन की जरूरत के लिए जमीन तैयार की। आखिरकार 1985 में जन संस्कृति का पहला सम्मेलन हुआ और नाटककार गुरशरण सिंह पहले अध्यक्ष व कवि गोरख पांडे पहले महासचिव बने। हाल ही में जसम का 17वां सम्मेलन रांची में संपन्न हुआ।
अमिता यादव ने समीक्षा करते हुए कहा कि इशरत नाहिद की कहानी ‘गुलचीं’ पितृसत्तात्मक समाज से उपजे, विकृत मानसिकता से ग्रस्त एक ऐसे पुरुष को पेश करती है जो अपनी बेटी को भी देह से इतर कुछ नहीं समझ पाता। वह पिता के प्यार की आड़ में उसका शारीरिक और मानसिक शोषण करता है। उसकी पत्नी आशिया जब तक यह समझ पाती है तब तक उसकी बेटी हिना पिता रूपी भेड़िये से बचने के लिए मानसिक बीमार समाज के ऐसे ही भेड़ियों की भीड़ में खो चुकी होती है। यह कहानी उस मां का अपराधबोध और छटपटाहट भी व्यक्त करती है जो अपनी बेटी को ऐसे भेड़ियों का ग्रास बनने से बचा पाने में नाकाम रही।

उन्होंने कहा कि विमल किशोर की कहानी ‘खून का फर्क’ पीढ़ियों से आपसी सौहार्द और अमन-चैन के साथ रहते आये एक मोहल्ले शराफतगंज की कहानी है जो देश में सांप्रदायिकता के कारण बदलते माहौल की चपेट में आ रहा है। वोटों की फसल काटने के लिए आखिरकार मोहल्ले में प्रायोजित दंगा होता है और एक दूसरे के दोस्त, हमदर्द लोगों को हिंदू और मुस्लिम बना कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। पाठक तब सन्न रह जाता है जब इन्सानियत का रक्षक कहलाने वाला डॉक्टर भी सांप्रदायिकता के जहर की चपेट में आकर खून को हिंदू और मुस्लिम के रूप में देखने लगता है। यह कहानी आज देश में बदल रही परिस्थितियों के बीच शराफतगंज जैसे इलाकों को बचाये रखने की कोशिशों की मांग करती है।
अमिता यादव ने कहा कि कंचन जायसवाल की कहानी ‘#रोज’ दुख और परेशानियों को जिंदगी का एक हिस्सा मानती है, न कि पूरी जिंदगी। जीवन में घोर दुख के बीच रोज ने खुद को और संबंधों को बखूबी संभाला, लेकिन कभी बेचारी नहीं बनी। पर एक दिन थक गई। ये थकना भी उसने दिखने नहीं दिया। यह कहानी सब कुछ परफेक्ट और आइडियल होने के सामाजिक दबाव के कारण कृत्रिम व्यक्तित्व की विडंबना की तरफ ध्यान आकर्षित करती है। साथ ही यह भी बताती है कि कैसे सोशल मीडिया को, जिसे आजकल भटकाव के रूप में देखा जाता है, एकाकीपन और खालीपन दूर करने का जरिया बना कर जिंदगी को अपनी शर्तों पर गरिमापूर्ण ढंग से जिया जा सकता है।

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ कहानीकार व कवि उषा राय ने कहा कि तीनों कहानियों में एक साझा बिंदु है कि सच कई परतों में छिपा होता है। आज के समय का यह सबसे बड़ा सच है। उन्होंने तीनों कहानीकारों की बेहतरीन रचनाओं के लिए सराहना की। साथ ही यह भी जोड़ा कि अगर इनकी मुख्य महिला पात्रों ने थोड़ा लड़ा होता तो बात ही और होती। उन्होंने कहा कि बिना लड़े कुछ नहीं बदलने वाला।
कार्यक्रम में शिरकत के लिए कंचन जायसवाल खास तौर पर फैजाबाद से आयी थीं। विमल किशोर की अस्वस्थता के कारण उनकी कहानी का पाठ रोहिणी जॉन ने किया। इशरत नाहिद की उर्दू कहानी को हिंदी के श्रोताओं ने भी पूरी सहजता से सुना और हिंदी-उर्दू के बीच दीवार खड़ी करने की कोशिश को बेमानी साबित किया। इन कहानियों पर शैलेश पंडित व आशीष सिंह ने भी सारगर्भित टिप्पणी की। ए. कुमार ने कार्यक्रम का कुशल संचालन करने के साथ-साथ आज के हालात पर एक बेहतरीन गीत प्रस्तुत किया।
धन्यवाद ज्ञापन के लिए मंच पर आयी नगीना निशा ने कार्यक्रम को महिला शक्ति का प्रतीक बताया और कहा कि यह शक्ति एक दिन जरूर बदलाव लायेगी। कार्यक्रम में जन संस्कृति मंच के सदस्य और शहर के प्रबुद्ध नागरिक बड़ी तादाद में उपस्थित थे।

