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साहित्य-संस्कृति

जयपुर में जन साहित्य पर्व

बीती 24 और 25 जनवरी को राजस्थान यूनिवर्सिटी के कैंपस के अंदर थोड़ी छिपी जगह यानि शिक्षक संघ के हाल देरा श्री भवन के लान और उससे लगे हाल में एक नए किस्म के सांस्कृतिक मेले की शुरुआत हुई। लगभग 30 फ़ीट गुणा 80 फ़ीट लान एक हिस्से में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप (पीएजी) के कलाकारों का बड़ा समूह चित्रों की रचना में रत था। इनके कुछ आर्टिस्ट आर्ट इंस्टालेशन को खड़े करने के प्रयास में जुटे थे। लान के धूप वाले हिस्से में प्रगतिशील धारा के सात-आठ प्रकाशकों के स्टालों से एक छोटे पुस्तक मेले की दुनिया साकार हो उठी थी।

लान से थोड़ा ऊपर सीढ़ियों के रास्ते हाल का दरवाजा था जहाँ दो दिन जन साहित्य का मेला जुटना था। हर दिन सुबह 10.30 से शाम 7.30 तक अलग -अलग सत्रों में भाषा, साहित्य , समाज और सरोकारों की चर्चा होनी थी। पहले दिन सत्र एक घंटा देरी से शुरू हुआ जिसे आयोजकों ने अपनी चिंता से काफी अपडेट करने की कोशिश की । सत्रों में बोलने वाले ज्यादातर वक़्ता अपने क्षेत्रो के स्टार न थे फिर भी हाल में 150 से 200 के बीच श्रोताओं की उपस्थिति हमेशा बनी थी। जो निकलकर बाहर आ जाते उन्हें पीएजी के कलाकारों का समूह या फिर किताबों के स्टाल अपने तई खींच लेते और इस तरह हाल से लेकर नीचे लान तक जन साहित्य का वृत्त सृजित हो रहा था।
इसी जयपुर में 25 जनवरी से होने वाले कॉरपोरेट पोषित बड़े साहित्यिक तमाशे जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल के विपरीत यहाँ आम जन ही सहयोगी थे इसलिए समाज और साहित्य के सम्बन्ध में हुई चर्चा बिना किसी दिखावे और नियंत्रण के जमकर हुई। दूसरे दिन सिनेमा वाले सत्र में प्रतिरोध का सिनेमा से जुड़े संजय जोशी के आह्वान पर तुरंत 3000 रुपयों का चंदा भी जुट गया और हर वक़्त अतिथि और श्रोता गप्प करते दिखे।
पहले दिन की सफलता के कारण हुए प्रचार से दूसरे दिन के तीनों सत्रों में 200 सीटों वाला हाल भरा था ।
समारोह की सफलता से आयोजकों ने इसे हर साल मनाने का मन बनाया है। कुल खर्च हुए सवा लाख रुपयों में 120000 तक का सहयोग हासिल हो चुका था और ज्यादातर सहयोग छोटी राशि का था।
गौरतलब है कि जसम, जलेस, पीयूसीएल, दलित अधिकार मंच, शून्यकाल, स्कूल फॉर डेमोक्रेसी, विकल्प और इस तरह के कुल चौबीस संगठन इसके आयोजन से जुड़े थे. इनमें साहित्यकारों के संगठन भी थे तो जमीनी आन्दोलनों से जुड़े जन संगठन भी थे. किसी तरह की कोई फंडिंग नहीं थी. हाँ, युवाओं की बड़ी भागीदारी थी और कार्यकर्ताओं की कमी नहीं थी.
जन साहित्य पर्व के आयोजकों की यह समझ थी कि साहित्य की स्वायत्तता की बात धोखा है. साहित्य पर समग्रता में चर्चा तभी हो सकती है जब कलाकारों, अकादमीशियनों और एक्टिविस्टों को इससे जोड़ा जाए. इसी समझदारी के तहत रणवीर सिंह जैसे नाट्यकर्मी वक्ताओं में थे तो भँवर मेघवंशी जैसे एक्टिविस्ट आयोजकों में थे.
पहला उदघाटन सत्र था ‘पीर पर्वत सी’ जिसमें साहित्य के प्रतिरोधी चरित्र पर बात की गयी. इसमें प्रो. चमनलाल ने लिट् फेस्ट की प्रवृत्ति में ओझल होते सवालों को रेखांकित करते हुए कहा कि इन्हीं सवालों को केंद्र में लाना इस तरह के आयोजनों की सार्थकता है. प्रो. रणवीर सिंह ने रंगकर्मियों की ओर से कहा कि सच्चा रंगकर्मी हाशिये के तबके के लोगों के सवालों से अछूता रह ही नहीं सकता. कवयित्री कात्यायनी ने अपने संगठन के ढेरों उदाहरणों के जरिये बताया कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ सभी उत्पीड़ित तबकों को कतारबद्ध करके ही फैसलाकुन लड़ाई लड़ी जा सकती है. प्रलेस के कार्यकारी अध्यक्ष कवि गोविन्द माथुर ने प्रलेस की ओर से शुभकामनाएं देते हुए कहा कि संस्कृति के मोर्चे पर एकजुटता बहुत जरूरी है. सत्र के सूत्रधार प्रो. जीवन सिंह ने काव्य के प्रतिरोधी चरित्र को रेखांकित करते हुए लिखित एवं लोक साहित्य से अनेक उदाहरण प्रस्तुत किये.
दूसरा सत्र था ‘जन प्रतिरोध का इतिहास’. दक्षिणपंथी ताकतों के सत्ता में आने के साथ हमारी सांझी विरासत को धूमिल करके मिथकीय कथाओं को इतिहास में जोड़ने का जो षड्यंत्र शुरू हुआ है, उसे देखते हुए यह सत्र बहुत महत्त्वपूर्ण था. वरिष्ठ लेखक हरिराम मीणा ने मनुस्मृति को आदर्श मानने वाली शक्तियों को बेनकाब करते हुए बताया कि इस देश की श्रमशील जनता ने यहाँ का इतिहास गढ़ा है, आज उसके अवदान को फीका करने का जो प्रयत्न किया जा रहा है, उसे हम कभी होने नहीं देंगे. इस देश का आदर्श मनुस्मृति नहीं, बाबा साहब का बनाया संविधान है. प्रो. प्रदीप भार्गव ने कहा कि बहुलता मूलतः इस देश की परंपरा का प्राण रहा है, आज उसे ही एकरेखीय बनाकर परंपरा की एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. संस्कृतिकर्मी आशुतोष कुमार ने स्वातंत्र्योत्तर भारत के उन महत्त्वपूर्ण मुकामों को रेखांकित किया जब इस देश के मेहनतकश ने संगठित होकर अपने हक के लिए आवाज़ उठायी और जब शासक वर्ग ने अपना प्रतिक्रियावादी चरित्र दिखाते हुए या तो पूंजीवादी या पुनरुत्थानवादी ताकतों के साथ मिलीभगत कर देश को गर्त में धकेला. सूत्रधार प्रो. राजीव गुप्ता ने इनको संजोते हुए कहा कि अपने इतिहास का सही ज्ञान नई पीढी को कराने के लिए सघन कार्य की आवश्यकता है.
तीसरा सत्र था – ‘बात बोलेगी’ इसमें युवाओं और उनके सामने आने वाली चुनौतियों को उठाया गया.दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. राजीव कुंवर ने उच्च शिक्षा के बाजारीकरण, विश्वविद्यालयों में रिक्तियां, पाट्यक्रम से विज्ञानिक चेतना के निष्कासन जैसे समग्र परिदृश्य को सामने रखते हुए कहा कि युवाओं की लड़ाई, मेहनतकशों, वंचित समुदायों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की लड़ाई से अलग नहीं है बल्कि उसी का हिस्सा है. डॉ घासीराम ने राजस्थान के शिक्षा परिदृश्य पर रोशनी डालते हुए कहा कि राजस्थान को हिन्दुत्त्व की प्रयोगशाला बनाने के लिए शिक्षा को ही औजार बनाया जा रहा है और विवेकशील चेतना के निर्माण का मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट गया है. यह बहुत चिंताजनक है. युवा कवयित्री कविता कृष्णपल्लवी ने मजदूर बस्तियों में काम के अपने अनुभव साझा करते हुए विद्याथियों और मेहनतकशों की एकता के महत्त्व को समझाया. सूत्रधार भँवर मेघवंशी ने रोहित, डेल्टा की सांस्थानिक हत्याओं का ज़िक्र करते हुए देश के विभिन्न शैक्षिक संस्थानों में पनप रहे नए प्रतिरोध को आशा की किरण बताया.
दूसरे दिन का पहला सत्र था ‘बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे’. इसमें ‘प्रतिरोध का सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने तस्वीरों की राजनीति और नए सिनेमाई वृत्त की चर्चा की जो मुख्यधारा को चुनौती देता हुआ हाशिये को प्रमुखता से जगह दे रहा है। ख़ुशी की बात है कि सत्र के बाद सूरतगढ़, जयपुर और सीकर के शहरों में सिनेमा गतिविधि शुरू करने के प्रस्ताव मिले और तीन लोगों ने एक-एक टी बी की हार्डडिस्क फिल्में भरने के लिए सेशन के बाद बाजार से खरीद कर दी।
सूत्रधार हिमांशु पंड्या ने उदयपुर फिल्म सोसाइटी के पांच साला सफ़र के जरिये बताया कि जनसहयोग से सार्थक सिनेमा को जनता तक पहुँचाना संभव है. सत्र में भोपाल के ‘एकतारा कलेक्टिव’ द्वारा निर्मित एक महत्त्वपूर्ण फिल्म ‘तुरुप’ दिखाई गयी. यह फिल्म एक चौराहे पर चल रही शतरंज की बाजियों के जरिये देश की राजनीति को दूषित करने वाले सभी मुद्दों जैसे लव जिहाद, जातिवाद और गौरक्षा आदि को समेत लेती है और बहुत खूबसूरती से अपना सन्देश दे जाती है.
दूसरा सत्र था ‘भाखा बहता नीर’. इसमें जनभाषा के सवाल पर बहस हुई. जहाँ राजस्थानी के जनकवि रामस्वरूप किसान ने जन भाषा और सत्ता पक्ष की भाषा के अलगाव को रेखांकित किया वहीं उन्होंने भाषा में आने वाले शुचितावादी आग्रहों के प्रति भी सावधान किया. उर्दू के प्राध्यापक प्रो. मोहम्मद हुसैन ने उर्दू और हिन्दी के सगेपन को रेखांकित करते हुए कहा कि जो इन दोनों भाषाओं के अलगाव की बात करता है वह इन दोनों भाषाओं का दुश्मन है. प्रो. आर बी गौतम ने चित्रकला की भाषा के विविध आयामों को समझाते हुए भाषा के एक अलग पक्ष को सामने रखा. युवा लेखक प्रियंका सोनकर ने दलित चेतना की भाषा के तीखे तेवरों को रेखांकित करते हुए उसे यथास्थितिवाद को चुनौती देने वाली बताया. संचालक विनोद स्वामी ने कई कविताओं को उद्धृत करते हुए हिन्दी कविता की भाषा के स्वाद को श्रोताओं तक पहुँचाया.


तीसरा और अंतिम सत्र था ‘हम लड़ेंगे साथी’. इसमें जनआन्दोलनों से जुड़े साथी वक्ता थे. मजदूर किसान शक्ति संगठन की अरुणा रॉय ने राजनीतिक साक्षरता को वक्त की सबसे बड़ी जरूरत बताते हुए साहित्यकारों से सरल और आसानी से जनता की समझ में आने वाला साहित्य लिखने की अपील की. माकपा के जुझारू नेता कॉमरेड अमराराम ने सफ़दर हाशमी का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि जनता और संस्कृतिकर्मियों के बीच मीडिया और कार्पोरेट घरानों के कारण दूरी आ गयी है तो संस्कृतिकर्मियों को सीधे जनता से संवाद के लिए सफ़दर की तरह नए रास्ते ढूँढने चाहिए.
सीपीआई (एमएल) की पोलित ब्यूरो सदस्य कॉमरेड कविता कृष्णन ने स्त्रियों के सम्मान के नाम पर गुंडागर्दी करने वाली दक्षिणपंथी शक्तियों की पोल खोलते हुए कहा कि ये लोग स्त्रियों को अपनी संपत्ति समझते हैं और स्त्री सम्मान के नाम पर उसकी हिरासत और नियंत्रण चाहते हैं. उन्होंने आज की स्त्रियों के साहसिक प्रतिरोध के अनेक उदाहरण गिनाते हुए स्त्री आन्दोलन को और मजबूत बनाने की बात कही.
गांधीवादी एक्टिविस्ट हिमांशु कुमार ने गांधी के वैकल्पिक मॉडल की चर्चा करते हुए कहा कि आज का कोर्पोरेट साम्राज्यवाद गांधी के विचार की हत्या करता है और फिर भी गांधी का नाम लेने का पाखंड करता है. वैज्ञानिक प्रो. वी उपाध्याय ने जैव विविधता पर मंडरा रहे आसन्न खतरों के बारे में उपयोगी जानकारी दी. सूत्रधार निखिल डे ने इन विविध आन्दोलनों के साझा सूत्र को रेखांकित करते हुए कहा कि आज जनता के हित की बात करने वाले का सत्ता के साथ टकराव अवश्यम्भावी है.
पूरे आयोजन के दौरान बाहर लॉन में समान्तर सत्र भी चलते रहे और सभी सत्रों में वक्ताओं के साथ साथ श्रोताओं की भी सक्रिय भागीदारी रही. हरियाणा विश्वविद्यालय की प्रो. स्नेहलता ने जब बताया कि महाश्वेता देवी के नाटक ‘द्रौपदी’ की मंच प्रस्तुति के बाद विश्वविद्यालय और प्रशासन बौखला उठा तब आज के हालात की गंभीरता ही ध्वनित हो रही थी. प्रीतम पाल ने जब अपने साथियों के साथ गीत प्रस्तुत किया तब यहाँ इकट्ठे हुए साथियों का जज़्बा दिख रहा था और जब अरुणा रॉय ने युवा चित्रकारों को वहां चित्र बनाते पाया तो वे भी कूची लेकर बैठ गयीं और एक चित्र बना डाला.
आयोजन की पूर्व संध्या पर गांधी सर्किल से आयोजन स्थल तक एक मशाल जुलूस भी निकाला गया. पहले दिन विचार सत्रों के बाद शाम को कवि गोष्ठी हुई जिसमें हिन्दी और राजस्थानी के अनेक कवियों ने अपनी कवितायेँ प्रस्तुत कीं. दूसरे दिन शाम को ‘ब्रीदिंग स्पेस’ द्वारा निर्मित, बादल सरकार द्वारा लिखित और अभिषेक गोस्वामी द्वारा निर्देशित नाटक ‘हट्टमाला के उस पार’ हुआ. आयोजन की समाप्ति पर घोषणा हुई जिसे ‘जयपुर घोषणा’ कहा गया जिसमें बिना कॉर्पोरेट मदद के इसे हर साल दुहराने का संकल्प लिया गया है।
ज़िंदाबाद जन साहित्य पर्व।
ज़िंदाबाद युवा साथियों जिनकी मेहनत और लगन से यह संभव हुआ।

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