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जनमत

टाइम की 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में भारतीय

अमेरिकी पत्रिका-टाइम- में छपी दुनिया के सौ प्रभावशाली लोगों की सूची चर्चा में है. साथ ही चर्चा में है,उसमें शामिल भारतीयों के नाम.

सबसे पहले उन नामों की चर्चा कर लेते हैं,जिनकी कम चर्चा की जा रही है. टाइम की प्रवर्तक यानि पायनियर(pioneer) श्रेणी में इंग्लैंड के कैंब्रिज विश्वविद्यालय में क्लिनिकल माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर रविंद्र गुप्ता का नाम है. प्रो.गुप्ता की अगुवाई में हुए शोध के चलते पिछले साल लंदन में एचआईवी से ग्रसित व्यक्ति का इलाज हुआ. इतिहास में एचआईवी से पूरी तरह ठीक होने वाला यह दूसरा मरीज है.

टाइम में प्रो.गुप्ता पर लेख उसी व्यक्ति ने लिखा है,जो एचआईवी से उपचारित होने वाला इतिहास में दूसरा व्यक्ति है.  एडम कॉस्टिलेजो नाम के इस व्यक्ति ने लिखा है कि “ उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया,मुझे सशक्त करके दुनिया में एचआईवी के साथ जीने वाले लोगों के लिए प्रेरणा का दूत बनाया.मैं खुशनसीब हूँ कि  मैं उन्हें जानता हूँ और इस रोग को परास्त करने के उनके समर्पण से वाकिफ़ हूं. ”

टाइटंस श्रेणी में गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई का नाम शामिल है. उनके बारे में लिखते हुए जेपी मॉर्गन चेज के सीईओ जैमी डिमोन ने लिखा कि एक अमेरिकी कंपनी के सर्वोच्च पद पर पहुँचना और लंबे अरसे तक उसे सफलता के शिखर पर बनाए रखना आसान काम नहीं है.

कलाकारों की श्रेणी में फिल्मस्टार आयुष्मान खुराना को टाइम ने सौ प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया है.उनके बारे में लिखते हुए अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने लिखा है कि 130 करोड़ की आबादी वाली देश में बहुत छोटा प्रतिशत है जो अपने सपने सच कर पाता है. आयुष्मान उनमें से एक है. प्रतिभा और कठिन मेहनत के अलावा धैर्य, दृढ़ता और निडरता,वो गुण हैं, जिन्होंने आयुष्मान को इस मुकाम तक पहुंचाया.

राजनेताओं की सूची में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी टाइम ने दुनिया के 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया है. लेकिन उनके बारे में जो पत्रिका ने लिखा है, “दुनिया में मोदी जी का डंका बज रहा है” का दावा करने वाले भक्तिभाव वाले उनके समर्थकों के लिए भारी झटका है. नरेंद्र मोदी के बारे में टाइम के संपादक कार्ल विक ने लिखा है.

अपनी टिप्पणी में विक ने लिखा है कि उन्होंने दुनिया के सबसे जीवंत लोकतंत्र को गहरी छाया में धकेल दिया है. विशेष तौर पर मुस्लिमों को निशाना बनाते हुए उनकी हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी ने  भारत की विविधता को नष्ट कर दिया है. विक ने लिखा कि भारत में सभी धर्मों के लोग शांतिपूर्वक रहते आए हैं.  अपना पूरा जीवन शरणार्थी के तौर पर भारत में  गुजारने वाले दलाई लामा ने इस मामले में भारत की तारीफ “समरसता और स्थिरता” के उदाहरण के रूप में की है. लेकिन नरेंद्र मोदी ने इस सब को संदेहास्पद बना दिया है. महामारी का प्रयोग विरोधी मत का गला घोंटने के लिए किया गया.

हालांकि भारत में मोदी समर्थक इसे टाइम का भारत के प्रति पूर्वाग्रह कह कर खारिज करने की कोशिश कर रहे हैं. अंग्रेजी न्यूज़ पोर्टल- डीएनए ने तो इस लाइन पर बकायदा लेख लिखा है. लेकिन टाइम ने सिर्फ मोदी के बारे में ऐसा नहीं लिखा है. अमरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से लेकर ब्राज़ील के राष्ट्रपति जाइर बोलसेनारो तक जिन की भी नीतियों की मार उनके देशों की जनता झेल रही है,उनके बारे में ऐसी ही कठोर टिप्पणी टाइम पत्रिका ने उन्हें प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल करने की साथ ही की है.

तो क्या मोदी के संबंध में की गयी सारी टिप्पणी में कोई ऐसी बात भी है,जिससे असहमत हुआ जा सके ? निश्चित ही. टाइम ने लिखा है कि मोदी ने ऐसे शासन किया जैसे कि हिंदुओं के अलावा किसी के होने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता. इसमें असहमति का बिन्दु क्या है ? असहमति यह है कि मोदी की शासन प्रणाली से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हिंदुओं के होने न होने से भी उनको कोई ज्यादा सरोकार नहीं है. लॉक डाउन की मार झेलती बड़ी आबादी,किसानों और मजदूरों के हितों पर कुठराघात करने के लिए लाये गए क़ानूनों से स्पष्ट है कि बहुसंख्यक आबादी और उसके हितों से उनका कोई लेना-देना नहीं है !

टाइम के 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में सबसे आश्चर्यजनक नाम- बिलकीस बानो का. 82 वर्षीय बिलकीस बानो सीएए-एनआरसी के खिलाफ शाहीन बाग आंदोलन की वो दादी हैं,जो उस आंदोलन की अगुवाई में सुबाह आठ बजे से लेकर आधी रात तक,धरना स्थल पर मौजूद रहती थी. उनके बारे में लिखते हुए प्रसिद्ध पत्रकार राणा अय्यूब ने लिखा कि मोदी सरकार की बहुसंख्यकवादी नीतियों के चलते जहां महिलाओं और अल्पसंख्यकों की आवाजें व्यवस्थित रूप से समाप्त की जा रही हैं,वहां बिलकीस प्रतिरोध की प्रतीक बनी.

यह गौरतलब है कि जब सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन को केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस निरंतर लांछित करने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे समय में टाइम द्वारा उस आंदोलन में शामिल एक सामान्य बुजुर्ग महिला को दुनिया की सौ प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल करना,उस आंदोलन के महत्व को रेखांकित करता है.

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