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अच्छे मुसलमान, बुरे मुसलमान: ज़ोहरान ममदानी के हवाले से

इस दौर में जबकि न्यूयॉर्क की चुनावी जीत ने राजनीति के व्याकरण को झिंझोड़ कर रख दिया है, कम से कम अमेरिका में तो अच्छे एवं बुरे मुसलमान के परंपरागत विभेद की चूलें हिल गई ही हैं।

राशिद अली

 

ज़ोहरान ममदानी की अग्नि-परीक्षा अभी बाकी है। वह कैसे मुसलमान हैं? जब तक वह खुद दावा न करें, उनकी धार्मिक पहचान सुनिश्चित कर पाना कठिन है।

9/11 के परिप्रेक्ष्य में जब महमूद ममदानी ने अपनी मौलिक कृति ‘गुड मुस्लिम, बैड मुस्लिम’ की रचना की थी उस समय उन्होंने सोचा भी नहीं होगा की जिस राजनीतिक द्वैध का प्रवर्तन वह कर रहे हैं वही एक दिन उनके अपने परिवार का सच बन जाएगा। ऐसा लगता है कि दो दशकों बाद न्यूयॉर्क में उनके बेटे ज़ोहरान ममदानी की प्रचंड जीत ने ‘अच्छे मुसलमान’ के मायने को एक नया आयाम दे दिया है।

 

सीनियर ममदानी के लिए ‘अच्छे मुसलमान’ का आशय कभी नैतिक मानदंडों पर खरा उतरना नहीं रहा। उनकी जिज्ञासा के केंद्र में सत्ता थी। यह एक “कल्चर टाक” यानी एक नया शब्द-युग्म था, यह बताने के लिए कि कैसे पश्चिम की दृष्टि में मुसलमानों को दो श्रेणियों में बाँट दिया गया था, ‘निष्ठावान’ और ‘खतरनाक’ मुसलमान। ‘अच्छे मुसलमान’ वह थे जो पश्चिम के तर्क एवं पक्षधरता के खांचे में फिट बैठते थे, ज़ाहिर है कि कई मुद्दों पर उन्हें समझौता भी करना पड़ता था। और वे जो उनके पालतू बन जाने को तैयार नहीं थे वे ‘बुरे मुसलमान’ थे। हांलाकि उनका बेटा इस समय वही कर रहा है जिसकी उन्होंने कभी  परिकल्पना की थी।

सीनियर ममदानी के अनुसार पश्चिम राजनीति-विहीन इस्लाम का पक्षधर था, धर्म खुद ही अराजनीतिक मुद्दा बन गया था। अराजनीतिक होते ही धर्म अपनी धार खो देता है। प्रतिरोध को कट्टरता का जामा पहना देना बहुत आसान होता है। उपभोगवादी संस्कृति में जज़्ब होते ही ‘अच्छे मुसलमान’ गर्व से भर जाते हैं। शायद यही वजह हो कि ईराक पर अमरीकी हमले के दौरान पश्चिम ने मुस्लिम-स्वीकार्यता का अनुक्रम इस प्रकार विकसित कर लिया कि सऊदी अरब, क़तर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे तेल और सुरक्षा की दृष्टि से भरोसेमंद देशों को ‘अच्छे मुसलमान’ माना गया और राजनीतिक रूप से असुविधाजनक देश ‘बुरे मुसलमान’ कहलाए।

तो ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ केवल भू-राजनीतिक हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। तेहरान किसी समय दोस्त हुआ करता था, पर अब वह अछूत हो गया है। ईराक़ के साथ भी वैसा ही है। यहाँ तक कि ओसामा-बिन-लादेन को भी, जो किसी दौर में शीत-युद्ध की उपलब्धि हुआ करता था बाद के दिनों में बुराइयों का सर्वोच्च प्रतीक बना दिया गया।

यही ढपली तो हमारे अपने घर में भी बज रही है। एक लंबे जमाने से तालिबान के प्रति जारी भारत की विभेद-नीति को उसी के साथ हमारे प्रछन्न-सहयोग ने एक रोचक मोड़ दे दिया है। अब इस दौर में यदि पाकिस्तान एक ‘बुरा मुसलमान’ है तो ज़ाहिर है कि तालिबान ‘अच्छा मुसलमान’ ही होगा।

ज़ोहरान ममदानी भी अभी अग्नि-परीक्षा के दौर में हैं। वह कैसे मुसलमान हैं? जब तक वह खुद दावा न करें, उनकी धार्मिक पहचान सुनिश्चित कर पाना कठिन है। उनके पुरखे खोजा शिया-मुस्लिम व्यापारी थे जो भारतीय प्रवासी के तौर पर तंज़ानिया और युगांडा चले गए थे। इस्लाम की रूढ़िवादी समझ के अनुसार खोजा (निजारी इस्माइली) को ‘अच्छे मुसलमानी’ तबके में अक्सरहा अछूत माना जाता है।

 

हमारे समय के पश्च-औपनिवेशिक काल के सर्वाधिक प्रभावी चिंतकों में से एक, सीनियर ममदानी का जन्म तत्कालीन बॉम्बे में और पालन-पोषण कंपाला में हुआ था। वह खुद को निरीश्वरवादी मानते हैं। ज़ोहरान की माँ मीरा नायर एक विश्व-प्रसिद्ध फ़िल्मकार हैं, योगाभ्यास करती हैं और सांस्कृतिक-सीमाओं के आर-पार उनका अबाध आना-जाना लगा रहता है। एक हिन्दू माँ और निरीश्वरवादी पिता की संतान, जोहरान की पहचान एक जटिल- वंशानुगत वर्गीकरण में उलझी हुई है। तो क्या इसका अर्थ यह निकलता है कि पश्चिम उनकी इस पहचान से खुश है? रिपब्लिकनों ने तो उनपर मेयर के “जेहादी” उम्मीदवार होने का ठप्पा ही लगा दिया था।

 

भौगोलिक परिदृश्य में यह विरोधाभास और भी जटिल हो जाता है। भारत में बहुत से लोग ज़ोहरान को भारतीय-प्रवासियों का ही एक हिस्सा मानते हैं, परंतु वास्तव में उनकी जड़ें तो पूर्वी-अफ्रीका में हैं।

इस दौर में जबकि न्यूयॉर्क की चुनावी जीत ने राजनीति के व्याकरण को झिंझोड़ कर रख दिया है, कम से कम अमेरिका में तो ‘अच्छे’ एवं ‘बुरे’ मुसलमान के परंपरागत विभेद की चूलें हिल गई ही हैं। किसी जमाने में शाही-नयनाभिरम का प्रतीक रहा न्यूयॉर्क आज नसों को जमा देने वाले विरोधाभास का सामना कर रहा है: उसी लोकतान्त्रिक ताने-बाने में से एक ऐसा मुसलमान निखर कर आया है जो उसके बने-बनाए खांचे में फिट आने से इंकार करता है।

ज़ोहरान का अरबी में मतलब होता है “आभा” या “शुक्र गृह”- एक जीवित विरोधाभास जो जितना चमकता है उतना ही जलता भी है। शाही संकल्पना में वह एक ओर समावेशन के प्रतीक हैं तो दूसरी ओर थर्रा देने वाली बेचैनी भी हैं। जो भी हो, पश्चिम को उनकी चमक बरदाश्त नहीं हो रही है जबकि उसने ही उनमें भरोसा भी जताया है। फिलिस्तीनियों की नस्लकुशी को लेकर उनकी सोच उन्हें सर्वाधिक बेचैन कर रही है। शाहों को वही किरणें  भाती हैं जो उनके माध्यम की ओर झुकती हैं, न कि वे किरणें जो उनसे होकर गुजर जाती हैं।

लेखक जम्मू  केन्द्रीय  विश्वविद्यालय में अध्यापक हैं।             अनुवाद: दिनेश अस्थाना

“द इंडियन एक्स्प्रेस” दिनांक 12.11.2025 से साभार

 

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