( भानु कुमार दुबे ‘मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी’ एक तरक्कीपसंद शायर रहे हैं। उनका जन्म 26 सितंबर 1953 को हुआ था। आज से दो साल पहले 28 जनवरी 2023 को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। अपने उतार-चढ़ाव भरे जीवन में उन्हें तीन बार मानसिक चिकित्सालय में भर्ती होना पड़ा था। एक बार वह टीबी में ऐसे मुब्तिला हुए कि सेकंड स्टेज तक पहुँच गए थे पर यह उनकी जिजीविषा ही थी जिसके चलते वह इन सारी बाधाओं को पार करते हुए अपना लेखन जारी रख सके। भाकपा(माले) के वह समर्पित कार्यकर्ता थे। छपने-छपाने के मामले में वह बेहद संकोची रहे इसलिए उनका केवल एक ग़ज़ल संग्रह ‘सांस्कृतिक संकुल’ से “क़तरे की रवानी” नाम से प्रकाशित हो सका। लेखक, अनुवादक दिनेश अस्थाना ने संस्मरण की इस शृंखला में बहुत डूब कर अपने यार ‘मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी’ को याद किया है। )
भानु चिट्ठी बड़े मन से लिखता था, ऐसा कि लगता वह सामने बैठा बातें कर रहा हो। शिप की मेरी नौकरी बहुत उबाऊ थी। बारह घंटे की शिफ्ट होती थी- पंद्रह दिन दोपहर बारह बजे से रात बारह बजे तक और पंद्रह दिन रात बारह बजे से दोपहर बारह बजे तक। इन पालियों के बीच एक हफ्ते का ब्रेक मिलता था।
शिप की नौकरी के दौरान चिट्ठी पढ़ने का मौका ही नहीं मिलता था, ड्यूटी की थकान के बाद खा-पीकर जब अपने कमरे में पहुँचता तो सीधे बिस्तर ही दिखायी देता था। और अगली जाग के बाद फिर ड्यूटी जाने की अफरा तफरी, एक हफ्ते के ब्रेक में ही कुछ लिखना-पढ़ना हो पाता था। ब्रेक के दौरान मजदूरों को भुबनेश्वर के मारवाड़ी होटल की डाॅरमेटरी में रखा जाता था। 15 दिन की ड्यूटी और 7 दिन रेस्ट का वेतन, रेस्ट के आखिरी दिन वहीं दिया जाता था। रेस्ट का वेतन, ड्यूटी के वेतन का दो-तिहाई होता था।
अगले दिन भुबनेश्वर हवाई अड्डे से हेलीकाॅप्टर से हमलोगों को शिप पर पहुँचा दिया जाता था। रेस्ट के दौरान मैं अपने उसी कृपालु रिश्तेदार के यहाँ भारतीय पर्यटन विकास निगम के ट्रैवलर्स लाॅज में ठहरता था। केवल वेतन लेने उस होटल में जाता था।
और दूसरे देशों के कर्मचारियों के बारे में तो मुझे नहीं मालूम लेकिन भारतीयों के लिये शिप में शराब पीने की सख़्त मुमानियत थी। पंद्रह दिन के सिगरेट का स्टाॅक लेकर हमलोग शिप में जाते थे, पर शराब तो केवल रेस्ट के दौरान ही पी जा सकती थी। इसलिये होटल में आने पर कोई बंदा होश में रहता ही नहीं था। एक था रिचर्ड्स, शराब का इस क़दर दीवाना कि होटल में आते ही शराब में डूब जाता और आखिरी दौर तक पीता रहता।
एक बार कैप्टन हर्ष ने उसे इसके लिये बहुत डाँटा और उससे शराब छोड़ देने का वादा ले लिया था। अगली वार वेतन बाँटने के लिये जब वह होटल में आये तो उसे फिर नशे में धुत पाया। लेकिन जब वह डाँटने लगे तो उसने बड़ी मासूमियत से कहा, ‘‘सर मैंने शराब नहीं, केवल बियर पी है।’’ तब पता चला कि उसने सिर्फ उस दिन 30 बोतल बियर पी थी। अचानक कोई गन्ध पाकर कैप्टन ने पूछा, ‘‘हू हैज़ टेकेन कन्ट्री लिकर ?’’ स्वभाव के एलीटनेस के कारण उन्हें ‘ कन्ट्री लिकर ’ से सख़्त नफ़रत थी, वही ‘कन्ट्री लिकर’ जिसे फ़िराक़ साहब ‘जमुनापारी’ बोलते थे। मैं चूँकि किसी वरिष्ठ रिश्तेदार के दकियानूसी घर में रह रहा था इसलिये किसी तरह की शराबनोशी के बारे में सोच भी नहीं सकता था।
उस शिप में मजदूरों के दो निम्नतम वर्ग थे- राउस्ट एबाउट (कुली) और रफ़ नेक (स्किल्ड कुली), इनके अलावा किचेन ब्वाय (बर्तन धोने वाले), रूम ब्वाय (कमरों की साफ-सफाई रखने वाले), लाॅन्ड्री ब्वाय (धोबी) आदि भी थे। ये सभी लोग हिन्दुस्तानी थे- अधिकतर गोआनी और मुम्बई के मछुवारा परिवार के लोग, कुछ आन्ध्र-प्रदेश, केरल या तमिलनाडु के भी थे पर उन सबका सम्बन्ध किसी न किसी रूप में मुम्बई के बन्दरगाहों से ही था। कुछ स्थानीय उड़िया लोग भी थे जो मेरी तरह ही किसी न किसी लिंक से आ गये थे। दो सुपरवाइज़र भी थे। ये सारे लोग मुम्बई की किसी लेबर-सप्लाई कम्पनी से जुड़े थे, नाम तो याद नहीं आ रहा है। मुझे भी उसी कम्पनी से जोड़ दिया गया था।
ज़ाहिर है कि हमलोग ऐटवुड ओशिनिक्स इन्काॅरपोरेटेड या फ्रैड्रिक्सबर्ग के कर्मचारी नहीं थे। हमारा नाम किसी अभिलेख में दर्ज नहीं था, हमें एक प्रिंटेड पेपर पर दस्तख़त लेकर वेतन दिया जाता था, जिसे मैं समझता हूँ कि वेतन देने के बाद सुरक्षित नहीं ही रखा जाता रहा होगा। बीमार पड़ने पर दवा के लिये शिप में ही एक छोटी सी डिस्पेंसरी थी, वहाँ एक बिहारी डाॅक्टर भी था। यानी हिन्दी बोलने वाले उस शिप में हम दो ही थे, बाकी की हिन्दी वही बम्बइया हिन्दी थी जो मुझे एकदम वाहियाद लगती थी। यह ख्याल ही ख़ौफ़ज़दा कर देने के लिये काफी था कि खुदा-न-ख़्वास्ता कोई समुद्र में गिरकर मर जाय तो उसके घरवालों को उसका पता तब तक नहीं चल सकता जब तक कि शिप का प्रशासन ही इस बात के लिये पहल न करे। और उसपर भी हम जैसे ठेके के कर्मचारियों का न तो कोई रिकाॅर्ड था और न प्रशासन को उसके बारे में कोई जानकारी ही थी। मुझे लगता है कि इन हालात में वर्तमान में भी कोई तब्दीली नहीं हुयी होगी।
लगभग रोज ही अपने शरीर के किसी न किसी भाग को चोटिल करते हुये मैंने कुली, पेंटर, सफाई मजदूर, वायरिंग आदि का काम करते हुये चार-पाँच महीने वहाँ गुजार दिये थे। तभी हमारी टोली में एक अमेरिकन कुली भी शामिल हुआ। काम में नया होने के बावजूद अमेरिकन होने के कारण वह खुद को हमलोगों का बाॅस समझने लगा। जब यह पता चला कि उसका वेतन 150 नहीं 2,500 डाॅलर प्रतिमाह था, 15 दिन की ड्यूटी के बाद उसे 7 दिन का नहीं बल्कि 15 दिन का रेस्ट मिलता था और रेस्ट भुबनेश्वर में नहीं बल्कि सिंगापुर में मिलता था, तो मेरे तन-बदन में आग लग गयी। और कुछ तो नहीं कर सकता था पर मैं उससे चिढ़ने जरूर लगा।
एक दिन किसी बात को लेकर उससे मेरा झगड़ा हो गया और मार-पीट की नौबत भी आ गयी। यह सारा वाकया हमारे अमेरिकन क्रेन-ड्राइवर के सामने हुआ था लिहाज़ा अगले दिन जब मैं ड्यूटी पर जाने से पहले नाश्ते के लिये किचन में गया तो नोटिस बोर्ड पर मुझे किचेन-ब्वाय का काम करने का आदेश दिखायी दिया। मैं समझ गया कि बस, मेरा विदाई का वक्त आ गया है। हेलीकाॅप्टर हर हफ्ते एक निर्धारित दिन ही आता था। कुछ संयोग ही रहा उस निर्धारित दिन से एक दिन पहले उसी नोटिस बोर्ड पर मेरा छँटनी का आदेश चिपका हुआ था और मौसम की ख़राबी के चलते अगले दिन हेलीकाॅप्टर नहीं आ सका, पूरे क्रू को नाव से आना पड़ा, 80 नाॅटिकल माइल दूर पैरादीप बन्दरगाह पर, समुद्र की लहरों पर उछलती-कूदती नाव में लगभग 8 घंटे। एक हफ्ते बाद मैं मिर्ज़ापुर वापस आ गया। ‘‘फिर बैतलवा, डार क डार।’’
वह अप्रैल-मई 1976 का दौर था। बेल-बाॅटम्स के फैशन का दौर था। जीन्स चलन में आ चुके थे, खासकर चौड़े काॅलर वाली जीन्स के शर्ट्स। मैंने भी भुबनेश्वर में ही एक जीन्स के चैड़े काॅलर वाली शर्ट और चैड़ी मोहरी वाली बेल-बाॅटम्स सिलवाई थी। उस समय तक सिले-सिलाये कपड़ों का रिवाज़ आम नहीं हुआ था। अफगानिस्तान में भुट्टो के उकसावे पर जमीयत-ए-इस्लामी पार्टी के लोगों ने एक गृह-युद्ध छेड़ रखा था। तब तक मुझमें इतनी राजनीतिक समझ नहीं आयी थी कि मैं इस गृह-युद्ध के निहितार्थ पहचान पाता, बस एक ही समझ थी कि हर सत्ता दमनकारी ही होती है और इसीलिये अफगान विद्रोहियों के प्रति भी मेरे मन में कहीं कोई नरम कोना तो था ही। मैं वही जीन्स वाला सूट पहनकर भानु के यहाँ आया था। हमलोगों का साझा दोस्त गोपाल भी वहीं था। मुझे देखते ही गोपाल ने कहा, ‘‘कइसन लग ता इ ड्रेस ?’’ और मेरे मुँह से बेसाख़्ता निकला, ‘‘अफगान रिबेल।’’ इसपर भानु ने मुझे टोका, ‘‘अफगान रिबेल त मत कहा।’’ आज मुझे समझ में आता है कि उस समय भी भानु की राजनीतिक समझ कितनी साफ थी।

