( भानु कुमार दुबे ‘मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी’ एक तरक्कीपसंद शायर रहे हैं। उनका जन्म 26 सितंबर 1953 को हुआ था। आज से दो साल पहले 28 जनवरी 2023 को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। अपने उतार-चढ़ाव भरे जीवन में उन्हें तीन बार मानसिक चिकित्सालय में भर्ती होना पड़ा था। एक बार वह टीबी में ऐसे मुब्तिला हुए कि सेकंड स्टेज तक पहुँच गए थे पर यह उनकी जिजीविषा ही थी जिसके चलते वह इन सारी बाधाओं को पार करते हुए अपना लेखन जारी रख सके। भाकपा(माले) के वह समर्पित कार्यकर्ता थे। छपने-छपाने के मामले में वह बेहद संकोची रहे इसलिए उनका केवल एक ग़ज़ल संग्रह ‘सांस्कृतिक संकुल’ से “क़तरे की रवानी” नाम से प्रकाशित हो सका। लेखक, अनुवादक दिनेश अस्थाना ने संस्मरण की इस शृंखला में बहुत डूब कर अपने यार ‘मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी’ को याद किया है। )
अक्सर जब मैं भानु के घर जाता तो उसे अपने पिताजी के साथ अकादमिक बहसों में उलझा पाता। आनन्द दुबे ज्ञान के भंडार थे, मार्क्सवाद के साथ ही वह इंडियन माइथोलाॅजी के भी विद्वान थे। धाराप्रवाह बोलते थे। भानु की समझ मुझसे कुछ ज्यादे थी, वह ध्यान से सुनता रहता था और मैं टुकुर-टुकुर दोनों का मुँह ही ताकता रहता था। कई बार वह कहते भी थे कि कागज़-कलम लेकर बैठा करो, कुछ नोट करो। पर सच यह है कि इस मामले में हम दोनों ही आलसी निकले। आज अफसोस होता है कि काश हम लोगों ने उनकी बात मानी होती तो ज्ञान के कुछ विन्दु आज हमारे खाते में भी होते।
भानु शतरंज और कैरम का माहिर खिलाड़ी था। शतरंज की शुरुआती चालें मैंने उससे ही सीखी थीं। उसने मुझे जो किताब दी थी-‘ हाउ टु प्ले चेस ’ उसमें उन दिनों के चैम्पियन गैरी कास्पोरोव और अनातोली कारपोव की बहुत सी कामयाब चालें दी हुई थीं। भानु के साथ खेलते हुये मैं उन चालों को आजमाता था लेकिन बहुत देर टिक नहीं पाता था। तीन-चार चालों के बाद भानु कोई ऐसी चाल जरूर डाल देता था कि मेरी सारी पढ़ी हुयी योजनायें धरी की धरी रह जातीं।
शतरंज उसके लिये एक सनक की तरह था। ओलियर धाट के पास भूसे की एक दुकान थी। दुकान घर के बाहरी हिस्से में थी, उसके पीछे एक आँगन था और उसके पीछे बरामदा और फिर एक कमरा। दुकान में भूसा, खली, चूनी, भूसी आदि जानवरों का चारा बिकता था पर उसके पीछे के आँगन, बरामदे और कमरे में कैरम-बोर्ड और शतरंज की बिसातें बिछी रहती थीं। भानु का पूरा दिन वहीं गुजरता था, न नाश्ते की परवाह और न खाने की। सिगरेट पीना जब कभी मँहगा पड़ने लगता तो वह बीड़ी पीने लगता था। बाहर दुकान में भले चहल-पहल हो पर अन्दर कैरम और शतरंज की बिसातों के गिर्द एकदम सन्नाटा छाया रहता था, आवाजें आती तो सिर्फ स्ट्राइकर की ठक-ठक की या फिर मद्धिम स्वर में ‘शह’ या ‘मात’ की। मैंने तो कभी नहीं देखा पर भानु ने खुद बताया था कि ऐसा ही एक अड्डा गणेशगंज में भी था। भानु की बैठकी वहाँ भी होती थी।
बीड़ी-सिगरेट पीने की भानु की आदत, जिद और जिजीविषा के सिलसिले में एक बात याद आती है। शतरंज-कैरम के इस अड्डे के सामने ही डा0 टी0डी0 श्रीवास्तव की क्लीनिक थी। वह भी सिगरेट के शौकीन थे। जब कभी क्लीनिक में वह अकेले होते तो बाहर चबूतरे पर टहल-टहल कर सिगरेट पिया करते थे। उन्होंने जब भानु की टी0बी0 का इलाज़ शुरू किया उस समय रोग अपनी दूसरी अवस्था में पहुँच चुका था। जब कभी वह गला खखार कर साफ करना चाहता तो गले से कफ़ के स्थान पर खून निकलता था। डा0 श्रीवास्तव ने उससे कहा कि वह बीड़ी-सिगरेट पीना छोड़ दे, तो तुर्की-ब-तुर्की उसने उन्हीं पर सवाल दाग दिया कि ‘‘ क्या आप सिगरेट पीना छोड़ सकते हैं ? नहीं न ? इसी तरह मैं भी नहीं छोड़ सकता। आप इलाज़ शुरू कीजिये, मैं ठीक हो जाऊँगा।’’ और वास्तव में वह उन्हीं के इलाज़ से ठीक हो भी गया।
उस समय हर जिले में एक रोजगार-दफ्तर हुआ करता था, मिर्जापुर में भी था, कचहरी/मिशन कम्पाउन्ड के पीछे। इलाहाबाद में भी था, लोकसेवा आयोग के सामने। मिर्जापुर के रोजगार-दफ्तर का पता नहीं पर इलाहाबाद में तो अभी भी है। हाँ यह जरूर है कि वहाँ कभी-कभार एकाध लोग दिखायी दे जाते हैं। अब वहाँ पहले जैसी गहमा-गहमी नहीं होती।
उस जमाने में युवा रोजगार पाने की उम्मीद में वहाँ अपना नाम लिखवा देते थे। कभी-कभी सरकारी विभाग अपनी रिक्तियों की सूचना वहाँ दे देते थे, तो रोजगार-दफ्तर से अर्ह अभ्यर्थियों को एक पोस्ट-कार्ड पर उसकी सूचना दे दी जाती थी। उस पोस्ट-कार्ड के आधार पर उस विभाग के इंगित दफ्तर में जा कर अभ्यर्थी साक्षात्कार देते और कई बार नौकरी लग भी जाती थी।
मैंने भी मिर्जापुर के रोजगार-दफ्तर में अपना नाम लिखवा रखा था। मेरे नाम भी एक पोस्ट-कार्ड आया था, चुर्क सीमेंट फैक्टरी में अप्रैन्टिस केमिस्ट पद के लिये और मेरा वहाँ चयन भी हो गया। कामकाजी दुनिया के बारे में मुझे कोई जानकारी तो थी नहीं, मुझे लगा था कि एक साल की अप्रैन्टिसशिप के बाद रेगुलर नौकरी मिल ही जायेगी। ऐसा पहले हुआ भी करता था। तो जनवरी 1974 में मैंने अप्रैन्टिसशिप ज्वाइन कर ली। अब मिर्जापुर आना-जाना सीमित हो गया।
जून में बाबूजी रिटायर हो गये तो घर की सारी जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गयी। मैं वहीं चुर्क में अपने काम के साथ ही ट्यूशन भी करने लगा। ट्यूशन मैं पहले भी करता था, पढाई के दौरान, इसलिये इसमें मुझे कोई कठिनाई नहीं हुयी। परिवार के सभी लोग मिर्जापुर में थे इसलिये आता-जाता तो था पर, बहुत कम। नतीजतन भानु से भी बहुत कम मिल पाता था। चुर्क की अप्रैन्टिसशिप से मैं खाली हो गया, जनवरी 1975 में।
दो नावों में पाँव रखने के कारण एम0एस0-सी0 प्रथम वर्ष में मेरे अंक बहुत ख़राब आये थे, फिर अगले साल की पढ़ाई एकदम नहीं हुयी थी इसलिये फाइनल परीक्षा देने की हिम्मत ही नहीं जुटा सका। अब मैं एकदम बेकार हो गया था, कोई काम नहीं। जनवरी-फरवरी के महीनों में आमतौर पर ट्यूशन मिलते ही नहीं और अगर मिलते भी हैं तो ऐसे बच्चों के जो पढ़ाई को लेकर कभी गम्भीर नहीं होते।
अब मेरी दिनचर्या यह थी कि सुबह नाश्ता करके भानु के यहाँ चला जाता। दिन भर वहीं रहता या उसके साथ ही संजय रेस्टोरेन्ट में। घरवालों को पता था कि मैं कहाँ मिलूँगा, सो दोपहर में किसी भाई को भेजकर खाने के लिये बुला लेते। रात के खाने पर मेरा कोई इन्तजार नहीं करता था। खाना मेरी चारपाई के नीचे रख दिया जाता था। रात में मैं चाहे जितनी देर से आऊँ, दरवाजा खोल दिया जाता था। मैं चुपचाप खाना खाकर सो जाता।अगला दिन फिर वैसा ही।
सही अर्थों में मैं अब आवारा हो गया था। आवारगी पर लताड़ पड़ी तो कुछ दिन एक डाॅक्टर के यहाँ कम्पाउन्डरी की, दवा की थोक की दुकान पर सेल्समैनशिप की, एक मामूली सी आयुर्वेदिक दवा की कम्पनी में मेडिकल रिप्रजेंटेटिव रहा, फिर उसे भी छोड़कर ट्यूशन करने लगा और अन्त में अपने एक कृपालु रिश्तेदार की मदद से एक अमेरिकन ऑफ़शोर ऑइल ड्रिलिंग कम्पनी में नौकर हो गया। कम्पनी का नाम था ‘ ऐटवुड ओशिनिक्स इन्काॅरपोरेटेड ’।
यह कम्पनी उड़ीसा के पैरादीप बन्दरगाह के पास बंगाल की खाड़ी में तेल खोज रही थी, तेल खोजने वाली शिप का नाम था ‘फ्रैड्रिक्सबर्ग’ और मेरा पदनाम था ‘ राउस्ट एबाउट ’; यह कुली का परिष्किृत रूप था, कुली कहना अच्छा थोड़ी लगता था। तो अब मैं अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर पिता की जिम्मेदारी उठाने के लिये कुलीगिरी कर रहा था। सन्तोष यह कि पैसे डाॅलर में मिल रहे थे। उस समय एक डाॅलर रु0 7.50 का हुआ करता था फिर भी मैं घर पर इतने पैसे भेज पा रहा था जितना यहाँ क्लास-टू की नौकरी करके भी न भेज पाता। हाँ भानु से राब्ते का ज़रिया अब केवल चिट्ठियाँ ही रह गयी थीं।

