( भानु कुमार दुबे ‘मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी’ एक तरक्कीपसंद शायर रहे हैं। उनका जन्म 26 सितंबर 1953 को हुआ था। दो साल पहले 28 जनवरी 2023 को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। अपने उतार-चढ़ाव भरे जीवन में उन्हें तीन बार मानसिक चिकित्सालय में भर्ती होना पड़ा था। एक बार वह टीबी में ऐसे मुब्तिला हुए कि सेकंड स्टेज तक पहुँच गए थे पर यह उनकी जिजीविषा ही थी जिसके चलते वह इन सारी बाधाओं को पार करते हुए अपना लेखन जारी रख सके। भाकपा(माले) के वह समर्पित कार्यकर्ता थे। छपने-छपाने के मामले में वह बेहद संकोची रहे इसलिए उनका केवल एक ग़ज़ल संग्रह ‘सांस्कृतिक संकुल’ से “क़तरे की रवानी” नाम से प्रकाशित हो सका। लेखक, अनुवादक दिनेश अस्थाना ने संस्मरण की इस शृंखला में बहुत डूब कर अपने यार ‘मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी’ को याद किया है। आज पढिए संस्मरण की आखिरी कड़ी)
मेरी डायरी का वह पन्ना जहाँ से भानु को बार-बार याद करने का दिल चाहा।
20 नवम्बर 2024
परसों रात मैंने यू-ट्यूब पर पाकिस्तान में बनी फिल्म ‘मंटो (2015)’ देखाी। मंटो के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बनी चार घंटे की यह फिल्म इतनी अच्छी बनी है कि बिना रुके देखी जा सकती है। फिल्म देखने के साथ-साथ मुझे अपने प्रिय दोस्त भानु ‘मुंतज़िर’ की याद आती रही। निर्देशक सरमद सुल्तान खूसट ने ही मंटो का किरदार निभाया है। नायक का चेहरा-मोहरा, चाल-ढाल, हाव-भाव सब कुछ भानु से इतना मिलता जुलता है कि मुझे लग रहा था कि मैं मंटो के ज़रिये भानु से ही मिल रहा हूँ। एक लम्बे अर्से तक बेरोजगारी में ट्यूशन करके गृहस्थी चलाते रहे भानु की झलक इस प्रकाशक से उस प्रकाशक तक चक्कर लगाते हुये मंटो में मिल जाती है।
भानु का यह शेर बरबस याद आ जाता है : खिड़की से खिलौनों की दुकाँ देख रहे हैं बच्चे मेरे दहलीज़ से बाहर नहीं जाते ।
मंटो को तो टीबी बहुत बाद में हुयी, भानु टीबी की गिरफ्त में तभी आ गया था जब वह सम्भवतः ग्रेजुयेशन कर रहा था। उस समय वह दिमाग़ी रूप से भी स्वस्थ नहीं था, बस इतना याद था कि घर उसी के नाम पर है। विक्षिप्तता के आलम में उसने एक बार घर के सभी लोगों को बाहर निकाल दिया था। उसको घर में अकेला छोड़कर बाकी सभी लोग उसी मोहल्ले में किराये के मकान में रहने लगे थे। उसके खाने-पीने की चीज़े और जरूरत भर की सिगरेट उसके पिताजी रोज पहुँचा जाते थे। सड़क पर ही हरी पान वाले को सहेज रखा था कि सिगरेट की कमी होने पर भानु जब भी दुकान पर आये, उसे सिगरेट दे दे, भुगतान वह खुद कर देंगे। उस दौर में उसके पास जाने वाला सिर्फ मैं था, सुबह नाश्ता करके उसके पास आ जाता, दिन भर उसके साथ ही रहता, दोपहर में सिर्फ खाना खाने अपने घर जाता था। उस दौर में मैंने भानु को बखुशी खून की उल्टियाँ करते देखा है।
मंटो की तरह भानु भी दो बार पागलख़ाने जा चुका था। बक़ौल शरद मेहरोत्रा (खजांची का चौराहा, वासलीगंज वाले), उसने भी मंटो की तरह वहाँ भर्ती मरीज़ों के हक में आवाज़ उठायी थी और उसी तरह दिमागी रूप से स्वस्थ होने के आधार पर पागलख़ाने के अधिकारियों ने उसे डिस्चार्ज करके मुक्ति पायी थी। मंटो रात-रात भर जागकर अपनी कहानी का प्लाॅट फाइनल करते और भानु भी रात-रात भर जागकर अपने अशआर की नोक-पलक दुरुस्त किया करता था। मंटो जब लिखने के लिये कुर्सी पर बैठते तो उकड़ू बैठते थे, भानु कुर्सी-मेज का इस्तेमाल तो नहीं करता था, पर अपने तख्त पर ही उकड़ू बैठकर लिखता था। मंटो का तो दौर ही साइकिल का था, पर भानु अपने दौर में भी साइकिल का ही इस्तेमाल करता रहा। कुछ दिनों के लिये उसके पास एक स्कूटी जरूर आयी थी पर उसका इस्तेमाल उसने बहुत ही कम किया।
कुल मिलाकर यह कि इस फिल्म को देखने के साथ ही मैंने भानु को बहुत ही शिद्दत के साथ याद किया।

