समकालीन जनमत
संस्मरण

नागफ़नी का दोस्त (10)

( भानु कुमार दुबे ‘मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी’ एक तरक्कीपसंद शायर रहे हैं। उनका जन्म 26 सितंबर 1953 को हुआ था।  दो साल पहले 28 जनवरी 2023 को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। अपने उतार-चढ़ाव भरे जीवन में उन्हें तीन बार मानसिक चिकित्सालय में भर्ती होना पड़ा था। एक बार वह टीबी में ऐसे मुब्तिला हुए कि सेकंड स्टेज तक पहुँच गए थे पर यह उनकी जिजीविषा ही थी जिसके चलते वह इन सारी बाधाओं को पार करते हुए अपना लेखन जारी रख सके। भाकपा(माले) के वह समर्पित कार्यकर्ता थे। छपने-छपाने के मामले में वह बेहद संकोची रहे इसलिए उनका केवल एक ग़ज़ल संग्रह ‘सांस्कृतिक संकुल’ से “क़तरे की रवानी” नाम से प्रकाशित हो सका। लेखक, अनुवादक  दिनेश अस्थाना ने  संस्मरण की इस शृंखला में बहुत डूब कर अपने यार ‘मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी’ को याद किया है। )

मेरे ओबरा प्रवास के दौरान (1977-1992) भानु से व्यक्तिगत मुलाकात कम और ख़तों के ज़रिये राब्ता ज्यादा रहा। ओबरा में मेरे पास फोन नहीं था इसलिये बातचीत नहीं हो पाती थी। उसकी शायरी की शुरुआत और विकास के बारे में कभी मुझे जानकारी नहीं रही। पता नहीं क्यों उसने यह बात मुझसे छुपायी। पर 1992 में मैं जब मिर्जापुर आ गया तो नियमित मुलाकात में उसने अपनी शायरी के बारे में ढेर सारी बातें बतायीं।

भानु को शायरी करने का मशविरा उसके मामा ने दिया था। जब उसके पिताजी को यह बात मालूम हुयी तो उन्होंने समझाया कि बिना किसी को उस्ताद बनाये अच्छी शायरी करना सम्भव नहीं है। ‘क़ालिब मिर्जापुरी’ के नाम से शायरी करने वाले याकूब रज़ा जै़दी कभी उनके प्रिय छात्र रहे थे। उनका घर बस एक गली छोड़कर दूसरी गली में था। वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र रहे थे। मुहल्ले के करीबी होने के कारण मेरी भी उनसे जान-पहचान थी। उनकी रचनायें भानु के पिताजी को पसन्द थीं इसलिये उस्ताद के तौर पर उन्होंने उनका ही नाम सुझाया और क़ालिब साहब भानु के पहले उस्ताद बन गये। उन्होंने ही शायरी के ककहरे के तौर पर उसे मिसरा, मतला, मक़्ता, रदीफ़, क़ाफ़िया से लेकर वज़्न, बहर, तक़्ती करना सब कुछ सिखाया।

भानु ने मुझे बताया था कि अपने ज़ेह्नी इलाज़ के लिये उसे अक्सर लखनऊ के नूर मंजिल जाना होता था। उनमें से ही किसी दौरे में उसकी मुलाकार मशहूर शायर ‘वाली आसी’ से हो गयी थी। शायद अमीनाबाद में उनकी किताबों की दुकान थी जहाँ अधिकतर शायर ही आकर बैठते थे और किताब की बिक्री कम, शेरो-शायरी का दौर-दौरा बराबर चलता रहता था। भानु भी अपना परिचय देकर और शेर कहने का शौक होने की बात बताकर वहीं बैठ गया। अचानक किसी दुकान के साईन-बोर्ड की ओर इशारा करके उस्ताद ने भानु से उसे पढ़कर उसकी तक़्ती करने को कहा। भानु ने सही-सही उसकी तक़्ती कर दी। फिर उन्होंने भानु से उसके कई शेर सुने और खुलकर दाद दी।

मरहूम हुरमत-उल-इकराम साहब मिर्जापुर ही नहीं पूरे भारत के मक़बूल-ओ-मारूफ़ शायर रहे हैं। साल तो नहीं याद है, चालीस साल से कुछ ज्यादा ही हो गये होंगे, मिर्जापुर में एक गंगा-जमुनी कवि-सम्मेलन एवं मुशायरा हुआ था जिसमें देश के कई प्रसिद्ध कवियों एवं शायरों ने शिरकत की थी। फ़िराक़ साहब भी वहाँ आये थे और उन्हीं के इसरार पर हुरमत-उल-इकराम साहब भी आये थे। बहुत ही कामयाब महफ़िल थी वह।

उस महफिल का एक दिलचस्प वाकया यह रहा कि फ़िराक़ साहब को पहले दौर में सबसे आखिर में बुलाया गया था। स्टेज पर आते ही सबसे पहले उन्होंने कहा कि बहुत सारे लोग, लगभग सभी कवि एवं शायर देश में फैली ग़रीबी और बेकारी पर अपनी चिन्ता ज़ाहिर किये हैं, फिर भी इस शहर के लोग इतने ख़ाली क्यों हैं कि रात भर जाग कर मुशायरे का लुत्फ़ उठा रहे हैं। फ़िलहाल उन्होंने अपना कलाम पढ़ना शुरू किया और उसे खत्म करने के बाद कहा कि मैं जानता हूँ कि इतनी भीड़ सिर्फ मुझे सुनने आयी है। अब मैं पढ़ चुका तो मुशायरा ख़त्म हो गया। अब आपलोग अपने-अपने घर जाइये। और मुशायरा ख़त्म हो गया।

‘ क़ालिब मिर्जापुरी ’ साहब के इन्तक़ाल के बाद उन्हीं हुरमत-उल-इकराम साहब के शागिर्द ज़फ़र मिर्जापुरी भानु के अगले उस्ताद बने और उनके अशआर पर इस्ला करने लगे। भानु की रचनायें स्थानीय साप्ताहिक अखबार ‘जनता’ में अक्सर छपती रहीं पर देवास से निकलने वाली नियमित साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका ‘अरबाब-ए-कलम’ के सम्पादक इक़बाल बशर साहब ने उनकी रचनाओं को विशेष रूप से सराहा और छापा। अपना काव्य-संग्रह निकालने के प्रति वह बेहद संकोची रहे, पर मेरे आग्रह और के0के0 पाण्डेय के अथक प्रयास से उनका एकमात्र काव्य-संग्रह ‘ क़तरे की रवानी’  सांस्कृतिक संकुल प्रकाशन से प्रकाशित हो सका।

मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी के कुछ चुनिंदा अशआरः-

 

खो जायेंगे ख़लाओं में अशआर कल मेरे                                                                   

अच्छे लगें तो आज दिलों में उतार लो।

दुनिया की जरूरत है न जन्नत की मुझे चाह

बस एक ही ख़्वाहिश है कोई आँख न रोये।

चिंगारियाँ आँखों में लिये ढूँढ रहा हूँ   

बारूद का इक ढेर तो मिल जाये कहीं से।

मंज़िल भी बेक़रार बहुत थी मेरे लिये 

वो रास्तों से मेरा पता पूछती रही।

कुछ बोलते न बने तो चीखो ही कम से कम  

 कुछ तो कहो कि अब ये ख़ामोशी गुनाह है।

जारी है फिलिस्तीन में फिर एक कर्बला 

कट जाते हैं झुकते नहीं वारिस हुसैन के।

बाज़ार से बाज़ार की बाज़ार के लिये    

चलती है मेरे मुल्क में ऐसे जम्हूरियत।

 हाँ निकलने को निकलते हैं सुबह दोनों मगर

ख़ास बच्चे कार पर तो आम बच्चे काम पर।

मज़हब की लोरियाँ हैं सियासत की थपकियाँ      

कैसे न मीठी नींद की आदत बनी रहे। 

इसको जनम दिया है चटानों की कोख ने 

कैसे मेरी ग़ज़ल में नफ़ासत बनी रहे।                    

 

 

 

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