सुरेन्द्र कुमार बेदिया / देवकीनंदन बेदिया
कम्युनिष्ट पार्टियों को छोडकर भारतीय राजनीति में ऐसे विरले नेता होते हैं जिनकी पहचान राजनीतिक पद से इतर उनके द्वारा किये गए संघर्ष और लोगों के साथ उनके घनिष्ठ जुडाव से होती है। शिबू सोरेन एक ऐसे ही नेता थे। जल, जंगल, जमीन बचाने का संघर्ष, पिता की हत्या और महाजन-सूदखोरों के शोषण-शासन से त्रस्त झारखंड के आदिवासी समुदाय को आजाद करने की बीडा ने शिबू सोरेन को आंदोलनकारी बना दिया। अपने लोगों के साथ गहरे जुडाव और संघर्ष से आदिवासियों के बीच देखते-देखते इतने लोकप्रिय हुए कि आदिवासियों ने प्यार और सम्मान से उन्हे ‘ दिशुम गुरू’ की उपाधि दे डाली। उन्होने सिर्फ एक राजनीतिक व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि अलग राज्य के निर्माण, आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्ष, जनवाद और सामाजिक न्याय के लिए लडने वाले नेता के रूप में अपनी पहचान बनायी। उन्होने अपना पूरा जीवन आदिवासियों के हक-हकूक, मान-सम्मान,पहचान और झारखंडी जनमानस के लिए एक अलग झारखंड राज्य के लिए समर्पित कर दिया।
वे बिहार (अब झारखंड) के अत्यंत दूरदराज जंगल-पहाड के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में उम्मीद के किरण बनकर उभरे, जहां आदिवासी समुदाय पर थोपी गई महाजनी प्रथा, अशिक्षा और सूदखोरों का अंतहीन शोषण चरम पर था। उनका संघर्षशील जीवन का सफर जंगल की राजनीति से शुरू होकर संसद तक और एक मामूली आदिवासी किशोर से लेकर झारखंड के निर्माता बनने तक की एक अविश्वसनीय यात्रा रही है। उन्होने न केवल अपने संघर्ष में झारखंड को मुख्य केन्द्र में रखा बल्कि देश के पूरी राजनीति को प्रभावित करते हुए एक नई चेतना पैदा की।
आदिवासी नेता, गुरूजी और “दिशोम गुरु” के नाम से सुविख्यात शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी, 1944 को पहाडों के गोद में बसे सुंदर सा नेमरा गांव, प्रखंड गोला, जिला रामगढ के तत्कालीन बिहार ( वर्तमान में झारखंड ) में हुआ था। भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र झारखंड के रामगढ़, बोकारो जिले के पूर्वी-दक्षिणी छोर और पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जिला के पश्चिम सीमांचल में अवस्थित जंगल और पहाडों के मध्य बसा है। गोला क्षेत्र संताल और बेदिया आदिवासियों का निवास स्थल है। उस काल में उतर प्रदेश और बिहार के गया जिले से बनिया लोग मवेशियों को लाकर पश्चिम बंगाल के झालदा बाजार में बिक्री कर रहे थे। उनलोगों का आने-जाने के क्रम में हजारीबाग (रामगढ़) जिला के बरलंगा गांव के डाक-बंग्ला में आराम के लिए रात्रि पडाव था। दूसरे दिन भोर में झालदा बाजार के लिए निकल पडते थे। निरंतर आने-जाने के क्रम में बरलंगा व आस-पास के भूमि को देखकर उनमें बसने का लालच आ गया।
बरलंगा के गैरमजरूआ जमीनों में घर बनाकर बनिया लोग रहने भी लगे। सबसे पहले विस्टु साव नामक व्यक्ति घर बनाकर रहने लगा। जिसे गोला क्षेत्र में महाजनी प्रथा के एक प्रमुख महाजन के रूप में जाना जाता था। वह पहले साहूकार के रूप में ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण कर राशन, तेेल, गुड, मसाला, दलहन आदि सामाग्री का व्यापार करते थे। कुछ ही दिनों के बाद भ्रमण व्यापार करते-करते आदिवासियों को उधार देकर उनके जमीनों को बंधक बनाना शुरू कर दिया। फर्जी दस्तावेज बनाकर जमीनों को हडपने लगे। कुछ ही वर्षों में सभी साहूकार महाजन में बदल गये और बडे पैमाने पर आदिवासियों की जमीनेें कब्जा कर मालिक बन जमींदारी करने लगे। उन्हीं जमीनों पर आदिवासियों को काम कराते और उत्पादित अनाज को बरगा गांव में महाजन विस्टु साव द्वारा निर्मित बडे-बडे गोदामों में पहुंचाने का काम लिया जाने लगा था। इस तरह ग्रामीण क्षेत्रों में साहूकार महाजनी का कहर आदिवासियों पर बरपाने लगे थे। उस समय विस्टु साव इलाके के सबसे प्रभावशाली और संपन्न महाजनों में गिने जाते थे। उनका आर्थिक ताकत के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन और पुलिस पर भी असर था।
झारखंड की सबसे बडी जनजाति ‘‘संताल’’ आदिवासी समुदाय से संबंध रखने वाले शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन की हत्या महाजन-सूदखोरों ने कर दी थी। सोबरन सोरेन ने 1950 के दशक में धनकटनी आंदोलन चलाया था। वे आदिवासियों को जागरूक करने का काम कर रहे थे। वह एक सजग और पढे लिखे सच्चे समाजसेवी थे। जिन्होने अपने गांव नेमरा और आसपास के पहाडों में बसे गांव नरसिंहडीह, अंवराडीह, रावरौ, सुग्गा टीकरा, आस पास के बोकारो व बंगाल पुरूलिया जिला के गांवों के संतालों के साथ बैठक कर संगठित करने लगे थे। संतालों को संगठित करने के बाद महाजनों द्वारा हडपे गए सभी खेतों से धान का फसल काट लेने की रणनीति बनाई गई। योजना के मुताबिक आदिवासियों का समूह अपने पारंपरिक हथियार तीर-धनुष, हंसुआ लेकर खेत में उतर गया और धान की बालियां काटकर अपने-अपने घर ले गये। उसके बाद खेतों की जुताई शुरू हो गई। महाजन, सूदखोर के खिलाफ जन जागरण व आंदोलन शुरू हो गया।
सोबरन सोरेन ने गैरकानूनी, शोषणकारी प्रथा और अन्याय के खिलाफ आदिवासी किसानों को संगठित किया और आंदोलन की अगुवाई कर संथाल परगना में महाजनी प्रथा को चुनौती दी और आदिवासी किसान संगठनों की नींव मजबूत करने का काम किया। शिबू के पिता का यह आंदोलन बाहर से आकर निवास कर रहे सूदखोर महाजन और जमींदारों को नागवार गुजरा और वे लोग उनकी हत्या की योजना बनाने लगे। बुंडू और तमाड से भाड़े के गुण्डों को लाया गया।
उस समय शिबू सोरेन किशोर थे और अपने बडे भाई राजाराम सोरेन के साथ गोला सरकारी आदिवासी स्कूल के हाॅस्टल में रह कर पढाई कर रहे थे। ठंद का महीना था। सोबरन सोरेन 27 नवंबर 1957 को अपने बेटों के लिए खाने का सामान लेकर हाॅस्टल पहुंचाने के लिए निकले थे। रास्ते में बरगा गांव से गुजरते समय उनको पीछा किया गया और मौका मिलते ही जंगल झाडी से भरे हुए लुकैयाटांड नामक स्थल में फरसा से गरदन में पीछ से वार कर बेरहमी से उनकी हत्या कर दी गई।
पिता के हत्या की घटना शिबू सोरेन के लिए जीवन का एक निर्णायक मोड़ बना । इस घटना ने उन्हें पूरी तरह बदल कर रख दिया, और उनके राजनीतिक संघर्ष में उत्प्रेरक का काम किया। गोला हाई स्कूल, हजारीबाग (रामगढ़) से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने पढाई छोड दी और जनता की पाठशाला में सीधे कूद पडे। उन्होने महसूस किया कि आदिवासियों का शोषण करने वाले बाहरी लोगों खासकर सूदखोरों और महाजनों द्वारा उनकी जमीनें लगातार लूटी जा रही है। भोले-भाले आदिवासियों की दयनीय स्थिति और पिता की हत्या ने उनके दिलो दिमाग में शोषण अत्याचार के खिलाफ एक चिंगारी भडका दी। यही चिंगारी आग बनकर पूरे आदिवासी समुदाय के लिए संघर्ष का मशाल बन गया, जो आगे निरंतर पिता के आंदोलन की परंपरा उनके जेहन में धधकता रहा।
शिबू सोरेन ने 18 वर्ष की आयु में संगठन की शुरुआत ‘‘संताल नवयुवक संघ ’’नामक संगठन की स्थापना से की और पिता के आंदोलन की विरासत की परंपरा को जारी रखते हुए महाजनी प्रथा के खिलाफ जोरदार जन आंदोलन शुरू कर दिया। इस आंदोलन को इतिहास में ‘ धनकटनी आंदोलन ’ के नाम से सबसे ज्यादा प्रसिद्धि मिली। शिबू सोरेन का धान कटनी आंदोलन झारखंड के आदिवासी किसान संघर्षों का एक अहम अध्याय बन गया था, जो 1970 के दशक में शुरू हुआ और धीरे-धीरे पूरे संताल परगना व कोयलांचल क्षेत्र में फैल गया। इसका मुख्य कारण आदिवासियों से महाजनों, जमींदारों और साहूकारों द्वारा जबरन अनाज वसूली करना, ब्याज पर ब्याज (सूदी प्रथा) से जमीन हडप लिया जाना और पुलिस-प्रशासन महाजनों के पक्ष में खड़ा रहना था।
धनकटनी में साहूकार, जमींदार द्वारा आदिवासियों के हडपी हुई खेत में तैयार धान की फसल काटकर जमीन के असली मालिक को वापस कर दिया जाता था इसमें महिलाओं और युवाओ की बडी भागीदारी रहती थी। महिलाएं हंसिया, और युवा तीर धनुष लेकर निकल पडते और महिलाएं धान काटती और पुरूष तीर-धनुष लेकर तैनात रहते थे। धीरे-धीरे धनकटनी आंदोलन को शिबू सोरेन और उनके साथियों ने संगठित प्रतिरोध में बदल दिया इसका प्रारंभिक क्षेत्र संताल परगना का गोपीनाथपुर, टुंडी, निरसा और आसपास के गांव थे पर, तेजी से इसका फैलाव बोकारो, धनबाद, गिरिडीह, हजारीबाग और आंशिक रूप से पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में हो गया।
साहूकारों के धान ले जाने से रोकने के लिए खेतों में सामूहिक पहरा लगाया जाने लगा। किसानों को संगठित कर महाजनों की फसल कटाई रोका जाने लगा। जब्ती की गई फसल को किसानों को वापस दिलाया गया। इस आंदोलन ने शिबू सोरेन को गांव-गांव तक पहचान दिलाई। मजदूर-किसान एकता का आधार बना और झारखंड आंदोलन के लिए मजबूत जनाधार तैयार हुआ।
शिबू सोरेन को ‘दिशुम गुरु’ (जनता का नेता) का दर्जा इसी दौर में मिला। 1970 के दशक के शुरूआती दौर में शिबू सोरेन का आंदोलन एक मजबूत राजनीतिक और सामाजिक पहचान हासिल कर चुका था। उन्होने महसूस किया कि आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए एक संगठित राजनीतिक मंच की आवश्यकता है। शिबू सोरेन ने 1972 में मार्क्सवादी समन्वय समिति के नेता व मार्क्सवादी चिंतक काॅमरेड ए.के.राय और बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में बडी सभा कर उन्होंने ‘‘ झारखंड मुक्ति मोर्चा ’’ की स्थापना की। लाल और हरे झंडे की एकता ने शिबू सोरेन को और भी मजबूती प्रदान किया। इस संगठन का उदेद्श्य आदिवासियों को शोषण से मुक्ति, उनके लिए एक अलग झारखंड राज्य की मांग और महाजनी प्रथा को जड़मूल से खत्म करना था। शिबू सोरेन की एक आवाज में आदिवासी तीर-धनुष लेकर जुटने लगे थे। शिबू सोरेन का आंदोलन प्रभावी हो चला था लेकिन पूरे झारखंड में अभी स्वीकार्यता नहीं मिली थी।
23 जनवरी, 1975 को जामताडा जिले के चिरूडीह गांव में शिबु सोरेन ने सभा बुलाई। इस सभा का मकसद था आदिवासियों को महाजनों और सूदखोरों के खिलाफ एकजुट करना था। चिरूडीह इलाके में आदिवासियों और गैरआदिवासियों के बीच तनाव बढ रहे थे। इस आंदोलन को गैर आदिवासी अपने खिलाफ देख रहे थे। इसलिए सभा का विरोध होने लगा। जब सभा में हजारों आदिवासी जमा हुए तो शिबू सोरेन ने महाजनी प्रथा और जमीन हड़पने के खिलाफ जोरदार भाषण दिया। लेकिन स्थिति तब बेकाबु हो गई जब सभा के दौरान आदिवासियों और गैर आदिवासियों के बीच हिंसक झडप शुरू हो गई। इस झडप में 11 लोग मारे गये थे। इस घटना ने पूरे देश का ध्यान खींचा और शिबू सोरेन पर हत्या और हिंसा भडकाने के गंभीर आरोप लगे।
झारखंड के लिए 70 का दशक उथल-पुथल का समय था। उस समय झारखंड, बिहार का हिस्सा हुआ करता था और दक्षिण बिहार यानि वर्तमान झारखंड आदिवासी बहुल होने के बावजूद राजनीतिक रूप से हाशिए पर था। उत्तर बिहार के नेता और जमींदार सता पर काबिज थे और आदिवासियों के हक की आवाज दबायी जा रही थी। चिरूडीह कांड के समय देश में आपातकाल की शुरूआत हो रही थी। इंदिरा गांधी की सरकार ने सख्ती बढा दी थी। आदिवासी आंदोलनों को अराजकता के रूप में देखा जाने लगा था। शिबू सोरेन का आंदोलन सरकार और स्थानीय महाजनों के लिए चुनौती बन चुका था। चिरूडीह की सभा इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि आदिवासियों को एकजुट करने और उनके हक की लडाई को तेज करने का एक बडा मंच दिया जा सके, लेकिन हिंसा ने एक नया मोड दे दिया।
चिरूडीह की सभा कोई अचानक तय नही हुई थी। शिबु सोरेन ने धनकटनी आंदोलन के जरिए धान काटना शुरू कर दिया था। वे पारसनाथ की पहाडियों और जंगलों में रहकर आंदोलन का संचालन किया करते थे। उनकी रणनीति थी गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करना और महाजनों के खिलाफ एकजुट करना, उन्हें संघर्ष में शामिल करना। चिरूडीह में सभा का आयोजन भी इसी रणनीति का हिस्सा था। यह सभा महाजनो द्वारा जमीन हडपने और सूदखोरों के खिलाफ था। लेकिन स्थानीय गैर आदिवासियों ने अपने खिलाफ एक अभियान के रूप में इसे देखा। तनाव तो पहले से ही बढ रहा था और सभा के दौरान छोटी सी चिंगारी ने एक हिंसा को जन्म दे दिया। हिंसा के लिए एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का दौर चला लेकिन उस समय कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिली कि भीड में क्या हो रहा था किसी को कुछ पता नहीं था लेकिन इस हिंसा में 11 लोगों की मौत ने शिबू सोरेन को और उनके आंदोलन को एक रात में सुखिर्यों में ला दिया था। हालांकि इस घटना ने उन्हें कानूनी मुसीबतों में भी फंसाया। लंबी कानूनी कार्यवाही के बाद, सोरेन को 6 मार्च 2008 को बरी कर दिया गया। लेकिन आदिवासी समुदाय में उनकी लोकप्रियता चरम पर पहुंच चुकी थी। संताल समुदाय ने उन्हें अपना मसीहा मान लिया था।
शिबू सोरेन आदिवासियों के संघर्ष के आवाज बन रहे थे। उन्होंने झारखंड को मुक्त करते हुए आदिवासियों को पहचान दिलाते हुए आदिवासियों के उस अधुरे सफर को आगे बढाने का बीडा उठाया जो एक समय में सिद्धू कान्हू, तिलका मांझी और सबसे बुलंद आवाज बिरसा मुंडा ने उठायी थी। वही संताल परगना का क्षेत्र, वही छोटानागपुर का पठार जहां उलगुलान का नारा गूँजा था। धरती आबा बिरसा मुंडा ने जल, जंगल, जमीन के हिफाजत के लिए इस देश के मूल निवासी आदिवासियों के संघर्ष जो कि सबसे पुराना संघर्ष है उसे आगे बढाने के लिए उलगुलान का मशाल थामा। वह मशाल के तहत तीन लडाई एक साथ लडी जा रही थी। पहली लडाई अंग्रेजों के खिलाफ लडाई लडने थी जिसे सबसे पहले आदिवासियों ने शुरू किया लेकिन आज देश के इतिहास में आदिवासी पढाई कहां जाते हैं ? उसके बाद दूसरी लडाई दिकुओं से, उन सामंती साहूकारों से जो इस देश के रहने के बावजूद आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन में घुसपैठ करते हुए उनके संसाधनों पर नजर बनाये रखते थे और उनके संस्कृति के उपर हमला करते थे। उन दिकुओं के खिलाफ बिरसा मुंडा ने उलगुुुुुुुुुुुुुुुुुुुलान का एलान किया था। तीसरी लडाई उन तमाम लोगों से आदिवासी आज भी लड रहें हैं जो आज भी उन्हें राष्ट्र निर्माण में अहम नहीं मानते । उन्हे अपना किरदार तक बताना पडता है कि वह कौन है।
उस बिरसा मुंडा के उलगुलान को आगे बढाने का काम संविधान सभा में जिस शख्स ने किया था उनका नाम था जयपाल सिंह मुंडा। यह वह नाम है जो झारखंड के बुनियाद में है,जो झारखंड के नींव में है। वह नींव जिसको बिरसा मुंडा रच कर गये। वह नींव जिसको झारखंड के बिसात पर एक अलग मोर्चा बनाकर जयपाल सिंह मुंडा संविधान सभा में लडते हैं। जयपाल सिंह मुंडा संविधान सभा के बहस में बोलते हैं कि हम सिंधु घाटी सभ्यता के असली वारिस हैं, लोकतंत्र का पाठ हमें मत सिखाएं। हमसे लोकतंत्र सीखना होगा। इस देश के हम आदिवासी हैं। इस देश के मूल निवासी हैं और हम इस देश के बनाने और बचाने वाले हैं। यही लडाई आगे बढ रही थी और झारखंड के उस पूरे इलाके में जो तब बिहार का हिस्सा हुआ करता था।
शिबू सोरेन ने 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा बनाकर अपनी लडाई को आगे बढाने का काम किया। आदिवासियों के जमीन का अधिकार, जमीन पर नियंत्रण, खनिज संसाधनों और सबसे बडी लडाई भाषा और संस्कृति की लडाई थी। वही संस्कृति जिसे बीजेपी और आर. एस. एस. कभी वनवासी कहकर उस पर थोपती है कि वह हिन्दू है लेकिन आदिवासियों के प्रकृति पूजा, आदिवासियो का जल,जंगल जमीन, आदिवासियों का अपनी संस्कृति बिल्कुल अलग है। फिर भी उन पर धार्मिक हमला किया जाता है। शिबू सोरेन ने इन तमाम सांस्कृतिक मोर्चे, आर्थिक मोर्चे और राजनीतिक मोर्चे की लडाई को गोलबंद करने का काम किया।
शिबू सोरेन के नेतृत्व में आदिवासी आंदोलनों की रणनीति एकदम जमीनी, समुदाय आधारित और दीर्घकालिक थी। बिना अनुमति जमीन से फसल काटने जैसी प्रत्यक्ष कार्रवाई के साथ महाजन प्रथा व अन्य शोषण के खिलाफ आंदोलन गुरूजी का सशक्त नेतृत्व शैली आदिवासी समाज में लोकप्रिय रही। उन्होंने आदिवासी समुदाय में दिशोम गुरु और गुरूजी के रूप में गहरा सम्मान प्राप्त किया और लोक-नायक की छवि बन गई। जब 2000 में झारखंड राज्य का गठन हुआ, तो यह शिबू सोरेन और उनके दशकों के संघर्ष की सबसे बड़ी जीत थी। इस आंदोलन की सफलता का श्रेय उन्हीं को जाता है।
शिबू सोरेन ने राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई 1980 में पहली बार दुमका से लोकसभा के लिए सांसद चुने गये। वे 1989, 1991 और 1996 में भी लोकसभा के लिए चुने गए। वर्ष 2002 में, वे राज्यसभा के लिए चुने गए थे। उन्होंने उसी वर्ष दुमका लोकसभा सीट उपचुनाव जीता और राज्यसभा सीट से इस्तीफा दे दिया। वह 2004 में फिर से चुने गए। वह मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय कोयला मंत्री बने, लेकिन तीस साल पुराने चिरुडीह मामले में उनके नाम पर गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद उन्होंने 24 जुलाई, 2004 को इस्तीफा दे दिया। एक महीने से अधिक समय तक न्यायिक हिरासत में रहने के बाद वे आठ सितंबर को जमानत पर रिहा हुए और उन्हें 27 नवंबर, 2004 को फिर से केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करते हुए कोयला मंत्री बनाया गया।
झारखंड में फरवरी-मार्च 2005 में विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस-झामुमो गठबंधन के लिए एक समझौते के हिस्से के रूप में 2 मार्च 2005 को बीजेपी द्वारा बहुत अधिक राजनीतिक सौदेबाजी और लेन-देन के बाद, आखिर में उन्हें झारखंड के राज्यपाल द्वारा झारखंड में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया। लेकिन 11 मार्च को विधानसभा में विश्वास मत प्राप्त करने में विफल रहने के बाद उन्होंने नौ दिन बाद, 11 मार्च को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
उनके परिवार में पत्नी रूपी सोरेन, तीन बेटे दुर्गा सोरेन, हेमंत सोरेन, बसंत सोरेन और एक बेटी अंजलि सोरेन हैं। उनके बेटे हेमंत सोरेन वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री हैं। उनके बड़े बेटे दुर्गा सोरेन 1995 से 2005 तक जामा से विधायक थे। लेकिन अब उनका देहांत हो चुका है। दुर्गा की पत्नी, सीता सोरेन जामा से पूर्व विधायक रही हैं, लेकिन अब भाजपा में हैं। बसंत सोरेन झारखंड युवा मोर्चा के अध्यक्ष हैं, जो झारखंड मुक्ति मोर्चा की युवा शाखा है। वे दुमका से वर्तमान विधायक हैं।
शिबू सोरेन के निधन के बाद झारखंड के सामने जो चुनौतियाँ उभरी हैं, वह सिर्फ राजनीतिक संक्रमण तक सीमित नहीं हैं बल्कि इनमें मुख्य रूप से आदिवासी अधिकार , उनका विकास, उनकी अस्मिता, सम्मान व पहचान का सवाल और खनिज संसाधनों पर आदिवासियों का हक और प्रबंधन और प्रशासन के कई गहरे पहलू शामिल हैं। आदिवासी समुदाय के अस्तित्व-अस्मिता पर बढ़ रहे चौतरफा हमलों और दबावों से निजात पाना है। जमीन बचाने के अलावा झारखंडी समाज में फैलाये जा रहे ‘डिलिस्टिंग’ जैसे विवाद साम्प्रदायिक विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ मुस्तैदी से खडा होना जरूरी है विशेषकर हाल के समय में ‘‘आदिवासी रूढ़ि’’ का हवाला देकर उछाले जा रहे तथाकथित धर्मांतरण मुददे के जरिए सरना -आदिवासी टकराव बनाने की सामाजिक विवाद को उन्माद का रूप देने की पुरजोर कोशिश चल रही है।
आदिवासी समाज के ज्वलंत सवालों झारखंड में पेसा कानून सहित सीएनटी/एसपीटी कानूनों को प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन की मांग अधर में लटका हुआ है। आदिवासियों की जमीनें धडल्ले से लूटी जा रही है और विस्थापन -पलायन का संकट निरंतर विकराल होता जा रहा है। 2023 के आंकडों के अनुसार वन अधिकार अधिनियम-2006 के तहत लाखों दावे अभी भी लंबित है। मौजूदा सरकारों की नीतियां आदिवासी हितों के खिलाफ काम कर वन संरक्षण संशोधन अधिनियम-2023 ने वनभूमि पर आदिवासियों के अधिकारों को कमजोर कर दिया है। क्योंकि वर्तमान शासन काॅरपोरेट हितों को ही प्राथमिकता दे रहा है। आज भी पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में पेसा कानू का प्रभावी कार्यान्वयन नहीं हो सका है। रघुबर सरकार द्वारा बनाए गए लैंड बैंक को खत्म करना सरकार के लिए गहन चुनौती बनी हुई। भाजपा संरक्षित कुडमी-कुरमी समुदाय द्वारा एसटी का दर्जा पानेे की मांग ने आदिवासी समूहों के बीच तनाव को जन्म दिया है। इससे कई मूल आदिवासी अपने संवैधानिक अधिकारों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व को हिस्सेदारी, नौकरी और जमीन पर कब्जा करने और हस्तक्षेप के रूप में देख रहे हैं। इस विवाद ने डर आशंकाओं को जन्म दिया है। ऐसे में आदिवासियों के पक्ष में खड़ा होकर समुचित समाधान निकालने का प्रयास करना और उनके अधिकारों के लिए लड़ने का वक्त है। आदिवासियों के अस्तित्व अस्मिता, सम्मान, पहचान व विकास के लिए शिबू सोरेन की विरासत को आगे बढ़ाते हुए एक नई दिशा निर्धारित किया जा सकता है।
आज जब कि झारखंड एक अलग राज्य के रूप में अपनी पहचान बना चुका है, तो शिबू सोरेन का योगदान हमेशा याद किया जाएगा। उनके अगुवाई में शुरू हुआ झारखंड आंदोलन ही वह आधार है जिस पर इस राज्य की नींव पडी है। उन्होने आदिवासी संस्कृति और पहचान को बचाने और उसे बढ़ावा देने में महती भूमिका अदा की। आज उनकी विरासत उनके बेटे और झारखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा आगे बढाई जा रही है। शिबू सोरेन का जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक अकेला व्यक्ति भी अपने संघर्ष और समर्पण से इतिहास बना सकता है। शिबू सोरेन का निधन झारखंड की राजनीति में एक युग का अंत कहा जा सकता है लेकिन उन्होने न केवल झारखंड को एक भौगोलिक पहचान दी, बल्कि एक मजबूत सामाजिक और सांस्कृतिक आधार भी प्रदान किया, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।

