मनीष आज़ाद
कॉमरेड कंचन कुमार से मेरी पहली मुलाकात देहरादून में हुई थी. उस वक़्त हम वर्ल्ड सोशल फोरम (WSF 2004) के खिलाफ “Mumbai Resistance” (MR 2004) की तैयारी में मशगूल थे. कंचन कुमार भी वहां इसी सिलसिले में आये थे.
उनके संपादन में निकलने वाली प्रसिद्ध क्रांतिकारी सांस्कृतिक पत्रिका ‘आमुख’ के माध्यम से मैं उन्हें पहले से जानता था और बेहद उत्सुकता से उनका इंतजार कर रहा था. जैसा कि कॉमरेडो से मिलकर अक्सर होता है, मुझे ऐसा लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं. मुझे ठीक-ठीक तो याद नहीं, लेकिन पता नहीं किस सन्दर्भ में मैंने पाब्लो पिकासो का जिक्र कर दिया. उन्होंने तुरंत मुझसे पूछा कि आप चित्रकार अनिल करंजई को जानते हैं ? जब मैंने अनभिज्ञता जाहिर की तो उन्होंने बेहद धीमे स्वर मे, मुस्कुराते हुए कहा कि हमें अपने आसपास के रचनाकारों को भी जानना चाहिए.
उनके साथ यह मेरा पहला सबक था. इसी के साथ वे अचानक खड़े हुए और बोले कि चलिए मैं आपको अनिल करंजई के घर ले चलता हूँ. रास्ते में उन्होंने विस्तार से मुझे जन चित्रकार अनिल करंजई के बारे में बताया. तब मुझे पता चला कि अनिल करंजई की मृत्यु तो 2001 में ही हो चुकी थी और दरअसल हम उनकी जीवन संगिनी जूलियट रेनाल्ड से मिलने जा रहे हैं. बाद में मुझे पता चला कि जूलियट रेनाल्ड भी प्रसिद्ध कला समीक्षक हैं और उनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. जब जूलियट रेनाल्ड ने घर का दरवाजा खोला तो मेरे लिए यह किसी नई दुनिया के खुलने जैसा था. घर में चारों तरफ पेंटिंग्स और किताबें. जूलियट रेनाल्ड और कंचन कुमार की सघन बातचीत को मैं मंत्रमुग्ध सा सुनता रहा और मन ही मन आश्चर्य करता रहा कि इस शख्स को साहित्य के अलावा पेंटिंग्स की भी कितनी बारीक जानकारी है. बाद में कंचन कुमार ने अनिल करंजई की कई पेंटिंग्स दिखाते हुए मुझे उनके अर्थ भी समझाए.
पिछले साल जनवरी में जब राजेश सकलानी और अरविंद शेखर के संपादन में देहरादून से प्रकाशित ‘जागर: कठिन समय में रचना’ मेरे हाथ में आयी तो उसके मुख पृष्ठ पर अनिल करंजई की प्रसिद्ध पेंटिंग्स “Agony of Bliss” को देखकर याद आया कि कंचन कुमार ने इस पेंटिंग्स को मुझे दिखाया था और इसकी बारीक व्याख्या भी की थी.
लौटते समय कंचन कुमार ने यह आश्चर्यजनक बात भी बताई कि जिन चार लोगों ने 1965/66 में आमुख पत्रिका शुरू की थी, उनमें साहित्यकार सिर्फ कंचन कुमार थे. बाकि तीन चित्रकार थे और उनमे से एक अनिल करंजई थे.
जिस सहजता और गहराई से वे हिंदी और बांग्ला भाषा/साहित्य में परस्पर आवाजाही करते थे, उससे यह समझना कठिन था कि वे बनारसी बंगाली थे या बंगाली बनारसी.
मैंने अपने छात्र संगठन के छात्रों के साथ उनकी एक बैठक कराई. इसमें क्या क्या बातें हुई, यह तो मुझे ठीक से याद नहीं है. लेकिन एक चीज अच्छी तरह से याद है. उन्होंने छात्रों से किसी भी हालत में सुबह 5 बजे उठ जाने को कहा. उनके अनुसार यही पढ़ाई के लिए सबसे अच्छा समय होता है. ऐसा नहीं था कि यह बात इससे पहले किसी ने मुझसे नहीं कही थी. लेकिन पता नहीं क्यों उनकी इस बात ने ऐसा असर किया कि मैं तब से आज तक कमोवेश सुबह जल्दी उठने का रूटीन पालन करता रहा हूँ. 2019 में जब मेरी पहली गिरफ्तारी भोपाल से हुई थी तो सुबह के साढ़े 5 बजे थे और मैं कुछ पढ़ ही रहा था. अगर एटीएस मुझे सोते हुए नहीं पकड़ पाई तो इसका श्रेय निश्चित ही कंचन कुमार को है.
कंचन कुमार से मिलने से पहले मेरे मन में उनकी इमेज थोड़ी अख्खड़/मुंहफट साहित्यकार की थी. आमुख में जिस तरह से हिंदी के ‘स्थापित’ साहित्यकारों विशेषकर कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव पर वैचारिक हमले किये गए, शायद उससे उनकी यह छवि बनी या बनाई गयी थी. लेकिन इस छवि के विपरीत वे बेहद शालीन और विनम्र व्यक्ति थे. जब मैंने उन्हें उनकी इस छवि के बारे में बताया तो वे सहज ही मुस्कुराने लगे. इसी क्रम में जब मैंने उनसे पूछा कि आखिर साहित्य की कसौटी क्या है, तो उन्हेंने सहज ही उत्तर दिया कि वही जो हर चीज की कसौटी है यानि वर्ग [चेतना]. आज तथाकथित उत्तर आधुनिकता के अंधेरे में उनकी यह महत्वपूर्ण बात हमें रोशनी दिखा सकती है.
मुंबई प्रतिरोध के प्रचार और इस आयोजन के लिए फंड लेने के लिए हम देहरादून में लगातार नुक्कड़ नाटक कर रहे थे. नाटक देखने के लिए एक नुक्कड़ पर हम उन्हें भी ले गए. उस नाटक में मेरा बहुत छोटा सा रोल था. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई और नाटक के बारे में कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए, जिसे हमने तुरंत ही अगले शो में कार्यान्वित भी कर दिया. बहुत बाद में कंचन कुमार से राजनीतिक सांस्कृतिक कर्मी तुषार कांति द्वारा लिए गए एक साक्षात्कार से मुझे पता चला कि दरअसल उन्होंने ही नक्सलबाड़ी के दौरान और उसके बाद हिंदी क्षेत्र में नुक्कड़ नाटकों की शुरुआत की थी और खुद भी नुक्कड़ नाटक लिखे और खेले थे.
बाद में अक्सर उनसे फोन पर बातचीत होती रही. हर बार उनके पास नयी-नयी योजनायें होती थी. वे मुझसे हिंदी साहित्य जगत में क्या चल रहा है, इसकी जानकारी लेते रहते.
उनकी मृत्यु से लगभग साल भर पहले अचानक उनका फोन आया. सामान्य बातचीत के बाद मैंने उनसे कहा कि राजनीतिक-सांस्कृतिक आंदोलनों का आपके पास इतना समृद्ध अनुभव है, तो आप अपनी आत्मकथा क्यों नहीं लिखते? उन्होंने छूटते ही कहा कि कम्युनिस्ट आत्मकथा नहीं जनकथा लिखते हैं. मुझे याद आया कि एक बार यही सवाल मैंने माओवादी नेता कॉमरेड नारायण सान्याल से भी उनकी मृत्यु के कुछ ही साल पहले पूछा था. उन्होंने भी बिना देर किये जवाब दिया कि अभी मैं रिटायर नहीं हुआ हूँ.
मैं सोचने लगा कि ये लोग आखिर किस मिट्टी के बने होते हैं.
कंचन कुमार बहुत अच्छे अनुवादक थे. बहुत सा बांग्ला और विश्व साहित्य की जानकारी मुझे उन्हीं से यानि उनकी पत्रिका ‘आमुख’ से हुई. उन्होंने मुरारी मुखोपाध्याय की एक कविता का अनुवाद ‘प्रेम’ नाम से किया था. यह कविता खुद कंचन कुमार के व्यक्तित्व और कर्म पर बखूबी फिट बैठती है-
हो जाए प्यार तो
चाँद मत बन जाना,
हो सके तो बनकर
आ जाना सूरज ।
मैं उसकी गर्मी ले लूँगा
और प्रकाशित करूँगा अन्धेरे जंगल ।
हो जाए प्यार
तो नदी नहीं बन जाना,
आ सके तो आना
बाढ़ की तरह ।
मैं उसका अवेग लेकर
तोड़ूँगा बाँध निराशा के ।
हो जाए प्यार
तो फूल मत बन जाना,
चमक सको तो चमकना
बिजली की मानिन्द ।
मैं उसकी दहाड़ भरकर छाती में
भेजूँगा हर कोने में युद्ध की घोषणा ।
हो जाए प्यार तो
बन मत जाना चिड़िया,
आना तो आँधी की तरह ।
मैं उसकी ताक़त लेकर उधार
पाप का महल तोड़ दूँगा ।
चाँद,
नदी,
फूल,
तारे,
चिड़िया —
ढूँढ़ हम इन्हें लेंगे बाद में ।
अभी अन्धेरे में
लड़ा जाना है
युद्ध आख़िरी
और अभी हमें मड़ैया में
बस, आग
चाहिए ।

