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कुल्ली भाट: निराला की रचना-धर्मिता और व्यक्तित्व में एक मोड़

कुल्ली भाट, निराला की ऐसी रचना है, जो खुद उनके लेखन में भू-चिन्ह  की तरह है। इसका रचनाकाल 1937-38 ईसवी का है। पुुुस्तिका के रूप में यह 1939 में छपी। 1916 से 1938 तक की समयावधि भी एक सी नहीं है। 1930 तक का विभाजन इसमें भी है।
इस बीच मानवतावाद, रोमांटिसिज़्म या छायावाद तथा आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से संपर्क का असर उनकी रचनाओं पर है या इसके प्रभाव में रचनाएं हैं।
इस समय तक उनकी रचनाएं नये ज्ञान और मानवतावादी विचार के आने से उपजी भाव-संवेदनाओं, आदर्शवाद आदि की साक्षी हैं। नये का स्वागत मुक्त और उत्साही ढंग से है। इसीलिए यहां पुराने के प्रति विद्रोह तीव्र और आक्रामक है। प्रकृति की कई चीजें वहां विद्रोही रूप लिए हैं। साथ ही, दया, करुणा, प्रेम आदि उदात्त भाव उनकी रचनाओं के लक्ष्य बने हैं।
मानवतावाद और आधुनिक बोध ने  व्यक्ति की स्वतंत्रता और पिछड़े समाज के मूल्य व नैतिकता के बीच की टकराहट को नया रूप और स्तर दिया। निराला इसके प्रतिनिधि रचनाकार के बतौर आते हैं। मानवतावाद के प्रभाव में जहाँ उनकी दृष्टि दीन और उपेक्षित जनों पर जाती है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक बोध के चलते उनमें वैयक्तिक स्वतंत्रता का भाव भी तीव्रतर है।  उसमें सहानुभूति भी है, समानभूति भी है। निजी जीवन की विषमताओं से वे इसी अवधि में गुजरते हैं। बावजूद इसके, मानवीय करुणा और वैयक्तिक  स्वतंत्रता की उच्चतम पुकार वे इसी अवधि में बनते हैं।
आधुनिक बोध और मानवतावादी विचार की आखिरी सीमा तक वे इस अवधि में जाते हैं। 1930 के दशक में सामाजिक-सांस्कृतिक मुक्ति के सवाल प्रमुखता पाते हैं।
अवध और बिहार का किसान आन्दोलन, भगत सिंह के साथियों  का  राष्ट्रीय मंच पर ठोस रूप में सामने आना, गाँधी-आम्बेडकर के बीच पूना पैक्ट, गाँधी का अछूतोद्धार आदि। निराला के भीतर इसका संघर्ष शुरू होता है।
वे अपने जीवन के अनुभवों से इस दिशा में बढ़ते हैं। सामाजिक-सांस्कृतिक मुक्ति का सवाल निराला के यहाँ प्रमुख होने लगता है। समाज के भीतरी विभाजन, विषमता की ठोस भौतिक सच्चाइयों के बीच पहुंचते जाते हैं।
एक महान कह कर गायी गयी संस्कृति का झूठ, पाखंड उनके सामने धीरे-धीरे खुलता है। अब इससे मनुष्य की मुक्ति किस विचार से होगी। मानवतावाद को जहां तक पहुंचाना था वह तो हो चुका। वह विचार इस मुक्ति में आगे के लिए सहायक नहीं। वैयक्तिक मुक्ति, सामाजिक मुक्ति के बिना अधूरी है, मूल्यहीन है। निराला के भीतर यह  द्वन्द्व है। इसको लेकर संघर्ष है। कौन सा विचार इसमें सहायक होगा?
निराला खोजते हैं, पाये हुए को जाँचते हैं। ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘तुलसीदास’ इसी में रचे जाते हैं।
पर सामाजिक मुक्ति का सवाल वहाँ अपना हल नहीं पाता।
1930 के दशक में वे इसीलिए ज्यादा द्वंद्व और पीड़ा से गुजरते हैं। और इस दशक के उत्तरार्ध तक जाते-जाते निराला इसमें से बदलकर निकलते हैं।
मानवतावाद की उच्चतम अवस्था मार्क्सवाद है, इस ज्ञान का सैद्धांतिक आधार उनके यहां कितना स्पष्ट था, यह तो पता नहीं लेकिन व्यवहार में वे इस ज्ञान तक पहुंचते हैं।
यहां तक पहुंचने की उनकी यह यात्रा निजी सामाजिक अनुभव और अनेक व्यक्तियों के संपर्क तथा सामाजिक मुक्त की चिंता के बीच होती है और यह उनके यहां अंत तक रहता है।
जाति और वर्ग की मुक्ति की राह निराला के लिए अस्पष्ट नहीं थी अब। उसके विचार तक वे पहुंचते हैं और वहां अंत तक रहते हैं। जिन्हें वे बाद के दिनों में वेदांती लगने लगते हैं, वह दुरुस्त नहीं। उनके यहां जो वेदांत दिखता है, एक तो  वह भारतीय मानवतावाद के भीतर का विकसित वेदांत है, जो बिल्कुल वही नहीं है, जो हिंदूवादियों के यहां है या प्राच्यवादियों द्वारा थम्हाया हुआ है। दूसरे, यह जो है भी निराला के यहाँ वह द्वन्द्व से, दुविधा से मुक्त नहीं। वह स्थिर विचार नहीं है उनके यहाँ। खैर
1937 के बाद  निराला का व्यक्तित्वांतरण होता है। वे बदलते हैं। इस बदलने में जिन चरित्रों की भूमिका रही कुल्ली भाट उसमें सबसे ऊपर हैं। इसीलिए वह कुल्ली भाट को जीवन चरित्र लिखने के लिए सबसे योग्य मानते हैं। ऐसा ‘जिसके चरित में नायकत्व  प्रधान हो।’ जिसमें चरित से जीवन ज्यादा हो, जिस चरित का अंधेरा जगजाहिर हो, छिपा न रहे, ऐसा जीवन जिससे पाठक चरितार्थ हों’…। चरितार्थ होने वालों में निराला स्वयं भी हैं।
कुल्ली के इस जीवन चरित में खुद निराला का भी जीवन आता है। भूमिका में वे लिखते हैं- “पंडित पथवारीदीन भट्ट (कुल्ली भाट)  मेरे मित्र थे। उनका परिचय इस पुस्तिका में है। उनके परिचय के साथ मेरा अपना चरित्र भी आया है। और कदाचित अधिक विस्तार पा गया है। रूढ़िवादियों के लिए यह दोष है, पर साहित्यिकों के लिए विशेषता मिलने पर गुण होगा।”
– लखनऊ, 10- 5-39
‘विशेषता’ की बात ऐसी रही कि कुल्ली भाट हिंदी ही नहीं भारतीय साहित्य की भी निधि साबित हुई।
कुल्ली भाट  एक चरित पुस्तिका है। जिसका चरित और जीवन वास्तविक है। यह संस्कृत के चरितम् या चरित्र तथा हिंदी की चालीसा की तरह नहीं है, जिसमें लक्षित  चरित्रों को भी महान बताने की परिपाटी होती है या कल्पनिकता की ऐसी बुनावट होती है, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं रहता।
  कुल्ली भाट कुल सोलह प्रकरणों में लिखा गया है। ग्यारह  प्रकरणों तक जो कथा चलती है,  उसमें निराला का गौना, प्लेग,  ससुराल, पिता, पत्नी, सास आदि से जुड़ी  घटनाओं,  विवरणों से होते हुए कुल्ली का प्रवेश होता है।
कुल्ली समलैंगिक हैं। इसको लेकर समाज के भीतर की धारणाओं और नैतिक व्यवहार को निराला ने प्रकट किया है। ग्यारहवें प्रकरण तक  सामान्य विवरणों, हल्की-फुल्की घटनाओं, हास्य-विनोद के साथ कथा चलती है।  लगता है, कि निराला ने क्या लिखा है, इसमें तो कुछ है ही नहीं। लेकिन, जैसे ही बारहवां  प्रकरण प्रारंभ होता है सत्य की ऐसी कथा-भूमि खुलती है जो व्याकुलता से भर देती है। उसके बाद का चार प्रकरण सामाजिक-राजनीतिक थ्रिल की तरह सामने आता है। उसकी सच्चाई जो सामाजिक  विसंगतियों, विद्रूपता तथा राजनीति के अंतर्विरोधों से युक्त है, एक-एक कर खुलती है।
हिंदी में इतने ऊंचे शिल्प की गद्य रचना विरल है। कथा पूरी होने के बाद मनुष्यता हर बात से ऊपर प्रतिष्ठित मिलती है। बाकी की  नैतिकताएं  एक कमजोर, दरक चुके, खोखले आधारों पर खड़ी दिखने लगती है।  निराला के लिए मनुष्यता की कसौटी उत्तरोत्तर क्यों ऊंची होती गयी, ‘कुल्ली  भाट’ में उसके स्पष्ट संकेत मिल जाते हैं।
बारहवें  प्रकरण का पहला पैराग्राफ कुल्ली के जीवन चरित्र के नये पाठ की पीठिका बनाता हुआ है।
“इन दिनों मैं लखनऊ रहने लगा था। सविनय अवज्ञा आंदोलन समाप्त हो चुका था। अछूतोद्धार की समस्या थी। इसी समय दलमऊ गया। कुल्ली की पूर्ण परिणति थी। राजनीति और सुधार दोनों के पूर्ण रूप थे। आंदोलन का केंद्र रायबरेली था। तब कुल्ली काफी भाग ले चुके थे।  पहले नमक कानून दलमऊ में तोड़ा जाने वाला था, तब कुल्ली  ने ही खबर दी थी, कि पुलिस गोली चलाने की तैयारी में है। तब कार्यकर्ता दलमऊ से हट कर रायबरेली चले गए थे। ताकि पुलिस को तकलीफ न हो। अदालत जाने वाले वकीलों, पुलिस के नौकरों, सरकारी अफसरों, पण्डों,  पुरोहितों, जमीदारों और तालुकेदारों  से घृड़ा करने लगे थे। प्रसंगवश  ब्राह्मणों से भी घृणा करने लगे थे।”
कुल्ली की पूर्ण परिणति राजनीति और सुधार दोनों रुपों  में होती है। वह राजनीतिक कार्यकर्ता बन चुके हैं। ब्राह्मण होकर मुसलमान स्त्री  से विवाह करते हैं और अछूत पाठशाला खोली है। कुल्ली बताते हैं-
“पाठशाला में तीस-चालीस लड़के आते हैं, धोबी, भंगी, चमार, डोम और पासियों के। पढ़ाता हूँ। लेकिन यहाँ के बड़े आदमी कहे जानेवाले लोग मदद नहीं करते। यहाँ के चेयरमैन साहब के पास गया, वह जबान से नहीं बोले, हालाँकि शहर के आदमी हैं। टाउनएरिया में सिर्फ कुछ घर हैं। बाकी गंगापुत्रों की बस्ती है। ये लोग उदासीन हैं। कुछ सरकारी अफसर हैं, वे भड़काया करते हैं। कैसे काम चले? मदद कहीं से नहीं मिलती। जो काम करता था, आन्दोलन में छोड़ दिया। अब देखता हूँ, उसी गधे पर फिर चढ़ना होगा।”
कुल्ली की पाठशाला के लिए जब निराला अपने परिचितों, अधिकारियों, चिकित्सकों या सम्मानित जनों से, संभ्रांत लोगों से बात करते हैं, तो लोगों ने कहा,
“अछूत-लड़कों को पढ़ाता है, इसलिए कि उसका एक दल हो; लोगों से सहानुभूति इसीलिए नहीं पाता; हेकड़ी है; फिर मूर्ख है, वह क्या पढ़ायेगा? तीन किताब भले पढ़ा दे। ये जितने कांग्रेसवाले हैं, अधिकांश में मूर्ख और गँवार। फिर कुल्ली सबसे आगे है।  खुल्लम-खुल्ला मुसलमानिन  बैठाये है।”
यह बातें हैं 1030-37 के बीच की। सविनय अवज्ञा आंदोलन खत्म हो चुका है। अवध का किसान आंदोलन 1920 से 31 तक चलता है। कांग्रेस हालांकि तब तक भी किसानों के हितों को खुद में अभिव्यक्त नहीं करती थी। अभी भी कांग्रेस मध्यवर्गीय  हितों की समझौतापरस्त राजनीति का मंच थी।
लेकिन किसान आंदोलनों ने नीचे से दबाव बनाना शुरू कर दिया था। अवध के किसान आंदोलन के खत्म होते-होते बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में स्वामी सहजानंद के नेतृत्व में किसान आंदोलन ने छोटे-मझोले, सीमांत किसानों और जमीदारों तालुकेदारों के बीच के तनाव  को इतना बढ़ा दिया कि अब कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक स्तर पर इसकी आंच पहुंचने लगी। 1936 ईसवी में  सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष ही बन जाते हैं।
इतना ही नहीं, इसी दशक में भगत सिंह से प्रभावित समाजवादी  युवकों की बड़ी संख्या कांग्रेस के भीतर सक्रिय होती है। इनमें से प्रायः का सम्बन्ध किसान परिवारों से था। जमीदार परिवारों के युवकों तक में इसने विचलन पैदा कर दिया था।
इसी दशक में आम्बेडकर मजदूर फेडरेशन बनाते हैं।  कहने का आशय यह कि कांग्रेस के भीतर चौतरफा नयी चेतना और सामाजिक मुक्ति के वास्तविक दबाव महसूस किये जाने लगे थे। नेहरू कांग्रेस की तरफ से किसान आन्दोलन में भेजे जाने लगे, जबकि प्रगतिशील किसान चेतना की अगुवाई सुभाष चन्द्र बोस कर रहे थे, तब भी।
दूसरी तरफ गाँधी का अछूतोद्धार कार्यक्रम आता है। लेकिन कांग्रेस इसकी स्वाभाविक प्रतिनिधि कभी नहीं बन पाती। कांग्रेस की अपनी पसंद नहीं होते हुए भी और संगठन में मध्यवर्गीय हितों के सर्वोपरि  होने के बावजूद किसान और अछूत वर्ग  नई चेतना के साथ नीचे से धक्का देने लगा था।
किसान और अछूत  कांग्रेसी नहीं था और मध्यवर्ग के साथ उसकी कोई एकता भी नहीं थी, लेकिन दिलचस्प है कि जब भी यह दोनों वर्ग अपने हक के लिए या स्थानीय सामाजिक-संरक्षण प्राप्त शक्ति से टकराता  कांग्रेसी हो जाता। क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप ही ऐसा था। वहाँ मुख्य टकराव औपनिवेशिक सत्ता से था। इस बात को आज के सन्दर्भ से भी कोई समझ सकता है, जब राष्ट्रीय राजनीति में मुख्य टकराव फासिस्ट सत्ता से है, तो दलित, मजदूर, किसान जब सत्ता से टकराता है तो वामपंथी कहा जाने लगता है। और,  जब वामपंथी टकराता है, तो वह कांग्रेसी कहा जाता है।
कुल मिलाकर मध्यवर्ग और उसकी किसी भी तरह की राजनीति का जन-पाठ और उसके सन्दर्भ  जितने निराला के यहाँ हैं, और कहीं नहीं।
कहने का एक आशय यह भी, कि 1930-40 के दशक में कांग्रेस की नीति और नेतृत्व तथा  नीचे की जनता, अछूत, किसान  के बीच कभी कोई जीवित और स्वाभाविक सम्बन्ध हिन्दी देश में नहीं बना।
खुद कांग्रेस की नीति और नीचे के संगठन के बीच कोई एकता नहीं विकसित की गयी। नीति में कांग्रेस इस दशक में किसान आन्दोलन के दबाव में जमीदारी के खिलाफ हुई पर संगठनात्मक रूप से कभी जमीदारी के खिलाफ कोई अभियान नहीं लिया गया। अछूतोद्धार और धर्मनिरपेक्षता को लेकर भी यही वास्तविकता रही।
इसी वास्तविकता में आज के हिन्दी प्रदेश की दुर्दशा छिपी मिलेगी। निराला के साहित्य में जो किसान, जो अछूत आधुनिक और प्रगतिशील दिखता है, उससे इतिहास का एक दूसरा पाठ भी खुलता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि हिन्दी प्रदेश पिछड़े मूल्यों से ही ज्यादा पहचाना जाता रहा!!
निराला के साहित्य के सन्दर्भों से देखने पर जो बात मिलती है, वह यही कि कांग्रेस इसे लेकर डाँवाडोल रही। आजादी के बाद भी देखा जाये, तो लगभग  सभी प्रधानमंत्री आधुनिकता और प्रगतिशीलता के वास्तविक प्रतिनिधि नहीं बन पाये, खुद नेहरू भी। इसका भी सन्दर्भ निराला के साहित्य में है। निबन्धों और कहानियों में है। दो निबंध तो नेहरू को लेकर ही है।
  इस हिंदी देश (जिसके लिए निराला ‘हिंदुस्तान’ का प्रयोग करते हैं- “वह मुखोपाध्याय महाशय को उतना ही बड़ा मानते थे, जितना बड़ा कोलकाता-बम्बई वाले हिंदुस्तानियों को मानते हैं”) का जो मध्य वर्ग तैयार हो रहा था, या बना था उसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक दरिद्रता कुल्ली  के मुसलमान से शादी करने और अछूत पाठशाला खोलने की प्रतिक्रिया में जाहिर हो जाता है।
साथ ही वह कांग्रेस के भीतर के प्रगतिशील तत्वों के प्रति भी कितना दूराग्रही है वह भी कुल्ली प्रकरण में जाहिर हो जाता है।  लेकिन, खुद कांग्रेस कहाँ खड़ी है, यह भी इससे पता चलता है।  कुल्ली के प्रगतिशील, आधुनिक और जनवादी कार्यों को कांग्रेस के नेतृत्व से कोई सम्बल या प्रोत्साहन नहीं मिलता है।
कुल्ली निराला के कहने पर गांधी और नेहरू दोनों को पत्र लिखते हैं, लेकिन उसका जवाब नहीं आता। बावजूद इसके कुल्ली अपना जीवन कांग्रेस के कार्यकर्ता और सदस्य तैयार करने में लगा देते हैं।
आजादी के बाद जो कांग्रेस संगठन सामने आया उसकी एक बानगी तो यहाँ मिल ही जाती है। इसे और स्पष्ट रूप से जानना हो, तो फणीश्वर नाथ रेणु को  पढ़ना चाहिए।
कहने का आशय यह, कि नेहरू के आधुनिकता और प्रगतिशीलता  का विराट ढोंग  खड़ा करने के बावजूद कांग्रेस  संगठन यथास्थितिवाद और प्रतिगामी तत्वों के वर्चस्व से कभी मुक्त नहीं हुई।
दूसरी बात, जो मध्यवर्ग भारत में बना और जिसके हितों की प्रतिनिधि कांग्रेस थी, वह भी ढोंगी और पाखंडी था। इसका एक कारण जाति-विभाजित  भारतीय समाज में सवर्णों का ब्राह्मणवादी मूल्यों और नैतिकता का पोषक होना था। जो मध्य वर्ग बन रहा था, वह इन्हीं जातियों के बीच से बन रहा था।
बाद को तमाम किसान आन्दोलनों  और सुधारों के चलते राजनीति में उभरी मध्यवर्ती  जातियों ने भी सांस्कृतिक रूप से इसे ही सामाजिक पैमाना बनाया।  उसे चुनौती कम ही मिली उनसे।
निराला ने इस बनते मध्यवर्ग  की पोल-पट्टी अपनी बहुतेरी कहानियों में खोली है। या, उसकी वस्तुस्थिति को कहानियों का मुख्य विषय बनाया है। कुल्ली के मुसलमान से विवाह करने और अछूत पाठशाला  खोलने पर मध्यवर्गीय प्रतिक्रिया यूँ है-
“फिर कुल्ली सबसे आगे है।  खुल्लम-खुल्ला मुसलमानिन  बैठाये है। उसे शुद्ध किया है, कहता है, अयोध्या जाने कहाँ ले जाकर गुरु मंत्र भी दिला आया है। पर आदमी आदमी हैं, जनाब, जानवर थोड़े ही हैं? कान फूँकने से विद्वान, शिक्षक और सुधारक होता है? देखो तो, बीवी तुलसी की माला डाले है। दुनिया का ढोंग।”
जबकि खुद यही मध्यवर्ग कितना बड़ा ढोंगी है, इससे प्रेमचंद और निराला दोनों का साहित्य भरा है।   हिंदी देश का यही मध्यवर्ग आज राजनीति का सबसे मजबूत आधार बना है और हर  लोकतांत्रिक, आधुनिक और प्रगतिशील तत्वों को ढोंग, अभारतीय  और ऐसे लोगों को देशद्रोही कहता है।
इस मध्यवर्ग  के लिए सहज और सामान्य बात क्या है! वह है, निर्लज्ज जीवन शैली, असीमित स्वार्थपरता, लोभ-लालच, भ्रष्टतम, गलाकाट जीवनशैली। देश को घुन की तरह इसके खाने के खिलाफ की गयी किसी भी क्रिया को यह देशद्रोही कहता है। बहरहाल
निराला ने अपनी अन्य गद्य  रचनाओं की तरह कुल्ली भाट में भी मध्यवर्ग की इस वास्तविकता को, पाखण्ड को लक्षित किया है। इसके सापेक्ष निराला अछूत समाज का वर्णन अगले ही प्रसंग में करते हैं। कुल्ली उन्हें अछूत पाठशाला में आने का न्योता देते हैं-
“तीसरे दिन कुल्ली आये। बड़े आदर से ले गये। देखा, गड़हे  के किनारे,  ऊँची जगह पर, मकान के सामने एक चौकोर जगह है। कुछ पेड़ हैं। गड़हे  के चारों ओर के पेड़ लहरा रहे हैं।  कुल्ली के कुटीनुमा बँगले के सामने टाट बिछा है। उस पर अछूत लड़के श्रद्धा की मूर्ति बने बैठे हैं। आंखों से निर्मल रश्मि निकल रही है। कुल्ली आनंद की मूर्ति साक्षात आचार्य। काफी लड़के। मुझे देखकर सम्मान प्रदर्शन करते हुए नत सिर अपने-अपने पाठ में रत हैं। बिल्कुल प्राचीन तपोवन का दृश्य। इनके कुछ अभिभावक भी आये हैं। दोने में फूल लिए हुए मुझे भेंट करने के लिए। इनकी ओर कभी किसी ने नहीं देखा। यह पुश्त-दर-पुश्त से सम्मान देकर नतमस्तक ही संसार से चले गये हैं। संसार की सभ्यता के इतिहास में इनका स्थान नहीं। यह नहीं कह सकते हमारे पूर्वज कश्यप, भारद्वाज, कपिल, कणाद थे; रामायण, महाभारत इनकी कृतियाँ हैं; अर्थशास्त्र, कामसूत्र इन्होंने लिखे हैं; अशोक, विक्रमादित्य, हर्षवर्धन, पृथ्वीराज उनके वंश के हैं। फिर भी ये थे और हैं।”
“अधिक न सोच सका। मालूम दिया, जो कुछ पढ़ा है, कुछ नहीं; जो कुछ किया है, व्यर्थ है; जो कुछ सोचा है, स्वप्न। कुल्ली धन्य है। वह मनुष्य है, इतने जम्बूकों  में वह सिंह है। वह अधिक पढ़ा-लिखा नहीं; लेकिन अधिक पढ़ा-लिखा कोई उससे बड़ा नहीं। उसने जो कुछ किया है, सत्य समझ कर। मुख-मुख पर इसकी छाप लगी हुई है। ये इतने दीन दूसरे के द्वार पर क्यों नहीं देख पड़ते? मैं बार-बार आँसू रोक रहा था।”
“इसी समय बिना स्तव के, बिना मंत्र के, बिना वाद्य, बिना गीत के, बिना बनाव, बिना सिंगारवाले वे चमार, पासी, धोबी और कोरी दोने में फूल लिए हुए मेरे सामने आ- आकर रखने लगे। मारे डर के हाथ पर नहीं दे रहे थे कि कहीं छू जाने पर मुझे नहाना होगा। इतने नत। इतना अधम बनाया है मेरे समाज ने उन्हें।”
“कुल्ली ने उन्हें समझाया है, मैं उनका आदमी हूँ, उनकी भलाई चाहता हूँ। उन्हें उसी निगाह से देखता हूँ, जिससे दूसरे को। उन्हें इतना ही आनंदविह्वल किए हुए है। बिना वाणी की वह वाणी, बिना शिक्षा की वह संस्कृति, प्राण का पर्दा-पर्दा पार कर गयी। लज्जा से मैं वहीं गड़ गया। वह दृष्टि इतनी साफ है कि सबकुछ देखती-समझती है। वहाँ चालाकी नहीं चलती। ओफ् ! कितना मोह है ! मैं ईश्वर, सौंदर्य, वैभव और विलास का कवि हूँ !- फिर क्रांतिकारी !!”
“संयत होकर मैंने कहा, ‘आप लोग अपना अपना दोना मेरे हाथ में दीजिए, और मुझे उसी तरह भेंटिए, जैसे मेरे भाई भेंटते हैं।’ बुलाने के साथ मुस्किराकर वे बढ़े। वे हर बात में मेरे समकक्ष हैं, जानते हैं। घृणा से दूर हैं। वह भेद मिटते ही आदमी-आदमी मन और आत्मा से मिले, शरीर की बाधा न रही।”
“इस रोज मैं और कुछ नहीं कर सका, देखकर चला आया, कुछ लड़कों से कुछ पूछकर।”
यह लंबा उद्धरण इसलिए, कि समाज, साहित्य, शिल्प, संवेदना, भाषा आदि के तो उच्च दर्शन इसमें होते ही हैं, लेकिन इसमें एक और बात दिखती है; जो एक रचनाकार और मनुष्य दोनों स्तरों पर निराला के बनने से जुड़ी है। बाहर से भीतर और भीतर से बाहर आवाजाही का ऐसा साहस परले ही दिखा पाए हैं हिंदी रचना संसार में। आत्मा को पिघला देना और फिर उसे नये ढांचे-सांचे में ढालने की प्रक्रिया इसमें दिखती है। इसे ही लोक में आत्मा को छीलना कहते हैं। इसी में ऊंचे उठते जाने और अकेले होते जाने के खतरे थे, जो निराला ने उठाये/पाये।
एक-एक पैराग्राफ, एक-एक पंक्ति, एक-एक शब्द पर ध्यान दें और 1940 ई. के बाद लिखी उनकी ‘कुकुरमुत्ता’, ‘अणिमा’, ‘बेला’ और ‘नये पत्ते’ की कविताओं की बदली वस्तु और संवेदना, काव्य-भाव की भंगिमा, तेवर को परखें तो प्रारम्भ में ‘कुल्ली भाट’ के भू-चिन्ह होने वाली बात और स्पष्ट हो जाएगी।
विचार और व्यक्तित्वांतरण 
विचार मनुष्य को बदल देता है। यह हृदय परिवर्तन नहीं क्योंकि परिवर्तित हृदय क्षणिक, तात्कालिक होता है। उसमें सत्य नहीं होता, दिखावा होता है। वह अपना मूल चरित्र छिपाये रहता है। कुल्ली का हृदय परिवर्तन नहीं होता, बल्कि कुल्ली बतौर मनुष्य बदलते हैं-
“कुल्ली धन्य है। वह मनुष्य है, इतने जम्बूकों में वह सिंह है। वह अधिक पढ़ा लिखा नहीं; लेकिन अधिक पढ़ा-लिखा कोई उससे बड़ा नहीं। उसने जो कुछ किया है, सत्य समझकर।”(प्रकरण-12)
“कुल्ली की आग जल उठी। सच्चा मनुष्य निकल आया, जिससे बड़ा मनुष्य नहीं होता। प्रसिद्धि मनुष्य नहीं। यही मनुष्य बड़े-बड़े प्रसिद्ध मनुष्य को भी नहीं मानता, सर्वशक्तिमान् ईश्वर की मुखालिफ़त के लिए सिर उठाता है, उठाया है। इसी ने अपने हिसाब से सबकी अच्छाई और बुराई को तोला है, और संसार में उसका प्रचार किया है।”(प्रकरण-13)
“कुल्ली स्थिर भाव से बैठे रहे। इतनी शान्ति कुल्ली में मैंने नहीं देखी थी, जैसे संसार को संसार का रास्ता बताकर, अपने रास्ते की अड़चने दूर कर रहे हों।”(प्रकरण-14)
“कुल्ली चले गये।  अब यह वह कुल्ली नहीं हैं। प्रायः पचपन-छप्पन  की उम्र।  लेकिन कितनी तेजी! कोई उपाय नहीं मिला, किसी ने हाथ नहीं पकड़ा, कुछ भी सहारा नहीं रहा, तब दूसरी दुनिया की तरफ मुंह फेरा है। कितना सुंदर है, इस समय सब कुछ कुल्ली का!”(प्रकरण-14)
” इतना स्तब्ध भाव था कि बात करने की हिम्मत नहीं होती थी। इसी समय साले साहब भीतर से जल-पान ले आये, और कुल्ली  के सामने आदरपूर्वक रखते हुए बोले,  ‘रात भर दुखिया चमार की सेवा करते हैं, उसकी स्त्री का देहांत हो गया है, दुखिया बीमार है। आज लालगंज जाएंगे, वहां कांग्रेस का काम है। कल दुपहर को जल-पान किया था तब से ऐसे ही हैं।’
चुपचाप तश्तरी उठाकर कुली नाश्ता करने लगे। चेहरा सुर्ख। मनुष्यत्व  रह-रहकर विकास पा रहा है। देखकर मैंने सिर झुका दिया।”(प्रकरण-14)
“सासु जी ने कहा, ‘भैया, आदमी नहीं, देवता है कुल्ली!”(प्रकरण-14)
सासु जी की यह प्रतिक्रिया बहुत मानीखेज है कुल्ली के इस चरित-कथा को समझने के लिए। प्रारम्भ में यही सासु जी कुल्ली के निराला से मिलने पर बवाल मचाती हैं, आपत्ति करती हैं। लेकिन वही सासु जी कांग्रेस का काम करने, मुसलमानिन से शादी करने, अछूत पाठशाला खोलने, उनकी सेवा करने को लेकर अपनी प्रतिक्रिया देती हैं कि कुल्ली देवता है। सासु जी गँवई महिला हैं लेकिन उनके सहज बोध में कुल्ली देवत्व प्राप्त कर लेते हैं लेकिन कुल्ली के इन्हीं कामों पर मध्यवर्गीय प्रतिक्रिया को मिलाइये-
“…अछूत लड़कों को पढ़ाता है…फिर मूर्ख है, वह क्या पढ़ायेगा? …खुल्लमखुल्ला मुसलमानिन बैठाये है।”
यह औपनिवेशिक सत्ता का पिट्ठू पाखंडी मध्यवर्ग है। जिसकी एक प्रतिक्रिया यह भी है कि ये जितने कांग्रेस वाले हैं, अधिकांश में मूर्ख और गँवार।
विसंगति देखिये कि ऊपर की कांग्रेस इसी मध्यवर्ग के हितों की राजनीति से घिरी रहती है। उसमें किसान और अछूत हितों को प्राथमिकता कभी नहीं मिलती। कुल्ली भाट की इसी कथा में यह बहुत स्पष्ट ढंग से आया है।खैर
कुल्ली के इस व्यक्तित्वांतरण के पीछे का विचार अनुभव और सत्य के मिलने से बनता है। बाहरी दुनिया की हलचल, जागतिक मानव-व्यवहार और आजादी के सच्चे संघर्ष से मिलकर यह विचार आता है।
“इधर कुल्ली अखबार पढ़ने लगे थे। त्याग भी किया था, अदालत के स्टाम्प बेचते थे, बेचना छोड़ दिया था। महात्मा जी की बातें करने लगे। मैं सुनता रहा। जब कुछ पूछते थे, तब जितना जानता था, कहता था।”
“कुल्ली जमे। पूछा, ‘समाज के लिए आपके क्या विचार हैं?’
‘जो कुछ मैं कह गया’, मैंने कहा, ‘इसी का नाम समाज है। जो कुछ बहता है, उसमें हमेशा एक सा जलत्व नहीं रहता।”
“कुल्ली कुछ देर स्तब्ध रहे। फिर साँस भरकर बोले, ‘यहाँ कांग्रेस भी नहीं है। इतनी बड़ी बस्ती, देश के नाम से हँसती है,  यहाँ कांग्रेस का भी काम होना चाहिए।”
कुल्ली की यह कांग्रेस किसान को जमीदार की मार और सरकार के अन्याय से बचाने का, अछूतोद्धार का संगठन थी। जबकि यह कांग्रेस ऊपर की कांग्रेस नहीं थी, जो कुल्ली के भेजे पत्र-प्रसंग से स्पष्ट हो जाता है।
महत्वपूर्ण है, कि कुल्ली जिस  आजादी के विचार और आन्दोलन से बदलते हैं, उसके मायने उनके लिए किसानों में कांग्रेस का संगठन करना, अछूत पाठशाला खोलना और मुसलमानिन से प्रेम और विवाह करना है।
बहुत स्पष्ट है, कि कुल्ली के लिए आजादी का यह विचार सामाजिक मुक्ति से गहरे जुड़ता है, न कि सत्ता हस्तांतरण या एक निश्चित भू-क्षेत्र का विदेशी दासता से मुक्त होना।
आजादी का यही विचार भगत सिंह, डाॅ. आम्बेडकर के पास भी था। साहित्य में यह प्रेमचंद के यहाँ प्रभावी और निर्णायक ढंग से रचना के पीछे काम करता है। निराला अपने जीवनानुभवों और सत्य की निरंतर पड़ताल से इस दिशा में बढ़ते हैं।
कुल्ली भाट, इसमें एक पड़ाव और मोड़ के रूप में भी है। यह उनकी बाद की कविताओं में बहुत साफ-साफ दिखता है। बल्कि यह भी कहना ठीक होगा, कि 1940 के बाद की निराला की कविताओं को ‘कुल्ली भाट’ के साथ मिलाकर पढ़ना चाहिए!

कुल्ली की अछूत पाठशाला और मुसलमानिन से प्रेम
कुल्ली की अछूत पाठशाला पर मध्यवर्गीय प्रतिक्रिया और लोकप्रशंसा की चर्चा हो आयी है। कुल्ली के लिए अछूत पाठशाला खोलना, आजादी की लड़ाई और कांग्रेस बनाने की उनकी अपनी समझ है।

मुसलमानिन से प्रेम और विवाह भी इसी से जुड़ा है। क्योंकि कुल्ली के लिए नीति और व्यवहार में  राष्ट्रीय और प्रांतीय कांग्रेस की तरह दोहरापन नहीं है।
कुल्ली लगातार इस बात से निराश होते हैं, लेकिन वे समझौता नहीं करते।
निराला और कुल्ली के बीच के संवाद से यह ज्यादा  स्पष्ट होगा-
मैंने सोचा, कुछ सुस्ता लें। कुछ देर बाद मैंने पूछा, “आपने महात्मा जी को लिखा?”
कुल्ली ने कहा,  “जान पड़ता है वह भी ऐसे ही होंगे” मैंने कहा,  “नहीं, सालभर अछूतोद्धार करने का उन्होंने कार्य ग्रहण किया है। देश के इस कोने से उस कोने तक दौरा करेंगे।”
कुल्ली ने कहा,  “बस दौरा ही दौरा है। काम क्या होता है। पहले अछूतों की बात नहीं सोची, जब सरकार ने पेंच लगाया, तब खोलने के लिए दौड़े-दौड़े फिर रहे हैं।
मैंने कहा, “अच्छा यह बताओ दोस्त, तुमने भी पेंच में पड़कर अछूतोद्धार  सोचा है या नहीं?”
कुल्ली नाराज हो गये। कहा,  “मेरे साथ भी कोई जमात है और अगर यही है, तो बैठा लें महात्मा जी मुसलमानिन”
“तुम कैसे हो”, मैंने डाटा, “वह बुड्ढे हो गये हैं, अब मुसलमानिन बैठायेंगे!”
कुल्ली शांत हो गये। कहा, “एक बात कही”  फिर शायद खत लिखने की सोचने लगे। सोचकर कहा, “कोई चारा नहीं देख पड़ता। हाथ भी बंधे हैं। लेकिन काम करना ही है। क्या किया जाये?”
मैंने कहा, “नंबरदार, ‘महाजनों येन गतः स पन्थाः’ इसीलिए कहा है। जिधर चलना चाहते हो आप, उधर चले हुए बहुत आदमी नजर आएंगे आपको। आपसे बड़े-बड़े। उसी तरफ चले जाइए। आज तक ऐसा ही हुआ है। कोई कुछ काम करता है, तो दुनिया से ही वस्तु-विषय ग्रहण करता है और उस विषय के काम करने वालों को देखता है, पढ़ता है, सीखता है, समझता है, तब अपनी तरफ से एक चीज देता है। आप अछूतोद्धार कर रहे हैं, कीजिए। करने वालों से मिलिए, उनकी आज्ञा लीजिए, जिन्हें अधिकांश जन मानते हैं; मेरे आपके न मानने से उनकी मान-हानि नहीं होती। यह समझिए। मैं आप उनके मुकाबले कितने क्षुद्र हैं। अगर यह धोखा है, तो इस धोखे को आप तो नहीं मिटा सकते। आप अपना रास्ता भी नहीं निकाल सकते, क्योंकि अभी आपने ही कहा- चारा नहीं, हाथ भी बंधे हैं। महात्मा जी को संसार की बड़ी-बड़ी विभूतियां मानती हैं। वह मामूली आदमी नहीं।”
कुल्ली कुछ देर स्तब्ध रहे। फिर साँस  भरकर बोले,  “यहाँ कांग्रेस भी नहीं है, इतनी बड़ी बस्ती, देश के नाम से हँसती है। यहाँ कांग्रेस का भी काम होना चाहिए”
इस संवाद से जाहिर होता है, कि कांग्रेस बनाने का उनका मकसद क्या था! वे गाँव-गाँव कांग्रेस के मेम्बर बनाते हैं, लेकिन उनकी अछूत पाठशाला के लिए कहीं से मदद नहीं मिलती।
इसी तरह मुसलमानिन से प्रेम और विवाह करना उनके लिए मनुष्य होने का विश्वास है। वे अछूत पाठशाला को मदद न मिलने पर कहते हैं-
” कुल्ली हँसे। कहा, “और भी बातें हैं। भीतरी  रहस्य का मैं  जानकार हूँ, क्योंकि यही का रहने वाला हूँ। भंडा फोड़ देता हूँ। इसलिए सब चौंके रहते हैं। वह मेम है, सरकार की तरफ से नौकर है, लेकिन बच्चा होआने जाती है, तो रुपया लेती है, और एक ही जगह दस-दस;  मैंने एक धोबिन को कहा, बुलाये और रुपया न दे, ज्यादा बातचीत करे, तो देखा जायेगा। धोबिन ने ऐसा ही किया। मेम साहब नाराज हो गयी। यही हाल मवेसी-डॉक्टर का है। मुसलमान इसलिए नाराज हैं, कि मुसलमानिन  ले आया हूँ। अरे भाई, तुम्हीं गाते हो-  दिल ही तो है,  न संगोखिश्त दर्द से भर न आये क्यों? फिर नाराज क्यों होते हो? क्या यह भी कहीं लिखा है, कि दिल सिर्फ मुसलमान के होता है? और हिंदू, हिंदू है बुजदिल, खासतौर से ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया बेचारा क्या करे- इस कोठे का धान उस कोठे करे, उसे फुर्सत नहीं, उसके लिए यह सब समझ से बाहर की बातें हैं, क्योंकि रूपये-पैसे की नहीं। आखिर क्या करूँ?  आदमी हूँ, आदमियों में ही रहना चाहता हूँ।”
कुल्ली के लिए आदमियों में रहना क्या है, यह निराला के ही शब्दों में-
“…सच्चा मनुष्य निकल आया, जिससे बड़ा मनुष्य नहीं होता।”
निराला की इस रचना में कुल्ली के चरित-कथा के मारफत मध्यवर्ग, सवर्ण, कांग्रेस आदि की जमीनी हकीकत तो सामने आती ही है और उसके सापेक्ष कुल्ली का चरित्र उभरता/निखरता है, पर एक और बात जो सामने आती है, कि भारत में  वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक समस्या और भ्रष्टाचार के केन्द्र में औपनिवेशिक सत्ता की बड़ी भूमिका रही है। जिसका एक संकेत मध्यवर्ग की मूल्यहीनता और भ्रष्ट-जीवन के वर्णनों तथा लाला साहब और पण्डित जी प्रसंग में मिलता है।
बाद को चलकर जब निराला ‘कुकुरमुत्ता’ कविता लिखते हैं, तो वहाँ इसके बिम्ब मिलते हैं। कुल मिलाकर ‘कुल्ली भाट’ निराला की रचना-धर्मिता और व्यक्तित्व में आया एक मोड़ है। बाकी, सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की बड़ी रचना तो है ही!
(फीचर्ड इमेज गूगल से साभार)

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