पवन करण
तुम्हारी बातें कुदाल-सी खोदती रहतीं हैं मेरी मिट्टी, जब मिलता है तुम्हारे नेह का जल, हरी-भरी हो जाती हूं-
कवि पूनम शुक्ला के कविता संग्रह ‘पिता का मोबाईल नंबर’ को पढ़ने के बाद उनसे जो पूछा जा सकता है वह यह कि क्या उन्हें समकालीन कविता के इस तल्ख और तेजतर्रार दौर, जिसमें भाषा,रूप,कल्पना और कथन अत्यधिक सक्रिय हैं, उन्हें अपनी कविता का सीधे और सरलता से चलना हताशा से नहीं भरता। शायद उनका उत्तर न में हो। संभव है कि उनकी कविता उनके अंतस का आईना हो और उसका प्रतिनिधित्व करती हो। यह तय है कि कवि के रूप में वे अपने आसपास के वातावरण, जिस पर जहां तक उनकी दृष्टि जाती है, उसका एक भाग हैं। वे दृष्टा नहीं, जहां उनकी कविता जन्म लेती है, उसका हिस्सा हैं। फिर सरलता, सादगी और सीधा होना कवि और उसकी कविता की कोई कमतरी नहीं। ये उसका निरंतर और स्वभाविक गुण है। जो समाज से सरलता से संवाद करने में सक्षम होता है। कहन के स्तर पर स्मृति में बने रहने में सफल होता है।
चार-पांच बरस पहले एक कविता केंद्रित आयोजन में शामिल हुआ। जिसमें समकालीन कविता के अधिकांश प्रमुख-प्रतिनिधि कवियों ने भाग लिया और अपनी कविताएं पढ़ीं। मगर उसमें जो पक्ष उभरकर सामने आया वह यह कि अधिकतर कवियों ने मां पर केंद्रित अपनी किसी न किसी कविता का पाठ किया। जब पढ़ी गईं कविताओं पर टिप्पणी करते हुए कविता के एक वरिष्ठ आलोचक ने इसे कवियों का ‘ममियाना’ बताते हुए सबका ध्यान इस ओर खीचा तो सब खीजते हुए चौक गये। सचमुच वहां पढ़ी गई कविताओं में मां ज्यादा ही मौजूद थी। कभी कहीं यह भी संयोग घटे कि अधिकांश स्त्रीकवि किसी कविता केंद्रित आयोजन में पिताओं पर लिखीं कविताएं पढ़ें और एक चुभन भरी आलोचकीय तंज की शिकार हों। क्या ये संभव है?
स्त्रियों की दुनिया में पिता प्रथम पुरुष के तौर पर सामने आता है। पिता की स्मृति स्त्री के हृदय पर स्थायी होती है। उसके जीवन में आने वाला कोई दूसरा अत्यंत अंतरंग पुरुष भी उसे लांघ नहीं पाता। अधिकतर स्त्री कवियों ने अपने पिताओं पर मार्मिक और संवेदना से भरी कविताएं लिखी हैं। पूनम शुक्ला भी उनमें से एक हैं। जिन पर अपने पिता के जीवन की गहरी छाप है। उनकी कविता में उन्हें पिता का जीवन जीते हुए भी पकड़ा जा सकता है। वे बड़ी आसानी से अपने पिता के पीछे खड़े उनके भी पिता को अपनी कविता में ले आती हैं। मगर वे अपनी कविता में पितृसत्ता की संवाहक नहीं, पितृसंवेदना की विस्तारक की तरह नजर आती हैं। फिर स्त्रीकवियों ने ही क्यों पुरुषकवियों ने भी पिता से शत्रुता की हद तक तमाम असहमतियों के बाद भी एक से एक शानदार कविताएं लिखीं हैं। क्या यह सच है कि मां पर कविता लिखते हुए पुत्र और पिता पर कविता लिखती हुई पुत्रियां कुछ अलग, कुछ खास, कुछ अनूठा रचती हैं।
समाज और आसपास के दृश्यों से भरी उनकी कविता( दृष्टि) जब उनके भीतर झांकना प्रारंभ करती है। तब उसकी खुर्दबीन उल्लेखनीय होती है। स्वयं पर(स्त्री पर) लिखते समय वे अपनी कविता में सर्वाधिक आत्मसमृद्ध नजर आती हैं। कुछ तल्ख, कुछ तेज, कुछ आक्रामक जो उनकी कविता का समग्र गुण नहीं। आखिर गुस्सा, प्रतिपक्ष, कथन, मनुष्य का अस्थायी किंतु परिवर्तनकारी सुभाव है। अपनी कविता में प्रेम-कथन में उन्हें कोई संकोच नहीं। बल्कि वे प्रेम-अभिव्यक्ति के स्तर पर और खुलती हैं और वे वहां उतनीं सरल और सीधी भी नजर नहीं आतीं। प्रेमपथ सीधा होता भी नहीं उसकी पगडंडियां टेढ़ी-मेढ़ी, ऊंची-नीचीं और रपटीलीं-धसकीलीं होती हैं। जिन पर फिसले बिना न प्रेम हासिल होता है न संभले बिना चला जाता है। पूनम शुक्ला सादगी से भरी अपनी कविता से समकालीन कविता को और समृद्ध करने की चाहत में सार्थक कविता रचती कवि हैं। मगर उनकी कवि-संवेदना और कहन-सामर्थय को तो उनकी कविता पढ़कर ही परखा जा सकता है-
●इच्छाएं मरती नहीं, हम ही उन्हें जबरन
जिंदा दफ्ऩ कर, उनकी मौत का जश्न मनाते हैं
उनकी क़ब्र पर रखे हुए फूल
लगातार सुनते हैं, भीतर से आती हुई आवाजें
●कितना अच्छा होता गर मेरा कोई नाम न होता
मैं ढेरों नाम की एक चुनरी बना
उसे धीरे से ओढ़ लेती और उसे लहराती
●मैं किसी दुखभरी आंखों से निकलकर
खिलखिलाती हुई आकर बैठ जाऊंगी तुम्हारे पास
मैं आऊंगी…मैं खुशी की तरह आऊंगी
●दौड़ती तो अब भी वह चमकती बिजली की ही माफिक
पर आईना है कि चमककर टूटता ही नहीं
●धार्मिक स्थलों पर बैठे हुए धर्म के पुजारी
धार्मिक अनुष्ठानों के बीच
अपनी सीधी चाल से भटककर
बहन-बेटियों की इज्जत ली ने निकल पड़ते हैं
●पीछे छूट गये शहर, बार-बार पीछे से
देते हैं आवाज दरअसल वे देखना चाहते हैं
हमारा पीछे मुड़कर देखना
●अब बस एक सुनसान-सी रात है
जहां मां चांद सी और पिता तारों से दिखते हैं
मैं कुछ कहना चाहती हूं
रास्ते में मेरी आवाज खो जाती है
●बहुत डरती हैं स्त्रियां स्त्रियां बनने से पहले
स्त्रियां बनते ही बदल जाता है उनका डर
●गरीबों के आधे भूखे पेट आधे हवा से भरे हुए हैं
भूखे और नंगों के आधे पेट आधे हवा से भरे हुए हैं
तन आधे हवा से ढके हुए हैं, कच्चे-पक्के,
आधे-अधूरे मकान आधे हवा से बने हुए हैं
हम आधी आबादी वाली महिलाएं अब आधी हवा हवा हैं
●मकान खरीदे जाते हैं अब बस निवेश के रूप में
●कहीं से बसंत नीचे उतर आएगा आज
आज उसका ख़ुद से बातें करने का दिन है
आज एक स्त्री घर में अकेली है
●सभी आवाजें हवा में पनाह लेती हैं
छुपी होती है हवा में ही सभी आवाजों की आवाज
●उदासी सोया हुआ पत्थर है
उदासी की पीठ पर भले ही
हंसी की गिलहरियां कूदती हों
उसकी पीठ में सिहरन नहीं होती
●चलना एक प्रार्थना है
●सामने आए वक्त़ को तलाशती हूं
भय को प्रेम की शमशीर से काटती हूं
जुल्म के खिलाफ खड़ी होती हूं
तनकर कुछ देर और ज्यादा।
( प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित मैनें इस कविता संग्रह को पढ़ लिया है। आप भी पढ़िए। )
पुस्तक: पिता का मोबाईल नंबर (काव्य संग्रह)
कवि: पूनम शुक्ला
प्रकाशन: प्रकाशन संस्थान
मूल्य: 199 रुपये (पेपरबैक)

