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पहाड़ों की ठंडी हवा सरीखी कविताएँ :अशोक कुमार के काव्य संग्रह ‘रिक्तियों में पहाड़’ की पुस्तक समीक्षा

आलोक कुमार मिश्रा


हिन्द युग्म प्रकाशन से कवि अशोक कुमार का नया काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ है- ‘रिक्तियों में पहाड़।’ संग्रह के नाम में ही नहीं बल्कि इसमें शामिल कविताओं की अनुगूँज में भी पहाड़ और उसके लोक जीवन की उपस्थिति गहरे तक महसूस होती है। अशोक का ये दूसरा ही काव्य संग्रह है, लेकिन परिपक्वता की दृष्टि से कविताएँ पाठक को बाँधती ही नहीं चौंकाती भी हैं। इनकी कविताओं में हिमाचल के पहाड़ों से आती आवाज़ों के साथ-साथ वर्तमान महानगरीय समय के यथार्थ, विद्रूपताओं, विडंबनाओं और सच्चाइयों को भी रेखांकित किया जा सकता है। एक पाठक के रूप में मैं अशोक को पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तो पढ़ता ही रहा हूँ, उनके जीवन और रचना प्रक्रिया का भी साक्षी रहा हूँ। पिछले कुछ वर्षों में ही उन्होंने एक नई काव्य भाषा काईजाद किया है। वो भाषा जिसमें पहाड़ बोल उठते हैं, लोकगीत महानगरों की आपाधापी में भी कानों में गूँजने लगते हैं, जिसके व्याकरण की चौहद्दी में सच बयाँ होते हैं तो उसे तोड़कर बाहर निकलते हुए अनसुने-अनकहे को भी आवाज़ मिलती है।
संग्रह की पहली ही कविता हम पाठकों को एक आईना दिखा देती है जिसमें सारी अच्छाइयाँ हमारी व्यावहारिक बुद्धि और समझ के अधीन होकर सिमटकर सद्कामनाओं में हो बदलकर रह जाती हैं। कविता भीतर तक बोल उठती है, “दरअसल मैं /भीतर से डरा हुआ / वह व्यक्ति हूँ/जो विद्रोह किए बग़ैर/ क्रांति चाहता है।” इसी डर को अगली कविता ही नहीं और भी कई कविताओं में अशोक दर्ज़ करते हैं जो मध्यवर्गीय जीवन का एक बड़ा सच बन गया है। पर उनका कवि मन भीतर ही भीतर इस डर की कारा को तोड़ डालने को कसमसाता है और “कम से कम जो हम कर सकते थे” कविता में उसे इस तरह से सामने लाता है कि क्रांतियाँ बड़े बदलावों से ही नहीं छोटे-छोटे कदमों को उठाकर भी संभव की जा सकती हैं। वे कहते हैं, “कितना कुछ था जो हम कर सकते थे/मसलन! पेड़ काटने के/सरकारी अभियान के विरुद्ध /लगा सकते थे एक पौधा।” कविता में आगे वो कई नागरिक नियमावलियाँ प्रस्तुत करते हैं और साथ ही अफसोस भी जताते हैं कि हमने ऐसा कुछ नहीं किया। कविता ‘आंदोलन’ में कवि सारी झिझक तोड़ते हुए कह ही देता है कि “…आंदोलन के बग़ैर/सृजन संभव नहीं।” ये कविता आंदोलनों को अभिप्रेरित करने वाली पोस्टर कविता के रूप में प्रचलित होने का दम रखती है। सोशल मीडिया पर पिछले दिनों वायरल होकर इसने यह सिद्ध भी किया। इसी संदर्भ की एक कविता संग्रह में और भी है- ‘किसान आंदोलन का अंतिम दिन।’
समय को रेखांकित करते हुए अशोक उम्मीद का दामन भी बखूबी पकड़े रहते हैं। कविता ‘पंचनामा’ में वह लिखते हैं कि “प्रपंचों की इस आग से/ठूँठ नहीं होगी किसी भी देश की देह/जड़ें सोख ही लेंगी/अपने हिस्से का पानी।” धावक लड़कियों को देखकर कवि उम्मीदों से भर उठता है और सोचता है कि ‘तमाम लड़कियों को ऐसे ही धावक होना चाहिए।’ रोज़मर्रा की जिम्मेदारियों को निभाते हुए संतुलन साध आगे बढ़ रही स्त्री को कवि ने कविता ‘बैलेंस’ में बखूबी उकेरा है। पर समय की विद्रूपता भी कवि से छिपती नहीं है तभी तो खाँचों में बंटे विमर्शवादी युग में एक सामान्य प्रगतिशील जन की स्थिति को शब्द देते हुए कवि अशोक ने कविता ‘मिसफिट लोग’ में लिखा है- “वे जो न तो अंबेडकर को नकार सके/न गाँधी को/और न भगत को/उन्हें नकार दिया सभी ने।” पंक्तियाँ पढ़ते हुए कितने ही निजी अनुभव आँखों में तैर जाते हैं। जीवन की बढ़ती आपाधापी और जटिलताओं से उकताते हुए कवि मानव होने की सहज नैसर्गिक कामना को अभिव्यक्त करते हुए कहता है कि ‘मुझे बिल्कुल सरल होना था किसी दंतकथा की तरह’ पर ‘ओ दुनिया के संभ्रांत लोगों, सुनो!/तुम्हारी भाषा ने मुझे बहुत कठिन बना दिया है।’ कवि की चाह ही क्या है, बस यही कि “एक आदमी जो तना रहे/जो अंत तक आदमी बना रहे।” लाख नाउम्मीदियों के बादल तने हों, प्रतिगामी शक्तियाँ उरूज़ पर हों, पर कवि का ये कहना एक गहरी आश्वस्ति दे जाती है कि “वे इतिहास में बेढंगे थे/वर्तमान में कुरूप हैं/और भविष्य में निश्चय ही/अप्रासंगिक हो जाएँगे।”
अशोक की कवि दृष्टि कई नज़रिए से अलहदा है। उनके यहाँ औसत कवि और उसकी औसत रचना के प्रति भी सम्मान है। वो इतनी ‘औसत कविता’ भी लिखे जाने की वकालत करते हैं कि ‘उन्हें समझने को शब्दकोश कि ज़रूरत न हो।’ ये संभवतः अमूर्त और जटिल होते-होते आम जन की समझ और पहुँच से दूर होती जा रही हिंदी कविता के प्रति भी कवि का वक्तव्य है। कवि कर्म साधारण या औसत होकर भी दुनिया के किसी दूसरे कार्य से तो बेहतर ही होगा, ऐसा विश्वास कविता में दिखाई देता है। एक ‘अच्छी कविता’ का पैमाना कवि टटोलता है तो पिता की चुप्पी और माँ की जीवन यात्रा के अनुभवों को दर्ज़ करने से बेहतर कुछ नहीं पाता।
संबंधों में विश्वास अशोक की कविताओं में सर्वत्र घुला दिखता है। ये संबंध रिश्तों के साथ-साथ जगहों से भी कम नहीं है कवि का। संग्रह में उनके अपने शहर चंबा का वर्णन मन को लुभाने वाला है। वही चंबा जो उनके लिए सपनों का शहर ही नहीं बल्कि संभावनाओं की खिड़कियां खोलने वाला दरवाज़ा भी था। बाद के समय में आकर दिल्ली में बस जाने के बाद भी उन्हें हिमाचल की वे ‘खूबसूरत औरतें’ याद आती हैं जिन्होंने अपने जीवन की तंगी में भी रिश्तों को सहेजे रखा। उन्हें हर बार घर की याद आती है अलग-अलग रूपों में। कवि डरता भी है कि “एक अरसे बाद/अकेले, चुपचाप/जब अपने ही आँगन में खड़ा होऊँगा/तो डरता हूँ/कि कहीं वहाँ से गुजरने वाला कोई/यह न पूछ ले कि/कौन हो तुम? तुम्हें पहले तो कभी नहीं देखा।” कवि पहाड़ों पर आमंत्रित करता है दूसरों को भी पर कुछ निर्दोष शर्तों के साथ और कहता है कि ‘आना तो ऐसे मत आना’।अपनी जड़ों से जैसा लगाव अशोक को है, वो दुर्लभ है। वैसे पहाड़ों से आए इस कवि को मैदानों से कोई दुराव नहीं बल्कि अपने कर्म क्षेत्र के रूप में यहां का कहलाने से भी नहीं हिचकते।
इस संग्रह से गुजरते हुए पाठक को हिमाचल के पहाड़ी लोक का ऐसा अनुभव होता है मानो आसपास शीतल जल का कोई चश्मा फूट पड़ा हो। ‘मिंजर मेले को याद करते हुए’ कवि जब इससे जुड़ी लोक कथा सुनाता है और मेले का दृश्य चित्रण करता है तो लगता है कि पढ़ते हुए हम उस मेले का हिस्सा हुए जा रहे हैं। ये कवि की अपनी आभा है, कविता का अपना औदात्य है। संग्रह की अधिकतर कविताएँ प्रेम के तंतुओं से बुनी हुई दिखती हैं। कवि सिक्किम में होते हुए अपने लोक को याद करता है, प्रेयसी की हथेलियों के ताप को बचाते हुए दुनिया को बचाने का उपक्रम भी करता है। उसे प्रिया के साथ होने से उम्मीद और सृष्टि के बने रहने का आभास होता है। ऐनी फ्रैंक की डायरी पढ़ते हुए तमाम विभीषिकाओं के बीच भी उसे प्रेम प्रसंग पर ही रुकने का मन होता है। वह आस्था और चेतना के ‘द्वंद’ में भी प्रेम के पाले में खड़ा दिखता है। यही कवि की पक्षधरता है।
संग्रह के अंतिम भाग की सभी बारह कविताएं कवि के लोक रस और उसकी स्मृति की कविताएँ हैं। चाहे अपने ‘गद्दी’ पुरुखों-पुरखिनियों की बात हो या फिर ‘देवता’ का लोक स्थापत्य, सबमें कवि अपने ही सहज रूप में सामने है। उसे अपनी ‘भाषा’ पर गर्व है भले ही वो लिपिहीन हो। साटा-गाटा या घर जमात्री, ऐसी लोक परम्पराओं को अशोक उनके पवित्रतम और सरलतम रूप में याद करते हैं। उनकी स्मृति में घास-फूस, मिट्टी के घर जिन्हें ‘कोठा’ कहा जाता था, आते हैं तो वो साधारण ‘टोकरियाँ’ भी जो जीवन का अभिन्न अंग थीं। ‘बसोआ: उदासी का पर्व’ पढ़ते हुए सच में एक उदासी घेरती जाती है।
एक पाठक के तौर पर मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि इस संग्रह के माध्यम से हिंदी कविता को संवेदना और करुणा से भरा और अपनी जड़ों से जुड़ा एक अनोखा कवि मिल रहा है, जिसके पास एक मखमली भाषा भी है और बेहतर भविष्य का सपना भी। इन कविताओं में पहाड़ों सा दृढ़ और मजबूत इरादा है तो उससे प्रवाहित होती हुई भावनाओं की एक नदी भी है। हिन्द युग्म ने बड़े सुंदर तरीके से इसे छापा है। कवि अशोक को आगे के रचना कर्म के लिए मेरी शुभकामनाएँ।

 

 

संग्रह – रिक्तियों में पहाड़
कवि – अशोक कुमार
प्रकाशक – हिन्द युग्म
वर्ष – दिसंबर 2025
मूल्य – 249 रूपए


समीक्षक आलोक कुमार मिश्रा
जन्मतिथि : 10 अगस्त, 1984
जन्मस्थान : ग्राम- लोहटा, जिला- सिद्धार्थ नगर, उत्तर प्रदेश।
वर्तमान पता: म.न.-280, ग्राउंड फ्लोर, पाकेट-9, रोहिणी सेक्टर-21 दिल्ली-110086

सम्प्रति: दिल्ली के सरकारी स्कूल में राजनीति विज्ञान प्रवक्ता के पद पर पदस्थ और वर्तमान में एससीईआरटी दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में प्रतिनियुक्ति प्राप्त।

प्रकाशित संग्रह: बोधि प्रकाशन से ‘मैं सीखता हूँ बच्चों से जीवन की भाषा’ (2019) कविता संग्रह प्रकाशित।

प्रलेक प्रकाशन से बाल कविता संग्रह ‘क्यों तुम सा हो जाऊँ मैं’ प्रकाशित। इसी संग्रह पर ‘किस्सा कोताह कृति- सम्मान- 2020’ मिला।

अनबाउंड स्क्रिप्ट प्रकाशन से शैक्षिक लेखों का संग्रह ‘बच्चे मशीन नहीं हैं’ (2025) प्रकाशित।

न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से कहानी संग्रह ‘दूध की जाति और अन्य कहानियां’ (2025) प्रकाशित। कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ और रचनात्मक लेख प्रकाशित

संपर्क: मोबाइल नंबर – 9818455879, 8076533893

ईमेल :alokumardu@gmail.com

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