समकालीन जनमत
जनमत

अखबार में आ जाएगा

दिनेश अस्थाना 

 

राहत इंदौरी साहब का एक मशहूर शेर है:-

बन के इक हादसा बाज़ार में आ जाएगा                                         जो नहीं होगा वो अखबार में आ जाएगा।

 

तो साहब अखबार पढ़ने का भी एक सलीका होता है। जो कुछ छपा होता है, समाचार ठीक-ठीक वही नहीं होता, बल्कि कई बार छपे हुए के भीतर छुपा होता है। इसे समझने के लिए बिटविन द लाइंस और प्रायः बिटविन द वर्ड्स भी पढ़ना होता है।

 

अब इसी खबर को ले लीजिये, पिछले दिनों अखबार में एक छोटी सी खबर छपी थी कि उत्तर-प्रदेश मंत्रिमंडल ने ‘आउटसोर्स सर्विस कार्पोरेशन’ के गठन को मंजूरी दे दी है। बड़ी मासूम और मामूल सी खबर है। अखबार के मुताबिक यह कदम कामगारों के हुकूक और पारदर्शिता को सुनिश्चित किए जाने की गरज से उठाया गया है। अब अगर इसे ठीक से समझना है तो आपको अपनी सोच की गाड़ी को रिवर्स-गियर में डालना होगा।

 

अभी तक तो होता यह था कि स्वीकृत रिक्त-स्थानों की अनुपलब्धता के चलते तात्कालिक आवश्यकतानुसार विभिन्न विभाग अपने स्तर पर खुले बाज़ार से ठेकेदारों के माध्यम से अल्प-अवधि के लिए कार्मिकों की भर्ती कर लेते थे।

इसमें कमीशन-खोरी की गुंजाइश नियोक्ता अधिकारी और ठेकेदार के बीच सीमित होती थी। कर्मचारी को कागज में लिखी मजदूरी से कुछ कम ही मिलती थी, परंतु इस व्यवस्था में अधिकारी, ठेकेदार और कर्मचारी तीनों खुश रहते थे।

ठेके के कोटेशन में “कांट्रैक्टर बेनिफ़िट” का प्रविधान होता ही है, कुछ उसमें से और कुछ कर्मचारियों की मजदूरी में से काटकर साहब का कमीशन दे दिया जाता और बाकी बचा ठेकेदार के हिस्से में जाता था।

बड़े उद्योगों, जैसे ओबरा पावर हाउस में तो किसी समय ‘लेबर सप्लाई’ की व्यापक व्यवस्था होती थी। वहाँ अनेक लेबर-सप्लायर्स पंजीकृत थे। वही पूरे पावर-हाउस में लेबर-सप्लाई करते थे और एक समय तो ऐसे कर्मचारियों का काम लगभग नियमित कर्मचारियों जैसा ही हो गया था।

ऐसे में कर्मचारी संगठनों के दबाव में बड़ी संख्या में लेबर-सप्लाई के कर्मचारी नियमित किए गए थे। पर इस प्रकार का कोई संगठन छोटी-छोटी जगहों में संभव नहीं है, इसलिए हालात जस के तस पड़े हैं।

तो, ऐसा लगता है कि कमीशन की चाशनी देख कर कुछ लोगों की लार टपकने लगी है, अन्यथा यदि सरकार को पारदर्शिता, कर्मचारियों के हालात और उनके अधिकारों की जरा भी चिंता होती तो वह उन्हें आउटसोर्स करने के स्थान पर उन्हें नियमित नौकरी देने की बात करती।

नई प्रस्तावित व्यवस्था में मंत्रालय-स्तर पर बड़े ठेकेदारों का पंजीकरण किया जाएगा और आउटसोर्स नौकरियाँ उन्हीं ठेकेदारों के माध्यम से दी जाएंगीं।

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