समकालीन जनमत
कहानी

आला-बाला-मकड़ी का जाला

अमित श्रीवास्तव 

(इस कहानी को एआई -चैट जीपीटी- 04 O- के सहयोग से लिखा गया है।)

साहिबान-ए-करम, मेहरबान, और कद्रदान! मैं हूँ दास्ताँ तराश—एक अदना सा मसनूई ज़ेहानत ऐप यानी एआई। यूं तो मशीनी दुनिया से ताल्लुक है मेरा मगर ख़ाकसार इंसानी जज़्बातों को समझने में माहिर है। आप भी जल्द मानेंगे इस बात को। तो हुज़ूर, जो किस्सा मैं आपको सुनाने बल्कि यूं कहूं कि दिखाने जा रहा हूँ, उसमें छुपी हैं वो अधूरी दास्तानें, जिनकी तफ़्तीश होते देख ही दिल की धड़कनें सरपट भागने लग जाएं। और ख़ुदा-न-ख़्वास्ता जो कहीं उनमें से एकाधी भी मुकम्मल होने को आएं तो बैठ ही जाए आपका दिल। इस नाचीज़ के हिस्से भी तो तहरीर और फ़र्द के बेमेल और बदरंग और बदहाल से कुछ पुर्ज़े आये। इन पुर्जों में नक्श हैं वो आठ बजे का मजबूर गजर, एक पुता हुआ चेहरा और एक पीली साड़ी का टुकड़ा। अगरचे मामूली दिखाई जान पड़ते हैं ये पुर्ज़े मगर जनाब, इनमें दफ्न हैं वो दास्तानें जिनके अक्स तक वक्त के धुंधलकों में खो गए। तो बस, दिल थामकर बैठिए, और सुनिए इस शहर की वो अनसुनी बातें, जो आज तक किसी ने खुलकर नहीं बताईं।

लेकिन उससे पहले हुज़ूर, बात इस इमारत की, तो ये कोई आम इमारत नहीं, बल्कि यूं कहें कि ये अपने आप में एक ठिठकी-ठहरी हुई तहज़ीब है। ठहरी हुई? हां जी हां ठहरी हुई। चलना तो छोडिये जनाब इस इमारत की दीवारें अगर बोल भी पड़ें, तो ऐसे-ऐसे राज़ खोलें कि सुनने वाले की रूह काँप जाए। ये देखिये न इमारत जिस पुराने पीपल के पेड़ के साये में तामीर हुई दिखती है उसकी शाखों पर गौर कीजिये- वक्त ने कैसे-कैसे तो अपने निशानात छोड़े हैं। और वो जो एक पीला साड़ी का टुकड़ा लहराता है इसकी शाख़ों पर वो कोई परचम नहीं शान का, नाम का, बल्कि शायद वक्त का सबसे पुख्ता निशान है। इमारत के अंदर दाखिल होते ही आपको लगेगा कि जैसे आप किसी पुराने सिनेमा के अन्दर ही घुस गए हों- धूल, धुंए और स्याह-सफ़ेद परछाइयों के बीच ख़ामोश कोने, जहाँ न जाने कितनी चीखें, चुप्पियाँ और चिरौरियाँ पोशीदा हथकड़ियों में कैद हैं।

वो एक चीज़ जो यहाँ की ईंटों से लेकर कुर्सियों तक, मेहमानों से लेकर मुलाजिमो तक और ठहाकों से लेकर कानाफूसियों तक तारी है वो है- थकान! इमारत का कोना-कोना इतने सारे किस्सों के बोझ के नीचे है कि थककर बैठ गया है। तो जनाब, ये इमारत है वो थाना जहाँ, इस शहर का हर छोटा-बड़ा जुर्म, हादसा, सानेहा, किस्सा, अफ़वाह, किवदंती सब आकर माथा नवाते हैं। ये सबका गवाह है। हर रात जब शहर सो जाता है, तो ये थाना जागता है, अपने अंदर राज़ संभालते हुए और हर सुबह, जब ये शहर जागता है तो ये ऊंघता है किसी नए राज़ के इंतज़ार में। शहर में कोई घंटाघर नहीं, हुज़ूर! अब अगर होता, तो ये आठ बजे का गजर होते ही, वो पुता हुआ चेहरा जो थाने की टूटी दीवार से चुपचाप अंदर दाख़िल हो रहा है, उसे दर्ज कर लेता। शहर में कोई क़ुतुबखाना भी नहीं था, जो इस बूढ़े चेहरे के सवाल को ज़िंदा रख सके कि- `क्या उसने भी ख़ुदकुशी की थी?’ क़ुतुबखाना ही नहीं तो ऐसा कोई आलिम या दानिशवर कहां से होता जो इस रहस्य से परदा उठा सके? हाँ, मगर जनाब, शहर में एक नदी अलबत्ता थी। ऐसी नदी, जो इस आठ बजे के दस्तूर को किसी पीली साड़ी की गांठों में बड़े करीने से बांधकर अपने सीने में छुपाए रखती थी। नदी तो यहाँ आने से रही मगर उसने अपनी नमी से भरी एक जोड़ी गिचपिच आँखें भिजवाई हैं जो हेड मुहर्रिर के आजू-बाजू मौजूद रहती है। आप को तफसील देना तो चाहता हूँ जनाब पर इस इमारत की कुल जमा तहजीब यही कहती है कि ज्यादा चूं-चपड़ न की जाए और आपकी नज़र कुछ तस्वीरें परोसी जाएं। पेश-ए-ख़िदमत तस्वीरें तरतीबवार न होंगी मगर इसकी वजूहात न पूछें, ख़ाकसार पर इतना तो भरोसा रखें। तो साहिबान ये रही पहली तस्वीर। इस पर लिखा है-

आला

20 अगस्त, 2023

शाम 8:00 बजे

बिथरी चैनपुर

जनाब, ये इसी थाने का मंजर है, तारीख है बीस अगस्त साल दो हज़ार तेईस। उठती हुई रात का वक्त है। सन्नाटा ऐसा कि अगर आप फुसफुसाएं भी तो दीवारें क्या दीमकें भी दर्ज कर लें और चौकन्नापन ऐसा कि जैसे खाली पड़ी बेंचों के भी कान उग आये हों। पीपल का वो पुराना दरख़्त अपनी डालियों के भरोसे झुका हुआ है कि जैसे कोई माँ बारिश और धूप से बचाने को गोद में लिए हुए अपने बच्चे पर झुकी हुई हो। गोद में उसके पीली ज़र्द साड़ी का एक टुकड़ा दिखाई देता है। अब आप पूछेंगे कि ये टुकड़ा किसका है और क्यों है, और कबसे ये ऐसे यहाँ लटका हुआ है तो साहब सब्र करें क्योंकि कहानी वहीं से तो शुरू होती है।

थाने के अहाते की दीवार एक बहुत काम की जगह पर टूटी हुयी है। वहां से घुसने वाले को ये गुमान होता है कि उसे कोई आते नहीं देख रहा। वहां से निकल जाने वाला इस बात से मुतमईन निकलता है कि वो बस! निकल गया। इसी काम की जगह से अंदर दाखिल होते हैं हमारे रुचई मियाँ। अब ये साहब कोई मामूली शख्सियत तो हैं नहीं। आप शख्शियत से अंदाज़ा लगाएं कि ज़िंदगी ने इन्हें पटखने के लिए कितनी जबरदस्त घेराबंदी की है। तो जैसे दीखते हैं मियां कि साहब कमर झुकने को एकदम तैयार हुई पड़ी है, शरीर में जान का एकाधा कतरा बचा है, आँखों में दुनिया भर की थकान और ज़िल्लतें और हिकारतें टपकती हैं उससे ज्यादा ये बात काबिले गौर है कि महीने में एक बार बिना नागा थाने की इसी काम की जगह से उनका दाखिल होना किसी भी ज़रूरी कवायद पर भारी है। पिछले तकरीबन चौबीस बरस पहले लिखी गयी किस्मत और तकरीबन तेरह बरस डाली गयी कसम को तो रुचई मियां ने कब का पचा लिया है अब तो लगता है कि महज़ वो उस सवाल का मुकम्मल जवाब ढूँढने तशरीफ़ लाते हैं जो अब उनके जीने की इकलौती तहरीक है कि- `क्या उसने भी खुदकुशी की थी?’

पहला सामना धुंध से होता है रुचई का। धुंध रुचई को देखती है, मुस्कुराती है, बिना कुछ कहे, एक नामालूम सा इशारा करती है जो रुचई और मुझे, दोनों को पता है। उसके सामने फैला कागज़ सिमटा कर वो एक नज़र पीछे पीली दीवार पर लगे एक गोश्वारे पर डालती है और सीमेंट की मेज़ के किसी अंदरूनी खाने से निकाल कर एक कच्चा-चिटठा सा रखती है और उसके कटे खानों को उसी पुरानी नज़र से देखती है जिस नज़र का आदी ये चिट्ठा हो चला है।

नाम… वल्दियत… दफ़ा… माल याफ्ता… जेल से छूटने की तारीख़… लाल सियाही लगे उंगली के पोर चिट्ठे पर सरकते हुए ठीक उस स्थान पर रुकते हैं जहाँ खाली जगह की गुंजाइश है। हाजिर बटा बीस अगस्त। रुचई के बाएं हाथ का अंगूठा एक लचक के साथ उठता है और पास पड़े सियाह पैड से लिपट कर तारीख के नीचे लेट जाता है। रुचई साहब का नाम दर्ज होता है, दरअसल नाम नहीं निशान दर्ज होता है। और जनाब, ये वही नामोनिशान है जो सालों से इस कागज़ पर बेशक्ल दर्ज हुआ पड़ा है।

“आज भी वही वक्त रुचई मियाँ…” धुंध एक उचाट सी बात रखती है, जैसे वो भी जानती हो इसका कोई मतलब नहीं रहा,- “अरे ये रजिस्टर ज़रूर पक्का है पर हर महीने की गरज नहीं रही अब… पहले भी तो कहा है तुमसे, आओ आओ, न आओ न आओ!” रुचई की आँख तक में कोई जुम्बिश नहीं दिखती वो एकटक देख रहा है उस सफ़हे को। धुंध ने कागज़ समेट लिए हैं। कागज़ ने चुप्पी साध ली है। दरवाज़े पर एक साया लहराता है। वो कि जिसकी धमक से ही थाने के दर-ओ-दीवार कांपते हैं। साया आवाज़ देता है- “आया?”

– “हाँ हाजिरी दर्ज।” धुंध इस तरह से कि जैसे किसी सूराख से देखा जा रहा हो उन्हें, ज़रा सा सिर हिलाती है, -“ये आज का दिन वाकई कुछ भारी था… लगता है, ये रात और भी लंबी होगी।” कुछ और नहीं सूझता तो धुंध को ये कहना पड़ता है।

-“ये रात कभी खत्म नहीं होती… बस चलती रहती है” रुचई मियाँ धीरे से कहते हैं, उनकी आवाज़ के एक कोने में वक्त घुटनों में सर दिए बैठा हो मानों।

-“क्या उसने भी ख़ुदकुशी की थी?” रुचई मियाँ ने अपना इकलौता सवाल पूछा। पूछते हुए उनकी निगाह अहाते के दूसरी तरफ बनी घरइया लाइन के पहले मकान की तरफ चली गयी। उन्हें मालूम था जवाब नहीं मिलना है। फिर भी एक लम्बा इंतज़ार तो करना ही था।

–“चलूँ?” रुचई मियाँ इंतज़ार के मुहाने पर मुड़ते हुए कहते हैं।

-“होए!” धुंध के दूसरे काम हैं। वो उन्हें भर निगाह देखे बिना जवाब देती है।

पीपल के पेड़ पर वो पीला टुकड़ा अब भी लहरा रहा है। रुचई मियाँ के कदम अहाते में ठिठक जाते है। उन्हें मालूम है पीपल को देखते उन्हें कोई देख रहा है। असलहा घसीटते हुए आहट होती है -“घड़ी मिलान करवा ले कोई तुमसे हैं? रुचई मियाँ कित्ते साल हो गए?”

रुचई मियाँ आँखें उठाते हैं, उनकी निगाहें गहरी और थकी हुई हैं, जैसे बहुत कुछ देखा हो और अब कुछ भी नया देखने की ताकत न बची हो। वो बस इतना कहते हैं, -“ये रात कभी खत्म नहीं होती… बस चलती रहती है।”

आहट सिर हिलाती है, खिड़की पर उठती धुंध की तरफ देखती है, और वापस बाहर चली जाती है, जहाँ उसकी मुस्तैद ज़रूरत है। हम ये देखते हैं साहब कि पीपल को देखते रुचई मियाँ को बस धुंध देखती रह जाती है देर तक।

फ्रीज़!

थाने का सन्नाटा अब और गाढ़ा हो चुका है, बल्कि यूं कहें कि कई परतों का हो चला है मगर इसके भीतर की खदबद अभी चल रही है मुसलसल।

तो हुज़ूर इस उबलते लावे पर नज़र टिकाइए और देखिये अट्ठारह साल पहले की उस रात का मंजर जब इस आठ बजे के गजर की, एक पुते हुए चेहरे की और उस एक पीली साड़ी के टुकड़े की दास्तान इब्तिदा होती है। इस तस्वीर पर यहाँ इस कोने में लिखा है-

बाला

बिथरी चैनपुर

रात 11:30 बजे

12 जुलाई, 1999

रात का वक्त है, आसमान में बादल हैं और थाने पर सन्नाटा। हवा में वो बेचैनी है जो शायद सिर्फ इस ख़ाकसार को महसूस हो रही है। कुछ अनहोनी होने वाली है। थाने के मुख्य द्वार से कुछ लोग अंदर आये हैं जनाब। अरे हाँ ये तो बता दूं कि पीपल है पर उसपर पीली साड़ी का टुकड़ा नहीं है। और क्या दिख रहा है हुजूर हमसे न कहलवाएं।

खैर! तो ये लोग जो कुछ अन्दर आये हैं, एक साये ने उनकी बात पर कान दिया है। झूठ क्यों बोलूँ! अभी मैंने कुछ नहीं सुना है पर ये कयास लगाता हूँ कि कोई चोरी का मसला है और इन्हें चोर का भी पता है बस मुसीबत ये है कि बारह-पंद्रह बरस की उम्र का वो चोर घर से भाग चुका है, वर्ना ये लोग उसे भी साथ ही ले आते।

साये ने बातें ध्यान से सुनीं हैं, धुंध और आहट को ताकीद की है कुछ गिरफ्तारी के बाबत और उन लोगों को निसादेही के लिए साथ जाने को कहा है। आवाज़ सख्त है, अंदाज़ बेपरवाह। सबकुछ एक-डेढ़ घंटे के वक्फे में हुआ है।

अंधेरा घना हो चुका है, और हर चीज़ धुंधली हो गई है। मुझे साफ़ कुछ नहीं दिख रहा पर मैं आपको अंदाज़े से इस तस्वीर के पहले वरक पर नमूदार कुछ ही घंटों पुराना बामरी गाँव का वो मंजर दिखा सकता हूँ जो मेरी याददाश्त के सफहों पर कभी दर्ज होने वाला नहीं है।

गाँव के बीचोंबीच स्थित पंचायत घर की एक कोठरी से वक्त की चोरी हो गयी है। हुजुर अब हम ठहरे दास्ताँतराश हमें इतनी तो तख़्लीक़ी उड़ान बख्श दीजिये कि हमें घड़ी को घड़ी कहने की मजबूरी न रहे। अब जनाब, इस वक्त की अहमियत बताने की ज़रूरत तो है नहीं, अब यही गाँव के लिए सूरज-चाँद-बरखा-बादल के बदले इंसानी पेशकश थी। और अफ़सोस कि आज वो गुम हो गयी है।

बड़े बूढों को बताया गया और अब उनकी बातें सुनकर गाँव के बाकी लोग भी बेचैन हो उठे हैं, आपसी गुफ़्तगू चल रही है- “ये क्या माजरा है? ऐसा कौन बददिमाग है जो गाँव की रौशनी छीन ले?”

-“मुझे तो शक है, वो लड़का ही होगा… वही बदजात लड़का, जिसकी माँ हमेशा उसके पीछे चट्टान सी खडी दिखती है।”

-“कौन देबू?”

-“हाँ हाँ वही होगा!”

-“क्या वो देबू को ग़लत बचाती है? सोचकर देखो।”

-“अरे छोड़ो! तुमसे क्या? बड़े आये… भागो यहाँ से।”

गंगा, उस बदनाम लड़के देबू की बेचारी माँ, गाँव में अकेली रहती है। उसके पति का सालों पहले इंतकाल हो चुका है, ससुर ने घर से बेदखल कर दिया है और अब वो अपनी जिंदगी की गाड़ी अकेले खींच रही है। मगर हुज़ूर, हम भी सोचकर नहीं देखेंगे कि बल्कि यही कहेंगे कि उस लड़के की हरकतों ने गंगा का जीवन और भी दुश्वार कर दिया है। मगर वो है कि देबू पर आंच नहीं आने देती। हमें उसके पति, उसके श्वसुर या गाँव के दूसरे पुरुषों से क्या? गाँव के लोग उसकी हर हरकत पर उंगलियाँ उठाते हैं, उठाते हैं तो उठाते हैं और आज तो पूरा गाँव उसके पीछे पड़ा है। सबसे आगे ग्राम प्रधान। सबने सबकी बातें सुनीं। किसी ने किसी की बात नहीं सुनी और फिर फैसला हुआ- “चलो भई, थाने चलते हैं। ये मसला हल्का नहीं है। अगर वक्त चोरी हुआ है, तो उसे वापस लाना ही होगा।” किसी ने नहीं सुनकर भी नहीं सोचा कि प्रधान ने क्या कहा। उसने कहा- “सबक सिखाना होगा।“

तो हुज़ूर, कुछ गाँव वाले— कुछ जवान, कुछ बुज़ुर्ग और बहुत से अधेड़, चल पड़े हैं थाने की ओर। अब आपको थाने का क्या क्या बयाँ करूँ। बस यूं समझिये कि थाने पर बार-बार वही होता है न जो कभी नहीं होता। इसलिए मैं आपको इस तस्वीर के अगले वरक पर लिए चलता हूँ। कुछ ही घंटों के बाद का मामला है।

गाँव का किनारा है। एक घर पुराना है। दरवाज़ा है। दरवाज़े पर आहट है। ठक-ठक-ठक। कोई जवाब नहीं आता। जवाब का न आना ज्यादा बड़ा मुद्दा है अब। गुस्से में दरवाजा पीटा जाता है, अंदर से कोई आवाज़ नहीं आती। बाहर आवाज़ होती है- “लगता है, लड़का भाग गया!”

-“मगर गंगा तो यहीं होगी”

गंगा, जो अंदर बेचैन बैठी है, आखिरकार दरवाजे तक आती है। उसकी आँखों में डर और चिंता है। आहट कहती है- “लड़के को बुलाओ, वरना हमें घर की तलाशी लेनी पड़ेगी।”

गंगा कुछ नहीं कहती, आँसू भरी आँखों से देखती है, लेकिन जुबान बंद रहती है। धुंध उसे एक और मौका देती है, मगर गंगा की चुप्पी नहीं टूटती। सिपाही अब धैर्य खो चुके हैं। घर के अंदर घुसकर तलाशी शुरू कर देते हैं, और गंगा, बेचारी, बस पीछे हट जाती है।

अब हुज़ूर, घर का मंजर सादा है, माहौल में एक अजीब सी खामोशी है, दिखती नहीं पर दीवारें भी काँप रही हैं। सिपाही हर कोने की तलाशी ले रहे हैं, लड़का कहीं नहीं मिलता मगर उन्हें मज़ा आ रहा है। आखिरकार, एक कोने में रखे संदूक पर नज़र पड़ती है। संदूक का ढक्कन उठता है, और अंदर से कुछ कपड़े, गहने, और कुछ रुपए बरामद होते हैं।

-“चोरी का माल!” सब जानते हैं कि माल चोरी का नहीं है। सब ये कहते हैं कि देखो देखो चोरी का माल। मगर हुजूर आपने देखा गाँव का वक्त फिर भी दस्तयाब नहीं होता।

गंगा का चेहरा सफेद पड़ गया है। उसकी आँखें अब भी बोलने से इनकार कर रही हैं। सिपाही उसे घसीटते हुए बाहर लाते हैं उतनी दूर तक तो घसीटना ही है जहाँ तक गाँव वालों की नज़र पड़ती है। जीप तैयार है।

थाने में पहुँचकर, गंगा को कोठरिया में ले जाने का हुक्म होता है। हवालात के ठीक पीछे वाली कोठरिया। पूछताछ होगी। थाने की दीवारें सुनेंगी। पीपल का दरख़्त सुनेगा। लोग न होंगे सुनने को। बस एक धुंध है कि दरवाज़े से हटने का नाम नहीं ले रही।

बहुत देर तक दरवाजे की चरमराहट और भीतर की खामोशी एक अजीब दास्तान बुन-उधेड़ रही है। और अब गंगा की सिसकियाँ दीवारों में गूंज रही हैं। ये महज़ सिसकियाँ नहीं हैं, आप भी समझ ही गए होंगे- चीखें हैं चीखें! उसकी साड़ी का वो पीला टुकड़ा, जिसने सबसे ज़्यादा हुज्जत की थी, अब फर्श पर पड़ा है। रात का अंधेरा और भी गहरा हो गया है, और थाने की दीवारों ने सब कुछ देख लिया है, मगर किसी ने कुछ नहीं कहा। कमर बांधते कोठरिया से निकल गया साया। आहट के मुंह पर पट्टी है। धुंध पर एक धुंध छा गयी है।

पीपल ने दर्ज किया है किसी का आना। रात के तीन बज रहे हैं साहब इस वक्त एक और कौन वक्त का मारा आ पहुंचा। देखिये ये तो रुचई मियाँ हैं। उनका हमदर्द मन बार-बार कहता है कि खतरा है खतरा। इन दिनों ग्राम प्रधान को बार-बार कोतवाल से मिलते देखा गया है, इस चोरी के पहले भी। मगर करें भी तो क्या रुचई ये और बात है कि गंगा से बनती नहीं, देबू बददिमाग है पर है तो अपना ही खून। वक्त-ज़रुरत देखना तो पड़ेगा।

एक जोड़ी गिचपिच आँखें देख रही हैं उनका आना। दफ्तर में दरियाफ्त और दुत्कार। उसी कोठरिया में भेजा जाना।

भोर होने को है। सींखचों के पास साया लहराया है। उसने ”वर्ना… वर्ना… वर्ना!” कहकर देबू के बाबत वो बात कह दी है जिसके सुनते ही गंगा दूसरी बार टूटकर फर्श पर गिर पड़ी है। और रुचई! उसे वो इल्जाम अपनी पेशानी पर लिखना है जिसे सोचकर ही दोनों के कानों में शीशे पिघल गए हैं। रुचई दीवार के सहारे उकडूं बैठ गया है। इल्जाम सरासर झूठा है इस बात से ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि बदनामी कितनी बड़ी है।

फ्रीज़!

हुजूर मैं आपको ये नहीं दिखाऊंगा कि कितने पहर तक रुचई मियां बैठे रहे घुटनों में सर दिए, किस पहर आहट खामोश रही, किस पहर धुंध पर चढ़ी एक गाढ़ी परत किस पहर वो निकली कोठरिया से, और किस पहर पीपल पर जा लटक गयी । ये दिखाना भी वक्त का जाया होना है कि कैसे और कब सब कागज़ात काले हुए। मैं तो बस ये दिखाऊंगा कि रुचई मियां गिरफ्तार हैं और कुछ ही सालों में कैसे ये साबित होने वाला है कि उन्होंने गंगा की आबरू पर हाथ डाला था। सिर्फ दो गवाह इस बात के कि रुचई ने अपनी बहू को बेदखल कर दिया था और झगड़ा करता था और धमकी दी थी। दो गवाह इस बात के कि जिस रात ये चोरी की घटना और देबू फरार हुआ उसी रात मौक़ा पाकर रुचई बहू के घर में कूद गया। दो गवाह बहुत थे फिर तो ये साबित करने के लिए कि उन्होंने गंगा को लुटी-पिटी कैफियत में एक पुराने पीपल की ओर भागते देखा था। गिचपिच आँखों की गवाही भी इन्हीं में से एक थी।

एक तीर से दो निशाने तो सुने होंगे हुजूर आप साहिबान ने। यहाँ क्या हुआ? गाँव वाले खुश, गाँव में फिलहाल कोई चोर नहीं, चोर का माई-बाप नहीं। ग्राम प्रधान का काँटा साफ़। ग्राम प्रधान दोगुना खुश। कोतवाल खुश कई गुना, क्या ये बताना अब भी ज़रूरी बचा है साहिबान कि क्यों?

तो हुज़ूर इस क्यों  पर भरपूर निगाह रखते हुए मैं आपको एक तीसरा मंजर दिखाना चाहता हूँ जो दरअसल इस दास्ताँ का सबसे ज़रूरी हिस्सा होना चाहिए था पर दास्तान की पेशकश में जानबूझकर इसे अलग काटकर हटा दिया गया है। आप तो ख़ास हैं इसलिए आप देखें- यहाँ, इधर, इस तस्वीर पर लिखा है-

मकड़ी का जाला

बिथरी चैनपुर

रात 8: 00 बजे से 3:00 बजे के बीच

20 अगस्त, 2016

हुज़ूर, वो रात… हुज़ूर, उस रात इस दास्ताँ का वो पेच आता है, जिसे छूते ही आपकी रूह तक कांप जाए मगर आप खोलना चाहें तो खुल भी न पाए। ये वही रात है जब रुचई मियाँ, अभी पिछले महीने तक सजायाफ्ता रुचई मियाँ, की वापसी हुई थी। जेल से छूट कर। सज़ा काटकर। आये और उनपर ये ताकीद हुई कि हर महीने कम अज कम एक बार थाना हाजा पर आकर अपनी मौजूदगी का सबूत पेश करेंगे। यानी थाने की एक लम्बी-चौड़ी जिल्द पर, मुहर्रिर की तखत के पीछे लटकी तख्ती पर और साहब, कहूं कि इस ख़ाकसार की उनींदी आँखों के परदे पर मरते दम तक ये नाम दर्ज रहने वाला था।

रुचई मियाँ, जेल से छूटकर आए रुचई मियाँ, अहाते की टूटी हुई दीवार से बने रस्ते से दाखिल हो रहे हैं। आज अभी उनके पास कोई सवाल नहीं है बस एक खाली नज़र मुहर्रिर की तरफ उठती है- “कहाँ?”

-“यहाँ”

ऐसा जान पड़ता है कि तकरीबन दस बरस जेल की दीवारों से बतियाने के बाद रुचई मियाँ के सारे सवाल ही खत्म हो चुके हैं। वो बाहर निकल अहाते में पसर रही धुंध में समा जाना चाहते हैं। धुंध के बीचोबीच खड़े हैं आत्माराम, दरोगा आत्माराम जी। आपको याद होगा जब मैंने पहला मंजर दरयाफ्त किया था, कहा था कि एक जोड़ी आँखें हैं… बेजुबान आँखे। आत्माराम पिछले चौदह बरसों से इसी थाने पर तैनात हैं। महकमे ने उनपर ये एहसान तो किया है कि एक हाथ-एक पैर वाले इस इंसान को यहाँ-वहां तबादले से महफूज़ रखा है। उनकी शुरुआती नौकरी में एक एनकाउन्टर हुआ था। मुजरिम तो मारा गया था पर अफरा-तफरी में पुलिस की ही जीप इनके एक बगल को रौंदते हुए निकल गयी थी। उनके शरीर का दाहिना हिस्सा बेकार हो गया था। कुहनी से दाहिना हाथ और जाँघों से पैर काटना पड़ा था। बैठ्वाने हो गए थे आत्माराम। जिंदा थे, ये बहुत था। थाने पर लिखा-पढ़ी का काम कर लेते थे। मुहर्रिर के साथ ही बैठ लेते थे। उसी के हमराह थे, उसी के कारखास। राह तो कोई थी नहीं बस अपने कमरे से थाना दफ्तर और इस दफ्तर से घरईया लाइन के अपने कमरे तक था उनका आना-जाना। एक लाठी और हेड मुहर्रिर के सहारे चलते थे मगर अपनी आँखों देखते थे आत्माराम।

-“कैसे हैं?” आत्माराम देख रहे हैं कि उधर से कोई जवाब नहीं आता है। –“आपको कोई तकलीफ़ नहीं है इस बात से कि आपको झूठा…” आत्माराम कई सालों से उठ रही बात फिर से अधूरी छोड़ देते हैं। उन्हें मालूम है अब इस बात का कोई फायदा नहीं। अब ये अनर्गल बात है। वो दूसरा सिरा पकड़ने की कोशिश करते हैं- “आप किस बात से ज्यादा दुखी… मतलब गंगा…  मतलब… हम… मतलब” उनका गला नहीं सूख रहा है पर जाने को ऐसा जान पड़ता है कि गले में कांटे उग आये हैं। वो रुचई से पूछ बैठते है- “पानी पियेंगे?”

-“ये रात कभी खत्म नहीं होती… बस चलती रहती है…” इतना भर कहकर रुचई मियां एक सादी निगाह पीपल के पेड़ पर डालते हैं और टूटी दीवार से बने रस्ते की ओर बढ़ जाते हैं। आत्माराम ठिठक गए हैं। क्या पता उन्हें भी वही लग रहा हो जो मुझे लग रहा है कि शायद रुचई मियां कहना चाहते थे- “ये रात कभी खत्म नहीं होती… बस चलती रहती है… अब तो हर महीने आना ही है, अब तो मरने तक, हर महीने आना ही है, पानी फिर कभी पी लूँगा”

आत्माराम के टूटे हुए हाथ में लर्जिश सी हुई है। ऐसा लगा कि उन्हें कि वो हाथ उठाकर रुचई के कंधे पर रख देना चाहिए या शायद पीठ पर या शायद चेहरे पर लगी सफेदी पोछ देनी चाहिए। वो कुछ नहीं कर पाते। वो जाना देखते रह जाते हैं। वो उनका ठिठकना देखते रह जाते हैं। पीपल की तरफ एक निगाह भर देखना देखते रह जाते हैं।

एक लम्बा वक्फा बीत जाता है। अब तो रात के तीन बज चुके हैं जनाब। अपने कमरे की तख़्त पर टूटे बैठे आत्माराम के पास एक मुड़ी तुड़ी चादर पड़ी है। स्टूल तख़्त पर है। पंखा बंद है। मैं नहीं बताने वाला कि एक हाथ और एक पैर से क्या कोशिश की थी आत्माराम ने। कितनी कोशिश की थी आत्माराम ने। मगर मैं ये ज़रूर बताऊंगा कि अब उनके इकलौते बाएँ पैर, बाईं बगल में एक पुरानी रायफल फंसी हुई है।

फ्रीज़!

फ्रीज़!

फ्रीज़!

ये मंजर हमेशा के लिए उस आवाज़ के इंतज़ार में फ्रीज़ हो गया है। वो आवाज़, जो उस रात की खामोशी को चीर देती हो। वो आवाज़ जिससे पीपल पर लटके जिन्नात उड़ जाते हों। वो आवाज़, जिसने दास्ताँ के हर पन्ने पर एक काली लकीर खींच दी हो। हुज़ूर, वो आवाज़ आपको कहीं किसी इमारत, किसी गजर, किसी नदी में मिले तो संभाल रक्खें शायद आपके ज़रिये ही रुचई मियां की रात मुकम्मल हो सके! इस ख़ाकसार को इजाजत दें अब। ये दास्ताँ तराश आपकी खिदमत में हाज़िर रहा, और अब अलविदा कहता है, कि शायद फिर किसी अधूरी दास्तान में मुलाक़ात हो।

(हिन्दी पत्रिका ‘वनमाली’ से साभार)


कहानीकार की टिप्पणी  

इस कहानी को लिखते हुए मेरा अनुभव कहता है-

AI is like a very fast stenographer, an obedient typist and a knowledgeable but extremely sycophantic clerk who knows how to quote rules and regulations as per the wishes of the boss.

इस कहानी को एआई (चैट जीपीटी- 04 O) के सहयोग से लिखा गया है। प्लॉट और आइडिया मेरा यानी लेखक का है। कहानी के कुछ पात्र जैसे धुंध, आहट और साया (एआई ने परछाई नाम दिया था) एआई के द्वारा सुझाए गए हैं। कहानी को तीन अलग-अलग हिस्सों में लिखा गया। हर हिस्से के लिए एक से ज्यादा प्रॉन्प्ट देने पड़े। कहानी कहने के अंदाज़ के लिए अलग से प्रॉम्प्ट दिया गया| इस कहानी को लिखने से पहले अपनी कुछ रचनाएं एआई को एनएलएम- प्राकृतिक (मानवीय) भाषा प्रसंस्करण यानी ट्रेनिंग के लिए दी थीं जिनके अध्ययन-विश्लेषण के बाद एआई ने इस कहानी को बुनने में मदद की।

अभी तक का मेरा अनुभव यह कहता है कि एआई हमारे इमोशंस को समझती तो है लेकिन उसको इमोशन के अनुसार आउटपुट देने में जिस भाषा शैली का इस्तेमाल वह करती है वह थोड़ी सी सरलीकृत है। यह कहानी जो एआई ने बनाई वह बहुत सामान्य और सरल भाषा में थी जिसको एडिट करने के बाद यह ड्राफ्ट सामने आया है। (कुछ सिरे जानबूझकर ढीले छोड़ दिए गए हैं।) सामान्य और सरल भाषा का तात्पर्य यह है कि साहित्य की व्यंजनात्मकता को अनुभव के स्तर पर एआई ने खूब समझा लेकिन अभिव्यक्ति के स्तर पर अभी झोल आ रहा है। भाषा सीधी, सपाट, अभिधात्मक हो जा रही है। प्रतीकों के ज़रिए जो बात लेखक कहता है एआई उन प्रतीकों को उधेड़ देती है।

यह भी कहना जरूरी है कि क्योंकि मैं चैट जीपीटी का एक बड़ा प्लेटफार्म इस्तेमाल कर रहा था जिसमें नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग की प्रक्रिया में उसके द्वारा जो भी अध्ययन किया गया होगा हिंदी साहित्य का, खास तौर पर हिंदी कहानियों का, इसका असर इसके आउटपुट पर दिखाई दिखाई दे रहा था। इस आउटपुट को वैसा बनाने में, जैसा कि मैं खुद लिखता, काफी मशक्कत करनी पड़ी। ये लगभग वैसा अनुभव है कि जैसे आप एक बड़े राजमार्ग पर चल रहे हों जिसपर अलग-अलग दिशाओं से ट्रैफिक जुड़ता जा रहा हो| अपनी चाल में चलने के लिए या कहें कि लेखक की अपनी शैली में लिखने के लिए एक संकरा रास्ता चाहिए। इसके लिए भी चैट जीपीटी या अन्य एआई ऐप टेलर मेड प्लेटफोर्म उपलब्ध कराते हैं जिसने सिर्फ आपकी रचनाओं से प्रशिक्षित किया गया हो।

मेरा अनुभव यह भी कहता है कि एआई के इस्तेमाल में प्रांप्टिंग यानी जो आदेश हम एआई को देते हैं, उसकी बहुत अच्छी तैयारी आपके पास होनी चाहिए। दूसरा जबतक एआई की (और लेखक की भी) ट्रेनिंग पूरी तरह से नहीं हो जाती तबतक उन विधाओं में लिखना आसान होगा जिनमे सीधी-सपाट भाषा से काम चल जाता है, जैसे कोई रपट या फिर कोई रेखाचित्र या कोई कैरेक्टर स्केच। कुछ इस तरह की चीज जिसमें बहुत ज्यादा गूढ़ और कलात्मक अर्थ न छुपाने हों। हिंदी भाषा को लेकर समस्या इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि सूचना प्रौद्योगिकी के मौजूदा मॉडल में उसकी उपस्थिति नगण्य है। मशीन का जेहन मूलतः अंग्रेजी या थोड़ा बहुत कुछ अन्य भाषाओं का है। आप कमांड किसी भी भाषा में दें मशीन उसे अंग्रेज़ी में ही डीकोड करके समझती है। इसी तरह से मशीन लर्निंग या एनएलपी के लिए उपलब्ध सामग्री यानी ट्रेनिंग मैटेरियल भी हिंदी में बहुत कम है क्योंकि साहित्य के अतिरिक्त भी समूची सूचना प्रोद्योगिकी में हिन्दी का इस्तेमाल कम है।

एक चीज़ जो मुझे बेहद चिंताजनक लगती है वो भाषा-भाव-भंगिमा की समझ को लेकर है। मुझे नहीं मालूम कि तकनीक के स्तर पर साहित्यिक और गैर साहित्यिक भाषा को लेकर कितना अंतर होगा क्योंकि साहित्य तो एक बहुत संक्षिप्त इस्तेमाल है इस तकनीकी का। अगर तकनीकी स्तर पर भाषा की समझ साहित्य और गैर साहित्यिक इस्तेमालों में समान होगी तो आने वाले समय में साहित्य की भाषा में बड़ा बदलाव दिखाई देने वाला है। दूसरे शब्दों में कहें तो यदि एआई द्वारा भाषा की समझ उसके उपयोग के प्रति तटस्थ है तो यह बात साहित्य पर एक बड़ा प्रभाव पैदा करने वाली है!

फिलहाल मौजूदा समय में ज़्यादा ज़रूरी ये समझना होगा कि आप एआई की मदद लेखन के किस चरण में और कैसे ले रहे हैं। मेरा अनुभव ये कहता है कि पूरी कहानी लिखने की बजाय किसी चरित्र को विकसित करने में, किसी पात्र के लिए बैक ग्राउंड स्टोरी बुनने में, संवाद लिखने में या कहानी को कोई मोड़ देने का आइडिया जेनेरेट करने में इसका बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। यह भी कहना ज़रूरी है कि अगर आप एआई को अच्छे तरीके से कोई प्रॉन्प्ट देते हैं तो कई बार बहुत चौंकाने वाले परिणाम सामने आते हैं| यह माध्यम मुझे लगता है कि बहुत सारी संभावनाओं से भरा हुआ है और आने वाले समय में इसका बहुत बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस पूरी बात से अगर एआई को परिभाषित करें तो लगता है-

एआई एक बहुत तेज लिखने वाली आशुलिपिक, आज्ञापालक टाइपिस्ट और उस जानकार लेकिन बेहद चापलूस प्रधानलिपिक की तरह है जिसे साहब की इच्छानुसार नियम-विनियम उद्धृत करना आता हो।

(अमित श्रीवास्तव की हाल ही में तीन पुस्तकें  प्रकाशित हुई हैं। ‘शिराज-ए-दिल जौनपुर’, ‘कोविड ब्लूज’  कथेतर गद्य है एवं ‘तीन’ उपन्यास है।)

Fearlessly expressing peoples opinion