समकालीन जनमत
ज़ेर-ए-बहस

अँधेरे में एक उम्मीद

 

( अरुण दीप की यह रिपोर्ट ‘ द हिन्दू ’  में 19 अक्टूबर को प्रकाशित हुई है। समकालीन जनमत के पाठकों के लिए हिंदी अनुवाद दिनेश अस्थाना ने किया है )

11 अक्तूबर के अपराह्न में ब्यावर शहर के बीचोबीच कुछ कार्यकर्ता और कुछ ग्रामवासी एकत्रित हुये हैं। वे ऐतिहासिक चांग द्वार और इस जिले की एक बड़ी बाजार के बीच की त्रिमुहानी पर बिछी एक दरी पर बैठे हुये हैं। कार्यकर्ताओं के हाथों में दशकों से लहरायी जानेवाली वही तख्तियाँ हैं जिनपर नारे लिखे हुये हैं- ‘हमारा पैसा, हमारा हिसाब’, ‘हम जानेंगे, हम जियेंगे’, ‘हम लड़ेंगे हम जीतेंगें’।

चांग द्वार एक ऐतिहासिक स्थल है, सिर्फ इस कारण नहीं कि गाँववालों के अनुसार यह औपनिवेशिक युग में बनवाया गया था, बल्कि इसलिये भी कि 1996 में यहाँ एक प्रदर्शन भी हुआ था। उस समय कम से कम 200 मजदूर एवं किसानों, जो ‘ जन-सुनवाई ’ के कारकुन माने जाते थे, ने भूमि आवंटन से लेकर स्कूल की इमारत तक के खर्चों तक के अभिलेख उपलब्ध कराये जाने की माँग को लेकर जबरदस्त प्रदर्शन किया था।

चूँकि इस प्रदर्शन को एक अलाभकारी संगठन, मजदूर किसान संघर्ष समिति (एम0केवएस0एस0) के अरुणा राॅय और निखिल डे जैसे कार्यकताओं का समर्थन प्राप्त था (और उसे राष्ट्रीय मीडिया से प्रोत्साहन भी मिल रहा था) इसलिये वह उस वर्ष बहुत तेजी से जन-आंदोलन में तब्दील हो गया था और इसीलिये सरकारी बाबू लोग एकदम से सकपका गये थे। इसके बाद पारदर्शिता के पक्ष में एक अभियान सा चल पड़ा जिसके परिणामस्वरूप ‘ सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 ’ अस्तित्व में आ सका। इस अधिनियम की सहायता से कोई भी भारतीय नागरिक सरकार से, राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को छोड़कर, अन्य किसी भी प्रकार की सूचना की माँग कर सकता है।

समय बीतते-बीतते यह सरकार को जिम्मेदार ठहराने के लिये कार्यकर्ताओं और पत्रकारों का एक कारगर हथियार बन गया। एक कैडिल मार्च के दौरान एम0केवएस0एस0 के सह-संस्थापक डे ने एक ऐसी बातचीत में, जिसमें उनके पुराने साथी और उनका निर्देश पाने को आतुर स्वयंसेवक बार-बार बाधा पहुँचा रहे थे, बताया कि ‘‘हम लोग खुद को चुटकियाँ काट रहे थे कि यह कोई ख्वाब तो नहीं है।

सूचना के अधिकार के बीस बरस मनाने का जश्न, खासतौर पर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 के जरिये, उसे कमजोर बनाने के खिलाफ़ आवाज़ उठाने का अवसर भी था। इस कानून का यह तनुकरण कार्यकर्ताओं के लिये अपना वह लक्ष्य हासिल करने की राह और भी कठिन कर देगा जिसे लोगों ने लड़कर प्राप्त किया था।

आरटीआई की थीम पर बनी राजस्थानी नौटंकी, लोक-गीत और एक कैंडिल-मार्च जिसमें एक ऑटो रिक्शा पर लगाया गया एक बाँस का पुतला भी है, जिसके होंठ नारों की तर्ज पर हिल-डुल रहे हैं , कुल मिलाकर यह सारा तमाशा भीड़ को खींचने और प्रचार-प्रसार का एक जश्न है। यह वास्तव में अगले दिन मनाये जानेवाले ‘सूचना का अधिकार मेला’ की पूर्व-पीठिका है।

नागरिकों का हथियार

शुरुआती प्रदर्शनों के वर्ष 1996 में भारतीय जनता पार्टी के नेता और राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखाावत ने राज्य की विधायिका के पटल पर स्थानीय नगर निकायों केअभिलेखों को जनता के समक्ष जाँच हेतु उपलब्ध कराने का वचन दिया था। परंतु अगले दिन जब राज्य सरकार द्वारा उसका अन्तिम संस्करणः ‘ एक निश्चित शुल्क का भुगतान करके अभिलेखों की जाँच की जा सकेगी और उसकी फोटोकाॅपी करने की सुविधा नहीं रहेगी’, प्रकाशित किया गया तो शेखावत का दोहरापन खुलकर सामने आ गया। शेखावत ने बाद में यह दलील दी कि राज्यों के बेशुमार स्थानीय निकाय के दफ्तरों में फोटोकाॅपी मशीन खरीदने के लिये पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं है।

एम0केवएस0एस0 और ब्यावर के लोगों और राजस्थान के दूसरे इलाकों के लोगों ने सरकार पर दबाव बनाने के लिये चांग गेट पर 40 दिनों तक धरना दिया। राॅय बताते हैं कि ‘‘ जब हमलोग जागे तो देखा कि हमारे जूते-चप्पल पूरे मैदान में यहाँ-वहाँ बिखरे पड़े हैं। उन्हें सुअरों ने इधर-उधर कर दिया था।’’ एक दूसरे स्वयंसेवक का कहना था कि ‘‘ हमने सद्भावना में अपना प्रदर्शन वापस ले लिया ’’ ताकि सरकार को कार्यकर्ताओं की माँगों पर विचार करने और उन्हें लागू करने के लिये कुछ समय मिल जाय।

वर्ष 2000 में राजस्थान को राज्य-स्तर पर सूचना के अधिकार के कानून को पारित किये हुये चार साल हो जाते। राष्ट्रीय स्तर पर सूचना का अधिकार कानून पारित किये जाने के बहुत पहले ब्वायर के सूचना का अधिकार कार्यकर्ताओं को, अपना आन्दोलन संगठित करने और सरकार को उत्तरदायी ठहराने के लिए सरकारी अभिलेखों में ही सही, एक कारगर हथियार मिल चुका था। 2001 में सुशीला देवी ने पाया कि भीषण बरसात के मौसम में ब्यावर के सर्पदंश से प्रभावित लोगों को विष-रोधी दवायें देने के लिये उनसे दाम वसूला जा रहा था जबकि सरकारी अस्पतालों में यह मुफ्त किया जाना चाहिये था।

इसी प्रकार डाॅक्टर भी माताओं से बच्चों के जन्म के बाद प्रत्येक से 500 रुपये वसूल रहे थे। इस समय 60 साल की हो चुकी सुशीला देवी बताती हैं कि ‘‘ मैं ऐसे अभिलेख लेकर गाँवों में गयी और जिनको भी विष-रोधी दवायें दी गयी थीं या जिन माँओं ने किसी बच्चे को जन्म दिया था उनसे पूछा कि क्या उन्होंनें इसके लिये कोई भुगतान किया था। उनका जवाब था हाँ,  उन्होंने ऐसा किया था।’’

इसके कुछ दिन बाद ही सारे अभिलेखों के साथ अस्पताल पर धावा बोला गया तो उन्होंने अपने अभिलेखों के आधार पर बताया कि उनमें ऐसा तो कुछ भी नहीं है। सुशीला देवी ने बताया कि ‘‘ उन्होंने कोई पैसा वापस नहीं किया लेकिन यह भी कहा कि आगे से ऐसा नहीं होगा ’’।

ब्यावर और देश के दूसरे हिस्सों में सूचना का अधिकार कानून लागू होने, जिससे लोगों को सड़क निर्माण के ठेकों की शर्तों से लेकर राशन की दुकानों तक के अभिलेखों की जाँच करने का अधिकार मिल गया था, के बाद किये गये सोशल ऑडिटों में यह पहला ऑडिट था। यह भारत में राजनीति एवं धन के सर्वव्यापी गँठजोड़, जो अक्सर सत्ता की ताकत को सुनिश्चित करते हैं, के खिलाफ़ नागरिकों के संघर्षों के लिये एक प्रभावी हथियार साबित हुआ।

जनसंघर्ष एवं समझ

आज रविवार है, मेले का दिन। यह जश्न उसी जगह मनाया जा रहा है जहाँ आने वाले दिनों में सूचना का अधिकार कानून पारित होने और उसके प्रभावों को समर्पित एक संग्रहालय की स्थापना की जाने वाली थी। सैकड़ों लोग- कार्यकर्ता, स्वयंसेवी, ग्रामीण जिन्हें किसी प्रकार से भी भूतकाल में इस कानून के अन्तर्गत लाभ मिला रहा हो- धूप में तने सफेद तम्बू के नीचे इकट्ठा हुये हैं।

यहाँ एम0केवएस0एस0 और दूसरे संगठनों के स्टाल लगाये गये हैं- इस मेले में भाग लेने के लिये मेघालय से आरटीआई का लाभ उठानेवाले एक जनसंगठन से लेकर मदुरै से दो दिन की रेल यात्रा करके आये तमिलनाडु के हजारों समूह तक शामिल हैं।

कुल 25 लोगों के तमिलनाडु प्रतिनिधिमंडल के दल ने कल्लाकुरुचि की अगस्त-जुटान उकेरी हुयी टी-शर्ट पहन रखी है, इसमें राज्य के 2500 आरटीआई-प्रयोगकर्ताओं ने भाग लिया था। तमिलनाडु विद्युत परिषद के एक कर्मचारी बाकियाराज बताते हैं कि कैसे उन्होंने उत्तराधिकार स्थापित करने के लिये राज्य सरकार द्वारा जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने की जटिलताओं को उजागिर किया।

उनका कहना है कि ‘‘ मैंने यह सुनिश्चित कराया कि लोगों को जारी मृत्यु प्रमाणपत्र में माता और पिता दोनों के नाम अंकित हों।’’

एक स्टाल पर एक स्वयंसेवक यह बताता है कि कैसे सरकारी वेबसाइट पर अनिवार्य रूप से प्रदर्शित किये जाने वाले अभिलेख इस कानून के लागू होने के फलस्वरूप अब प्रदर्शित किये जा रहे हैं, इसे उसने एलईडी टीवी पर भी दिखाया। एक दूसरे स्टाल पर ब्यावर निवासी गौरव चैरोटिया जो उत्तर प्रदेश के नोयेडा में कार्यरत साॅफ्टवेयर इंजीनियर हैं, दस साल से अनुपलब्ध म्युनिसिपल पुनर्वास केन्द्र की जमीन के कागज़ात दिखाते हैं जो लाभार्थियों के लिये अब उपलब्ध हैं।

62 वर्षीया गीता देवी जो उन लाभार्थियों मे से एक हैं जिन्हें चैरोटिया की सहायता मिल सकी। वह बताती हैं कि, ‘‘ दस साल पहले मैंने अपने जिस पट्टे के लिये आवेदन दिया था, वह अब जाकर मिल सका।’’ दूसरे लोग उतने भाग्यशाली नहीं रहे। सुगनी देवी को 80 साल की उम्र में पट्टा मिला था। उसके बाद उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के अन्तर्गत घर बनाने के लिये धनराशि पाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जब अखबारों में इसका खुलासा हुआ तो उन्हें वांछित धनराशि प्राप्त तो हो गयी। पर नींव डालने के तुरंत बाद 84 साल की उम्र में उनका निधन हो गया और उनका अपना घर बनाने का सपना, सपना ही रह गया।

लीपापोती के प्रयास

सूचना का अधिकार कानून, भारत में राजनीतिक शक्ति और इससे संलगन गैरकानूनी तामझाम का अनवार्यतः पूरी तरह खुलासा करनेवाले औजार का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाया है। वह गँठजोड़ सम्भवतः इतना विशालकाय है कि यह कानून उसके सामने बौना नज़र आता है। फिर भी इससे जिन संरचनाओं का जन्म हुआ और इसके चलते कानून की किताबों में जो कुछ लिखा गया उससे वह लोग भी भौंचक रह गये जो दशकों से इसके लिये संघर्षरत थे।

तो क्या सूचना का अधिकार कानून का कोई स्वर्णयुग भी था ? डे का उत्तर था ‘‘हाँ, ठीक उसके पारित होने के वक्त’’, क्योंकि दंड और सेवा-अभिलेखों में लाल-निशान और जन-भावना का निशाना बन जाने का भय जन-सूचनाधिकारियों के मन में इस कदर बैठ गया था कि वे किसी मामले में टाल-मटोल करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।

अब वे दिन बीत चुके हैं। 2019 में संसद ने सूचना का अधिकार कानून में संशोधिन करके केन्द्र-सरकार ने सूचना-आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन पर रोक लगा दी है। अब केन्द्र और राज्य दोनों स्तरों पर सूचना-आयुक्त के पद अपीलीय हैं। जो लोग सूचना का अधिकार के आवेदन पत्रों के निस्तारण से संतुष्ट नहीं हैं वे वहाँ अपील कर सकते हैं और यदि वे वहाँ भी संतुष्ट न हों तो उच्च न्यायालय का रुख कर सकते हैं।

जम्मू एवं कश्मीर का धचका और भी गहरा है। इस मेले में अपना एक स्टाल चला रहे शोाध-छात्र इरफान बाँका बताते हैं कि धारा 370 की समाप्ति के पहले तक कश्मीर की विशेष अवस्थिति के कारण उसे अपना अलग सूचना का अधिकार कानून लागू करने का अधिकार प्राप्त था परन्तु अब हर अपील केन्द्रीय सूचना आयोग के पास जाती है क्याोंकि केन्द्र-शासित प्रदेश घोषित हो जाने के बाद हर अपील वहीं जानी है। वह आगे कहते हैं कि इससे उसके उत्तर की गुणवत्ता भी काफी कम हो गयी है।

अपीलकर्ताओं ने केन्द्रीय सूचना आयोग के साथ अपने अनुभवों को साझा करते हुये अपनी प्रतिक्रिया में हताशा और क्षोभ ही व्यक्त किया है। पिछले चार सालों में यह देखना असामान्य नहीं रह गया है कि सुनवाई के दौरान सूचना-आयुक्त अपीलकर्ता की बातों को अनसुना करके यथास्थिति बहाल करने का आदेश देते रहते हैं।

यहाँ तक कि सत्ता की वफादारी के चलते आयुक्त यदि जनसूचना के अधिकार को नकार नहीं पाते तो भी मामले को निपटाने के अनिच्छुक सरकारी विभाग उसे लटका देते हैं।  केन्द्रीय सूचना आयोग में ऐसे मामलों की सुनवाई में एक वर्ष से अधिक का समय लग जाता है, और इसके और भी आगे बढ़ जाने की सम्भावाना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।

अभी हाल में ही रहे सूचना-आयुक्त हीरालाल समरिया की 14 सितम्बर को छुट्टी हो गयी पर उनका उत्तराधिकारी अभी तक नियुक्त नहीं किया जा सका और सारे मामले लम्बित होते चले जा रहे हैं जबकि उनकी छुट्टी के बारे में सबको पहले से ही पता था।

समरिया की छुट्टी का मुद्दा तो सिर्फ एक नमूना है। केन्द्रीय सूचना-आयुक्त के 11 पदों में से 9 खाली हैं। यही हाल पूरे देश का है और कहीं-कहीं तो इससे भी गहरी खामियाँ हैं। 2024 में छह राज्य सूचना आयोगों में मामलों की सुनवाई के लिये कोई भी आयुक्त नहीं थे, और उनके कर्मचारी असहाय अवस्था में आनेवाली नयी अपीलों को केवल रजिस्टरों में दर्ज कर रहे थे, इस बात का कुछ भी अता-पता नहीं था कि उनकी सुनवाई कब होगी। \

डे के सह-संयोजकत्व में गठित जन-सूचना के अधिकारों के राष्ट्रीय अभियान (एनसीपीआरआई) ने अपने एक सर्वेक्षण में पाया कि उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकारों को इन रिक्त पदों को भरने का निर्देश दिया है पर इन निर्देशों का अनुपालन अभी भी लम्बित है।
पर सबसे घातक रहा है 2023 का वह संशोधन जिसे डिजिटल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के अन्तिम भाग में जोड़ा गया है। इस कानून का मुख्य लक्ष्य है उन कम्पनियों को दण्डित करना जो डेटा को लीक होने से रोक नहीं पाते, और यह सुनिश्चित करना कि लोगों के पास यह चुनने की सुविधा रहे कि उनके डेटा ऑनलाइन किस प्रकार से प्रयुक्त किये जा सकते हैं। इसी के साथ कार्यकर्ताओं का तर्क यह भी है कि वर्तमान संशोधन सूचना के अधिकार कानून पर कुठाराघात है।

डेटा प्रोटेक्शन एक्ट का अनुच्छेद 8(1)(जे) किसी सरकारी संगठन को यह अनुमति देता है कि वह ‘‘ किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत सूचना उपलब्ध कराने से मना कर दे।’’ वह इससे भी आगे जाकर यह स्पष्ट करता है कि इस प्रकार की सूचना उपलब्ध कराने को उचित ठहराने के लिये उसे ‘‘व्यापक जनहित’’ में होना जरूरी है।

विधिक जानकारों का कहना है कि 2023 के कानून ने ‘‘व्यक्तिगत सूचना’’ या ऐसी सूचना जो सार्वजनिक न की जा सके, के दायरे को बहुत बढ़ा दिया है।

सरकार का तर्क है कि यह संशोधन केवल ‘ निजता के अधिकार ’ के मामले में उच्चतम न्यायालय के 2017 के आदेश के अनुपालन में और जिस सूचना के प्रकाशन की विधिक अनिवार्यता हो उसे ही प्रकाशित किये जाने में है। परन्तु यह बात कार्यकर्ताओं के गले नहीं उतरती।  उनकी दलील है कि यदि यह लागू हो जाता है तो सुशीला देवी और गौरव चैरोटिया जैसे कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में किये जानेवाले सोशल ऑडिट एकदम असम्भव हो जाएंगे।

यह संशोधन अभी लागू नहीं हुआ है, क्योंकि 2023 के कानून द्वारा सरकार को इसे लागू किये जाने की अधिसूचना जारी करने का अधिकार दिया गया है। अब तक तो फिलहाल इलेक्ट्राॅनिक्स एवं सूचना तकनीकी मंत्रालय की ओर से इसके लागू किये जाने का कोई संकेत नहीं मिला है, उसे ही इस कानून के विभिन्न अनुच्छेदों के लागू किये जाने का अधिकार प्राप्त है और वह अनुच्छेद 8(1)(जे) के संशोधनों को अभी रोके रखना चाहती है।

आगे क्या होगा, किसी को कुछ भी नहीं पता। राॅय का कहना है कि, ‘‘ जब 2023 का संशोधन लागू होगा तो प्रतिरोध की दिशा पता नहीं क्या होगी। लेकिन हमलोग चुप नहीं बैठेंगे।’’

मेले के बाहर, आकर इस संशोधन के विरोध में ठोस विधिक-विचार रखनेवाले, न्यायमूर्ति ए0पी0 शाह ने कहा कार्यकर्ताओं के पास इसके विरुद्ध न्यायिक मामला बनाने की पर्याप्त संभावनायें हैं। जो कुछ भी प्राप्त किया जा चुका है और जो कुछ दाँव पर लगा है को भी ध्यान में रखते हुये, डे का दृष्टिकोण आशावादी है। उफनते मेले में मीडिया से रूबरू होते हुये वह कहते हैं कि, ‘‘इस आन्दोलन के पास अपना जीवन है। कोई संशोधन इसकी गति को रोक नहीं सकता।

 

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