तस्वीरनामा

भारतीय चित्रकला के इतिहास में , जनपक्षधर चित्रकला के बारे में लोगों में प्रायः यह भ्रम रहा है वे फौरी और राजनैतिक मकसद से बनाये जाते रहे ऐसे चित्रों में ‘ कलागुणों ‘ की उपेक्षा हुई है , लिहाज़ा उन्हें चित्र न कह कर पोस्टर कहना ज्यादा उचित है. ऐसी अवधारणाओं के पीछे कला बाज़ार के दलाल समीक्षकों का बड़ा हाथ रहा है जिन्होंने एक ख़ास किस्म के मुट्ठी भर बाज़ारू चित्रकारों और उनके चित्रों को अजब-गज़ब कथाओं और अनर्गल व्याख्याओं के सहारे महान और ‘संग्रहणीय’ सिद्ध करने के प्रयासों के साथ साथ प्रगतिशील कलाकारों की आपराधिक उपेक्षा की.

भारतीय जनपक्षधर और प्रगतिशील चित्रकला का एक बहुत बड़ा हिस्सा काले सफ़ेद ( चित्तप्रसाद, ज़ैनुल आबेदिन , भाऊ समर्थ , सोमनाथ होर आदि के अधिकांश चित्र) चित्रों का है. साथ ही इस धारा के अन्य चित्रों में भी हमें प्रायः उन्नत मान के रंग , कैनवास और अन्य महंगे कला सामग्रियों का प्रयोग कम देखने को मिलते है.  इसके बावजूद इस सीमा के , इस कला में हम ऐसे उत्कृष्ट कलागुणों को देख पाते हैं, जो इन्हें उत्कृष्ट चित्रकला माध्यमों पर आश्रित हुए बगैर  वास्तव में महान और कालजयी बनाते हैं.

ऐसा ही एक चित्र (चित्र1) है, सोमनाथ होर का बनाया हुआ ‘ बंद बैठक’ (Close door meeting).

1946 के दिसम्बर के महीने में, सरकारी कला विद्यालय के युवा छात्र सोमनाथ होर को कम्युनिस्ट पार्टी ने उत्तरी बंगाल के गाँवों में चल रहे ‘तेभागा आंदोलन ‘ की गतिविधियों को चित्रित करने और उस पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए भेजा था. तेभागा आंदोलन के संघर्षशील किसानों के बहुत नजदीक जाकर सोमनाथ होर ने अपने अनुभवों को अपने डायरी में सचित्र दर्ज़ किया था.

बाद में यह ऐतिहासिक डायरी बांग्ला में ‘ तेभागार डायरी’ के नाम से प्रकाशित भी हुई. अपने इस दौरे में , सोमनाथ होर को स्थानीय किसानों ,पार्टी कर्मियों और शहर से गए पार्टी कार्यकर्ताओं को करीब से देखने का मौका मिला. इस डायरी में दर्ज आंदोलन के रिपोर्ट के साथ साथ उन सभी लोगों के चित्रण भी है । इसके अलावा जुलूस में चलते किसानों का समूह , पार्टी अखबार पढ़ते किसान , बैठक में शामिल होने आये किसानों का जत्था , फसल काटते  किसान , रात के वक़्त पार्टी मीटिंग आदि आदि.

इन सब रेखाचित्रों (स्केच) को बनाते समय सोमनाथ होर ने यह सोचा था या नहीं कि इन चित्रों को आधार मान कर वे कभी छापा चित्र या कैनवास पर अलग से इन्हे बनाएंगे , इसका कोई जिक्र हमें ‘तेभागा डायरी’ में नहीं मिलता।  पर जैसा की दुनिया भर में समय समय पर बने कालजयी चित्रों के बनने के पीछे चित्रकार का जनता से जीवंत जुड़ाव की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है. सोमनाथ होर के ‘ बंद बैठक’ चित्र भी उनके इस जीवंत अनुभव का नतीजा है.

1946 के जाड़े की एक रात में तेभागा आंदोलन से जुड़े पार्टी के प्रमुख कार्यकर्ताओं के एक बंद बैठक में सोमनाथ होर उपस्थित थे और इस बैठक में उपस्थित लोगों को उन्होंने स्केच किया था.  इस घटना के बीते दो साल भी नहीं हुए थे कि आज़ाद हिन्दुस्तान में कम्युनिस्ट पार्टी को (1948) प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया और सोमनाथ होरे को भूमिगत होना पड़ा था. 1951 में भूमिगत रहते हुए सोमनाथ होर ने अपने तेभागा आंदोलन के चित्रों को आधार बना कर एक वुडकट छापा चित्रों की श्रंखला बनाई थी . ‘ बंद बैठक ‘ उन चित्रों में अन्यतम है.

‘बंद बैठक ‘ को निःसन्देह हम आधुनिक भारतीय चित्रकला के कुछ कालजयी चित्रों में से एक मान सकते है , जो अपने साथ जुड़े ऐतिहासिक सन्दर्भों के कारण महान नहीं है , बल्कि अपने उत्कृष्ट कलागुणों के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है.

जनपक्षधर चित्रों के काले सफ़ेद होने के पीछे के कारणों को रेखांकित करते हुए प्रख्यात कला समीक्षक शोभन सोम ने इन दो रंगों में दो विपरीत ध्रुवों को चिन्हित किया था.  उनका मानना था कि जिन चित्रकारों में , समाज के दो विपरीत छोरों पर अवस्थित दो वर्गों की राजनैतिक समझ होती है और जिनके चित्र बनाने का मकसद इस विरोधाभास को स्पष्टतर करना होता है,  वे प्रायः काले-सफ़ेद चित्र बनाते हैं. यह बात शायद भारतीय जनपक्षधर कलाकारों के चित्रों को देख कर सबसे बेहतर समझा जा सकता है.

ऐसे ही काले-सफ़ेद रंगों में बने ‘ बंद बैठक ‘ चित्र को देख कर हमारी पहली प्रतिक्रिया यही होती है की चित्र में दिख रहे सभी लोग बेहद गंभीर विषय पर बात कर रहें हैं. समय रात का है और मौसम जाड़े का. ठण्ड से बचने के लिए सभी लोई , चादर या कम्बल ओढ़े इस बैठक में शामिल हुए हैं. चित्र में दिख रहे सातों लोग एक घेरे में बैठे हुए हैं जिसके बीच में एक लालटेन रखा है जो कमरे का एक मात्र प्रकाश श्रोत है.  चित्र में इस प्रकाश श्रोत और उसके प्रभाव से प्रकाशित कुछ चेहरों के अलावा कुछ भी नहीं है. गौर से देखने पर हम पाते है, कि वास्तव में यह चित्र केवल काले और सफ़ेद छोटे-बड़े धब्बों से बना है. बैठक में उपस्थित लोगों के अतिरिक्त  केवल कमरे के दीवाल ही दिखती है. जो इस चित्र की महज एक पृष्ठभूमि ही नहीं है बल्कि चित्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा भी है. झोपड़ियों की ऐसी दीवालों को ‘टाटी ‘ कहा जाता है.

(टाटी : छप्परों के घर को चारों ओर से घेरने के लिए सरपत/पुआल या अन्य खर पतवारों की सहायता से बनायी गयी दीवाल। कहीं कहीं पर इन अस्थायी दीवालों पर गोबर की एक परत भी लीप दी जाती थी ताकि छिद्रों को ढका जा सके।)

 चित्र में इस ‘टाटी’ पर पड़ती रौशनी से ही हम न केवल इसके बुनावट को ही साफ़ समझ पाते है बल्कि अपने उत्स से दूर जाने के साथ साथ कमज़ोर होती रौशनी जो  काले और सफ़ेद के बुनावट से एक ‘ क्रॉस-हैचिंग ‘ रचते हैं; कमरे के माहौल को और भी ज्यादा गंभीर बनाते हुए पाते है.

चित्र के केंद्र में टाटी पर, बीच के आदमी के चेहरे की लम्बी परछाई की पृष्ठभूमि में , इस आदमी के चेहरे पर प्रकाश के चन्द सफ़ेद धब्बों से सोमनाथ होर इस व्यक्ति के चेहरे पर एक ख़ास भाव पैदा करते हैं. साथ ही इस व्यक्ति के कपड़ों पर फैली रौशनी उसके चेहरे पर आते आते क्रमशः कम होती दिखती है. यही बात हम दूसरे लोगों के कपड़ों और चेहरे पर भी पाते है. चित्र में दो लोगों की काली पीठ चित्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि चित्रकार सोमनाथ होर ने कमरे के अंदर , रौशनी के मुकाबले अँधेरे के विस्तार को इन्ही के माध्यम से स्पष्ट किया है.

यहाँ गौर तलब है कि इस चित्र को देखकर दर्शक सहज ही समझ पाता है कि चित्रकार ने यह चित्र , इस बैठक में शामिल लोगों के घेरे में शामिल न होकर; इन दो लोगों के पीछे बैठ कर बनाया था.

इस कम ख्यात काले-सफ़ेद छापा-चित्र को देखते हुए हमें अनायास ही विन्सेंट वॉन गॉग के ‘आलू खाने वाले लोग ‘ (पोटैटो ईटर्स) की याद आती है (चित्र 2 ), क्योंकि दोनों ही , चित्र में ‘एकल प्रकाश उत्स’ (सिंगल सोर्स लाइट) के प्रभाव के उत्कृष्ट उदहारण हैं. दोनों चित्रों में इस समानता के अलावा कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं. वॉन गॉग का चित्र ‘पोटैटो ईटर्स’ , जहाँ एक बहुवर्णी और कैनवास पर तैल-रंग से बना चित्र है वहीं ‘बंद बैठक’ एकवर्णी छापा चित्र है.

‘ बंद बैठक ‘ पर बात करते हुए ‘पोटैटो ईटर्स’ की चर्चा का उद्देश्य दोनों चित्रों के बीच किसी प्रकार की तुलना करना नहीं है , न ही किसी चित्र को छोटा या बड़ा सिद्ध करना है बल्कि सोमनाथ होर के चित्र ‘ बंद बैठक’ के कलागुणों को समझने का एक प्रयास मात्र है. यह प्रयास , आज़ादी के बाद की आधुनिक भारतीय कला-समीक्षा  के संकीर्ण, अन्यायपूर्ण और जन विरोधी चेहरे से पाठक को परिचित कराने का भी हैं, जहाँ ‘बंद बैठक ‘ जैसे कालजयी चित्रों और ऐसे चित्रों को बनाने वाले तमाम जनपक्षधर चित्रकारों की उपेक्षा की जाती रही है ।

 

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