देश भर में चल रहे प्रेमचंद जयंती कार्यक्रमों की कड़ी में आठ अगस्त को दिल्ली के सुरजीत भवन में अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान ‘ हम देखेंगे ’ की ओर से ‘ राष्ट्र का वर्तमान और प्रेमचंद ’ विषय पर एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जंतर-मंतर के निकट आयोजित इस कार्यक्रम में वरिष्ठ कथाकार योगेंद्र आहूजा, गांधीवादी चिंतक एवं एक्टिविस्ट मणिमाला तथा उर्दू साहित्य के गंभीर अध्येता खालिद अशरफ ने प्रेमचंद के साहित्य, उनकी वैचारिक दृष्टि और आज के भारत में उनकी प्रासंगिकता पर विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन दलेस की सरोज कुमारी ने किया और प्रलेस की संध्या नवोदिता ने धन्यवाद-ज्ञापन किया।
कार्यक्रम की शुरुआत जन नाट्य मंच के कलाकारों द्वारा प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘पंच परमेश्वर’ के प्रभावशाली कहानी-पाठ से हुई। इसमें सानिया हाशमी, अशोक तिवारी, मुस्तफ़ा, अबीर और सायना ने हिस्सा लिया। इसके बाद जन नाट्य मंच की कलाकार कोमिता ने हरीश चंद्र पांडे द्वारा रचित ‘पंच परमेश्वर का पुनर्वाचन और एक प्रस्ताव’ शीर्षक कविता का पाठ किया। इस रचनात्मक प्रस्तुति के बाद संगोष्ठी के वैचारिक सत्र की शुरुआत हुई।
राष्ट्र की अवधारणा और प्रेमचंद
अपने वक्तव्य में वरिष्ठ कथाकार योगेंद्र आहूजा ने सबसे पहले इस बात पर चिंता व्यक्त की कि पिछले दो दशकों में ‘राष्ट्र’, ‘लोकतंत्र’, ‘विज्ञान’, ‘इतिहास’, ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘प्रगति’ जैसे शब्दों के अर्थ किस तरह विकृत और अपहृत किए गए हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद और उनके समय के दूसरे पूर्वज लेखकों के लिए ‘राष्ट्र’ का अर्थ आज प्रचलित संकीर्ण अर्थों से बिल्कुल अलग था।
उन्होंने कहा कि प्रेमचंद राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के सबसे बड़े साहित्यकारों में हैं और 1905 से 1936 तक के भारतीय इतिहास का सबसे व्यापक चित्र उनके साहित्य में मिलता है। उनके लिए राष्ट्र केवल एक राजनीतिक संरचना नहीं, बल्कि एक जीवित नैतिक सत्ता था, जो नागरिकों की साझा स्मृतियों, संघर्षों, आकांक्षाओं, एकता और सहभागिता से निर्मित होती है। यह संकल्पना तभी सार्थक होती है, जब उसमें न्याय, समानता, सहभागिता, एकता और पारस्परिक जिम्मेदारी की चेतना मौजूद हो। इसके अभाव में ‘राष्ट्र’ सिकुड़कर केवल ‘राज्य’, ‘सत्ता-तंत्र’ या उसके संस्थानों का पर्याय बन जाता है—ऐसी संस्थाएँ जो नागरिकों को जोड़ने के बजाय विभाजित और नियंत्रित करती हैं, संवाद की जगह आज्ञापालन चाहती हैं और मनुष्य की गरिमा के बजाय सत्ता की ताकत को महत्त्व देती हैं।
आहूजा ने कहा कि प्रेमचंद अंग्रेजी शासन के दौर में लिख रहे थे, लेकिन उनका राष्ट्रवाद केवल अंग्रेज-विरोध तक सीमित नहीं था। उसमें किसी तरह की संकीर्णता या सांप्रदायिकता नहीं थी। उनके लिए राष्ट्र का अर्थ किसान, मजदूर, दलित, स्त्रियों और पिसती हुई जनता के सामूहिक जीवन से था। किसी राष्ट्र की वास्तविक ताकत और पहचान इस बात से तय होती है कि वह अपने सबसे कमजोर, उपेक्षित और वंचित नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

इसी दृष्टि से उन्होंने कहा कि प्रेमचंद हमारे समय के अत्यंत जरूरी समकालीन लेखक हैं। वे समय के साथ पुराने नहीं हुए, बल्कि नए होते गए हैं और बदलते समय में उनके अर्थ और गहरे होते गए हैं। उन्होंने ‘राष्ट्र’, ‘राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य’ को सत्ता की निगाह से नहीं देखा। उनकी निगाह हमेशा उन लोगों पर ठहरती है, जहाँ इतिहास की रोशनी सबसे कम पहुँचती है—किसान, खेतिहर मजदूर, दलित, स्त्रियाँ, निम्न वर्ग और निम्न-मध्यवर्ग तथा हाशिए पर धकेले गए असंख्य लोग।
उनके लेखन का मूल प्रश्न, आहूजा के अनुसार, यह है कि जिस राष्ट्र के सबसे कमजोर मनुष्य के हिस्से में अपमान, अभाव और अन्याय ही आए, क्या वह स्वयं को महान कहने का नैतिक अधिकार रखता है? जिस समाज की बड़ी आबादी भूख, कर्ज, जातिगत अवमानना और सामाजिक विषमता के साथ जीती हो, वह स्वयं को सभ्य और सशक्त राष्ट्र कैसे कह सकता है?
आज जब ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रवाद’ सार्वजनिक जीवन के सबसे अधिक प्रयुक्त और विवादित शब्द बन चुके हैं, प्रेमचंद को पढ़ना इसलिए जरूरी है कि वे इन शब्दों के भीतर छिपे नैतिक अर्थों को फिर से प्रकाशित करते हैं। वे बताते हैं कि राष्ट्र और राज्य एक ही चीज नहीं हैं; देशभक्ति मनुष्यता के विरोध में नहीं, बल्कि उसकी शर्त होनी चाहिए; संस्कृति तभी संस्कृति है, जब वह प्रभुत्व का औजार न बन जाए; और विकास, यदि न्याय से रहित हो, तो केवल ऊपरी चमक-दमक है।
राष्ट्रीय मुक्ति से सामाजिक मुक्ति तक
आहूजा ने कहा कि आजादी के आंदोलन की जो वैचारिक जमीन थी, वही प्रेमचंद के लेखन की भी जमीन थी। वे गांधी और उनके नैतिक साहस से गहरे प्रभावित थे, लेकिन उनके भीतर का कथाकार हर विचार, हर आंदोलन और यहां तक कि राष्ट्रवाद को भी प्रश्नांकित करने की स्वतंत्रता रखता था। इसीलिए उनका साहित्य भावुक श्रद्धा के बजाय कठोर आलोचना और आत्मालोचना का दस्तावेज है। वे जानते थे कि जो राष्ट्र स्वयं को सवालों से मुक्त मान लेता है, वह धीरे-धीरे अपनी नैतिक चेतना खो देता है।
उन्होंने प्रेमचंद के ‘महाजनी सभ्यता’ निबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल पूँजीवादी व्यवस्था या धन के असमान वितरण की आलोचना नहीं है, बल्कि एक पूरी सभ्यता की कठोर आलोचना है। चिंता यह है कि जब धन मूल्य का पर्याय बन जाता है, तब मनुष्य का मूल्य क्या रह जाता है। ऐसी सभ्यता में व्यक्ति का मूल्य उसके चरित्र, ज्ञान, श्रम या नैतिकता से नहीं, उसकी आर्थिक हैसियत से तय होने लगता है। धीरे-धीरे मनुष्य के भीतर भी एक ‘महाजन’ बैठ जाता है। बाजार केवल हमारी जेबों पर नहीं, हमारी कल्पना पर भी कब्जा करता है; वह केवल वस्तुएँ नहीं बेचता, सपने भी बेचता है और हमारी आकांक्षाओं की दिशा तय करता है।
‘गोदान’ और किसान की त्रासदी
आहूजा ने कहा कि ‘गोदान’ को केवल औपनिवेशिक भारत में किसान-जीवन का आख्यान मानना उसके अर्थ को बहुत छोटा कर देना होगा। यह भारतीय समाज की संरचना का आख्यान है, जिसमें राजनीतिक और सामाजिक इतिहास लगातार एक-दूसरे से टकराते हैं। इसका मूल प्रश्न है—क्या राजनीतिक आजादी अपने-आप सामाजिक मुक्ति भी लेकर आती है?
होरी की हत्या कोई अंग्रेज नहीं करता। उसे महाजनी व्यवस्था, जाति-व्यवस्था, धार्मिक कर्मकांड, प्रशासन की निष्ठुरता और वह सामाजिक नैतिकता मारती है, जो अन्याय को व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा मान चुकी है। प्रेमचंद इस सवाल को हमारे सामने रखते हैं कि किसी राष्ट्र का सबसे बड़ा शत्रु उसकी सीमाओं के बाहर होता है या उसकी सामाजिक संरचनाओं के भीतर।

होरी की त्रासदी केवल गरीबी नहीं है। उसकी आकांक्षा अपनी ‘मरजाद’ बचाए रखने की है। वह जितना अधिक श्रम करता है, उतना ही ऋणी होता जाता है और उसकी मरजाद का हरण होता जाता है। प्रेमचंद यहाँ संकेत करते हैं कि श्रम और सम्मान का रिश्ता टूट चुका है। यह केवल आर्थिक अन्याय नहीं, बल्कि सभ्यता का नैतिक संकट है।
जाति : राष्ट्र की सबसे गहरी दरार
योगेंद्र आहूजा ने जाति को राष्ट्र की सबसे गहरी और अंतहीन दरार बताया। प्रेमचंद उन शुरुआती हिंदी कथाकारों में हैं जिन्होंने जाति को सामान्य रूढ़ि या परंपरा के बजाय सत्ता और अन्याय की जटिल संरचना के रूप में देखा।
‘सद्गति’ और ‘ठाकुर का कुआँ’ जैसी रचनाएँ बताती हैं कि मनुष्य की सबसे गहरी पराजय आर्थिक अभाव नहीं, बल्कि उसकी गरिमा का अपहरण है। जाति उत्पीड़ित व्यक्ति को अमानवीय बनाती ही है, उत्पीड़क को भी नैतिक रूप से विकृत करती है। एक मनुष्य से उसकी गरिमा छीनती है और दूसरे से उसकी करुणा तथा मनुष्यता। इस अर्थ में जाति केवल कुछ व्यक्तियों का उत्पीड़न नहीं, बल्कि पूरे समाज की नैतिक विफलता है। जब एक मनुष्य की पीड़ा दूसरे को स्वाभाविक और सामान्य लगने लगे, तभी सभ्यता का सबसे गहरा संकट शुरू होता है।
‘रंगभूमि’ और विकास का प्रश्न
आहूजा ने ‘रंगभूमि’ को आधुनिक भारत में विकास, सत्ता और नैतिक प्रतिरोध का महाकाव्य बताया। यह आधुनिकता की नैतिक समीक्षा भी है। इसका केंद्रीय सवाल है—क्या विकास मनुष्य को अधिक मानवीय भी बनाता है?
सूरदास अंधा है, लेकिन वही इतिहास को सबसे स्पष्ट देखता है। उसकी जमीन उसके लिए संपत्ति या संसाधन भर नहीं, बल्कि जीवन के नैतिक भूगोल का हिस्सा है। कारखाना केवल औद्योगीकरण का प्रतीक नहीं, बल्कि ऐसी आधुनिक सभ्यता का प्रतीक है जो दक्षता, गति, लाभ और उत्पादन को सर्वोच्च मूल्य मानती है। प्रेमचंद उद्योग-विरोधी नहीं हैं; वे उस दृष्टि के आलोचक हैं जिसमें मनुष्य साधन और लाभ साध्य बन जाता है।
सूरदास की लड़ाई केवल अधिकार की नहीं, अपनी मौजूदगी और अस्तित्व की लड़ाई भी है। विस्थापन केवल भौगोलिक नहीं, अस्तित्वगत अनुभव है। सभ्यता की पहली जिम्मेदारी उन लोगों को याद रखना है, जिनकी कीमत पर उसका वैभव निर्मित होता है।
इसीलिए ‘रंगभूमि’ आधुनिक राज्य और नागरिक के संबंधों का भी उपन्यास है—राज्य नागरिक के लिए है या नागरिक राज्य की विकास-परियोजनाओं के लिए? भूमि-अधिग्रहण, पर्यावरणीय संकट, आदिवासी अधिकार, नगरीकरण और जलवायु परिवर्तन के मौजूदा प्रश्नों के बीच यह सवाल और भी प्रासंगिक हो उठता है। विकास का सबसे मुश्किल सवाल यह नहीं कि हम क्या और कितना निर्माण करते हैं, बल्कि यह है कि उस निर्माण की कीमत कौन चुकाता है।
सांप्रदायिकता और हिंसा का नॉर्मलाइजेशन’
आहूजा ने कहा कि प्रेमचंद सांप्रदायिकता के सबसे बड़े विरोधियों में थे। हालांकि आज सांप्रदायिकता के जिस बेरहम और विनाशकारी रूप का सामना हम कर रहे हैं, उसे समझने के लिए प्रेमचंद के साथ मुक्तिबोध, हन्ना आरेंट जैसे लेखकों-विचारकों, समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों को भी पढ़ना आवश्यक है।
इस संदर्भ में उन्होंने हन्ना आरेंट की ‘बुराई की सामान्यता’ की अवधारणा का उल्लेख किया—मनुष्य अपनी क्रूरता को पहचानना कैसे बंद कर देता है? हिंसा उसे हिंसा नहीं लगती, अन्याय अन्याय नहीं दिखता और अमानवीयता उसके दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाती है। भयानक अपराध हमेशा ऐसे लोग नहीं करते जो देखने में दरिंदे हों। बिल्कुल सामान्य, शरीफ और घरेलू जीवन जीने वाले लोग भी बिना किसी दुविधा या कचोट के खौफनाक जुल्मों का हिस्सा बन सकते हैं।
पिछली सदी ने दिखाया कि बर्बरता स्वयं सभ्यता के भीतर जन्म ले सकती है। उच्च संस्कृति और औद्योगिक दक्षता भी विराट पैमाने पर जनसंहार की सेवा में लग सकती हैं। सभ्यता और नैतिकता एक ही बात नहीं हैं; प्रगति और मनुष्यता भी एक ही बात नहीं हैं। क्रूरता व्यक्तिगत न रहकर सामूहिक और प्रशासनिक हो सकती है। जब अत्याचार प्रशासनिक प्रक्रियाओं में बदल दिया जाता है, तो उसका नैतिक भार असंख्य लोगों में बँट जाता है और किसी एक व्यक्ति को अपने अपराधी होने का अनुभव नहीं होता।

मणिमाला : बदलते शोषण और नए सवाल
योगेंद्र आहूजा के बाद गांधीवादी चिंतक और एक्टिविस्ट मणिमाला ने कहा कि प्रेमचंद वास्तविक चरित्रों के लेखक हैं और उनके पात्र आज भी गाँवों में दिखाई पड़ते हैं। प्रेमचंद की किताबों में मौजूद दलित अब किताबों से बाहर आ चुके हैं और नई पीढ़ी अपनी जमीन बना रही है।
उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की कहानियाँ इतनी प्रभावशाली हैं कि एक बार पढ़ लेने के बाद वे उन्हें भूल नहीं पातीं। प्रेमचंद ने किसान आंदोलन और किसानों की मजबूती का सवाल भी उठाया। आज यदि प्रेमचंद होते तो होरी का चरित्र शायद कुछ अलग होता, क्योंकि आज का किसान भी संघर्ष करने और अपनी जमीन के लिए लड़ने की क्षमता रखता है।
मणिमाला ने कहा कि पहले गाँव का महाजन किसानों का शोषण करता था, अब उसी शोषण का स्वरूप बदलकर कॉरपोरेट शक्ति के रूप में सामने आया है। उन्होंने झारखंड में पूँजीपतियों को अत्यंत कम दर पर हजारों एकड़ जमीन लीज पर दिए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि किसान आज भी शोषण के शिकार हैं, केवल शोषण के तरीके बदल गए हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्रेमचंद ने किसानों की तरह स्त्रियों के सवाल को भी मजबूती से उठाया और वे स्त्रियों के प्रति गहरी संवेदना रखते थे।
खालिद अशरफ : प्रेमचंद की वैचारिक यात्रा और उर्दू से रिश्ता
संगोष्ठी के अंतिम वक्ता उर्दू साहित्य के गंभीर अध्येता खालिद अशरफ थे। उन्होंने प्रेमचंद के लेखन के तीन दौर—आर्यसमाजी, गांधीवादी और प्रगतिशील—बताए और उन्हें एक ‘ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल’ के रूप में देखा।
उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने स्वयं भी संघर्ष किया और नौकरी से इस्तीफा दिया। उनके पुत्र अमृतराय के हवाले से उन्होंने बताया कि प्रेमचंद ने ‘हंस’, ‘जागरण’ और सरस्वती प्रेस जैसे तीन ‘हाथी’ पाल लिए थे, जिनका पेट भरते-भरते वे कंगाल हो गए थे। पत्नी शिवरानी देवी के साथ प्रेमचंद का एक प्रसिद्ध चित्र है, जिसमें उनके जूते में सुराख दिखाई देता है—जो उनकी आर्थिक कठिनाइयों का प्रतीक है।
खालिद अशरफ के अनुसार प्रेमचंद अपने कथासाहित्य में जितने प्रगतिशील दिखाई देते हैं, उससे कहीं अधिक स्पष्ट रूप से उनकी प्रगतिशील विचारधारा उनके पत्रों में सामने आती है। इसलिए प्रेमचंद की विचारधारा को समझने के लिए ‘विविध प्रसंग’ जैसी पुस्तकों में संकलित उनके पत्रों को पढ़ना जरूरी है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद के पत्रों पर अभी अपेक्षाकृत कम काम हुआ है।
जाति और सांप्रदायिकता के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि ये समस्याएँ भारतीय समाज में पहले से मौजूद थीं; अंग्रेजों ने उन्हें केवल बढ़ावा दिया। प्रेमचंद के लिए केवल वर्ग का सवाल पर्याप्त नहीं था। राष्ट्रीयता, जाति और जेंडर से जुड़े सवाल भी उनके लिए उतने ही महत्त्वपूर्ण थे। 1932 के एक संपादकीय लेख का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने दलितों की आर्थिक स्थिति मजबूत किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया था। उनके अनुसार उस समय, डॉ. आंबेडकर को छोड़कर, शायद ही किसी ने इस सवाल को इस तरह उठाया था।
खालिद अशरफ ने आज के संदर्भ में आदिवासी-विरोधी मानसिकता, जातिवाद और सांप्रदायिकता के साथ कॉरपोरेट शक्तियों के गठजोड़ की ओर भी संकेत किया और कहा कि प्रेमचंद ऐसी ताकतों के विरोध में खड़े थे। इस संदर्भ में उनका ‘महाजनी सभ्यता’ निबंध आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।
उन्होंने भाषा के सवाल पर भी विशेष जोर दिया। उनके अनुसार हिन्दुत्ववादी शक्तियाँ लंबे समय से यह जहरीला दुष्प्रचार करती रही हैं कि हिंदी हिन्दुओं की भाषा है और उर्दू, फारसी तथा अरबी मुसलमानों की भाषाएँ हैं। प्रेमचंद मूलतः उर्दू के लेखक थे और उनका पूरा लेखन इस सांप्रदायिक विभाजनकारी दृष्टि के विरुद्ध एक सशक्त प्रमाण है। फारसी भाषा पर प्रेमचंद की गहरी पकड़ का उल्लेख करते हुए उन्होंने शिबली के कथन को उद्धृत किया कि हिन्दुस्तान के सात करोड़ मुसलमानों में भी एक ऐसा व्यक्ति नहीं था जो प्रेमचंद जैसी फारसी लिख सके।
प्रेमचंद को पढ़ने का अर्थ
संगोष्ठी में व्यक्त विचारों का केंद्रीय निष्कर्ष यही था कि प्रेमचंद को पढ़ना केवल अतीत को समझना नहीं है। राष्ट्र, स्वराज, विकास, सामाजिक न्याय, जाति, सांप्रदायिकता, किसान, स्त्री और मनुष्यता से जुड़े जिन सवालों को उन्होंने उठाया था, वे आज भी हमारे सामने खड़े हैं।
प्रेमचंद का साहित्य हमें यह पूछने के लिए विवश करता है कि हम कैसा राष्ट्र बनाना चाहते हैं और उस राष्ट्र की कीमत कौन चुका रहा है। उनके लिए राष्ट्र केवल सत्ता, भूगोल या संस्थाओं का नाम नहीं था; वह मनुष्यों के बीच न्याय, बराबरी, सहभागिता और पारस्परिक जिम्मेदारी से निर्मित नैतिक समुदाय था।
इसी अर्थ में प्रेमचंद अपने समय के ही नहीं, हमारे समय के भी लेखक हैं। उनके साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह हमें तैयार उत्तर नहीं देता, बल्कि ऐसे सवालों के सामने खड़ा करता है जिनसे कोई भी लोकतांत्रिक और मानवीय समाज स्वयं को मुक्त नहीं कर सकता।
संगोष्ठी का संचालन सरोज कुमारी ने किया। संध्या नवोदिता के धन्यवाद-ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
कार्यक्रम में रामायन राम, आशुतोष कुमार, प्रेम तिवारी, राजीव कुमार शुक्ला, अर्जुमन्द आरा, देवी प्रसाद मिश्र, संजीव कुमार, विनीत तिवारी, अभय कुमार, कृष्ण कुमार, रश्मि रावत, गजेंद्र रावत, हीरालाल जी सहित बड़ी संख्या में साथियों ने शिरकत की। दिल्ली में दो दिनों की लगातार बारिश के चलते सड़कें और ज्यादा जाम हो गई थीं।इस के बावजूद ऑडियंस की संख्या बहुत अच्छी रही।

