प्रतिरोध और अनशन यथास्थिति को बनाये रखने के खिलाफ और व्यवस्था-परिवर्तन के पक्ष मंे चुनौती मात्र नहीं होते, वे खुद प्रतिरोध के स्वरूप को भी बदल देने मे सक्षम होते हैं-श्रीमानसी कौशिक
जब मेरी प्रोफेसर ज्योति दलाल ने मुझे ब्रिटिश दार्शनिक होवार्ड केगिल की पुस्तक ‘‘ऑन रेज़िस्टेंसः ए फिलास्फी ऑफ डिफाएन्स’’ से रूबरू कराया उस समय मुझे बिल्कुल ही अन्दाजा नहीं था कि जन्तर-मन्तर और संसद मार्ग पर छात्रों के प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करते समय मैं एक बार फिर खुद को उसी किताब के पन्ने पलटते हुये पाऊँगी।
एक पत्रकार के तौर पर हमें प्रदर्शन की रिपोर्टिंग एक घटना के तौर ही पर करने के लिये प्रशिक्षित किया जाता है। हम प्रदर्शनकारियों, हिरासत में लिये गये लोगों, पुलिस में दर्ज प्राथमिकियों और घायलों की संख्या देखते हैं। हम देखते हैं कि मार्च कब शुरू हुआ, पुलिस का हस्तक्षेप कब हुआ और भीड़ कब तितर-बितर हुयी। हम सहज ही पूछ लेते हैं प्रदर्शन सफल रहा या असफल। पर केगिल कुछ दूसरे सवाल पूछते हैं।
उनकी व्याख्या में प्रदर्शन केवल सत्ता से टकराव नहीं बल्कि मानव की वह क्षमता होती है जिसे काल-विशेष में विकसित करना होता है और उसे सँजोना भी पड़ता है। यह सिर्फ नारेबाजी नहीं; यह कल फिर और उसके अगले दिनों में बार-बार लौट आने की क्षमता होती है। एक पत्रकार के तौर पर काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करते समय इस सोच को दरकिनार करना मुश्किल हो गया।
19 जुलाई को, सोनम वांगचुक को जन्तर-मन्तर से उठा लेने के अगले दिन प्रदर्शन-स्थल पर 23 दिनों से अनशन कर रहे लोगों के साथ एकजुटता ज़ाहिर करने के लिये सैकड़ों लोग आ गये। वे आये थे बिहार, उत्तर-प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिम-बंगाल, ओडिशा और उसके भी आगे से।
अगले दिन भीड़ और उमड़ आयी। इंटरनेट की सेवायें ठप कर दी गयीं, मेट्रो-स्टेशन बन्द कर दिये गये फिर भी लोग कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर जन्तर-मन्तर पहुँचे।
20 जुलाई को मेट्रो से सफर के दौरान लगभग हर स्टेशन पर मैंने एक ही टेक सुनी ‘‘प्रदर्शन में जा रहे हैं?’’
यदि बढ़ती हुयी भीड़ प्रदर्शन की व्यापकता का एलान कर रही थी तो अनशन उसकी आग के अनवरत धधकते रहने घोषणा कर रहा था।
मैं खुद को उन अनशनकारियों के प्रति श्रद्धावनत पा रही थी जिन्होंने 23 दिनों से अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं किया था, और फिर भी असाधाण रूप से शान्त और सन्तुलित थे। उनको देखते हुये मैंने अनुभव किया कि भूख केवल भोजन की अप्राप्यता नहीं है। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उन्होंने इससे तादात्म्य स्थापित कर लिया है, एक ऐसा अनुशासन जिसने उनके शरीर, वाणी, धैर्य और आशा सबको मिलाकर एक सम्मिलित आकार दे दिया है।
बाहर, जब मैंने आस-पास खड़े लोगों से पूछा कि ऐसी कौन सी ऐसी चीज़ है जो इतने सारे लोगों को वहाँ खींच लाई है और उन्हें इससे क्या उम्मीदें हैं, एक अधेड़ का जवाब था ‘‘आजादी के शोले भड़काने वाला एर्क इंधन होता है। कभी वह तख्तनशीनों को खाक कर देता है और कभी खुद को ही स्वाहा कर देता है।’’
20 जुलाई की घटनायें निश्चय ही प्रतिरोध, बैरिकेड्स, आँसू-गैस, लाठी-चार्ज, जख़्मों, हिरासतों और प्राथमिकियों की भाषा में लिखी जायेंगी।
लेकिन एक शान्त कहानी उसी अधेड़ के कथन के साथ-साथ चलती हैः आग का धधकते रहना।
सम्भवतः वह व्यक्ति उसी प्रवृत्ति की ओर इशारा कर रहा था जिसे केगिल ने ‘प्रतिरोध की आत्मीयता’ के निर्माण के तौर पर व्याख्यायित किया है। हावर्ड केगिल ने अपने गाँधी-अध्ययन के दौरान चिह्नित किया था कि गाँधीजी जीवन में सत्याग्रह का विकास, प्रतिरोध की तकनीकी रणनीति कैसे से हुआ था। प्रतिरोध न केवल राजनीति का रूपान्तरण करता है बल्कि उस व्यक्ति को भी बदल कर रख देता है जो उसे विकसित करता है।
इसलिये चयन सिर्फ इस बात का नहीं है कि प्रतिरोध किया जाना है बल्कि इस बात को भी सुनिश्चित करना है कि दमन, हिंसा और मर्मान्तक पीड़ा के बावजूद उसे जारी रखना है। प्रदर्शन कोई एक घटना मात्र नहीं होता, यह जीवन की शर्त और पाठ भी बन जाता है।
जब लाठी चार्ज और आँसू गैस की बरसात के बीच हजारों कदम संसद की ओर कूच कर रहे थे तो उनके सामने केवल पुलिस से मुठभेड़ नहीं थी बल्कि वह उल्लेखनीय बेहतरीन आत्मसंयम भी था जिसके सहारे उन्होंने उसका सामना भी किया।
महिलाओं, बच्चों और उम्रदराज़ लोगों को बैरिकेड्स के बीच ठूँस दिया गया और जब उनपर लाठियाँ बरसाई जा रही थीं तब उन्हीं लोगों में से कुछ फूल भी बाँट रहे थे। बहुतों को हिरासत में लिया गया फिर भी कुछ लोग पुलिस-थानों से हँसते-मुस्कुराते बाहर आ रहे थे।
इतना, और भी बहुत कुछ लेकर मैं उस स्थान से बाहर आयी।
होवार्ड केगिल ने मुझे शब्द-भंडार दिया। प्रदर्शन ने मुझे उसका पाठ पढ़ाया।
‘द हिन्दू’ दिनांक 24.07.2026 से साभार
अनुवाद- दिनेश अस्थाना
फ़ीचर्ड इमेज गूगल से साभार

