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April 5, 2025
समकालीन जनमत
साहित्य-संस्कृति

कौशल किशोर की कविता में प्रतिबद्धता, संकल्पसिद्धता और निर्भीकता – प्रो सुधा उपाध्याय

‘आखर’ ई जर्नल तथा फटकन यूट्यूब चैनल की ओर से कौशल किशोर के कविता संग्रह ‘समकाल की आवाज चयनित कविताएं’ पर परिचर्चा का आयोजन रविवार को किया गया। इस कृति का प्रकाशन न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन ने किया है।

कार्यक्रम की मुख्य वक्ता कवि व आलोचक प्रोफेसर सुधा उपाध्याय (दिल्ली विश्वविद्यालय) थीं। उन्होंने कहा कि कौशल किशोर मुद्दों के कवि हैं। इनकी कविता में प्रतिबद्धता, संकल्पसिद्धता और निर्भीकता है। इनके कवि कर्म में जहाँ संघर्ष व प्रतिरोध है, वहीं मानवीय मूल्यों और स्थानीय बोध लोक जीवन को समादृत करने का भी संकल्प दिखाई देता है। मनुष्य, समाज, सृष्टि और मानवीय गरिमा इन दिनों आहत है। लगातार सामाजिक जीवन में मौजूद अनेक समस्याएं स्थाई होती जा रही हैं। अपने पूर्ववर्ती कवियों श्रेष्ठ क़लमकारों को कौशल किशोर न केवल अपनी स्मृतियों में स्थान देते हैं बल्कि वे अपने संवेदना संसार में उनके कवि धर्म को दोहराते हैं। उनसे ऊर्जा भी पाते हैं। साखी पन का भाव है। कविताएं लड़ने-भिड़ने का साहस और शक्ति देती हैं। ‘समकाल की आवाज’ इसी का दस्तावेज है।

सुधा उपाध्याय का कहना था कि हरेक रचनाकार राग-विराग की बात करता है। कौशल किशोर की कविता में जीवन का राग है। वे प्रॉब्लम एरिया को पकड़ते हैं। व्यवस्था के रेशे-रेशे की शिनाख्त करते हैं। कविता में इस दौर के बड़े उथल-पुथल चाहे वह राजनीतिक हो या सामाजिक, उसकी पड़ताल है। यहां नक्सलबाड़ी है, किसानों का विद्रोह है। जनतंत्र आहत है। उसके आवरण में अधिनायकवाद फल फूल रहा है। पुराने मूल्य जर्जर हो रहे हैं। नया उदित नहीं हो रहा है। त्रिशंकु जैसी हालत है। कौशल किशोर इस द्वंद्व को कविता में उकेरते हैं।

सुधा उपाध्याय ने कौशल किशोर की अनेक कविताओं का विवेचन-विश्लेषण किया। इस संबंध में उन्होंने ‘वक्त कविता के हमलावर होने का है’ की विशेष चर्चा की और कहा कि यह कविता राजेश जोशी की ‘मारे जाएंगे’ कविता की याद दिलाती है। यह ऐसी कविता है जिसे पाठ्यक्रम में होना चाहिए। शोधार्थियों-विद्यार्थियों को इस पर गौर करना चाहिए। ‘समकालीनता’ भी ऐसी ही कविता है जो आज के समय की क्रूरता और बुलडोजरी संस्कृति को सामने लाती है।

सुधा जी का आगे कहना था कि कविता जोखिम उठाए। कविता हमलावर हो जाए यानी अब सहने और कहने से बढ़कर आगे जूझने, लड़ने और मरने का समय आ गया है। ऐसे कूर काल को हराने के लिये हमें अपनी पक्षधरता और प्रतिबद्धता सिद्ध करनी पड़ेगी। केवल कविताई करने से बात नहीं बनने वाली। हम कलम वालों को सर क़लम करवाने का साहस व जोखिम उठाने का समय आ गया है। कौशल किशोर के लिए कविता डायरी में दर्ज करने वाली और मात्र सुनने सुनाने वाली चीज नहीं है बल्कि वह संघर्ष का हथियार है। समाज से जुड़ने और उसके बदलने का टूल्स है। वे अपनी कविता में कहते हैं – ‘यह उसके शब्दों की ताकत है कि/ मर गए और मार दिए गए लोगों के बीच भी/वह जिन्दा रहती है’ वह आगे कहते हैं कि ‘तोप चाहे जितनी मजबूत हो/ एक न एक दिन उसका मुंह बंद होता ही है /आज भी अगर कुछ करना है तो/तोप का मुंह तानाशाहों की ओर करना है/ वक्त कविता के हमलावर होने का है।’

सुधा उपाध्याय ने कहा कि जन संस्कृति मंच से जुड़े होने के कारण कौशल किशोर केवल कोरे कवि या लेखक साहित्यकार नहीं हैं बल्कि इनकी चिंता चिंतन से बदल जाती है जब ये ज़मीनी तौर पर व्यवहार जगत में भी मज़दूरों, किसानों, जल-जंगल-ज़मीन से जुड़ाव महसूस करते हुए अपनी संचेतना को जनचेतना से जोड़ लेते हैं। पूरी स्पष्टता से अपनी बात को वही कवि कह सकता है जो सत्ता व्यवस्था से निर्भीक है जो ईमानदारी से जन संस्कृति, जनचेतना और जन सरोकार से जुड़ी हुई कविताएँ करता हो।

इस अवसर पर कौशल किशोर ने अपनी रचना प्रक्रिया और साहित्य यात्रा के बारे में बताया। उन्होंने दिनकर जी को याद किया और कहा कि उन्होंने तटस्थता के विरुद्ध पक्षधरता की बात की थी। यह समय है जब मनुष्य को मनुष्य विरोधी तथा समाज को समाज विरोधी बनाया जा रहा है। संविधान, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है, ऐसे समय में कवि व लेखक से हस्तक्षेप की उम्मीद की जाती है। वर्तमान में उसे तय करना है कि वह किसके साथ है और किसके विरोध में है। कौशल किशोर ने संग्रह से ‘समकालीनता’, ‘दुख बहस के बीच’, ‘कनेरी की आंखें’, ‘मैं और मेरी परछाई’, ‘अनन्त है यात्रा’ आदि कविताओं का पाठ किया।

कार्यक्रम की संयोजक ‘आखर’ की संपादक प्रोफेसर प्रतिभा मुदलियार (मैसूर विश्वविद्यालय) थीं। सभी का स्वागत करते व कार्यक्रम का उद्देश्य बताते हुए उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से हम उत्तर व दक्षिण के बीच सेतु बनाना चाहते हैं। उनका कहना था की कविता का मूल सरोकार मानवता है और यह कौशल किशोर की कविताओं के केंद्र में है। यहां किसानों का विद्रोह है तो जीवन के तमाम उतार चढ़ाव है। कविता क्रूर काल में जानोपयोगी मूल्यों को सामने लाती है। इस भौतिक जगत के कुछ नए प्रश्नों को उकेरती है। इन्होंने माना है कि जीवन यथार्थ बदलने से कविता की जमीन भी बदलती है। कविता समकाल के प्रश्नों से रुबरु है। इनमें सामाजिक विमर्श है।

कार्यक्रम का संचालन गौरी वत्स ने किया और ‘आखर’ की कार्यकारी संपादक डॉ शोभना ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस मौके पर कवि-कथाकार डॉ रेनू यादव भी मौजूद थीं। हिंदी के प्रतिष्ठित कवि और गद्यकार दिविक रमेश और कवि व लेखक डॉ अवन्तिका सिंह ने अपनी टिप्पणियों से आयोजन को समृद्ध किया। डॉ शशिभूषण मिश्र को भी शामिल होना था लेकिन नेटवर्क की दिक्कत के कारण वे नहीं जुड़ पाए।

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