समकालीन जनमत
जनमत

नेहा बोरा : वामपंथी छात्र आंदोलन के उभार में एक नई रणनीतिक कड़ी

विजयशंकर चतुर्वेदी

भारत में किसी व्यक्ति के सार्वजनिक उभार को समझने का सबसे आसान तरीका है उसे किसी ऐतिहासिक नायक या नायिका के समकक्ष रख देना। किसी साहसी महिला को रानी लक्ष्मीबाई कह दिया जाता है, किसी जनांदोलन के चेहरे में जयप्रकाश नारायण दिखाई देने लगते हैं, कोई तर्क-वितर्क में माहिर हो तो उसे अफलातून कह दिया जाता है। मगर प्रशंसा के इन त्वरित रूपों में एक समस्या है: ये पहचान बना रहे उस व्यक्ति की अपनी यात्रा को ढँक देते हैं। उसकी मेहनत, वैचारिक तैयारी, संगठनात्मक अनुभव और संघर्ष से अर्जित क्षमता की पड़ताल करने के बजाय हम उसे पहले से निर्मित किसी बड़ी छवि में घोल देते हैं। नेहा बोरा के उभार को भी इस आसानी व प्रलोभन से बचकर समझने की जरूरत है।

आज जनता की निगाह में नेहा बोरा सिर्फ एक छात्र संगठन की पदाधिकारी नहीं रह गईं। वह उन युवा राजनीतिक चेहरों में शामिल हो चुकी हैं जिनकी उपस्थिति समग्र राष्ट्रीय विपक्ष की राजनीति में दमक रही है। नेहा के इस उभार और स्वीकृति का एक दृश्य खास तौर पर ध्यान खींचता है। 12 अक्टूबर को जब इंडिया गठबंधन के नेता मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय की ओर कूच कर रहे थे, तब सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ट्रक के ऊपर थे और नेहा बोरा उनके पास खड़ी हुई थीं। अखिलेश ने ट्रक के नीचे खड़े कार्यकर्ताओं से वामपंथी झंडा उठवाकर नेहा की ओर बढ़ाया और उन्होंने अहसानमंद होते हुए उसे पूरी गरिमा के साथ थाम लिया। दृश्य छोटा था, लेकिन उसका राजनीतिक अर्थ बहुत बड़ा था। इसी तरह जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी पैलेट गन का शिकार हुए युवक को देश की जनता के सामने लाइव पेश कर रहे थे तो हम सबने देखा कि नेहा उनके ठीक बगल में प्रमुखता से खड़ी हुई हैं। लेकिन छवि में हुए इस परिवर्तन का अर्थ समझने के लिए केवल जंतर-मंतर का आंदोलन देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि नेहा की इतनी विशाल सार्वजनिक पहचान बनी कैसे, उनके आंदोलन की वास्तविक जमीन क्या है और उनके नेतृत्व में ऐसी कौन-सी विशेषताएँ हैं जिन्होंने उन्हें व्यापक ध्यान के केंद्र में ला दिया है।

नेहा बोरा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में थिएटर और परफॉर्मेंस स्टडीज़ की शोधार्थी तथा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। आइसा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन का छात्र संगठन है। नेहा के राजनीतिक विकास की पृष्ठभूमि में दिल्ली विश्वविद्यालय के दिनों का थिएटर, नारीवादी विचारों से परिचय और फिर छात्र राजनीति से जुड़ाव शामिल है। यह विवरण महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि उनका सार्वजनिक व्यक्तित्व किसी एक रील, वायरल भाषण या अचानक मिले राजनीतिक अवसर का परिणाम नहीं है। उसके पीछे संगठन, छात्रों के मुद्दों को लेकर अनवरत संघर्ष और वैचारिक प्रशिक्षण का एक सुगठित क्रम रहा है।

जंतर-मंतर पर परीक्षा में अनियमितताओं, प्रश्नपत्र लीक, भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं की अव्यवस्था के विरुद्ध इस वर्ष चले आंदोलन ने उन्हें पहली बार देशव्यापी पहचान दिलाई। बेरोज़गारों के इस आंदोलन का आरंभिक चेहरा कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और सोनम वांगचुक जैसे नाम थे। लेकिन आइसा के कार्यकर्ताओं ने भी वहाँ तम्बू गाड़ कर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल रोप दी। सारा ध्यान वांगचुक पर केंद्रित था, सीजेपी के नेतृत्व को लेकर आशंकाओं का बाजार गर्म था। लेकिन आइसा की हड़ताल अपने मुद्दों पर अडिग रही। बाद में नेहा बोरा ने स्वयं मीडिया को बताया कि जब दूसरे तरीकों से माँगें उठाने के बाद भी परिणाम नहीं निकला, तब भूख हड़ताल को विरोध के एक और तरीके के रूप में अपनाने का निर्णय हुआ। सबने देखा कि वांगचुक को अस्पताल ले जाकर मौसमी का जूस पिला दिया गया, सीजेपी के नेता अकेले ही स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से मिलने पहुँच गए। लेकिन सरकार ने आइसा के अनशन को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की। इसके बावजूद नेहा ने जून-जुलाई के दौरान 23 दिन की भूख हड़ताल जारी रखी। आठ किलो वजन घट जाने और अस्पताल में भर्ती होने के बावजूद वे अपनी माँगों से नहीं डिगीं। उन्होंने दिखा दिया कि वह किस धातु की बनी हैं।

इसी मोड़ से नेहा बोरा की भूमिका केवल भाषण देने वाले छात्र नेता से अलग हो जाती है। किसी आंदोलन में भीड़ जुटने के बाद मंच पर शेखी बघारना और दहाड़ना एक बात है; जब समर्थन कम हो, परिणाम अनिश्चित हों और सत्ता की ओर से सहानुभूति की जगह धमकियाँ मिलें, तब अपने साथियों के साथ डटे रहना दूसरी बात। भूख हड़ताल का राजनीतिक महत्त्व उसके शारीरिक कष्ट में नहीं होता। वह नैतिक प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है जिसे हड़ताली की भूख सार्वजनिक जीवन के सामने रखती है। नेहा की पहचान का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा उसी निरंतरता से बना। यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि नेहा ने उस पूरे आंदोलन को अपने कंधों पर थाम लिया, या अकेले दम पर उसे किसी अंजाम तक पहुँचा दिया। किसी जनांदोलन की उपलब्धि अनेक संगठनों, कार्यकर्ताओं, प्रभावित लोगों और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के सम्मिलित प्रभाव से बनती है। लेकिन यह भी उतना ही गलत होगा कि किसी आंदोलन में लगातार काम करने वाले व्यक्ति की भूमिका को केवल उसकी संगठनात्मक पहचान बताकर छोटा कर दिया जाए। नेहा के मामले में इस दूसरे पक्ष पर ध्यान देने की जरूरत है।

वामपंथी छात्र संगठन से जुड़े होने के कारण नेहा को लंबे समय तक एक खास वैचारिक खाँचे में रखकर देखा गया। लेकिन किसी संगठन की विचारधारा से असहमति और उसके कार्यकर्ता की सार्वजनिक भूमिका का मूल्यांकन दो अलग बातें हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में किसी व्यक्ति की विश्वसनीयता का प्रश्न इस बात से तय नहीं हो सकता कि वह किस विचारधारा से आता है; यह भी देखना होगा कि वह किन माँगों को उठाता है, उनके लिए किस तरह काम करता है और अपने तर्कों को कितनी स्पष्टता से सार्वजनिक करता है।

पहले भी वामपंथी नेता बड़े संघर्ष करते थे, कुरबानियाँ देते थे, निर्भीकता से सवाल उठाते थे और संगठन की मजबूती के लिए लगातार काम करते रहे। लेकिन स्वीकारना होगा कि बीते कुछ दशकों से उन्हें व्यापक स्वीकृति नहीं मिल पा रही थी। नेहा को अक्रॉस द बोर्ड स्वीकार्यता मिल रही है—महिलाओं और छात्रों से लेकर उनके माता-पिता तक, मध्यम वर्ग से लेकर हर किस्म के बेरोज़गारों तक। इसका एक बड़ा कारण यह है कि उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे—परीक्षाओं की विश्वसनीयता, भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता, शिक्षा तक समान पहुँच और रोज़गार के अवसर आदि, किसी एक वर्ग या विचारधारा तक सीमित नहीं हैं। ये सवाल आज लगभग हर परिवार की चिंता बन चुके हैं। और अब तो चुनाव प्रक्रिया को साफ-सुथरा बनाने का बेहद संवेदनशील मुद्दा भी जुड़ चुका है। इसलिए विचारधारा दूरी पैदा करने वाला प्रमुख कारक नहीं रह गई।

नेहा को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाले विरोध प्रदर्शनों की घोषणा करने वाले समूह में भी शामिल किया गया। फिर वह संयुक्त विपक्ष की प्रेस कांफ्रेंस का प्रमुख स्वर बनीं। इसका अर्थ यह नहीं कि विपक्ष ने उन्हें अपना नेता मान लिया है या उनके नेतृत्व में कोई सर्वमान्य राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा हो चुका है। अधिक सावधानी से कहें तो यह बताता है कि नेहा की सार्वजनिक उपस्थिति अब उन राजनीतिक सीमाओं को पार कर रही है जिनके भीतर छात्र संगठनों को सामान्यतः देखा जाता रहा है। बड़े दलों के नेताओं का किसी छात्र कार्यकर्ता के साथ एक ही मंच या दृश्य में आना अपने आप में उस कार्यकर्ता की लोकप्रियता का अंतिम प्रमाण नहीं होता; लेकिन यह संकेत अवश्य है कि उसके नेतृत्व और उसके आंदोलन को राजनीतिक रूप से नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं रहा।

नेहा की शख्सियत में उनकी वक्तृत्व क्षमता चार चाँद लगाती है। वह हिंदी में तो तीखी और सीधी बात रखती ही हैं; अंग्रेज़ी में प्रभावी संवाद करने की उनकी क्षमता उन्हें उस ऑडियंस और उन मंचों तक पहुँचने में मदद करती है जहाँ छात्र राजनीति, विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय राजनीति के प्रश्नों पर व्यापक बहस होती है। भारत जैसे विशाल और बहुभाषी देश में यह द्विभाषी कुशलता कोई छोटी बात नहीं। उत्तर हो या दक्षिण, पूर्व हो या पश्चिम, मध्य भारत हो या तटीय क्षेत्र—समझने के लिहाज़ से हिंदी और अंग्रेज़ी मिलकर लगभग पूरे देश को कवर कर लेती हैं। नेहा बोरा की आवाज़ वामपंथी आंदोलन और मौजूदा छात्र आंदोलन के लिए एक ऐसी ताकत बन गई है जो देश के कोने-कोने तक केवल पहुँचती ही नहीं, बल्कि समझी भी जा रही है। यह अपने आप में वामपंथी आंदोलन के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। अंग्रेज़ी में उनकी प्रवीणता का एक और रणनीतिक महत्त्व है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया आमतौर पर हिंदी या क्षेत्रीय भाषा के वक्तव्यों को अनदेखा कर देता है, भले ही मुद्दा कितना भी बड़ा क्यों न हो, नेता चाहे जितना धुरंधर हो। लेकिन जब नेहा अंग्रेज़ी में लोकतंत्र के खतरे, संस्थाओं के क्षरण और युवाओं के अधिकारों की बात करती हैं, तो वह सामग्री अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँच जाती है। यह केवल उनकी व्यक्तिगत छवि का मामला नहीं। लोकतंत्र के संकट का मुद्दा वैश्विक है, और उनकी वक्तृत्व क्षमता उस मुद्दे को विश्व स्तर पर साझा करने का प्रभावी माध्यम बन गई है।

एक वक्ता के रूप में उनकी यह भूमिका वामपंथी आंदोलन और छात्र संघर्ष की एक वास्तविक परिसंपत्ति है। भाषण का मूल्य केवल आवाज़ की ऊँचाई या आक्रामक शब्दावली से नहीं आँका जाना चाहिए। उसकी असली कदर इस बात से होती है कि वक्ता अपने प्रश्नों को कितनी स्पष्टता से रखता है, श्रोताओं को उनसे जोड़ पाता है या नहीं और विरोध के बीच अपने तर्क को कायम रख पाता है या नहीं। और सबसे बड़ी बात, उसके मुँह से निकली बात कितनी दूर तक जाती है। नेहा की बेमिसाल सार्वजनिक वक्तृता का मूल्यांकन इसी कसौटी पर होना चाहिए।

हम जानते हैं कि नेहा बोरा किसी असाधारण पृष्ठभूमि से नहीं आतीं। उनकी परवरिश आम बच्चियों की तरह ही हुई है। लेकिन दक्षिणपंथी मीडिया लगातार उनके परिवार में झगड़े की कहानियाँ गढ़ता और प्लांट करता रहता है। कभी फैलाता है कि नेहा के पिता उनसे सख्त नाराज हैं, क्योंकि वे सरेआम गालियाँ बक रही हैं, किसी की इज्जत नहीं करतीं वगैरह। ये कहानियाँ ध्यान भटकाने और व्यक्तिगत स्तर पर हमला करने की कोशिशें हैं। आंदोलन से निकला हुआ कार्यकर्ता व्यापक समाज के उद्देश्यों को ज्यादा तवज्जो देता है। व्यक्तिगत प्रतिबंधों, फैमिली ड्रामा और इस तरह के ध्यान भटकाव से प्रभावित होना उसकी फितरत नहीं होती।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विरुद्ध गोरखपुर में की गई नेहा बोरा की तीखी टिप्पणियों ने विशेष ध्यान खींचा था। दक्षिणपंथी सत्ताधारियों की यह रणनीति रही है कि मूल मुद्दे को शब्दों की तीक्ष्णता तक सीमित कर देने से उसके राजनीतिक संदर्भ की उपेक्षा अपने आप हो जाएगी। उस भाषण की भाषा पर भी आपत्तियाँ उठीं। पुलिस में शिकायतें भी की गईं। उनकी बौखलाहट समझी जा सकती है, क्योंकि गोरखपुर आदित्यनाथ योगी का दुर्ग है। उसमें घुसकर उनकी कार्यप्रणाली पर सार्वजनिक प्रश्न उठाना एक जोखिम भरा कदम था। परंतु सत्ता के सबसे मजबूत गढ़ में जाकर उससे सवाल पूछने और ललकारने का अधिकार नेहा को महत्त्वपूर्ण लगा।

यहाँ यह समझना जरूरी है कि नेहा की बातों का तीखापन कोई अचानक निकली भड़ास नहीं थी। यह आंदोलन को सीढ़ी-दर-सीढ़ी आगे बढ़ाने वाले उस प्रशिक्षण का परिणाम था जो वामपंथी छात्र आंदोलन लंबे समय से अपने कार्यकर्ताओं को देता आया है। नेहा और उनके साथी समझते हैं कि उनका मुकाबला किन दैत्यों से है। वे जानते हैं कि इन ताकतों से लड़ने के लिए कदम-दर-कदम कैसे आगे बढ़ना है। बीच में अगर कोई मुश्किल आती है—हिरासत हो, भूख हड़ताल हो या धमकियाँ, तो उस मुश्किल से निकलकर आगे कैसे जाना है।

जंतर-मंतर में मिली शारीरिक दुर्बलता के बावजूद नेहा ने जेन-ज़ी के देशव्यापी दौरे का कार्यक्रम बना लिया। मुंबई के एनसीपीए में जो कार्यक्रम हुआ, उसमें अभूतपूर्व भीड़ उमड़ पड़ी। फिर प्रयागराज और लखनऊ में भी इसी तरह के कार्यक्रम आयोजित हुए। ये कार्यक्रम महज भाषणों की श्रृंखला नहीं थे। ये आंदोलन की जमीन को विस्तृत करने, नए क्षेत्रों में संपर्क बढ़ाने और अपनी माँगों को व्यापक जनसमर्थन से जोड़ने की व्यवस्थित कोशिश थे। यह क्रम बताता है कि नेहा ने अपने नेतृत्व को किसी एक स्थान या घटना तक सीमित नहीं रखा। वह लगातार नए मोर्चे खोलती चली जा रही हैं। इसी क्रम में सितम्बर के राँची छात्र आंदोलन का जिक्र भी जरूरी है। वहाँ का आंदोलन कुछ लोगों द्वारा सत्ता-प्रायोजित बताकर छात्रों को बाँटने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन नेहा ने इसे छोटे-मोटे मतभेदों का प्रश्न नहीं बनने दिया।

आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते उन्होंने एक बार भी यह नहीं सोचा कि आंदोलन का नेतृत्व कौन कर रहा है। यह भावना उनके लिए निर्णायक रही कि छात्र आखिर छात्र ही होते हैं। वे राँची पहुँचीं और वहाँ सत्ता के टट्टुओं ने उनके चेहरे पर स्याही फेंकी। लेकिन नेहा का किरदार उस वक्त और निखर कर सामने आया, जब उन्होंने सत्ता को सीधी चुनौती देते हुए छात्रों का संघर्ष जारी रखने का वादा किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली में पैलेट गन और लाठीचार्ज झेल चुकी हैं, इसलिए वे ऐसी किसी स्याही से नहीं डरने वालीं।

उनका यह रवैया दिखाता है कि व्यापक छात्र एकता को बनाए रखना उनके लिए विचारधारात्मक मतभेदों से ऊपर है। यह विचार-प्रक्रिया हमें यह भी याद दिलाती है कि जनआंदोलन की असली मजबूती किसी एक व्यक्ति के करिश्मे में नहीं, बल्कि उस संगठनात्मक क्षमता में होती है जो मुश्किलों के बीच भी समान लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता निकालती है। नेहा की इस भूमिका का मूल्यांकन करते समय उनकी निर्भीकता और उनके कदमों की तथ्यगत कसौटी, ये दोनों बातें साथ रखनी होंगी। नेहा और उनके साथियों की गतिविधियाँ भी यही बताती हैं कि नेतृत्व केवल मंच पर भाषण देने का नाम नहीं; वह बदलती परिस्थितियों में संगठन को सक्रिय बनाए रखने की क्षमता भी है। उनके वर्तमान आंदोलन की माँगें किसी एक दल, संगठन या व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं। यह कोई आइसा का अलहदा आंदोलन नहीं था। अलग-अलग संगठनों और राजनीतिक धाराओं को एक साथ आना पड़ा है, लेकिन इस एकता को बनाए रखने के लिए जिस साझा रणनीति, स्पष्ट प्राथमिकताओं और निर्णय लेने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जरूरत थी, वह नेहा की दृष्टि में साफ नज़र आ रही है।

नेहा को करीब से जानने वाले बताते हैं कि उनका जीवन सादगी से भरा हुआ है—साझा जगह में रहना, रोज़मर्रा के कामों में हाथ बँटाना और कार्यकर्ता के रूप में जीवन को किसी विशेष सुविधा या प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाना। हम जानते हैं कि राजनीतिक विचारधारा का वास्तविक परीक्षण मंच पर बोले गए शब्दों से नहीं, रोज़मर्रा के व्यवहार से होता है। समानता की बात करने वाले व्यक्ति के जीवन में यदि बराबरी, साझेदारी और श्रम के प्रति सम्मान दिखाई देता है, तो वह उसके विचारों को विश्वसनीयता देता है।

अक्टूबर 2026 में चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली में बार-बार हिरासत, बैरिकेड पार करने और पुलिस के साथ झड़प के बावजूद वे सड़क पर लौटती रही हैं। लेख में वर्णित सभी घटनाएँ उनकी उस ज़िद, निर्भीकता और साहस को रेखांकित करती हैं जो शारीरिक जोखिम, हमले और सत्ता के दबाव के बावजूद उन्हें पीछे हटने नहीं देता। नेहा बोरा की अब तक की यात्रा याद दिलाती है कि नेतृत्व क्षमता केवल पद, पारिवारिक विरासत या चुनावी संसाधनों से पैदा नहीं होती। वह अध्ययन, वैचारिक प्रशिक्षण, सांगठनिक कार्य, सार्वजनिक कार्यभार और ज़मीनी समस्याओं के साथ निरंतर जुड़ाव से विकसित होती है। किसी युवा नेता की उपलब्धि को स्वीकार करने का एक तरीका उस प्रक्रिया को समझना है जिसने उसे यहाँ तक पहुँचाया। नेहा बोरा के उभार को भी इसी कसौटी पर कसा जाना चाहिए— संगठन के बल पर स्वयं के विकास, अपनी सीमाओं और समकालीन समय की वास्तविक राजनीतिक चुनौतियों के बीच।

 

 

(हिंदी के कवि-कथाकार, पत्रकार और वैचारिक लेखक विजय शंकर चतुर्वेदी तीन दशक से अधिक समय से साहित्य और मीडिया में सक्रिय हैं। उनका लेखन तकनीक, साहित्य, राजनीति और समाज के अंतर्संबंधों की पड़ताल करते हुए सत्ता से प्रश्नाकुल संवाद और नागरिक विवेक की सक्रियता पर बल देता है। उनकी रचनाएँ पहल, वसुधा, वागर्थ, लमही, आजकल, वर्तमान साहित्य, समालोचन, बनास जन सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। वे मुंबई में जनसत्ता के संपादकीय टीम का हिस्सा रहे हैं। संपर्क-ईमेल: vijaysshankarchatturvedi@gmail.com)

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion