( भानु कुमार दुबे ‘मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी’ एक तरक्कीपसंद शायर रहे हैं। उनका जन्म 26 सितंबर 1953 को हुआ था। दो साल पहले 28 जनवरी 2023 को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। अपने उतार-चढ़ाव भरे जीवन में उन्हें तीन बार मानसिक चिकित्सालय में भर्ती होना पड़ा था। एक बार वह टीबी में ऐसे मुब्तिला हुए कि सेकंड स्टेज तक पहुँच गए थे पर यह उनकी जिजीविषा ही थी जिसके चलते वह इन सारी बाधाओं को पार करते हुए अपना लेखन जारी रख सके। भाकपा(माले) के वह समर्पित कार्यकर्ता थे। छपने-छपाने के मामले में वह बेहद संकोची रहे इसलिए उनका केवल एक ग़ज़ल संग्रह ‘सांस्कृतिक संकुल’ से “क़तरे की रवानी” नाम से प्रकाशित हो सका। लेखक, अनुवादक दिनेश अस्थाना ने संस्मरण की इस शृंखला में बहुत डूब कर अपने यार ‘मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी’ को याद किया है। )
1997 में मैं इलाहाबाद आ गया था। 1998 में मेरे घर में फोन लग गया था। अब मेरी भानु से नियमित बातें हो जाती थीं। 2004 के किसी माह में मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है, भानु का फोन आया कि भाभी के गर्भाशय का ऑपरेशन हुआ है। तब तक यह सामान्य बात हो चुकी थी। मेरे संज्ञान में ऐसे कई मामले पहले भी आ चुके थे। लेकिन उसके कुछ दिन बाद जब फिर फोन आया कि उनकी तबीयत सँभल नहीं रही है, सेहत दिन-ब-दिन गिरती जा रही है तो मैंने तुरंत कहा कि उन्हें लेकर इलाहाबाद आ जाओ। मैं उनका इलाज़ करवा दूँगा। अगले दिन वे लोग आ गये।
उन दिनों सेंट मैरीज़ कान्वेन्ट के सामने डा0 सुमित सचदेवा की क्लीनिक थी। मेरी बेटी तूलिका ने बताया था कि वह अच्छे डाक्टर हैं। प्रणय जी और कुमुदिनी जी भी उनके पास जाते हैं। मैं भी उनके पास जाने लगा था इसलिये भाभी को भी वहीं ले गया। बहुत सलीके वाले डाक्टर थे। मरीज़ों को अप्वाइंटमेंट देते समय वह टाइम-स्लाॅट भी दे दिया करते थे। इसलिये लोगों को उनके यहाँ कम से कम इन्तज़ार करना पड़ता था। उस समय उनकी फीस केवल 50 रुपये थी। उन्होंने भाभी की सारी रिपोर्टें देखीं, फिर उन दोनों को बाहर भेज दिया और मुझे रोक लिया। मुझसे उन्होंने कहा कि यह केस मेरा नहीं डा0 दीपक मित्रा का है, वह प्रीतम नगर में रहते हैं। वहीं ले जाइये और अपने सहायक से कहा कि वह मेरे पैसे वापस कर दे। मेरे लिये डाक्टर का यह व्यवहार एकदम अनोखा था। न तो किसी डाक्टर ने इसके पहले एक बार जमा पैसे वापस किये थे और न ही बाद में किसी ने किया।
भानु और भाभी को वहीं एक ऑटो में बैठाया और मैं पीछे-पीछे स्कूटर से चलने लगा। ऑटो बहुत तेज जा रहा था और मैं इत्मीनान से चलने का अभ्यस्त था। फिर भी कोशिश करके उसका पीछा कर रहा था। कैंटूनमेंट एरिया में मज़ार के पास अचानक एक गड्ढा आ गया और मैं उसे देख नहीं सका। स्कूटर समेत मैं गड्ढे में गिर पड़ा, पर मेरे ऊपर तो कुछ और ही धुन सवार थी, मैं जल्दी से उठा और स्कूटर स्टार्ट करके फिर ऑटो के पीछे लग लिया।
गहन जाँच के बाद डा0 मित्रा ने कोई टेस्ट लिखा, कोई विशेष टेस्ट रहा होगा क्योंकि उसके चार्जेज़ तब ही मुझे बहुत अधिक लगे थे। टेस्ट वहीं प्रीतम नगर में हुआ था, किसी डाक्टर ने खुद किया था। मुझे इस समय न तो उस टेस्ट का नाम याद आ रहा है और न ही डाक्टर का। बहरहाल डाक्टर ने मुझे रिपोर्ट के लिये अगले दिन बुलाया था। दूसरे दिन जब मैं वहाँ गया तो डाक्टर ने मरीज़ से मेरे रिश्ते के बारे में पूछा। मैंने बताया कि वह मेरी भाभी हैं तो उन्होंने बताया कि यह कैन्सर का केस है, कन्फर्मड। मैं अवाक रह गया। कैन्सर उस समय तो लाइलाज़ था ही, जो लोग इलाज़ में करोड़ों रुपये नहीं फूँक सकते उनके लिये आज भी लाइलाज़ ही है। डाक्टर का कहना था कि मिर्जापुर में जब उनकी सर्जरी हुयी थी तो बायाप्सी नहीं करायी गयी थी। यदि उस समय यह सावधानी बरत ली गयी होती तो सम्भवतः इलाज़ हो जाता, अब तो कैन्सर पूरे शरीर में फैल चुका था, इलाज़ लगभग नामुमकिन था पर अपने मरीज़ को छोड़कर भाग तो नहीं सकते थे। इसलिये उन्हें कमला नेहरू अस्पताल में भर्ती करा दिया गया।
कीमोथिरैपी शुरू हो गयी। पहली कीमो के बाद ही उनका रूप-लावण्य मद्धिम पड़ने लगा, शरीर गलने लगा। दूसरी कीमो के बाद उनके काले-घने बाल झड़ने लगे। तीसरे कीमो के बाद उनके पूरे बाल झड़ गये। यह सिलसिला चलता रहा और छठवाँ कीमो होते-होते तो यह हाल हो गया कि मैं जब अपनी पत्नी को लेकर उन्हें अस्पताल में देखने गया तो उन्हें बिस्तर में ढूँढना पड़ रहा था कि वह हैं कहाँ। वह बिस्तर के एक कोने में गठरी बनी पड़ी थीं। भानु के घरवाले जानते थे कि भानु के लिये यह सब देखना घातक हो सकता है, इसलिये उन्हें वापस मिर्जापुर भेज दिया गया। भाभी की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी मंटू ने निभाई।
जब कोई अपना जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा हो तो सारी तार्किकता धरी की धरी रह जाती है। ‘मरता क्या न करता’ की स्थिति थी, मंटू भाभी को लेकर बाबा रामदेव के पतंजलि आश्रम हरिद्वार पहुँच गये। रामदेव ने जो भी सुझाया, मंटू ने पूरी लगन से किया। कभी -कभी उम्मीद की हल्की सी किरण दिखायी देती लेकिन फिर हालत जस की तस। मिर्जापुर में भानु अपनी पत्नी की सेवा पूरे मनोयोग से कर रहा था।
हालत बहुत ज्यादा खराब हो जाने पर उन्हें फिर कमला नेहरू अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस बार भानु को नहीं आने दिया गया, केवल मंटू और भानु के बेटे मिंकू आये थे। साथ में मुहल्ले के दो-तीन लड़के और भी थे। मैं भी पहुँच गया था। आखिर तीसरे दिन भाभी ने अपनी अन्तिम साँस ले ली।
ग़ज़ब जीवट था भानु का। अन्तिम संस्कार के अगले दिन जब मैं मिर्जापुर गया तो उसे एकदम सामान्य पाया। सबकुछ मशीनी ढंग से चल रहा था। लेकिन जो जब भानु के सीने में था वह बाद के दिनों में उसके फोन काल्स में बराबर दिखता था। भाभी की चर्चा वह हमेशा करता रहा, अपनी आखिरी साँस तक।

