रज्जब अली: कहानी: हेमंत कुमार

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रज्जब अली तेज कदमों से गेहूँ की सीवान के बीच से मेंड़ पर सम्हलते हुए नदी के पास कब्रिस्तान की तरफ बढ़े जा रहे थे। आज के सिवा इसके पहले वह आहिस्ता-आहिस्ता पूरी सीवान के एक-एक खेत की फसलों का मुआयना करते, लेकिन इस वक्त उन्हें सिर्फ नजीब की अम्मी की कब्र दिखाई पड़ रही थी। उनके दिलोदिमाग में काफी उथल-पुथल मची हुई थी। दिमाग सायं-सायं कर रहा था और कलेजा रह-रह कर बैठा जा रहा था।

शाम का वक्त था और मौसम तेजी से बदल रहा था। अभी तीन रोज पहले पूरी सीवान हरी थी, लेकिन तीन दिन की तेज लू ने उसे पूरी तरह से भूरे रंग में तब्दील कर दिया था। पूरी सीवान दूर-दूर तक किसी मरुस्थल-सी लग रही थी। सीवान के एक छोर पर नदी के किनारे नीलगायों का एक झुण्ड धीरे-धीरे फसलों को रौंदता हुआ चारे की खोज में बढ़ता चला आ रहा था, जो रज्जब अली को देखकर वापस मुड़ा और सरपट भागता हुआ नदी पार कर पलाश के घने जंगल में खो गया।

वह एक छोटी नदी थी। जिसकी कोख में पानी काफी मंथर गति से आगे बढ़ रहा था। नदी के किनारे एक पुराना पीपल का पेड़ था। पेड़ के उत्तरी तरफ श्मसान और दक्षिणी हिस्से में छोटा सा कब्रिस्तान था। अभी पिछली साल सरकार ने श्मसान के लिए टिनशेड और सीढ़ियाँ बनवा दी थी, और कब्रिस्तान को चहारदीवारी से घेर दिया था। इसी कब्रिस्तान में उसकी बीवी की करीब पाँच साल पुरानी कब्र थी। रज्जब अली सीधे कब्र के पास पहुँचे। कुछ देर तक वह चुपचाप उसे कातर निगाहों से निहारते रहे। कब्र के बगल में उन्होंने झाड़ू छोड़ रखी थी। उससे कब्र को वह अच्छी तरह से साफ करके उसके बगल में बैठ गये। आज वह अपने को अन्दर से काफी कमजोर महसूस कर रहे थे। कब्र को सहलाते हुए उनको हिचकी बँध गयी। उन्हें आभास हुआ, कि कब्र में एकाएक दरार पड़ गयी है। जिसमें से नजीब की अम्मी का खूबसूरत चेहरा सामने आ गया है उसकी भूरी आँखें उनसे पूछ रही हैं, ‘‘कहो! घर का क्या हाल है?’’ वह अपने सीने को कब्र से चिपका कर फूट-फूट कर रोने लगे,‘‘मैं नहीं जाऊंगा नजीब की अम्मी! मैं अपना गाँव छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा। तुम अपने बच्चों को समझाओ कि वे भी घर न छोड़ें। अपना वतन छोड़ने पर सिवा ठोकर के ठिकाना नहीं मिलता।”

वह देर तक रोते रहे फिर एकाएक चौंक पड़े । उन्हें महसूस हुआ जैसे किसी ने उनकी पीठ पर थपकी दी हो। वह बैठकर इधर-उधर निहारने लगे। वहाँ कोई नहीं था। पीपल के पेड़ की एक छोटी डन्ठल उड़ते हुए उनकी पीठ से टकराई थी। आज उन्हें हवा की सरसराहट भी डरा दे रही थी। वह कब्र को चूमकर उठे और श्मसान की सीढ़ियों पर आकर बैठ गये।

नदी के उस पार जंगल में दूर-दूर तक पलाश के सुर्ख फूल आग की तरह दहक रहे थे। जिसके ऊपर डूबते सूरज का लाल गोला दहकते जंगल में धीरे-धीरे सरक रहा था। रज्जब अली चुपचाप उस अग्नि गर्भ को निहारते रहे। पीपल के पत्तों की सरसराहट उनके दिल में भय पैदा कर रही थी। उन्हें बार-बार लग रहा था कि श्मसान और कब्रिस्तान के ढेर सारे मृत चेहरे उनके इर्द-गिर्द बैठकर अपनी गाढ़ी पीली आँखों से पूछ रहे हैं – बोलो, गाँव का क्या हाल है ?

उसी समय जंगल के उस पार से मग़रिब की अजान की आवाज उभरी। वह आहिस्ता से उठे और नदी के पानी से वजू करके सीढ़ी पर गमछा बिछाकर नमाज अदा करने लगे।

नमाज के बाद उनका मन कुछ शान्त हुआ। अब वह वहाँ नहीं रुके। वह कब्रिस्तान पर एक नजर डालकर सीवान में वापस लौट आये ।

कब्रिस्तान जाने के बहाने वह दसवें, बारहवें दिन सीवान में ज़रूर आते । पूरी सीवान में एक अंगुल भी उनका हिस्सा नहीं था, लेकिन सबके खेतों की जानकारी उनके पास रहती। किसकी फसल अच्छी है, किसकी कमजोर है। किस खेत को खाद, पानी चाहिए। किस प्रजाति का बीज बढ़िया है, रज्जब अली को किसी कुशल किसान की तरह सब मालूम था। सीवान से लौटने के बाद वह उसकी हर खबर गाँव को देते। उस दिन सुबह से ही पुरवइया चलने लगी थी और आसमान घने बादलों से पट गया था । मौसम को देख कर रज्जब अली की निराशा ओैर बढ़ गयी। उन्होंने गेहूँ की भूरी बाल को तोड़ कर दाना निकाला और दातों से दबा दिया। दाने अभी कच्चे थे। उनके होंठ बुदबुदाए,‘‘इस साल तो फसल तूने बहुत अच्छी दी, लेकिन देकर उसे वापस मत ले लेना। किसान बेचारे बेमौत मर जायेंगे। उन पर रहम करना मेरे मालिक।’’

जिस तरह से लोग शाम को सज-संवर कर बाजार निकलते हैं उसी तरह रज्जब अली अपने गाँव और सीवान में निकलते – झक सफेद कुर्ता, चारखाने की लुंगी, टोपी, नमाजी गमछा, आंखों पर चश्मा, सफेद लम्बी दाढ़ी, महीन मूँछें, मुँह में पान, शरीर पर इत्र और हाथ में छोटी-सी छड़ी। कभी-कभी मुफलिसी भी इंसान को इतना खुद्दार बना देती है कि वह अमीरी को भी मुँह चिढ़ाने लगती है। रज्जब अली को देख कर कुछ ऐसा ही लगता। उस दिन भी रज्जब अली इसी तरह से थे। फर्क सिर्फ इतना था कि उन्होंने पान नहीं खाया था और कुर्ते पर इत्र नहीं था। वह गांव की चमरौटी की तरफ चल दिये। गांव के दक्षिणी छोर पर करीब सौ घरों की चमरौटी थी। चमरौटी जब तक बबुआन के भरोसे थी, वह भरी हुई थी। अब वह अशक्त बूढ़ों और बच्चों का बसेरा भर रह गयी थी। लड़के युवा होते ही परदेश पकड़ लिए थे, जो बचे थे वह लोगों की नजर में काहिल थे। रज्जब अली को देखते ही मंगरू दौड़ कर चारपाई लाया। और नीम के पेड़ के नीचे बिछाते हुए बोला ,’’राम-राम भइया! बैठो।’’

“राम-राम मंगरु भइया। क्या हाल है?” रज्जब अली चारपाई पर बैठते हुए बोले, “खाली बैठे हो, कोई काम नहीं है क्या?’’

‘‘ऐसा कह रहे हो भइया! जैसे तुम कुछ जानते ही नहीं हो।’’ मंगरू हंसते हुए बोला, “आज मुझे अपना बचपन याद आ रहा है। मेरे दादा कहा करते थे कि चैत महीने में जो चमार घर बैठा हो, उसके बच्चे भूखे मरेंगे। वह सही कहते थे। हम यहाँ मर रहे हैं और बच्चे परदेस में। सामने रामनवमी की पूजा है और घर में एक पैसा नहीं है। मेरे पास एक बकरा है। सोचा था कि उसी को बेचकर त्योहार के साथ अन्य खर्च भी देख लूँगा। इधर ऐसा हड़कम्प मचा कि बकर कसाई उसे खरीदने को तैयार ही नहीं हो रहे हैं। कल बबलू बाबू बोल गये कि इसे बेचना मत। नवरात्र के बाद उनके घर दावत है। उनके तेवर से तो यही लग रहा था कि वह बकरे की कीमत भी नहीं देंगे।”

रज्जब अली के माथे पर बल पड़ गये।

“ऐसी भी क्या बात है मंगरू, मेरे पास तो है! तीज-त्योहार,हारी-बीमारी के लिए मुझसे निस्संकोच ले लिया करो। आज नहीं तो कल लड़का परदेस से पैसा भेजेगा ही। बोलो कितना दे दूँ ?

‘‘अरे भइया बस समझ लो मिल गया मुझे’’ मंगरू हाथ जोड़ कर हंसते हुए बोला ‘‘जब से नोट बंदी हुई है वह भी परदेस में खाली बैठा है, मैं तो खुद उसके पेट की चिंता में डूबा हूँ। भला वह मेरे लिए क्या भेजेगा। खैर! छोड़ो इन सब बातों को। तुम कहां से आ रहे हो?”

‘‘सिवान से आ रहा हूँ। अभी गेहूं की फसल कच्ची है। मौसम रोज खराब हो रहा है। डर लग रहा है कि कहीं सब चौपट न हो जाय।’’ रज्जब अली दुखी मन से बोले ।

‘‘होने दो भइया अपना क्या जाता है?” मंगरू मुंह बिचका कर बोला, ‘‘जब उस सिवान का एक भी दाना में मयस्सर नहीं तो हम नाहक उसकी चिंता क्यों करें । जब हम उसकी बुआई-जुताई करते थे तब हमें भी उसकी चिंता हुआ करती थी। अब तो सारा काम चमरौटी के पेट पर तोप चला कर हो जाता है।”

रज्जब अली के पास कोई जवाब नही था। उनके आने की खबर धीर-धीरे पूरे चमरौटी में फैल गयी। लोग मंगरू के दरवाजे पर इकट्ठा होने लगे। रज्जब अली हफ्ते-दस रोज पर चमरौटी घूमने जरूर आते, लेकिन इससे पहले इतना कौतूहल कभी नहीं रहा। उन्हें तमाम लोग आ कर घेर लिए। औरतें अपनी गोद में बच्चे ले कर उनकी चारपाई के इर्द-गिर्द झाड़-फूंक कराने के लिए बैठ गयीं। गांव की औरतों का उन पर अटूट विश्वास था। कि जिस बच्चे को वह झाड़ दें तो वह जरूर ठीक हो जाता है।

रज्जब अली जानवरों के हादिक (वैद्य) थे। यह उनका पेशा नहीं बल्कि शौक था। पशुओं के रोग और उनके इलाज की उन्हें गजब की जानकारी थी। इसके लिए वह दूर-दूर तक मशहूर थे। वह पलाश के जंगल से तरह-तरह के पेड़ों की छाल, जड़, पत्तियां ले आकर उससे दवा बनाते। गाय, भैंस के पेट में फँसे बच्चे निकालते। वे सावन-भादों की रात या जेठ की दुपहरिया की परवाह नहीं करते। उसूल के इतने पक्के थे कि जिसके घर इलाज करने जाते उस दिन उसके घर का पानी तक पीना हराम समझते। अपने गांव-इलाके में उनका सम्मान था। इसी सम्मान से लोग उन्हें रजबल्ली चाचा या भाई कहते थे, यही उनके जीवन भर की कमाई थी जिससे वह संतुष्ट थे।

उन्हीं रज्जब अली को लोग किसी अजूबे की तरह निहार रहे थे। रज्जब अली को लगा कि कब्रिस्तान-श्मसान के सारे प्रेत उनके पीछे चले आकर यहां बैठे सभी लोगो के शरीर में समा गये हैं। वह एकाएक मुस्कुराए और बातों का सिलसिला शुरू किया,‘‘अरे भाई ललसू! तुम लोग तो ऐसे मनहूस बैठे हो मानो मेरा अभी जनाजा निकलने वाला है।”

‘‘भगवान न करे कि हमसे पहले आपका जनाजा निकले भैया’’ ललसू दोनों हाथों से सिर पकड़ कर बोला, “यही मन कह रहा है कि परिवार समेत नदी में जाकर डूब मरुं। अब इस गांव मे रहने लायक नहीं है।”

“क्या हुआ। कुछ बताओ भी”

“जो हमारे बाप दादों के जमाने से नहीं हुआ, वह अब होने वाला है।” ललसू ने पूरी बात बताना शुरू किया, “कल शाम को मिण्टू बाबू सिर पर नौरंगिया गमछा बांधे दो अजनबी लोगों के साथ बुलेट से दनदनाते हुए मेरे दरवाजे पर आये। वे लोग कुछ रंग में भी लग रहे थे । वह कड़क आवाज में बोले- कल अरहर काट कर मेरे दरवाजे पर पहुँच जानी चाहिए। मैंने सिर्फ इतना ही कह दिया, बाबू घर की सारी परानी बुखार से चारपाई पकड़ ली हैं। कोई रोटी बनाने वाला भी नहीं बचा है । मैं माफी चाहता हूँ। आप किसी और से कह दें। इतना सुनते ही वह भड़क गये । मेरी बहू बेटी के सामने ही मुझे मेरे बाप का नाम लेकर फूहर गाली देने लगे, और जाते-जाते धमकी भी दे गये – मेरी बात को इन्कार करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे पड़ी तुम्हें तो पता ही होगा कि आज भी पूरी चमरौटी बबुआन के कागज में है। चमरौटी इस बात को अच्छी तरह से समझ ले कि अब सरकार हमारी आ गयी है। चमरौटी को उजाड़ने में हमें एक पल भी नही लगेगा। अब तुम ही बताओ रजबल्ली भइया हमारे धरम में तो चिरई का खतोना भी उजाड़ना पाप है और ये पूरी चमरौटी को ही उजाड़ने की बात कर रहे हैं। आखिर इनका धरम क्या है? मेरी भी उमर हुई । मैंने भी कई सरकारें देखी हैं। आखिर उनकी कौन-सी ऐसी सरकार बन गयी कि दो दिन में ही बाबू साहेब अपने बाप-दादा का भी दीन-धरम सब भूल गये?

रज्जब अली अपना चेहरा झुकाकर चुप-चाप जमीन पर छड़ी से आड़ी-तिरछी रेखाएं बनाने लगे। वहां सन्नाटा पसर गया। वह एक झटके से उठे और चुपचाप चमरौटी से बाहर चल दिए।

कुछ दूर चलने के बाद उन्हें कुछ आभास हुआ। गर्दन पीछे घुमाकर देखा तो पूरी चमरौटी चुपचाप उनके पीछे चली आ रही थी। वह रुक गये और बोले, “अरे तुम लोग कहां चले आ रहे हो? क्या मेरा जनाजा निकला है?”

भीड़ खामोशी से खड़ी हो गयी। उनकी आँखें उनसे बार-बार पूछ रही थीं – क्या तुम भी गाँव छोड़कर चले जाओगे?

“क्या तुम लोग अपनी बस्ती से आज मुझे हमेशा के लिए विदा कर रहे हो?” रज्जब अली मुस्कराते हुए बोले, “मैं फिर आऊंगा। मैं बार-बार आऊंगा। तुम लोग मुझे धक्के भी दोगे तो भी मैं आऊंगा।”

भीड़ की आँखें भरभरा उठीं। रज्जब अली का गला रुँध गया, “मैं अपना गाँव छोड़कर नहीं जाऊंगा …..किसी भी कीमत पर नहीं जा सकता। मैंने इस माटी में जनम लिया है। गाँव के किस्से-लोरियाँ सुन-सुनाकर जीवन बिताया है। गाँव के सुख-दुःख में भागीदार रहा हूँ। मैंने अपनी जिंदगी में तमाम अभाव देखे लेकिन सारे अभाव गाँव की मोहब्बत के नीचे दब गये। अपने ही गाँव की नहीं, पूरे इलाके की मोहब्बत मेरी रगों में बसी है। इस मोहब्बत को छोड़कर मैं और कहीं नहीं जा सकता। अल्लाह की खैर रही तो मैं फिर तुम्हारी बस्ती में जरूर आऊंगा। जाओ, अब लौट जाओ।”

रज्जब अली एक झटके से मुड़े और तेज कदमों से बबुआन की तरफ चल दिये। कुछ देर तक चमरौटी उन्हें जाते देखती रही फिर वह धीरे-धीरे वापस लौट गयी।

चमरौटी से लगभग एक फर्लांग दूर उत्तर-पूर्व दिशा में करीब साठ घरों का बबुआन था। बबुआन से सटे दक्षिणी किनारे पर नाई, बढ़ई, कहार, कुम्हार, बारी आदि तीस घरों की परजौटी थी। उसी से लगे पश्चिम तरफ बीस घरों की जुलाहा बस्ती थी। जिसमें पाँच घर चुड़िहार और तीन घर धोबी भी थे। पूरी जुलाहा बस्ती में सिर्फ रज्जब अली और सुलेमान मियां ही अपना पुश्तैनी धन्धा करते थे। पिछले बीस-पच्चीस सालों से जब करघे ने उनका पेट पालना बन्द कर दिया तो बाकी जुलाहे दूसरा धन्धा करने लगे।

बबुआन में घुसने से पहले बहुत बड़ा मैदान था। जिसमें कभी आम की बहुत बड़ी बाग हुआ करती थी। अब वहाँ पुराने दस-पाँच पेड़ ही बचे हुए थे। गाँव का विजयदशमी का मेला इसी जगह लगता है। आज भी उसे मेलहिया बाग ही कहते हैं। बाग के एक किनारे पर एक भव्य पुराना देवी मंदिर था। जिसके गुम्बद पर बंधे लाउडस्पीकर से देवी भजन गूँज रहा था। नवरात्र के अवसर पर औरतें झुंड बनाकर देवी गीत गाते हुए मंदिर में धार चढ़ा कर घर वापस जा रही थीं।

रज्जब अली का कुछ देर रुकने का एक ठिकाना यह मंदिर भी था। हर दूसरे-तीसरे दिन शाम को वह मंदिर के पुजारी बाबा रामललक दास से मिलने जरूर चले आते। उस दिन जब वह मंदिर पहुंचे तो वहां लगभग सन्नाटा हो चुका था। इक्का-दुक्का औरतें ही आ रही थीं। लेकिन देवी भजन अब भी बज रहा था। मंदिर के बरामदे में लालटेन जल रही थी। उसी के उजाले में फर्श पर चटाई बिछा कर बाबा लेटे हुए थे। बाबा का कृशकाय बूढा सांवला शरीर, जिनके सिर एवं दाढ़ी के बाल काफी लम्बे और सन की तरह सफेद थे, वह बार बार खांसी से जूझ रहे थे। उनकी खांसी शांत हुई तो रज्जब अली ने पुकारा,‘‘पांव लगी बाबा।’’

बाबा ने उठने की कोशिश की तो खांसी फिर आने लगी। रज्जब अली जूता उतार कर बरामदे में बाबा के पास जाकर उनकी पीठ सहलाने लगे। बाबा को धीरे-धीरे आराम मिलने लगा।

‘‘और रज्जब अली, क्या हाल-चाल है?’’

‘‘आप की दुआ है बाबा। अपनी बताइए।’’

‘‘मेरी तो देख ही रहे हो, आज दो दिन से सर्दी-खांसी से मरा जा रहा हूँ। पता नहीं मेरा कागद कहां खो गया है। मौत भी नहीं आ रही है।”

‘‘कोई दवा नहीं लिए?’’

‘‘भला मेरी कौन सुधि लेने वाला है।’’

‘‘मुझे ही खबर भिजवा दिये होते।’’

‘‘क्या तुम ही मेरी जिंदगी-भर का ठेका लिए हो? गांव में किसी और को मेरी गरज नहीं है?”

‘‘मैं हूँ तो किसी और की क्या जरूरत?’’ रज्जब अली हंसते हुए बोले, “आज रात किसी तरह से काट लो बाबा। मैं कल सुबह ही जंगल जाकर कुछ जड़ी ले आता हूँ। उसी का दो दिन काढ़ा पीजिए। आप एकदम चंगे हो जाएंगे।”

रज्जब अली और बाबा थोड़ी देर तक बातें करते रहे। बाबा को सुलगते गाँव के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। रज्जब अली ने भी उन्हें कुछ बताना मुनासिब नहीं समझा।

तीस साल पहले बाबा जब मन्दिर पर पुजारी बन कर आये तभी उनकी रज्जब अली से यारी हो गयी। जो अब तक उसी तरह से कायम थी। बाबा कहाँ से आये, क्यों घर छोड़े, गाँव में किसी को नहीं मालूम है। यह राज सिर्फ रज्जब अली को ही मालूम था। बाबा के लिए भोजन वबुआन के घरों से बारी-बारी आता। बाबा किसी भी मौके पर किसी के दरवाजे पर नहीं गये। पांच साल पहले रज्जब अली की बीवी की मौत पर गाँव और इलाके के सैकड़ों लोगों के साथ वह भी मिट्टी देने के लिए कब्रिस्तान जरूर गये थे।

रज्जब अली मन्दिर से उठकर बबुआन के अन्दर चल दिए। बिजली चली गयी थी। बबुआन के ऊपर चाँद की रोशनी कफन की माफिक लग रही थी। हर दरवाजे पर सन्नाटा पसरा हुआ था। कुछ घरों की चौखट की रोशनी में घर के अशक्त बूढ़े चारपाई पर खांस रहे थे या छोटे बच्चों को गाली देकर बुला रहे थे। कुछ भजन गा रहे थे या कुत्तों को मां-बहन की गाली देकर दुत्कार रहे थे। कभी इन दरवाजों की शान चारपाइयाँ और पशुओं -बेगारों की संख्या हुआ करती थी, लेकिन अब वहाँ सिर्फ बूढ़ों की कराह थी। इसी सन्नाटे को भंग करते हुए रज्जब अली उन बूढ़ों का खड़े-खड़े हाल लेते हुए आगे बढ़ते चले जा रहे थे। बबुआन के आखिरी छोर पर उनका सामना अरिमर्दन बाबू से हो गया। अरिमर्दन बाबू की उम्र रज्जब अली से थोड़ी कम थी। लम्बी छरहरी गोरी काया, दबंग चेहरा जिस पर सफेद बड़ी मूँछें। गांव मे अरिमर्दन बाबू का खानदान सबसे बड़ा था। आपसी मनमुटाव के बावजूद उनकी एक आवाज पर पूरा खानदान उनके पीछे खड़ा हो जाता। गाँव की प्रधानी का चुनाव वह कभी नहीं लड़े लेकिन असली प्रधानी वही करते।

”अरे रज्जब अली, मैं तुम्हारे टोले से आ रहा हूँ। वहां तुम भी नहीं मिले, पूरा टोला खाली है। लोग कहाँ चले गये?” अरिमर्दन बाबू अपना हाथ रज्जब अली के कन्धे पर रखते हुए बोले।

‘‘मैं तो सीवान गया था भाई। फसल पकने में अभी देर है। मौसम तेजी से खराब हो रहा है।’’

“अरे मौसम को मारो गोली।“ अरिमर्दन बाबू चिढकर बोले, “मैं पूछ रहा हूँ कि लोग चुपके से कहाँ चले गये?”

“पाकिस्तान।’’ रज्जब अली ने जोर का ठहाका लगाया ‘‘लोग पाकिस्तान चले गये।”

‘‘क्या मजाक कर रहे हो रजबल्ली?’’

‘‘मजाक तो आप कर रहे हो बाबू साहेब! गाँव के हर घर के तवे का हाल आप को मालूम रहता है और आपकी नाक के नीचे से पूरी जुलाहा बस्ती खाली हो गयी, आप को अब पता चला है ! इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है?”

“नौरंगिया सेना की बन्दर घुड़़की से सभी लोग इतना डर गये कि उनका हमारे ऊपर से विश्वास ही उठ गया!”

‘‘सारी रात जुलाहा बस्ती ने बबुआन का इन्तजार किया। जब कोई झांकने नही गया तो धीरे-धीर सभी लोग अपना ठिकाना तलाशने निकल गये। जो बेचारे झांकने गये वे किसी मुसीबत में अपनी सहायता तो कर ही नहीं सकते। वे हमारी क्या करते?”

रज्जब अली की बात सुनकर अरिमर्दन बाबू के चेहरे पर पश्चाताप के भाव साफ नजर आने लगे। वह अफसोस करते हुए बोले, ‘‘हमने तो उसे गम्भीरता से ही नहीं लिया वैसे भी हमारे गांव के लड़के उसका विरोध भी किए थे।”

‘‘आप ने गम्भीरता से इसलिए नहीं लिया क्यो कि आप डरे हुए नहीं हैं। उनकी बातों का वजन उस दिल से पूछिए जिसके दिल मे हर वक्त डर समाया रहता हो। “’रज्जव अली ने कहा, ‘‘यह सही है। वहां पर हमारे गांव की तरफ से विरोध हुआ था। लेकिन बाबू साहेब पूरे मूल्क को फूंकने के लिए एक तीली ही काफी है। यहां पर तो गाँव का एक कोना फूंकने के लिए दो-दो दहकते अंगारे तैयार बैठे हैं।’’

‘‘हे रजबल्ली ! किस ससुरा में इतनी हिम्मत है, जो मेरे गाँव के ऊपर नजर उठा कर देखे”, अरिमर्दन बाबू तैश में बोले, ‘‘वह दिन तुम भूल गये जब एक भैंसा मारने पर अगल-बगल के पाँच गाँवों के ठाकुरों से हमारी सत्रह साल दुश्मनी चली, जिसमें पूरा गाँव मिलकर लाठी चलाया था। हमारा कोई एक रोवां तक नहीं उखाड़ पाया था। जब हम एक जानवर के लिए दुश्मनी मोल ले सकते हैं तो तुम लोग इन्सान हो। हमारी पीढ़ियाँ एक-दूसरे की हमेशा परछाई बनकर रही हैं। तुम लोग उनकी बात पर आ गये और हमारे ऊपर तनिक भी विश्वास नहीं किए?’’

‘‘आप गुस्सा मत कीजिए बाबू साहेब। जब विश्वास पर घना अंधेरा छाता है, तो परछाइयाँ भी साथ छोड़ देती हैं। ’’रज्जब अली अपनी दाढ़ी सहलाते हुए बोले, ‘‘आप जिस जमाने की बात कर हैं उस जमाने में ठाकुर, वामन, कहार, कोहार, नाई, धोबी, चमार, जुलाहा सभी एक-एक जाति हुआ करते थे। अब सारे लोग हिन्दू; और जुलाहे, मुसलमान हो गये। इधर कुछ सालों से हम भी पाकिस्तानी कटुवे हो गये हैं।’’

अरिमर्दन बाबू को कोई जवाब नहीं सूझा। वह कुछ देर खामोश रहने के बाद बोले, ‘‘खैर! तुम्हारी बात में दम है रजबल्ली। हमारे गाँव में कुछ सपोलिए जरूर निकल रहे हैं, जिनके बाप-दादा हमारे गाँव के सामने कभी गर्दन उठाकर नहीं चले। आज उनके यहाँ ये ससुरे सांझ-बिहान दरबारी कर रहे हैं। आज मैंने उनके बाप को अच्छी तरह से समझा दिया है कि तुम लोग अपने-अपने लड़कों को लगाम लगा कर रखो नहीं तो जिस दिन मेरी लगाम खुल गयी तो उनका गाँव में रहना दुश्वार हो जायेगा।’’

“लेकिन, उनमें हमारा श्याम नहीं है।” रज्जब अली के मुँह से तपाक से निकला।

‘‘हां, मैं मानता हूँ कि श्याम कोई गलत काम नहीं करेगा, लेकिन इस इलाके का नेता तो वही है। यदि पूरे इलाके में कहीं कोई गलत काम होगा तो उसका कलंक सीधे उसी के माथे पर लगेगा। उसे समझाओ रजबल्ली। वह जिन हाथों में खेल रहा है, उन सबकी जनम कुंडली मैं जानता हूँ। ये देशभक्त नहीं शातिर अपराधी हैं। वे इसका इस्तेमाल करके कूड़े में फेंक देंगे।”

‘‘यह सब कुछ जानते हुए आपने गांव के लड़कों को पहले ही क्यों नहीं समझाया, जबकि सारे लोग आपकी बात मानते हैं।’’

‘‘समझाया था, लेकिन दबी जबान से । सबके ऊपर बहुत दिनों के बाद बिरादरी की होने वाली जीत का नशा छाया हुआ था, लेकिन अफसोस इसी बात का है, कि उनका खुल कर विरोध नहीं किया, क्योंकि इससे मैं पूरे इलाके में अपनी बिरादरी से कट कर अलग-थलग पड़ जाता। इसके बावजूद मैं इनकी हार से खुश हूँ।”

रज्जब अली के माथे पर श्याम को लेकर चिंता की लकीरें गाढ़ी हो गयीं।

अरिमर्दन बाबू अपने घर की तरफ निकल गये। और रज्जब अली बबुआन में आगे बढ़ गये। एकाएक उन्हें बाबा का ख्याल आया। उन्होंने मुड़कर अरिमर्दन बाबू को तेज आवाज में पुकारा। वह चौंककर पीछे घूमे, “क्या हुआ रजबल्ली?”

‘‘अरे एक जरूरी बात तो मैं भूल ही गया।’’ रज्जब अली उनके समीप पहुँच कर बोले, “मंदिर के बाबा को दो दिनों से खाँसी-जुकाम है। यदि इतनी वक्त उन्हें अदरक की चाय मिल जाती तो राहत हो जाती। कल सुबह मैं दवा का इंतजाम कर देता।”

‘‘अच्छा ठीक है, मैं अभी भिजवा देता हूँ।’’

युधिष्ठिर बाबू के दरवाजे पर चने का होरहा फूंका जा रहा था। गांव के सात-आठ लोग होरहा खाते हुए जुलाहा बस्ती की बातें कर रहे थे। रज्जब अली को आता हुआ देख कर वे चुप हो गये। युधिष्ठिर बाबू बिहंस कर चिल्लाए, ‘‘अरे रजबल्ली भइया, आओ होरहा खा लो।”

‘‘अब तो चना कड़ा हो गया होगा। होरहा का समय गया। मेरे दांतों से तो नहीं फूटेगा। आप लोग खाओ।’’

‘‘वही हाल तो मेरा भी है, लेकिन आज आखिरी है अब तो अगले साल मिलेंगे। लालच लग रही थी, खाने बैठ गया।”

युधिष्ठिर बाबू ने कहा, “ठीक है। अपने न सही । बच्चों के लिए लेते जाओ।”

वह एक झोला होरहा भरकर उन्हें पकड़ा दिये। जब रज्जब अली जाने लगे तो युधिष्ठिर वाबू ने पूछा, ‘‘और क्या हाल है?”

‘‘हाल तो ठीक नही हैं बाबू। गेहूँ की फसल अभी पकी नहीं, आसमान का रुख खराब हो गया।”

‘‘बादल बाँध कर खेती तो होगी नहीं। वैसे भी किसानों का नसीब हर वक्त भगवान के अंगूठे पर रहता है।”

युधिष्ठिर बाबू उनसे पूछना कुछ और चाहते थे लेकिन रज्जब अली बात बदल कर अपने घर की तरफ बढ़ गये।

रज्जब अली और श्याम बाबू के घर के पिछवाड़े के बीच झाड़ का जंगल था जो एक लम्बी पट्टी की तरह था। उस जंगल का उपयोग वबुआन का कुछ घर, परजौटी और जुलाहा बस्ती की औरतें दिन के समय सामूहिक रूप से करती थीं। उस जंगल में मर्द भूलकर भी नहीं जाते थे। रज्जब अली के घर श्याम बाबू के दरवाजे से होकर जाना होता था। रज्जब अली और श्याम बाबू के पिता भूषन बाबू हमउम्र थे । दोनो में दाँत कटी रोटी वाली दोस्ती थी। वे एक-दूसरे के साया थे। दोनों की जोड़ी कबड्डी खेलने में दूर-दूर तक मशहूर थी। भूषन बाबू सम्पन्न किसान थे। उनकी सम्पन्नता से रज्जब अली ने कभी अपने को मजलूम नहीं समझा। उनकी जिन्दगी भी लाख अभावों के बावजूद बड़ी मस्ती से कटी। श्याम बाबू की स्कूल में नौकरी लगने के दूसरे ही साल उनकी मां का निधन हो गया और शादी के दूसरे ही साल भूषन बाबू को लकवा मार दिया। भूषन बाबू पूरे दो साल अपना नित्यकर्म चारपाई पर ही किए। श्याम बाबू उनकी दवा के सिवा और कोई सेवा तो नहीं किए, लेकिन उनकी पत्नी शोभा और रज्जब अली उनकी सेवा को अपना धर्म मान लिए। भोर की नमाज के बाद रज्जब अली उनके पास पहुँच जाते और शोभा के साथ उनकी घण्टे भर साफ-सफाई करने के बाद ही दातून करते।

भूषन बाबू जब मरने को हुए तो रज्जब अली और शोभा से वचन लिए, ‘‘रजबल्ली, तुम यह दरवाजा कभी मत छोड़ना और बहू, तुम अपने किसी व्यवहार से कभी इसे दुःखी मत करना। तुम दोनों ने ऐसा कुछ किया तो मेरी आत्मा रोयेगी।’’ इतना कहकर वह फफक कर रो पड़े थे। उनके साथ ही शोभा और रज्जब अली भी रोने लगे थे।

श्याम बाबू के दरवाजे पर रज्जब अली रुक गये। इतनी वक्त वह यहाँ जरुर आते, लेकिन मन बेचैन होने की वजह से आज वह दो दिन बाद आये थे। श्याम बाबू का बड़ा बेटा पीयूष मकान के बरामदे में बैठकर पढ़ रहा था। दरवाजे के सामने एक छोटी-सी गोशाला थी। जिसके बरामदे में एक अच्छी नस्ल की गाय बंधी हुई थी। उसी के बगल में एक पुरानी चौकी पड़ी हुई थी, जिसके तीन पांवों को दीमक चाटकर कमजोर कर दिये थे, और चौथे पाँव की जगह ईंटें लगी हुई थीं।

रज्जब अली चुपचाप गौशाला की तरफ बढ़ गये। उनको देख कर गाय चौंककर कर खड़ी हो गयी और तेजी से अपनी गरदन हिलाने लगी। रज्जब अली को अपनी भूल का एहसास हुआ। वह जब भी आते, एक मुट्ठी घास उसके लिए जरूर लाते, लेकिन आज वह भूल गये। वह गाय का माथा सहलाते हुए बोले, ‘‘अरे गऊ माता! आज तो मैं तुम्हारे लिए कुछ लाया ही नहीं। मुझसे भूल हो गयी।’’

गाय और तेज चौंककर अपनी जीभ से झोले को टटोलने लगी। रज्जब अली ने झोले से एक मुट्ठी होरहा निकालकर उसके मुँह पर लगा दिया। होरहा चबाकर गाय शान्त हो गयी।

‘‘मम्मी!’’ बरामदे से पीयूष ने आवाज लगाया, ‘‘दद्दा आये हैं।’’

शोभा के आने से पहले उसकी पाँच साल की प्यारी बेटी श्वेता चहकती हुई दौड़कर आयी और रज्जब अली की कमर पकड़कर झूल गयी। उसके पीछे पीयूष भी आया जिसे उन्होंने झोला पकड़ा दिया । पीयूष झोला लेकर घर के अन्दर चला गया । रज्जब अली के सामने चौकी पर बैठकर श्वेता उनसे सवाल-जवाब करने लगी, ‘‘तुम दो दिनों तक कहाँ थे दद्दा? कल शाम को जब तुम नहीं आये तो मैं तुम्हें ढूंढ़ने तुम्हारे घर जा रही थी, तब तक बगल वाली दादी मिल गयीं । वह मुझे डरा दीं- उधर मत जाओ । झाड़ी में एक चुड़ैल रहती है । तुम्हें पकड़ ले जायेगी। मुझे चुडै़ल से बहुत डर लगता है दद्दा। मैं तुरन्त वापस भाग आयी । मम्मी कह रही थीं कि आप मेरे लिये खजूर लेने बगदाद गये है! वह तुम्हारे किस्सों वाला बगदाद! ऊँटों के काफिलों का रेत पर चलना मुझे बहुत अच्छा लगता है दद्दा। किसी दिन मुझे भी ले चलो । अरे हाँ ! मेरा खजूर दो।” उसने अपनी दोनो नन्हीं हथेलियाँ रज्जब अली के सामने फैला दीं।

‘‘मैं तुम्हारा खजूर ऊँट पर लाद कर ले आ रहा था। उसी समय तेज तूफान आ गया । ऊँट बेचारा रेत मे दबकर मर गया।”

‘‘ओह ! यह तो वहुत बुरा हुआ।” श्वेता सिहर गयी, “लेकिन दद्दा, तुम कैसे बच गये?”

‘‘उसी समय आसमान से एक परी उतरी । उसने मुझे अपने कन्धे पर बैठाकर यहाँ पहुँचा दिया।”

‘‘दद्दा, मुझे भी अपने साथ ले गये होते।” श्वेता मनुहार करने लगी, ‘‘मैं भी तुम्हारे किस्सों वाला बगदाद देखती । वहाँ के रेत और उस पर चलने वाले ऊँटों का काफिला देखती । तूफान आने पर किसी परी के कन्धे पर बैठकर तुम्हारे साथ घर वापस आ जाती । किसी दिन मुझे भी बगदाद ले चलो दद्दा।”

‘‘हां मेरी प्यारी गुड़िया । एक दिन मैं तुम्हें जरूर बगदाद घुमाऊंगा।” रज्जब अली प्यार से उसके बाल सहलाने लगे।

उसी समय शोभा एक हाथ में होरहा वाला झोला और दूसरे में चाय का गिलास लेकर आ गयी। उसने झोले में से थोड़ा-सा होरहा निकालकर उसमें चार-पांच किलो अरहर की दाल पालीथीन मे भरकर डाल दी थी। वह झोला और गिलास चौकी पर रखते हुए बोली, ‘‘चचा, दो दिन कहाँ थे?’’

‘‘दद्दा बगदाद चले गये थे।”

वे दोनों हँसने लगे। ‘‘बहू, तुम जब नौ दिन का उपवास हो तो चाय बनाने की क्या जरुरत थी?”

‘‘उपवास में भी फुरसत नहीं है चचा। सब तो कुछ करना ही पड़ रहा है।’’

‘‘श्याम कहाँ है?” रज्जब अली चाय पीते हुए बोले।

‘‘तुम तो जानते ही हो चचा, इधर साल भर से उन्हें राजनीति का ऐसा चस्का लगा है कि सब कुछ भूल गये हैं। खेती-बारी भी सब चौपट हुई जा रही है। घर की उन्हें कोई चिन्ता ही नहीं है। उनको तो सिर्फ तुम ही समझा सकते हो।’’

रज्जब अली चुपचाप सिर झुका कर चाय पीते रहे, “बहू, एक बात कहूँ।”

“क्या चचा?”

वह इसके आगे कुछ नहीं बोले। चुपचाप चाय पीते रहे। शोभा उनके जबाब का इंतजार करती रही। वह गिलास खाली करके झोला उठा कर जाने लगे।

‘‘चचा, तुम कुछ कह रहे थे?’’

‘‘नहीं रे, वैसे ही बोल दिया।’’

‘‘चचा, ऐसी भी क्या बात है, जो कहते-कहते आप रुक गये। आप तो हमसे कोई बात नहीं छिपाते फिर आज क्यों?”         रज्जब अली नहीं रुके। वह आगे बढ़ गये। एकाएक उन्हें झोला भारी होने का एहसास हुआ। उन्होंने रुक कर झोले में निहारा और एक नजर शोभा को देखकर परजौटी की तरफ बढ़ गये।

‘‘भूलना मत दद्दा।” श्वेता चिल्लाई, ’’अबकी बार मुझे भी अपने साथ बगदाद जरूर ले चलना।”

सूरजू कहांर के दरवाजे पर चार चारपाईयों पर सात लोग बैठे हुए थे। वे सभी पड़ोसी ही थे। बरामदे के बाहर लालटेन लटक रही थी। उसी के नीचे सूरजू की घरवाली सभी की तरह गुमसुम बैठी थी। रज्जब अली को देखकर सूरजू खड़ा होकर बोला, “चचा, आइए।”

चारपाई पर बैठे लोग पायताने सरक गये। चारपाई पर बैठते हुए रज्जब अली ने सूरजू की घर वाली से पूछा, “क्या बात है दुलहिनियाँ, सब खैरियत तो है?”

”क्या बतायें चचा। ये लोग अभी खेत से ईख बोकर आ रहे हैं। इसी बात पर चर्चा हो रही थी कि नागबेइल माई की पूजा हो कि नहीं।”

“क्यों नहीं होगी?” रज्जब अली ने कहा, ”जो पूजा बाप दादे के जमाने से होती आयी है, उसे तो करना ही होगा। नागबेईल माई किसानों के लिए अमृत की देवी हैं। यदि वह नाराज हो गयीं तो पूरे साल बच्चे एक लोटा शरबत के लिए तरसेंगे। उनकी पूजा तो होनी ही चाहिए।”

“जब गाँव के एक हिस्से में मरन पड़ा हो तो हम ऐसे में कैसे पूजा करके भोज देंगे। कल को यही समाज हम पर थूकेगा।”

अभी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि मनकी नाईन गला फाड़कर पूरे गाँव को थुथकारते हुए तेज कदमों से आ धमकी। सभी लोग चौंक गये। सहजू ने पूछा, “क्या हुआ भौजी?”

“अभी पूछते हो कि क्या हुआ? अरे यह पूछो कि क्या नहीं हुआ।” मनकी अपने दोनों हाथों को नचाते हुए चिल्लाकर बोली, “पूरे गाँव की आँखों में माड़ा पड़ गया है जो किसी को कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा है। सबकी जुबान को लकवा मार दिया है जो कोई उन्हें समझाकर रोक नहीं पा रहा है। सत्यानाश हो ऐसे बबुआन का जो उसकी परजा एक-एक कर कलपते हुए अपना घर छोड़कर जा रही है लेकिन किसी मुहझौंसे को उन पर तनिक भी दया नहीं आयी कि उन्हें अपने साहस पर रोक ले।” वह देवी मंदिर की तरफ अपना हाथ उठाकर तरह तरह से फरियाद करने लगी।

“मनकी, अब तो चुप हो जा। तेरी मुंहजोरी का तो कोई जबाब नहीं।” टिठू बारी ने उसे डाँटा, “क्या कोई फिर जा रहा है?”

“अरे, अब कौन बचा ही है? रजबल्ली चचा और मस्ताना को छोड़कर फरीद का परिवार बचा था। अब वह भी जा रहा है। उसे लोग समझा रहे हैं लेकिन वह किसी की बात मान ही नहीं रहा है।” वह रज्जब अली का हाथ पकड़कर खींचते हुए बोली, “तुम ही चलो चचा। हो सकता है कि वह तुम्हारी बात मान ले।”

रज्जब अली चुपचाप गर्दन झुकाकर छड़ी से चारपाई को धीरे-धीरे ठोंकते रहे। जबकि सभी लोग तुरन्त मनकी के साथ फरीद के घर की तरफ चल दिये।

फरीद के दरवाजे पर परजौटी के लोगों की भीड़ लगी हुई थी। वहां एक पिकअप गाड़ी खड़ी थी। जिसमें फरीद अपनी दोनों जवान बेटियों के साथ घर में से सामान निकालकर लाद रहा था। उनकी आँखों और चेहरे पर दुख और दहशत थी। उसके सात और नौ साल के दोनो लड़के स्कूल का बस्ता लेकर मुलुर-मुलुर इधर-उधर निहार रहे थे। परजौटी के साथी उनके पास चुपचाप खड़े थे। फरीद की बीवी घर की चैखट के पास परजौटी की औरतों के बीच बैठकर आँचल से मुह ढाँप हबस-हबस कर रो रही थी। औरतें उसे सान्त्वना दे रही थीं।

जब गाड़ी पर सारा सामान और बकरियाँ लद गयीं तो फरीद अपनी बीवी के पास आकर रुँधे गले से बोला, “चलो!” यह शब्द सुनते ही वह दहाड़ मारकर रो पड़ी। वह बारी-बारी से सभी औरतों के गले से लग कर रोयी। औरतें भी रोने लगीं। परजौटी के लगभग सभी घरों से राशन की छोटी छोटी गठरी गाड़ी में गिरने लगी। उसकी दोनो बेटियों ने उसका हाथ थामकर उसे गाड़ी में सामान और बकरियों के बीच बैठा दिया। कुसुमा नाइन रोते हुए बोली, “तुम्हें तो पता ही है कि अगले महीने मेरी बेटी का शादी है। उसे सुहाग की चूड़ी पहनाने तुम जरूर आ जाना।”

“कोई आये या न आये, मैं तो जरूर आऊंगी भौजी। तब तक तुम लोग मेरे घर का ख्याल रखना।”

वह एक बार फिर अपने घर को निहार कर जोर-जोर से रोने लगी। उसकी दोनों बेटियां उससे लिपट कर रो पड़ीं। फरीद ने अब अपने दोनों बेटों के कंधो पर हाथ रखकर चलने का इशारा किया तो वे अपने दोस्तों से लिपट कर रो पड़े। फरीद ने जब उन्हें अपनी तरफ खींचा तो छोटे बेटे ने रोते हुए पूछा, ‘‘अब्बू, हम अपना घर छोड़ कर क्यों जा रहे हैं?’’ फरीद ने चुपचाप अपने आंसू जब्त करते हुए उन्हें गाड़ी में ड्राइवर के बगल में बैठा दिया। वह हाथ जोड़ कर गांव वालों से विदा लेकर गाड़ी में बैठने को हुआ तभी रज्जब अली उसके सामने आकर खड़े हो गये।

“कहाँ जा रहे हो बेटा?’’ रज्जब अली की आवाज में नमी थी। फरीद की आँखों से दो बूंद आंसू निकल कर उसकी दाढ़ी में समा गये। ‘‘अपना ठिकाना छोड़ने पर दर-दर की ठोकरें मिलती हैं बेटा। फिर तुम ठहरे दो जवान बेटियों के बाप। यदि कोई सगा-संबंधी तैयार भी हुआ तो उसकी भारी कीमत वसूलेगा। यह भी तो हो सकता है कि उसकी कीमत तुम्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़े। जब जान ही देनी है तो कहीं और क्यों? अपनी चौखट पर दो । अपनी दहलीज की मौत से तुम नजीर बनोगे। कहीं और मरे तो महज एक घटना बन कर रह जाओगे।”

‘‘चचा मेरी दोनों बेटियां उनके निशाने पर हैं।”

“मैं तुम्हारा दर्द महसूस कर रहा हूँ बेटा।” रज्जब अली उसके माथे को सहलाते हूए बोले, ‘‘तभी तो मैं कह रहा हूँ कि अपनी जनम भूमि से सुऱि़क्षत जगह पूरी दुनियां में कहीं नहीं है। जरा नजर उठा कर देखो, तुम्हारे लिए पूरा गाँव खड़ा है। इनकी दुआएं हर वक्त तुम्हारे साथ हैं। इनकी दुआएं छोड़ कर तुम किसी गैर की दया पर जीने जा रहे हो। किसी की दया पर तुम्हारी बेटियों की आबरू कब तक महफूज रहेगी।”

‘‘चचा, अब तुम मुझे मत रोको मैंने अपने घर की चौखट से विदा ले ली है। मैं नहीं चाहता हूँ कि मेरी वजह से मेरे गाँव का कोई भाई बन्धु परेशानी में पडे़। अल्लाह के सहारे मैं अपने बच्चों की हिफाजत कर लूंगा।”

रज्जब अली उसे देर तक निहारते रहे। वह कातर स्वर में बोले, ‘‘जब तुम जाने का इरादा बना ही लिए हो तो जाओ। खुदा खैर करे। पर याद रखना बेटा यह सिर्फ कुछ दिनों की शैतानी हरकत है। इसका असर ज्यादा दिन नहीं रहेगा। जिस दिन तुम्हें अपने गांव पर विश्वास हो जाय, उसी दिन तुम गांव वापस लौट आना, हम तुम्हारा इन्तजार करेंगे।”

फरीद गाड़ी में अपने बेटों के पास बैठ गया। रज्जब अली ने झोला उसकी गोद में रख दिया, ”इसे रख ले बेटा। तेरे बच्चों के लिए मेरी बहू (श्याम बाबू की पत्नी) ने खाने का कुछ सामान दिया है।”

फरीद ने झोले को सहेज कर रख लिया। गाड़ी स्टार्ट होकर आगे बढ़ गयी। एक बार फिर रात की फिजा मे निर्वासित होने का रुदन गूंज उठा।

कुछ देर तक लोग स्थिर हो कर गाड़ी को ओझल होते देखते रहे। रज्जब अली ने ख्याल किया कि गांव की उस भीड में जुलाहा बस्ती तो क्या उसके घर का भी कोई नहीं था। उन्हें तनिक शक हुआ और वह तेज कदमों से अपने घर की तरफ बढ़ गये।

पूरे जुलाहा बस्ती में मरघट-सा सन्नाटा पसरा हुआ था। पूरी बस्ती खाली हो चुकी थी। बस्ती के सारे मकान खपरैल के थे। कुछ मकानों की टूटी खपरैल की जगह टिन लगे हुए थे। किसी-किसी घर के सामने फूस की मण्डई थी।

बस्ती घनी नहीं थी और साफ-सुथरी थी। बस्ती के सामने करीब तीन एकड़ का परती मैदान था। जिसमें कभी महुए की बाग हुआ करती थी। अब उसमें सिर्फ चार पुराने पेड़ बचे हुए थे। उस खाली जमीन में परजौटी के लोग खलिहान करते। जुलाहा बस्ती की बकरियाँ और मुर्गियाँ चरती। औरतें उपले पाथ कर गोहरौर लगाती। वह परजौटी और जुलाहों के बच्चों का खेल का मैदान भी था।

रज्जब अली सन्नाटे को चीरते हुए अपने घर की तरफ बढे़ जा रहे थे। एकाएक किसी कोने से कुत्ते के रोने की आवाज उभरी। उनके शरीर में सर्द सिहरन दौड़ पड़ी। उन्होंने अपना गला खँखार कर साफ किया।

जहूर मस्ताना अपने अंधेरे घर के सामने एक टूटी चारपाई पर बैठकर अपनी ढोलक सहला रहा था। उसका पूरा परिवार उसे छोड़कर जा चुका था। जहूर अपनी जवानी के दिनों में एक कौवाल पार्टी में ढोलक बजाता था। उस दौरान उसने शायर बनने की बहुत कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो सका। अलबत्ता अब भी वह हर मौके पर टूटे-फूटे शे’र जरूर बोलता। कौवाली का जमाना जाने के साथ ही उसकी बीवी को फेफड़े की बीमारी हो गयी। मेलों में गुब्बारे और बाँसुरी बेचकर उसका इलाज करने की बहुत कोशिश किया लेकिन उसे वह बचा नहीं सका। वह अपनी बीवी से बेपनाह मोहब्बत करता था। उसकी मौत के सदमे से उसने अपना मानसिक सन्तुलन खो दिया। उसके बेटों ने उसके पैरों में बेड़ियां डालकर छोड़ दिया। अब तो बीवी की यादें और ढोलक की मोहब्बत उसके जीने का सहारा थी। उसकी ढोलक गाँव की इकलौती ढोलक बची हुई थी, जिसे लोग फाल्गुन में फाग और हरिकिर्तन गाने के लिए मांगकर ले जाते थे।

रज्जब अली जब उसके दरवाजे पर पहुँचे तो वह ढोलक को धीरे-धीरे ठोंककर कोई इश्किया शे’र गुनगुना रहा था। रज्जब अली ने पूछा, ‘‘क्यों मस्ताना! तुम गाँव छोड़कर नहीं गये?’’

“इक जमाना बीत गया गिद्ध का दीदार हुए,

अब मिलेंगे वे हमारी घर की मुड़ेर पर।”   गला साफ करके और ढोलक पर एक भरपूर थाप देकर एक शे’र के जरिए मस्ताना ने अपना जवाब दिया था। दूसरा वक्त रहता तो रज्जब अली वाह-वाह करके उसकी तारीफ करते, लेकिन वह चुपचाप आगे बढ़ गये।

अपने घर का सन्नाटा देखकर उनके पैरों के नीचे की जमीन सरक गयी। घर के अन्दर-बाहर अंधेरा छाया हुआ था। वह काँपतें पैरों से घर के बरामदे में पहुँचे तो दरवाजे की सांकल चढ़ी हुई थी। वह धड़ाम से जमीन पर बैठ गये। उनके शरीर में बार-बार सुरसुरी उठने लगी। उनका शरीर उनके बस में नहीं था। वह एक तरफ लुढक कर सिसकियां लेने लगे। उन्हें ढांढ़स देने वाला कोई नहीं था। काफी देर तक वह इसी तरह से पड़े रहे। धीरे-धीरे वह अपने आप को संभाल कर उठे और दीवाल के ताखा को टटोल कर माचिस से लालटेन जला दिए। लालटेन की पीली रोशनी में उन्होंने सांकल खोला तो उसमें कागज का एक टुकड़ा फंसा हुआ था। वह जल्दी-जल्दी उसे खोलकर पढ़ने लगे। रज्जब अली के पोते उन्हें खेल-खेल में बुढ़ापे में उर्दू पढना सिखा दिये थे।

‘‘हमें माफ करना अब्बू, तुम्हारे लाख समझाने के बावजूद हम तुम्हें छोड़ कर अपने बच्चों की हिफाजत के लिए अपनी-अपनी ससुराल जा रहे हैं। तुम हमारी चिंता मत करना। गांव का माहौल ठीक होते ही हम लौट आयेंगे। तब तक तुम अपना खयाल रखना। खुदा हाफिज।”

वह कुछ देर तक कागज को घूरते रहे। फिर उसे तह करके उसे पाकेट मे डाल लिये। वह लालटेन लेकर घर में गये। पूरे घर में चूल्हा, चौका, राशन, बर्तन को छोड़ कर कुछ नहीं था। यह देखकर उन्हें महसूस हुआ कि कोई क्रूर लूटेरा उनका सब कुछ लूट ले गया लेकिन उन्हें तिल-तिल कर मरने के लिए कुछ छोड़ गया है। वह लालटेन लेकर बरामदे में वापस आ गये।

बरामदे मे उनका बिस्तर करीने से लगा हुआ था। उनका हर एक सामान सही जगह पर तरतीब से रखा हुआ था। चौकी की दूसरी तरफ उनका करघा खामोश पड़ा था। रज्जब अली ने चश्मा उतार कर ताखे पर रखा और कुर्ता उतार कर खूंटी पर टांग दिया। उनका कलेजा बार-बार बैठा जा रहा था। वह बिस्तर पर लेट कर अपने कलेजे को रगड़ने लगे। कुछ देर में उन्हें तनिक राहत मिली। बिस्तर पर से उठ कर हुक्का सुलगाया और उसके लम्बे-लम्बे कश लेकर ढेर सारा धुआं उगलने लगे।

दो दिन पहले गाँव के पंचायत भवन में नौरंगिया सेना की पहली चुनाव समीक्षा बैठक थी। मंडल अध्यक्ष होने की वजह से उसकी पूरी जिम्मेदारी श्याम बाबू पर थी। जिस तरह से चुनाव प्रचार मे बबुआन और परजौटी के लगभग हर घर से एक युवक लगे हुए थे, उस दिन भी वे सारे लोग वहाँ मौजूद थे। बैठक का समय शाम चार बजे निर्धारित था। लेकिन समय से काफी पहले ही इलाके के चारों तरफ से नौरंगिया गमछा बांधे झुंड के झुंड मोटर साइकिलों से लोग चले आ रहे थे। चार बजते-बजते पंचायत भवन के सामने नौरंगिया जमघट लग गया। निर्धारित समय पर सेना के प्रत्याशी रहे अरुणेन्द्र प्रताप उर्फ भैया जी लगभग दस लग्जरी गाड़ियो के काफिले के साथ पहुँचे।

उनके पहुँचते ही ‘‘जय श्री राम’’ के गगनभेदी नारों के साथ कार्यकर्ताओं ने उनको घेर लिया। उनकी कार में उनके रिश्तेदार प्रशांत जी भी थे। चुनाव संचालन की पूरी जिम्मेदारी इन्हीं के कंधो पर थी। श्याम बाबू ने दौड़ कर दरवाजा खोला। भैया जी जब प्रशांत जी के साथ कार से उतरे तो उनके पैर छूने की कार्यकर्ताओं में होड़-सी मच गयी। बहुत ही मशक्कत के साथ वह धीरे-धीरे बैठक कक्ष की ओर बढ़े। कार्यकर्ताओं के नारे लगातार कर्कश होते जा रहे थे। उस वक्त भैया जी का दबंग मुस्कुराता हुआ चेहरा बिल्कुल खामोश था। जबकि प्रशांत जी के मुस्कुराते हुए चेहरे के पीछे गहरा आक्रोश झलक रहा था। भैया जी बेहद मामूली वोटों से चुनाव हारे थे। चुनाव प्रचार के दौरान उनके विपक्षी भी उन्हीं को जीता हुआ मान बैठे थे। लेकिन मतदान के एक दिन पहले नौरंगिया दहशत के खिलाफ वोटों का ध्रुवीकरण हो जाने से जीती हुई सीट उनके हाथ से निकल गयी।

बैठक कक्ष के फर्श पर सफेद चादर बिछी हुई थी, जिस पर छोटे-बड़े तमाम पदाधिकारियों के साथ श्याम बाबू के अलावा बबुआन के तीन सक्रिय सदस्य भी बैठे हुए थे। कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था। कमरे के बाहर काफी कोलाहल था लेकिन अंदर मौत-सा सन्नाटा पसरा हुआ था। काफी देर की चुप्पी के बाद भैया जी ने प्रशांत जी को कार्यवाही शुरू करने का इशारा किया। प्रशांत जी के बगल में श्याम बाबू बैठे हुए थे जो प्रशांत जी के इशारे पर उठकर सामने बैठ गये।

बैठक की कार्यवाही शुरू होते ही प्रशांत जी के निशाने पर सीधे श्याम बाबू आये, “हमारी हार के जो कुछ बड़े कारण हैं, मैं समझता हूँ कि उनमें एक श्याम बाबू भी हैं।”

कमरे में सन्नाटा और अधिक गहरा गया। इस बात को सभी लोग जानते थे, कि श्याम बाबू साल भर से लगातार जितनी मेहनत किये थे, उतना शायद ही किसी और ने किया हो। इसके बावजूद प्रशांत जी के आरोप से सभी लोग सन्न रह गये, “श्याम बाबू की बातों में ऐसा जादू है कि कोई भी इन पर सहज विश्वास कर लेता है। उसी जादू के शिकार हम भी हो गये। काश, हमने इन पर विश्वास न किया होता तो आज हम भी राजधानी में होते।” प्रशांत जी ठंडी आह भरते हुए बोले, ‘‘मैंने मतदान से दो दिन पहले इनसे कहा था, कि हमें किसी भी हालत में चुनाव जीतना है। लेकिन श्याम बाबू चुनाव नहीं धर्मयुद्ध लड़ रहे थे। हमने जो रणनीति दूसरे मंडलों में अपनायी, उसी से वहां पर हमने लीड किया। उस रणनीति को श्याम बाबू ने अपने मंडल में लागू ही नहीं करने दिया। यही हमारी हार का कारण बना।”

श्याम बाबू किसी अपराधी की तरह गरदन झुका कर चुपचाप सुनते रहे।

”हम उदाहरण इन्हीं के गांव से लेते हैं। इनके गांव में चमारों के सात सौ वोट पोल हुए जिसमें इनका चार सौ वोट का दावा था। लेकिन हमें सिर्फ पचास वोट मिले। इसी तरह मुसलमानों का अस्सी वोट पोल हुआ। और हमारी मुख्य विपक्षी पार्टी को एक सौ पांच वोट मिले। पूरे मुसलमान तो हमारे खिलाफ गये ही, अपने साथ पचीस हिंदू वोट भी लेते गये। ये पच्चीस कौन लोग गये, क्या आपके पास उनकी शिनाख्त है?”

श्याम बाबू चुप, उनके गले से बोल नहीं फूटे।

“किसी जमाने में इनका गांव पूरे इलाके में सबसे दबंग गांव माना जाता था। इन लोगों के सामने कभी छोटी जातियां गरदन उठा कर नहीं चलती थीं। आज हालत यह है कि इन्हीं के गांव के मियां-चमार इनके कहने में नहीं हैं। क्योंकि ये लोग दबंगई करना छोड़ निवेदन करने लगे हैं। श्याम बाबू! सत्ता निवेदन से नहीं दबंगई से आती है और दबंगई बिना दहशत फैलाये हो ही नहीं सकती।’’ प्रशांत जी छात्र जीवन से ही पार्टी संगठन से जुड़े हुए थे। इस समय वह पार्टी के स्थानीय नेताओं में सबसे प्रखर चिंतक और तेज तर्रार वक्ता माने जाते थे।

‘‘एक लम्बे समय के बाद आज हम सत्ता में आये है। इस सत्ता को हमेशा के लिए अपने पास बरकरार रखने के लिए हमें उन कारणों से सजग रहना होगा, जिससे हम सदियों शासन करने के बाद भी सत्ता से वंचित हो गये।’’ वह तनिक रुककर वहां मौजूद एक-एक चेहरे को निहारते हुए बोले, ‘‘यहाँ पर हम लगभग सभी शासक वर्ग के वंशज बैठे हुए हैं। हमारे पूर्वज अल्पसंख्यक होते हुए भी बहुसंख्यकों पर राज किये। हमें अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए अतीत के उसी गौरव को वापस लाना होगा। हमें अपने पूर्वजों की शासन प्रणाली अपनानी होगी। उस शासन प्रणाली के मूल में सिर्फ भय था और अब वही भय हमारा मूल मंत्र होगा – भय बिनु होय न प्रीत।’’

‘‘माफ कीजिए सर।’’ काफी देर से चुप लोगों में से राकेश से नहीं रहा गया तो वह बोल पड़ा, ‘‘आज जब हमें बहुत दिनों के बाद सत्ता मिली है तो हमें चाहिए कि बिना भेदभाव किये सभी लोगों को साथ लेकर ऐसी व्यवस्था दें कि भविष्य में हमारे विरोधी भी हमारे साथ हो लें। सबको एहसास भी हो जाये कि शासन सिर्फ हमें चलाना आता है।”

प्रशांत जी कुछ देर तक उसे देखकर मुस्कुराते रहे। फिर समझाते हुए बोले, ‘‘सबको साथ लेकर चलना एक चुनावी जुमला होता है। जुमले चुनाव के साथ ही खत्म हो जाते हैं। सत्ता को बरकरार रखने के लिए हमेशा अपने वर्ग को संतुष्ट रखना होता है। जिन लोगों ने ऐसा नहीं किया, सबको साथ लेकर चलने की कोशिश की, वे सत्ता से बेदखल हो गये। इससे सबक लेकर हम ऐसी गलती नहीं करेंगे।’’

कमरे में सन्नाटा पसर गया।

“इस चुनाव में जो भी हमारे साथ पहले नहीं था। उसका बड़ा हिस्सा अबकी पहली बार हमारे साथ आ गया। उन्हें हमेशा के लिए अपने पास बांध कर रखना होगा। जो अब भी हमारे खिलाफ हैं, उन्हें किसी तरह अपने साथ लाना होगा। इतना ध्यान देना होगा कि जो नहीं आते हैं, उनका मुंह किसी भी तरीके से बंद करना होगा। जिससे वह हमारे खिलाफ कहीं भी कभी भी एक शब्द न बोल सकें। इसके लिए दहशत जरूरी है।” वह श्याम बाबू के चेहरे पर गहरी नजर गड़ा कर तनिक मुस्कुराते हुए बोले, ‘‘हम चाहते हैं कि इस दहशत की शुरुआत आप के ही गांव से हो।”

सभी लोग चौंक कर प्रशांत जी का चेहरा निहारने लगे। उन्होंने अपनी बात को दृढ़ता से फिर दुहराया, ”इस गांव की चमरौटी को तो हम बाद में देखेंगे। हमारा पहला निशाना जुलाहा बस्ती होगी। जुलाहों को खदेड़कर वहाँ सरकारी गोशाला बनेगी।”

इतना सुनते ही श्याम बाबू के साथ तीनों लड़के तैश में आकर खड़े हो गये। श्याम बाबू तनिक चेतावनी के लहजे में बोले, ‘‘प्रशांत जी, जुलाहा बस्ती पर निशाने का मतलब हमारे पूरे गांव पर हमला करना है। जिसे हमारा गांव कत्तई बर्दाश्त नहीं करेगा। यदि आपमें साहस हो तो किसी दबंग मुस्लिम गांव पर करके देखिए। हमारे गांव के जुलाहे बेहद गरीब और लाचार हैं । उनके ऊपर किसी की आंख उठ गयी तो हमारे गांव के उपर कलंक होगा।”

बबुआन के लड़कों का तैश भरा चेहरा और श्याम बाबू की तल्ख बात प्रशांत जी के कलेजे में जहरीले तीर की भांति घुस गयी। वह तिलमिला कर रह गये। कुछ देर तक उन्हें चुपचाप निहारने के बाद बोले ‘‘बैठ जाइए आप लोग। मैं तो आप लोगों की प्रतिक्रिया देखने के लिए मजाक कर रहा था। हमारी पार्टी लोकतंत्र में विश्वास करती है। कोई भी काम सबकी इजाजत से ही होगा। यदि इसी तरह का रुआब आप लोग चुनाव के समय जुलाहों और चमारों पर दिखाये होते तो विपक्ष में एक भी वोट नहीं पड़ा होता। हमें अपनी गांव की हैसियत दिखा रहे हैं। जबकि चुनाव में आप लोगों के ही गांव के जुलाहा, चमार आपको आपकी हैसियत दिखा दिये।”

श्याम बाबू तो पार्टी के अनुशासन का ख्याल करके बैठ गये लेकिन तीनों लड़के एक झटके से कमरे से बाहर निकल गये। कमरे में थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छा गया। प्रशान्त जी दरवाजे को अन्दर से बन्द करते हुए बोले, ‘‘श्याम बाबू, यह भी हमारी रणनीति का एक हिस्सा है। हमें अपने विरोधी के सबसे कमजोर तबके पर हमला करके यह देखना है, कि इसकी समाज में कैसी प्रतिक्रिया होती है। समाज का कौन तबका हमारे साथ और कौन लोग हमारे विरोध में खड़े होते हैं। उसी के हिसाब से हम अपनी अगली रणनीति बनायेंगे। खैर! हमें अपने कार्यकर्ताओं के मनोबल को बरकरार रखने के लिए हनक तो बनाये ही रखनी पड़ेगी। इससे हमें आज नहीं तो कल, यहाँ नहीं तो वहाँ, कुछ करना ही होगा।’’

बैठक खत्म होने के बाद बाहर मैदान में कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ का सम्बोधन भी हुआ। भैया जी तो महज दो शब्द में कार्यकर्ताओं का आभार प्रकट करके बैठ गये, लेकिन प्रशान्त जी का काफी लम्बा और जोशीला भाषण हुआ। उनके भाषण में तीखा आक्रोश और उत्तेजना थी। उनका रोम-रोम सुलग रहा था और गला प्रतिरोध की आग उगल रहा था। उनकी हर बात पर तालियों की गड़गड़ाहट और जय श्रीराम के गगन भेदी नारे लग रहे थे। पूरा मैदान उनकी जुबान की लपटों के गिरफ्त में था। उन्होंने अपने भाषण में तीन बातें काफी जोरदार ढंग से रखीं, ‘‘…मैं आखिर में कुछ बेहद जरूरी बातें और रखना चाहूँगा। जिसे आप लोगों को अभी से अमल में लाना होगा और दूसरों को भी अमल में लाने के लिए हर तरह का दबाव बनाना होगा। पहली बात तो यह कि आज हमारे भैया जी निर्वाचित विधायक नहीं हैं। इसके बावजूद यह हमारे क्षेत्र के असली विधायक हैं। जिसे हर किसी को मानना होगा और इन्हें विधायक का सम्मान भी देना होगा। निर्वाचित विधायक का हर मौके पर जोरदार विरोध करना होगा और उसे क्षेत्र में घुसने से रोकना होगा।’’

जोरदार तालियाँ और गगन भेदी नारे।

‘‘…..और दूसरी बात! ये नौ दिन हम हिन्दुओं के सबसे पवित्र दिन होते हैं। इस बात की गारण्टी होनी चाहिए कि इन बचे दिनों में पूरे इलाके की जमीन पर एक कतरा किसी भी जानवर का खून गिरा तो उस खून को उस कसाई के खून से धुला जायेगा।”

तालियों के साथ कर्णभेदी नारों से समर्थन।

‘‘…..नवरात्रि के बाद भी वे जानवर बिल्कुल भी न कटने पावें जिनको हमारा हिन्दू समाज नहीं खाता है, और हिन्दुओं के लिए हलाला मांस पूरी तरह से वर्जित होगा। जो हिन्दू इसे नहीं मानेगा उसे हमारे सामाजिक दंड भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।”

प्रशांत जी के भाषण ने कार्यकर्ताओं के दिमाग को गरम कर दिया। उनका भाषण खत्म होते ही मोटरसाइकिलों के साइलेंसर खुल गये। उनके इंजन के तड़तड़ाहट के साथ जय श्री राम, ‘जय हिन्दू राष्ट्र‘ के नारे इलाके के चारों दिशाओं में गूंज कर दहशत फैला दिये।

तब से लेकर अब तक पूरे इलाके का जर्रा-जर्रा रह रह कर नौरंगिया दहशत से कांप जा रहा था। हर एक झुन्ड में दस पंद्रह मोटरसाइकिलों पर नौरंगिया गमछा लहराते और नारे लगाते हुए जिस रास्ते से वे गुजरते लोगों के कलेजे काँप उठते। मुसलमानों के धंधे बंद हो गये। उनकी औरतें अपने घरो में कैद हो गयीं। विरोधी अपने-अपने दड़बों में दुबक गये। किसानों के पशुओं की बिक्री एकदम रुक गयी और हर चट्टी चौराहे पर नौरंगिया राजनीति शुरू हो गयी। पूरे इलाके में दहशत भरी सनसनी और तरह-तरह की अफवाहें बार बार उड़ने लगीं।

रज्जब अली के हुक्के में अब सिर्फ राख बची हुई थी। उसे वह एक कोने में गिराकर बरामदे से बाहर निकल गये। चांद की रोशनी धीरे-धीरे मद्धम होती जा रही थी। वह गोहरौर को एक टक निहारने लगे। रात के सन्नाटे में आज वे अजीब-से डरावने लग रहे थे। पुरवा हवा के झोंके ने उन्हें कुछ सुकून दिया। वह बरामदे में लौट आये। लालटेन उठाकर करघे के पास रखी और उसके सामने बैठ गये। करघे के तमाम धागे टूटे हुए थे। वह धीरे-धीरे उन्हें आपस में जोड़ने लगे। उसी समय बाहर किसी के आने की आहट हुई। वह चौंक कर अंधेंरे मे घूरने लगे।

‘‘चचा’’

‘‘कौन है? अरे श्याम बाबू। आओ बैठो।’’

श्याम बाबू बरामदे में आकर बिस्तर पर सिर झुका कर बैठ गये।

‘‘और बताओ श्याम। इतनी रात गये कैसे आना हुआ?’’

“बस ऐसे ही, घर आया तो शोभा ने बताया कि आप मुझे पूछ रहे थे। उसने आप को खाना खाने के लिए बुलाया है।”

”मैंने तो अभी-अभी खाना खा लिया है श्याम।” रज्जब अली ने झूठ बोला, “वैसे तो मैं तुम्हें रोज ही पूछता हूँ। इसमें नयी बात क्या है?”

श्याम बाबू खामोश हो गये। बरामदे में सन्नाटा पसर गया। रज्जब अली धागे को जोड़ने लगे। उनसे कुछ खास बाते करने के लिए वह आये हुए थे। लेकिन वह बात चाह कर भी जबान से नहीं निकल पा रही थी। एकाएक उनके मुँह से वह बात निकली जिसे वह पूछने की कभी हिम्मत नहीं किये थे।

‘‘चाचा तुम लोग बड़े का गोश्त क्यों खाते हो? क्या उसके स्वाद की वजह से या हम हिन्दुओं के विरोध में ?’’

रज्जब अली के ऊपर मानो घहरा कर बिजली गिरी। उनका पूरा शरीर सुन्न हो गया। वह चुपचाप टूटे धागे को निहारते रहे। उन्हें लगा कि उनके कलेजे के ऊपर धीरे-धीरे कुछ जम रहा है। उनकी आंखें भरभरा उठीं और गला रुंध गया। उन्होंने कातर निगाहों से श्याम की तरफ देखा और होंठों पर फीकी मुस्कान लाते हुए बोले, ‘‘श्याम, आज तक तुम अपने चचा को नहीं समझ पाये तो पूरे मुल्क के मुसलमानों को क्या समझोगे ? …… तुम्हारी और मेरे नजीब की छठी एक ही दिन थी। तुम दोनों को मैंने अपनी जांघ पर बैठा कर बकरी का दूध पिलाया है। तुम्हारा बाप जब तक जिंदा था, उसने रात में कभी मेरी रसोई देखे भोजन नहीं किया। जब कभी भी मेरे घर मेंहमान आये, सांझ होते ही तुम्हारे छत से राशन की पोटली मेरे आंगन में आ गिरती थी। जब तुम्हारी नौकरी लगी बेटा, उस रोज सांझ को मैं और तेरा बाप एक साथ घर से निकले थे। तेरे बाप ने डीह बाबा को दिया जलाया, और मैंने सैयद की मजार पर अगरबत्ती सुलगाया था। तकलीफ उस दिन हुई बेटा, जिस दिन तुम पहली पगार पाये। तुम पुरोहित को धोती तो दिये लेकिन इस चचा को तुमने एक गमछा भी देना मुनासिब नहीं समझा। मैं अभागा कि तेरा बाप मुझसे पहले मर गया। अल्लाह उसे जन्नत में सुखी रखे। जबसे वह मरा तबसे तुम रसोई तो क्या मेरे दरवाजे पर झाँकने तक नहीं आये। आज आये भी तो मेरे अजीज का बेटा नहीं बल्कि एक हिन्दू बन कर।”

श्याम की धमनियों में रक्त प्रवाह धीमा पड़ गया। वह चुपचाप किसी अपराधी की तरह सिर झुकाकर बाहर जाने लगा। रज्जब अली ने हंसते हुए पुकारा, ‘‘रुक जा श्याम, अपने सवाल का जवाब तो लेते जा।’’

श्याम न चाहते हुए भी दीवाल के सहार खड़ा हो गया।

”बेटा, जो तेरे घर मे रोज बनता है, वह हमारे लिए कभी-कभार किस्मत से मिलने वाली चीज होती है। जिसके पास एक अंगुल जमीन न हो उसके लिए अपने परिवार का पेट पालना आसान नहीं होता । मेरे तन से नाती-पोते सहित ग्यारह पेट हैं। इन सबके लिए बडे़ का गोश्त आता है। जिससे पूरी पतीली जूस तैयार होता है। उसी को दाल समझो चाहे सब्जी। इसी से रात में पूरे परिवार का पेट भरता है। सुबह उसी का निवाला करके बच्चे स्कूल या बकरी चराने जाते है और बहुएं तुम्हारे घरों में सिन्दूर, बिन्दी बेचने जाती हैं। अब बचा तुम्हारा चचा। यह पूरे दिन भूखे पेट करघा पर कबीर वानी गाते हुए रात होने का इंतजार करता है।”

श्याम को लगा कि उसके पैरों की सारी शक्ति चली गयी है। उसने धड़ाम से जमीन पर बैठ कर घुटनों में अपना चेहरा छिपा लिया।

”जा बेटा घर जा और हाँ, सुना है कि इस इलाके के मुसलमानों की रसोई सूँघने की जिम्मेदारी तुम्हें ही मिली है। बेटा, मेरी रसोई सूँघने से पहले तू अपने मरे बाप को जरूर याद कर लेना। जाओ बेटा अल्लाह तुम्हें बरकत दे।”

श्याम के कानों में हथौड़े बजने लगे।

रज्जब अली करघे की आदिम राग पर कबीर बानी गाने लगे।

कबीर बानी ही उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिली थी। यही गाकर वह अपनी जिन्दगी के हर रंग के लम्हों को जिये। कभी खुशियों की सौगात मिली तो उस पल गाकर जिन्दगी में चार चाँद लगाये और दुःखों का पहाड़ गिरा तो उसमें गाकर उस बोझ को हल्का किये। भरे पेट गाये तो जन्नत का एहसास हुआ और भूखे पेट गाये तो मरी जिन्दगी वापस मिली। कबीर बानी उनके जीवन का आधार रही। उनकी बीवी जब तक जिन्दा थी, करघे पर उनके साथ सुर से सुर मिलाकर गाती रही। उसके मरने के बाद उनका सुर तन्हा हो गया। उन्होंने बहुत कोशिश की कि अपने पूर्वजों की इस अनमोल धरोहर को अपनी संतानों को सौप दें, लेकिन वे अभागे हमेशा इससे दूर ही रहे।

वह करघे से उठकर लालटेन लेकर रसोई में गये। घर का कोना-कोना सिसक रहा था। रसोई में सिर्फ सूखी रोटी और एक कटोरे में गुड़ था। उनकी भूख तो मर ही चुकी थी फिर भी उन्होंने दोनो उंगली से गुड़ निकाल कर चाटा और मटके से पानी लेकर भर पेट पिया। हलक में पानी जाते ही उन्हें जुबेर की याद आ गयी। वह घर से निकल कर दरवाजे पर सांकल चढ़ाये और टार्च लेकर जुबेर के घर के लिए निकल पड़े।

चाँद डूब चुका था। अंधेरा अपने आगोश में सब कुछ समेट चुका था। टार्च की रोशनी देखकर एक कुत्ता कूँ-कूँ करता हुआ उनके पास आया और धीरे-धीरे उनके साथ चलने लगा। जुबेर अपने दरवाजे पर नहीं था। रज्जब अली ने टार्च की रोशनी इधर-उधर घुमाकर देखा, लेकिन वह कहीं दिखाई नहीं दिया। उसका नाम लेकर उन्होंने तेज हांक लगायी, ”जुबेर­­­­जुबेर­­­­।’’

‘‘वह हमारे यहाँ है चचा! आप भी चले आइए।’’ सरवन कहार की तेज आवाज आयी।

रज्जब अली जब उसके दरवाजे पर पहुँचे तो देखा कि जुबेर चारपाई पर लेट आसमान को शायरी सुनाकर अपने जाने जिगर को खुदा से वापस मांग रहा था। रज्जब अली के मुँह से अनायास ही निकला, ‘‘या खुदा! क्या सुकून की जिंदगी जीने के लिए अब हमें भी जुबेर ही बनना पडे़गा?”

‘‘आइए चचा, मैं आप को ही बुलाने जा रहा था।” सरवन ने कहा। फिर उसने अपनी घर वाली को आवाज दिया, “चचा आ गये हैं। हम दोनों के लिए खाना परोसो।”

‘‘अरे नहीं रे, मैं खाना खा कर आ रहा हूँ।’’

‘‘कब खाये चचा, कहाँ खाये, किसने बनाया था?’’

‘‘दिन का बचा था। उसी को खा लिया। उसमें से जुबेर के लिए भी रखा है।’’

”जुबेर तो खाना खा लिए हैं चचा लेकिन तुम झूठ मत बोलना। हमारे होते तुम उपवास करके सोवोगे तो हमें पाप लगेगा।“

”अरे, मैं अपने घर में क्यूँ झूठ बोलूं । भूखा रहता तो मैं माँग कर खा लेता। तुम लोग खा लो। खाने का समय निकला जा रहा है।” वह अपने घर वापस जाने के लिए मुड़े और जुबेर से कहा, “जुबेर, अब तुम भी सो जाओ। ये लोग दिन भर के थके हैं। इन्हें भी सोने दो।”

‘‘खुदा ने मेरी बात पर यकीन कर लिया है भाईजान। अब वह जरूर आ जायेगी। उसके आते ही मैं उसे लेकर मदीने चला जाऊँगा। तुम भी हमारे साथ चलोगे?”

रज्जब अली तेज कदमों से आगे बढ़ गये। कुत्ता जुबेर की चारपाई के पास बैठ कर कूँ-कूँ करने लगा। रात तो अभी ज्यादा नहीं हुई थी लेकिन गाँव के तमाम घरों के दिये बुझ चुके थे। शोभा अपने व्रत के लिए सिंघाड़े के आटे का हलवा बना रही थी। श्याम अपने बिस्तर पर बच्चों के साथ सोने की कोशिश कर रहा था। उसे अभी नींद का असर आया ही था, कि मोबाइल की घंटी बज उठी। वह चौंक कर उठा और फोन उठाया, ‘‘सर बताइए, इतनी रात गये कैसे ? जी मैं घर पर ही हूँ। …कहां पर ? देखिए मैं इतनी दूर रात को अकेले नहीं जा सकता। काम क्या है ?….क्या…..अरे, ऐसा मत कीजिए सर। हार का गम मुझे भी बहुत है। आप प्रतिशोध में इतना पागल मत हो जाइये। प्लीज मेरी बात तो सुनिए हैलो……हैलो।”

फोन कट गया। वह काफी बेचैन हो उठा। मोबाईल को री-डायल किया। फोन व्यस्त मिला। बार-बार मिलाया, लेकिन हर बार फोन व्यस्त ही मिला। वह तेजी से कमरे के बाहर निकलकर चहलकदमी करने लगे। शोभा भी रसोई से निकल कर आ गयी। उसे घबराया हुआ देख कर वह भी घबरा गयी। ”क्या हुआ। आप इतने परेशान क्यों हैं? किसका फोन था?”

‘‘शोभा, अभी कुछ अनर्थ होने वाला है।”

वह चीख पड़ी, “कहाँ ?’’

‘‘यह तो मुझे नही पता, लेकिन कहीं होगा जरुर।’’

श्याम ने फिर फोन मिलाया। घंटी पूरी गयी लेकिन फोन नहीं उठा। उसके कलेजे की धड़कन निरंतर तेज होने लगी। वह तेजी से छत पर भागा। उसके पीछे शोभा भी घबराकर छत पर चली गयी।

उसके कुछ ही देर के बाद देवी मंदिर पर दो मोटरसाईकिलें आ कर रुकी।

मंदिर के बरामदे में लालटेन की मद्धिम रोशनी में बाबा चटाई बिछा कर लेटे हुए थे। बुखार से उनका बदन टूट रहा था। अरिमर्दन बाबू के घर की चाय से उन्हें कुछ राहत जरूर मिली थी लेकिन बुखार अब भी तेज था। वह खाना भी वापस कर दिये थे। मोटरसाइकिल की आवाज सुनकर वह लेटे हुए ही गरदन उठा कर निहारने लगे। उन मोटरसाइकिलों पर चार युवक थे। बाइक चलाने वाले दोनों युवकों की उम्र बाइस-चौबीस साल से ज्यादा नहीं थी। उन चारों की गर्दन में नौरंगिया गमछा लटक रहा था। वे दोनों शरीर से मरियल लग रहे थे। उनके शरीर पर सस्ती जींस, चटख चारखाने वाली शर्ट और पैरों में हवाई चप्पलें थी। दोनों के सिर के निचले हिस्से के बाल बेहद महीन थे लेकिन ऊपरी हिस्से के बाल काफी लम्बे थे। दाढी और मूंछों के बाल तो काफी कम थे लेकिन ठुड्डी पर बकरे की तरह के लम्बे बाल लटके हुए थे। उनके बालों पर लाल मेंहदी लगी हुई थी। उनकी जींस कमर के नीचे सरक गयी थी। दोनों के कानों में मोबाइल की लीड थी। जबकि कान के लरों में पीतल के छल्ले झूल रहे थे।

उनके पीछे बैठने वाले दोनों युवक उनसे उम्र में कुछ ज्यादा थे। वे स्वस्थ और खूबसूरत थे। उनके कपड़े काफी महंगे थे। बाल करीने से कटे हुए थे। चेहरे पर हल्की काले भूरे रंग की दाढ़ी, और मूँछे ऐंठी हुई थीं। उनमें से एक के हाथ में महंगा मोबाइल था जिसे वे बार-बार गुरू कह रहे थे। वे चारों बरामदे में आकर खड़े हो गये।

‘‘पांव लागी बाबा।’’

‘‘जीते रहो बाबू लोग’’ बाबा कराहते हूए उठकर बैठ गये, “इतनी रात गये कैसे?”

‘‘नवरात है न बाबा। जरा देवी माँ के दर्शन के लिए चले आये।” गुरू ने विनम्रता से कहा।

‘‘वह तो ठीक है बाबू, लेकिन जूता-चप्पल बाहर ही निकाल कर आये होते।”

”गलती हो गयी बाबा, फिर नहीं होगी।” वे चारों कुछ दूरी पर पालथी मार कर बैठ गये।

‘‘किस गांव के हो?’’

‘‘इसी गांव के बाबा।’’

‘‘ना बाबू, तुम लोग तो इस गांव के नहीं हो।’’ बाबा उन्हें ध्यान से निहारते हुए बोले, ‘‘इस गांव के बच्चे-बच्चे को मैं पहचानता हूँ।”

‘‘देवी के दर्शन के लिए गांव बताना जरूरी है, बाबा?” गुरू ने कहा, “हमें जोरों की प्यास लगी है, कोई बर्तन है?”

‘‘सामने नलका है। वहीं जाकर पी लो।’’

“उसे तो हम देख ही रहे हैं बाबा, लेकिन बिना बर्तन के पानी नहीं पिया जा सकेगा।”

“मेरे पास इस कमंडल के सिवा और कुछ नहीं है।”

“यह भी चलेगा बाबा।” गुरू ने दोनों मरियल लड़कों को इशारा किया। वे दोनों झट से उठे। उसमें से एक ने कमंडल में पानी डाला और दूसरा मोटर साइकिल के थैले में से शराब की बोतल निकाल ले आया। वह तुरन्त बोतल की ढक्कन को दांत से खोलकर कमण्डल के पानी में मिलाने लगा। बाबा का माथा जोर से ठनका, ‘‘अरे बाबू! तुम लोग यह क्या कर रहे हो? देवी मन्दिर में अधर्म। मेरा कमण्डल भी अशुद्ध हो गया।’’

‘‘शान्त रहो बाबा। हम इसे धुलकर रख देंगे।’’

‘‘नहीं बाबू, यह तो नहीं होगा। राम राम राम। यह तो महापाप है। इसे तो मैं हरगिज नहीं होने दूँगा।’’ बाबा झपटकर कमण्डल को पकड़ लिए और उसे छीनने लगे। उसी छीना-झपटी में थोड़ी सी शराब छलक कर फर्श पर गिर गयी। गुरू को गुस्सा आ गया और उसने बाबा को धक्का दे दिया। बाबा छिटककर दूर जा गिरे। थोड़ी देर बाद बाबा हांफते हुए उठे और कमण्डल की तरफ फिर बढ़े।

‘‘बाबा, आगे मत बढ़ना।’’ गुरू ने चेतावनी के लहजे में बोला, ‘‘हमारे पूर्वज नवरात्र में शराब पीकर देवी माँ के सामने बलि दिया करते थे। तुम ज्यादा टें-टें करोगे तो आज हम तुम्हारी ही बलि चढ़ा देंगे।’’

बाबा सिहर कर खड़े हो गये। उनका शरीर क्रोध और भय से थर-थर कांप रहा था। अगले पल वह फिर हिम्मत करके कमण्डल पर टूट पड़े। गुरू ने उनकी गर्दन पकड़कर उठाया और मन्दिर के खम्भे के पास पटक दिया। उन सबने मिलकर गमछे से बाबा का हाथ पैर और जबड़ा फंसाकर खम्भे से जकड़कर बांध दिया। बाबा की आँखें भय से उबल पड़ी और वह गों-गों करने लगे।

लड़कों ने बहुत ही इत्मिनान से बारी-बारी मुँह पर चुल्लू लगाकर शराब पी और कमण्डल को बाबा के पास फेंक दिया। गुरू ने अपने मोबाइल पर समय देखना चाहा उसी समय घण्टी बज उठी। एकाएक सभी चौकन्ने हो गये। मोबाइल पर महज दो सेकेण्ड की बात सुनते ही वह बोल पड़ा, ”शुरु हो जा।’’

चारों एक झटके से खड़े हो गये। एक मरियल लड़के ने लपककर मन्दिर का कपाट खोला और अन्दर घुस गया। देवी की मूर्ति के सामने अभी भी दीया जल रहा था। लड़के ने फुर्ती से लाउडस्पीकर को ऑन किया । उसका वाल्यूम बढ़ाकर माउथ पीस को दो बार ठोंका। इसके बाद वह बेहद सधी हुई आवाज मे चिल्लाया, ‘‘जागो गांव वालो, जागो। जुलाहा बस्ती मे गौकशी हो रही है।”

इस बात को उसने रुक-रुक कर तीन बार बोला। इसके बाद झट से मशीन को बन्द किया और दौड़कर अपनी बाइक पर पहुँचा। उतनी ही फुर्ती से गुरू की लाठी ले कर देवी के सामने पहुंचा और हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया, ‘‘माँ हमारी रक्षा करना।” और लाठी से बंधे कपड़े को दीया से स्पर्श किया। लाठी मशाल बन गयी। वह झट से पीछे घूमा और उसकी लौ को बाबा की दाढ़ी से सटा दिया। बाबा की दाढी झुलस गयी और वह बुरी तरह से तड़प उठे। गुरू भी दौड़कर मोटर साइकिल पर बैठ गया। दोनों मोटरसाइकिलें काफी तेज रफ्तार में गाँव के बाहर से होती हुई जुलाहा बस्ती की तरफ बढ गयीं।

लाउड स्पीकर की आवाज सुन पूरा गाँव जागकर अपने-अपने दरवाजे पर खड़ा हो गया। इस अप्रत्यशित आवाज से किसी को कुछ समझ मे नहीं आ रहा था कि यह सच है या किसी ने उदण्डता की है ? सभी लोग एक दूसरे से तेज आवाज में पूछने लगे- क्या मामला है भाई ?

छत पर खड़े श्याम का शरीर काँप रहा था। उसे लगा कि अभी वह गश खाकर गिर जायेगा। उसकी जुबान सूख कर तालू मे चिपक गयी। शोभा भी डर गयी। वह जल्दी-जल्दी श्याम के शरीर को रगड़ने लगी। उसी समय उन दोनों की नजरें उस मशाल पर पड़ीं जो तेजी से लपलपाती हुई बढी चली आ रही थी। उसे देखकर श्याम हलक फाड़कर चीख पड़ा, “दौड़ो गांव वालो दौड़ो। वे लोग जुलाहा बस्ती को फूंकने आ रहे हैं।”

वह विक्षिप्त-सा चिल्लाते हुए छत से नीचे उतरा और गांव मे निकल गया।

शोभा काठ की मानिन्द स्थिर होकर एकटक मशाल को देख रही थी। जिसके पीछे पचासों मोटर साइकिले अंधेरे को चीरते हुई तेजी से बढ़ी चली आ रही थीं। वह एकाएक चिल्ला पड़ी, ‘‘रज्जब अली चचा, भाग आओ। हमारे घर, भाग आओ चचा।’’

पूरा गांव लाठी, भाला, गंडासे लेकर ललकारते हुए दौड़ पड़ा। परजौटी-चमरौटी से मर्दों के साथ औरतें भी हांड़ी-गगरी लेकर निकल पड़ी। गांव और उसके चारों तरफ देखते-देखते टार्च की रोशनी में कोहराम मच गया।

उसके पहले ही हमलावरों की मोटरसाइकिलें जुलाहा बस्ती के सामने आ कर खड़ी हो गयीं। हर मोटरसाइकिल पर दो सवार थे। पीछे बैठने वालों के हाथ में कार एवं बाइक के टायर थे जिसमें पेट्रोल से सने बोरे ठूंस कर भरे हुए थे। कुछ के हाथ में बड़े-बड़े झोले थे। जिसमें पेट्रोल से भरे गुब्बारे थे। वे काफी फुर्ती से उतरे। गुरू ने दौड़-दौड़ कर मशाल से उन टायरों में आग लगा दी। वे कार के जलते टायरो को जुलाहों के घरों में लुढ़का दिये और बाइक के जलते हुए टायरों को एक-एक कर मकानों के ऊपर फेंकने लगे। उसके साथ ही भारी संख्या में घरों के ऊपर पेट्रोल के गुब्बारे बरसने लगे। देखते ही देखते पूरी जुलाहा बस्ती तड़तड़ाकर जल उठी। आग की लपलपाती लपटें आसमान छूने लगीं और काला धुआं तेजी से पूरे गांव को अपने आगोश में ले लिया।

चारों तरफ से चली आ रहीं ललकारती भीड़ देखकर हमलावरों को पहले तो लगा कि ये सारे लोग गोकशी के नाम पर उनके समर्थन में आ रहे हैं। ऐसा उन्हें समझाया भी गया था। लेकिन उसी समय बबुआन के बीसों छतों से राइफल, बंदूकों से हवाई फायरिंग शुरू हो गयी। हमलावर भी अपने को घिरता हुआ देखकर अंधाधुंध फायरिंग करने लगे। लोगो का हुजूम जुलाहा बस्ती के बाहर ही ठिठक गया। हमलावर काफी पेशेवर तरीके से अपने काम को अंजाम देकर फायरिंग करते और ,‘‘जय श्री राम’’ ,जय हिन्दू राष्ट्र’’ का नारा लगाते हुए सुरक्षित भाग निकले।

बबूआन से अब भी फायरिंग हो रही थी। अब तो अगल-बगल के गांवों से भी होने लगी थी।

हमलावरों के भागने के बाद लोगों की भीड़ आग बुझाने को टूट पड़ी। लोग लाठियों के सहारे जलते टायरों को खींचकर मैंदान में फेंकने लगे। औरतें चिल्ला-चिल्ला कर गालियाँ देते हुए नलका चला रही थीं और मर्द दौड़कर बाल्टी के पानी को आग पर फेंक रहे थे। काफी मशक्कत के बावजूद जुलाहा बस्ती को बचाया नहीं जा सका। बह देखते ही देखते सुलगते खण्डहर में तब्दील हो गयी। मैदान में जगह-जगह तमाम टायर काला धुआं उगलते हुए जल रहे थे। पूरा मैदान किसी श्मशान की माफिक लग रहा था जहाँ एक साथ पचासों चिताएं जल रही हों। उसी के बीच अरिमर्दन बाबू छाती पीट-पीट कर दहाड़ रहे थे, “….. यह हमला हमारे गाँव पर नहीं बल्कि हमारे स्वाभिमान पर हुआ है ….. इस हमले का कलंक हमारे साथ हमारे पूर्वजों के माथे पर भी लगा है…… आज हमारा कोई पुराना बैरी हमें चुनौती दिया है ….. हम उसकी चुनौती को स्वीकार करते हैं …… और हम अपने पूर्वजों की कसम खाते हैं कि जब तक इसका बदला नहीं ले लेगें तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे…..।” उनके मुँह से झाग बहने लगा। पूरा गाँव गुस्से में तो था ही नौरंगिया सेना में रहे युवक भी सकते में थे। एक तरफ श्याम बाबू किसी अपराधी की तरह पश्चाताप की आग में झुलस रहे थे। उनके ऊपर अरिमर्दन बाबू की नजर पड़ी। वह दौड़ कर आये और उनका बाल पकड़ कर झिंझोड़ते हुए बोले, ”बोलो श्याम बाबू, यही तुम्हारा राष्ट्रवाद है? अपने ही लोगों की झोपड़ी फूँक कर तुम लोग कौन सा हिन्दू राष्ट्र बना रहे हो ? यदि यही है तो मुझे अपने इस राष्ट्र से निष्कासित कर दो।”

श्याम बाबू का शरीर बेजान हो गया। वह सिर पकड़ कर जमीन पर बैठ गये।

अरिमर्दन बाबू भीड़ में रिंकू और बबलू को तलाशने लगे। वह जोर से चिंघाड़े, “कहाँ हैं रिंकू और बबलू ?”

भीड़ में से वे दोनों अपने-अपने बाप के साथ आकर उनके सामने सिर झुकाकर खडे़ हो गये। उन्हें देखते ही अरिमर्दन बाबू के शरीर में आग लग गयी। उनके सिर का बाल अपने दोनों हाथों में भींचकर दोनों के माथे को आपस में एक झटके से टकरा दिये, “तुम दोनों सबसे बड़े नौरंगिया सैनिक बने हुए थे। इस बस्ती को फूँकने में जरूर तुम दोनों का हाथ है।”

उन दोनों के बाप हाथ जोड़कर रिरियाने लगे, “दादा ! हमारा विश्वास करो । जिस दिन आप हमें हिदायत दिये, उसी दिन से हम इन्हें घर में कैद करके रखे हैं। आज तो ये हमारे साथ आये हैं।”

“तुम लोगों के कहने पर मैं विश्वास नहीं करूंगा। ये निहायत गन्दे और आवारा लड़के हैं। मैं पता करूंगा। ये कुछ नहीं तो मुखबिरी ही किये होंगे।”

“आप कहें तो हम देवी मंदिर में शपथ भी खा लें।”

“असहाय बाप अपनी निकम्मी औलाद के लिए कहीं भी झूठी कसम खा सकते हैं। मेरी नजर में ये बहुत दिनों से खटक रहे हैं। इनसे बोल दो कि ये पूरे पाँच साल के लिये गाँव छोड़कर कहीं और चले जायें। यह मेरा आदेश है।”

चारों तरफ सन्नाटा छा गया। उस सन्नाटे को चीरता हुआ मनकी का रुँधा गला चिल्लाया, ”हे देवी मइया, जिन पापियों ने इन सुग्गों का बसेरा फूँका उनका शरीर नमक की तरह गल जाय…… उनकी बहन-बेटी कोठे की रोटी तोड़ें …… उनके बच्चे गली-गली में भीख माँगें।”

“चुप ……।” अरिमर्दन बाबू की चीख से एक बार फिर माहौल में सन्नाटा पसर गया।

भीड़ में एक किनारे जुबेर चुपचाप खड़ा होकर सारा मंजर निहार रहा था। वह बेड़ी लगे पैरों से धीरे-धीरे आगे बढ़ा और दोनों हाथों से छाती पीट-पीट, सिसक-सिसक कर अपनी किस्म की शायरी कहते हुए अपने सुलगते मकान के सामने जाकर खड़ा हो गया। उसकी निगाहें तेजी से कुछ तलाश रही थीं। जैसे ही उसकी नजर अधजली ढोलक पर पड़ी, वह पछाड़ खाकर उस पर गिर पड़ा। उसे अपने कलेजे से चिपकाकर वह फफक कर रो पड़ा, “या खुदा ! उसे तो तूने अपने पास बुला ही लिया, आज इसे भी नहीं बख्शा। अब तू ही बता मेरे मालिक। मेरी जिन्दगी किसके सहारे कटेगी ? अब मुझ पर रहम कर, तू मुझे भी अपने पास बुला ले।”

वह किसी अनाथ दुधमुहें बच्चे की तरह बिलख-बिलख कर रोने लगा।

पूरी भीड़ की आँखें भरभरा उठीं।

“अरे, रजबल्ली कहाँ हैं ?” एकाएक अरिमर्दन बाबू चिल्लाये।

भीड़ अपने अगल-बगल उन्हें ढूँढ़ने लगी। उस भीड़ में रज्जब अली कहीं नहीं थे।

“उनके घर में तो देखो।”

भीड़ के साथ श्याम बाबू भी उनके घर की तरफ दौड़े। घर बुरी तरह जल चुका था – करघा, बिस्तर, लालटेन, हुक्का सब कुछ जल कर राख हो चुका था। घर की खपरैल जल कर जमीन पर आवां की तरह सुलग रही थी। तमाम लोग मिलकर उन दहकते ढूँहों को कब्र की मानिन्द खोदने लगे। शुक्र था कि रज्जब अली वहाँ भी नहीं थे।

अरिमर्दन बाबू अपने दोनों कान को हथेलियों से दबा गला फाड़ कर चिल्लाये, “रजबल्ली …… रजबल्ली …… रजबल्ली ……!”

उनकी आवाज पूरे गाँव और सिवान में गूँज उठी, लेकिन कहीं से कोई आवाज नहीं आयी।

भीड़ उन्हें ढूँढने के लिए निकल पड़ी। टार्च की रोशनी में झाड़-झखाड़, कुइयाँ-इनार सब कुछ ढूँढ़ा गया, लेकिन रज्जब अली नहीं मिले। गाँव वालों की परेशानी बढ़ गयी। अरिमर्दन बाबू को एकाएक ख्याल आया। वह चौंक कर बोले, “चलो, देवी मंदिर चलें। हो सकता है वह बाबा के पास हों।”

सभी लोग देवी मंदिर को चल पड़े।

मंदिर पर पहुँचते ही सभी लोग सकते में आ गये। लोग स्तब्ध हो कर एक दूसरे का मुँह निहारने लगे। वहाँ रज्जब अली तो नहीं थे, लेकिन बाबा मंदिर के खम्भे से बँधे हुए थे। लालटेन जल रही थी। फर्श पर कमंडल और दारू की बोतल लुढ़की पड़ी थी। मंदिर का कपाट खुला था लेकिन दीपक बुझ चुका था। बाबा भीड़ को देखते ही कसमसाते हुए गों-गों करने लगे। लोगों ने दौड़कर उन्हें बन्धन मुक्त किया। बाबा बन्धन से छूटने के बाद कुछ देर तक निश्चल पड़े रहे। उनका शरीर थर-थर काँप रहा था और सीना धौंकनी की तरह चल रहा था। उनकी आँखों में दहशत साफ नजर आ रही थी। वह सामान्य होते ही चुपचाप उठे और मंदिर की सीढ़ियाँ उतरकर अँधेरे में भागने लगे। अरिमर्दन बाबू आगे बढ़कर चिल्लाये, “रुक जाइए बाबा …… रुक जाइए ।”

बाबा अपनी पूरी ताकत से दौड़ने लगे। टार्च की रोशनी उनका पीछा करने लगी। कुछ ही दूर जाने पर वह पकड़ में आ गये। लोगों ने उन्हें वापस लाना चाहा, लेकिन बाबा एक पतले पेड़ का तना बाँहों में भींचकर बैठ गये। किसी तरह से लोग उन्हें कन्धे पर लादकर मंदिर के बरामदे में ले आये। बाबा फफक कर रो पड़े। वह हाथ जोड़कर अरिमर्दन बाबू से बोले, ”बाबू, अब मैं इस गाँव में नहीं रह सकता। आपके गाँव को पाप लग गया। आप मुझे मुक्ति दें। मैं भीख माँग कर खा लूँगा लेकिन अब इस गाँव का अन्न-जल मेरे लिए हराम है।”

“बाबा, आप उन्हें पहचाने? उसमें कोई अपने भी गाँव का था ?” अरिमर्दन बाबू ने विनम्रता से पूछा।

“नहीं बाबू, अपने गाँव का तो कोई नहीं था, लेकिन गाँव के किसी भेदिया के बिना यह हुआ भी नहीं।”

“हमसे चूक हो गयी बाबा। हम नहीं समझे कि अब लोग हमारे खून को पतला समझ लेगें।” अरिमर्दन बाबू हाथ मलते हुए बोले, “बाबा, मैं आपके पैर पड़ता हूँ। आज हमारी बदनामी तो बहुत हुई। आपके चले जाने से दुनिया हम पर हँसेगी।”

अरिमर्दन बाबू और गाँव के लोग उन्हें तरह-तरह से समझाने लगे। बाबा अपने घुटनों में मुंह छिपाकर लगातार रो रहे थे। एकाएक वह गर्दन उठाकर बोले, “ रजबल्ली कहाँ है ?”

सभी लोग खामोश हो गये।

”तुम लोग चुप क्यों हो? वह जिन्दा तो है ?”

“हाँ बाबा वह ठीक है। कल सुबह उससे आपकी भेंट होगी।”

“मुझे ही ले चलो उसके पास।”

अरिमर्दन बाबू उन्हें समझा बुझा कर आश्वस्त किये।

अदिमर्दन बाबू ने सबको हिदायत दिया, “कल सुबह रजबल्ली को ढूँढकर लाना है। एक हफ्ते के अन्दर पूरा गाँव मिलकर जुलाहा बस्ती के मकानों की मरम्मत करायेगा। इसके बाद सभी को ढूँढ़कर घर वापस लाना है। अब से कोई नौरंगिया गमछे को हाथ नहीं लगायेगा और हमलावर हमारे पूरे गाँव के दुश्मन हैं। आज हम देवी माँ की कसम खाते हैं कि उनसे हम बदला जरूर लेंगे।”

चार लोग मंदिर पर ही रुक गये और बाकी लोग अपने-अपने घर वापस लौट गये।

श्याम बाबू लड़खड़ाते कदमों से अपने घर के अन्दर गये। उनके दोनों बच्चे बिस्तर पर आँखें मूँदकर लेटे हुए थे जिनके बीच में शोभा बैठकर चुपचाप उनके बालों में उंगलियाँ फिरा रही थी। श्याम बाबू बिना किसी आहट के बिस्तर पर बैठ गये। शोभा काफी देर तक उन्हें कातर निगाहों से देखती रही। उसका चेहरा पीड़ा से बिल्कुल सपाट हो गया था। वह बेहद दुःखी और शान्त स्वर में बोली, “आ गये ….. चचा कहाँ हैं?”

श्याम बाबू का सिर झुका ही रहा। उनके गले से कोई आवाज नहीं निकली। दोनों बच्चे उठकर बैठ गये और चुपचाप श्याम बाबू को निहारने लगे। उनकी आँखें दहशत से पीली हो चुकी थी। वे रह-रह कर डर से काँप जा रहे थे।

“अब हुई तुम्हारे दिल को तसल्ली? इसी दिन के लिए तुम अपने बच्चों तक की चिन्ता भी छोड़ दिये थे ?”

“मैं उसमें शामिल तो नहीं था।” श्याम बाबू हल्की नजर उठाते हुए धीरे से बोले।

“उससे क्या होता है? तुम उनकी साजिश में शामिल तो थे। तुम भी इस पाप से मुक्त नहीं हो सकते। जबसे बाबू जी मरे, तुम एक टूटे कमरे की मरम्मत भी नहीं करा पाए। ये गरीब बेचारे अपनी जिन्दगी का एक-एक कतरा जोड़ कर अपने बच्चों के लिए झोपड़ी बनाये। तुम लोगों से वह भी देखा नहीं गया। उसे जलाकर पल भर में तबाह कर डाला। तुम लोग दिन रात भगवान का नाम लेकर चिल्लाते हो, लेकिन उस भगवान से भी नहीं डरे। उन गरीबों की आह, क्या तुम्हारे बच्चों को कभी सुकून से जीने देगी?”

“मैं नहीं समझ सका कि वे इतने हिंसक होंगे।”

“जिनके साथ तुम इतने दिनों तक रहे उन्हें समझ भी नहीं सके। यह तो कोई मूर्ख ही कह सकता है। मुझे आज एहसास हुआ कि तुम एक जाहिल इंसान हो। सच कहूँ, तुम्हारे शरीर से आज मुझे किसी आदमखोर जानवर की दुर्गन्ध आ रही है। तुमने आज बाबू जी के मुंह पर कालिख पोत दिया। मुझे तुमसे घृणा हो गयी है। अच्छा तो यही होगा कि तुम घर छोड़कर चले जाओ और बिना चचा को वापस लिए मत लौटना।”

दोनों बच्चे अपनी माँ का मुंह निहारने लगे। श्याम बाबू कुछ देर तक चुपचाप सिर झुकाए बैठे रहे फिर एक झटके से हाथ में टार्च लेकर कमरे से बाहर निकल गये।

गोशाले में गाय खूँटा तुड़ाकर तेजी से चोंकर रही थी। श्याम बाबू ने टार्च जलाया तो गाय के बगल की चौकी पर कोई मानव आकृति लेटी हुई दिखाई दी। वह लपक कर आगे बढ़े। रज्जब अली अपनी बाहों से आँखें ढंक कर लेटे हुए थे। श्याम बाबू खुशी से उछल पड़े, “अरे चचा, तुम यहाँ?”

रज्जब अली उठकर बैठ गये। वह फीकी हँसी के साथ बोले , “हाँ बाबू, यहाँ के अलावा मैं और कहाँ जा सकता हूँ? मेरे यहाँ आने से तुम्हें काई परेशानी हो तो मैं कहीं और चला जाऊं।”

“अरे चचा, ऐसा तुम क्यों कहते हो?” इतना कहकर वह घर के अन्दर दौड़े, “शोभा …. शोभा। चचा गोशाले में हैं।”

शोभा और उसके दोनों बच्चे चौंककर उठे और घर के बाहर दौड़ पड़े। शोभा चौखट से वापस किचन में लौट आयी। अपने लिए जो हलवा और दूध रखा था उसे ले कर गोशाले में पहुँची। रज्जब अली को देखते ही उसके गले से रुलाई फूट पड़ी। दूध का गिलास और हलवे का प्लेट चौकी पर रखकर अपने मुंह में आँचल का पल्लू ठूंसकर वह फफक-फफक कर रो पड़ी। उसके दोनों बच्चे रुआंसे होकर शोभा और रज्जब अली का मुंह देखने लगे।

“मत रो बहू। मैं इतना कायर नहीं हूँ जो अपना गाँव छोड़कर कहीं भाग जाऊं। मैं अब यहीं रहूँगा। गऊ माता की सेवा करूंगा और बिटिया रानी को किस्सों में बगदाद घुमाऊंगा। मेरे मरने के बाद तुम लोग अपनी चच्ची के बगल में कब्र दे देना।”

इतना कहकर वह हलवे पर टूट पड़े और एक साँस में पूरा दूध पी गये। वह एक लम्बी डकार लेकर बेहद मासूमियत से बोले, “सच बहू, बहुत तेज भूख लगी थी। अब आत्मा तृप्त हो गयी।”

वह कुछ देर तक सामने अंधेरे में अपलक देखते रहे। धीरे-धीरे उनके चेहरे का रंग बदलने लगा। वह तनिक मुस्कराए फिर अनायास ही ठहाका लगाकर हँसने लगे। धीरे-धीरे ठहाका तेज होने लगा। सभी लोग स्तब्ध हो गये। एकाएक उनका गला जबाब दे गया। ठहाके की जगह गले से ‘हूऽऽऽऽऽ’ की तेज आवाज निकलने लगी। मानो असंख्य अभिशप्त आत्माओं का रुदन उनके गले में समा गया हो। उनका चेहरा और आवाज विचित्र तरीके से डरावनी हो गयी। सबके शरीर में भय की सिहरन दौड़ने लगी। एकाएक दोनों बच्चे चीखकर शोभा से लिपट गये।

[पल-प्रतिपल पत्रिका से साभार]

 

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