बल्ली के यहां उम्मीद का एक बच्चा है, जो सारी तानाशाहियों और पूंजी के फैलाये अंधेरे के ऊपर बैठा है

पुस्तक

हिंदी ग़ज़ल में बल्ली सिंह चीमा एक लोकप्रिय नाम हैं। यह उनका पांचवां ग़ज़ल संग्रह है। इसकी भूमिका हमारे दौर के महत्वपूर्ण आलोचक प्रणय कृष्ण ने लिखी है। वे लिखते हैं-

इस नये संग्रह में बल्ली ने मुल्क के बदले हुए हालात के बीच विकल्प की छटपटाहट दर्ज की है।… इस संग्रह में वक्त और उसकी सियासत की जैसी पहचान है, वह इस संग्रह को हमारे समय का एक जरूरी दस्तावेज बनाती है।”

  • जमीं जंगल औ नदियों की तिजारत कौन करता है।
    जरा सोचो कि नोटों की सियासत कौन करता है।
  • अहिंसा कहके हिंसा की वकालत कौन करता है।
    यहां अंधी बंदूकों की हिमायत कौन करता है।
  • मरे निर्दोष औ मासूम थोड़ा कह दिया वरना,
    दरिंदों से दरिंदों की शिकायत कौन करता है।
  • वतन की संपदा को चूसते खूंखार सांपों की,
    वकालत कौन करता है हिफ़ाजत कौन करता है।
  • जमीनी सच को ऐ ‘बल्ली’ कुचलना चाहता है कौन,
    हरापन चूस लेने की हिमाकत कौन करता है।

आज सत्ताधारी वर्ग की सियासत किस कदर फ़ासिस्ट, अमीरपरश्त और जन-विरोधी है तथा उसने संविधान और उसकी संस्थाओं को कैसे भीतर से खोखला किया है, उसे बल्ली भाई ने अदालत के मार्फत यूं समझा है-

छूट ही जाना था उसको बात है सच्ची खरी।
कोर्ट से धनवान कातिल हो ही जाते हैं बरी।

सबूतों औ गवाहों पर पड़े भारी अगर पैसा,
अदालत भी खुली आंखों को अंधा मान लेती है।

हुकूमत की नज़र से देखती है जब अदालत भी,
तो एक तरफ़ा हुए क़त्लों को दंगा मान लेती है।

इसी तरह मीडिया, अस्पताल, स्कूल सभी के भीतर सियासत की दखलअंदाजी को, पूंजी से उसके साठ-गाँठ को बल्ली ने इस संग्रह में बखूबी व्यक्त किया है।

बल्ली हिंदी के ऐसे ग़ज़लकार हैं, जिन्होंने गांव और किसान की जिंदगी, उसकी पेचीदगी, जद्दोजहद, रोजनामचे, पीड़ा, टीस को वास्तविक और आंतरिक सामाजिक संदर्भों के साथ ग़ज़ल में स्थापित किया है। वर्तमान कृषि-संकट और पलायन ने किसान जीवन में एक नया अंधेरा रचा है, जिसमें उनकी व्यथा, उनकी टूटन घुलकर उसे और गहनतर करती है। इस संकट को बाजारवाद और पूंजीवादी लोभ-लाभ ने पैदा किया है। बल्ली इस संग्रह में इन सबसे बावस्ता हैं-

  • मेरे बच्चों को ही मुझसे रोज़ लड़वाने लगा।
    खूबसूरत ऐड बन बाजार घर आने लगा।
  • सादगी औ सोच ऊंची ले के अब जाऊं कहां,
    हर मशीनी आदमी अब मुझको हड़काने लगा।
  • सीख बल्ली पेटीएम जुड़ना है गर बाजार से,
    लोग समझाएं मुझे मैं दिल को समझाने लगा।
  • क्या ये संभव है कि डालर भी कमाए जाएं,
    और मां-बाप को बिल्कुल न रुलाया जाए।
  • पहाड़ी गांव कस्बों से तो गायब हो गयी रौनक।
    सुना है हल्द्वानी, दून आ रहने लगी रौनक।
  • बुढ़ापे की जिन्होंने रौनकें बनना था आंगन में,
    कनेडा जा बसे वो साथ उनके जा बसी रौनक।
  • किसी चौपाल या आंगन में उसका दिल नहीं लगता,
    बड़े बाजार या फिर माल में रहने लगी रौनक।                                                                             और यह नगर और बाजार ऐसे हैं, कि-

जहां रह कर हमें बेगानगी महसूस हो हर पल,  लगें परदेश जैसे जो नगर ऐसे भी होते हैं।

वो जिनकी छांव में भी चिलचिलाती धूप होती है,
बशर के रास्तों में कुछ शज़र ऐसे भी होते हैैं।

बल्ली की यह सचेतनता और संवेदना ही है, जो उजालों और रौनकों के पीछे के अंधेरे को पहचान लेती है-
बहुत चालाक है दुश्मन उजालों को ख़बर कर दो,
दीये के ठीक नीचे ही अंधेरा बैठ जाता है।

लेकिन इनके बीच बल्ली के यहां उम्मीद का एक बच्चा है, जो सारी तानाशाहियों और पूंजी के फैलाये अंधेरे के ऊपर बैठा है-
उसकी रज़ा न हो तो पत्ता भी  न हिले

बच्चे ने ये सुना तो पौधा हिला दिया।

बल्ली सिंह चीमा इसी उम्मीद और हौसले के साथ अपने नये ग़ज़ल संग्रह में उपस्थित हैं।

उजालों को ख़बर कर दो- बल्ली सिंह चीमा, मूल्य- रुपए 112, सेतु प्रकाशन 305 प्रियदर्शनी अपार्टमेंट, पटपड़गंज दिल्ली 110092