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 बहुसंख्यकता एक मिथ है – निवेदिता मेनन

( अनाइअलेशन ऑफ कास्ट पर विचार मंथन)

नई दिल्ली। ‘ भारत में कोई समुदाय बहुसंख्यक नहीं है। बहुसंख्यकता एक मिथ है। इसे बहुत से ब्राह्मणेतर समाजों पर जबरन हिंदू या ‘सनातन’ पहचान थोप कर गढ़ा गया है। यह बहुसंख्यकता दरअसल एक विशिष्ट अल्पसंख्यक, अर्थात सवर्ण हिंदू ब्राह्मणवादी समूह, के सांस्कृतिक वर्चस्व को वैधता देने का उपकरण है। इसे चुनौती देने के लिए भारत को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की बाइनरी में देखने की जगह अल्पसंख्यकों के एक समुच्चय के रूप में देखना चाहिए, जिसमें सभी समूहों को समान अधिकार और अवसर मिल सकें। ‘

ये बातें निवेदिता मेनन ने दिनांक एक जून को दिल्ली के कनॉट प्लेस में ‘हम देखेंगे : अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान’ की ओर से आयोजित “जाति आज भी जीवित क्यों? जाति-विहीन समाज कब तक?” विषयक एक विचार गोष्ठी में कहीं।

इस गोष्ठी में निवेदिता मेनन ने भारतीय लोकतंत्र की जातिवादी नींव, ब्राह्मणवादी संरचना और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में बहुसंख्यकता के भ्रम पर विस्तार से चर्चा की।

यह आयोजन बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर की ऐतिहासिक कृति ‘Annihilation of Caste’ के प्रकाशन के 90 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया।

15 मई 1936 को डॉ. आंबेडकर की इस कृति का प्रथम प्रकाशन हुआ था।

मूल रूप से यह एक भाषण था जो लाहौर के जाति पाती तोड़क मंडल के राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रस्तुत किया जाना था, लेकिन इस भाषण के विचारों के वजह से वह अधिवेशन उस वर्ष नहीं हो सका। डॉ. आंबेडकर ने इसे प्रकाशित कराया।

समकालीन भारत में जातिगत भेदभाव, सामाजिक असमानता और ब्राह्मणवाद की जड़ताओं को देखते हुए यह पुस्तक आज भी अत्यन्त प्रासंगिक है। जाति के विनाश का स्वप्न देखने वालों के लिए एक अपरिहार्य पाठ है।

आमंत्रित प्रमुख वक्ताओं में बैजवाड़ा विल्सन, निवेदिता मेनन और गोपाल प्रधान शामिल थे। कार्यक्रम का संचालन रामायन राम ने किया।

बैजवाड़ा विल्सन किसी आकस्मिक परिस्थिति के कारण उपस्थित नहीं हो सके।

कार्यक्रम की शुरुआत वरिष्ठ आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने डॉ. आंबेडकर की वैचारिक विरासत और सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक आवश्यकता पर केंद्रित वक्तव्य से की।

संचालक रामायन राम ने बातचीत की शुरुआत करते हुए कहा कि डॉ. आंबेडकर ने ‘जाति प्रथा उन्मूलन’ में लिखा था कि जाति के आधार पर राष्ट्र का, लोकतंत्र का या किसी भी आधुनिक संस्था का निर्माण नहीं किया जा सकता।

आजादी के बाद से यह साफ हो चुका है कि इस दौरान लोकतंत्र की हर संस्था, विचार और राष्ट्र की सामूहिक भावना पर जाति की काली छाया मंडराती रही है। ऐसी स्थिति में डॉ. आंबेडकर का यह एतिहासिक भाषण आज की तारीख में कम्युनिस्ट घोषणापत्र से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।

निवेदिता मेनन ने संविधान के अनुच्छेद 17 के आलोक में यह रेखांकित किया कि भले ही जाति आधारित भेदभाव कानूनन अपराध माना जाता है, व्यवहार में आज भी जातीय हिंसा और भेदभाव समाज में व्याप्त हैं।

वामपंथी राजनीति आज तक जाति के सवाल और जाति की पहचान को लेकर पूरी तरह सहज नहीं हैं। जातीय और धार्मिक पहचान को नकारने भर से उनका अस्तित्व समाप्त नहीं होता।

मुस्लिम समुदाय पर हो रहे हमलों, CAA-NRC जैसे कानूनों और “जय श्रीराम” जैसे नारों को उन्होंने अल्पसंख्यकों के विरुद्ध सांस्कृतिक-राजनीतिक शस्त्र की संज्ञा दी।

जाति जनगणना की मांग करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक हमें यह नहीं पता कि किसके पास कितने संसाधन हैं, तब तक किसी भी समानता नीति की कल्पना बेमानी है।

गोपाल प्रधान ने कहा कि ‘Annihilation of Caste’ दरअसल उन लोगों को संबोधित है, जो स्वयं जातिप्रथा के शिकार नहीं हैं यानी जो सवर्ण हिंदू हैं।

यह मूलतः सवर्ण हिंदुओं के साथ एक संवाद है कि वे कैसे अपने को जाति के पूर्वाग्रह से मुक्त कर सकते हैं और कैसे हिंदू समाज को जाति की संरचना से मुक्त किया जा सकता है।

उन्होंने स्मरण कराया कि इतिहास में शोषितों के पास भी कभी संसाधन थे—हथियार, ज़मीन और धन—जो समय के साथ उनसे छीने गए।

ये तीनों तत्व, जो किसी समाज में शक्ति और आत्मनिर्भरता के आधार होते हैं, बहुजनों से छीन लिए गए। इनके एवज में उन्हें “अहिंसक” या अपरिग्रही बनने का उपदेश दिया गया। इस ऐतिहासिक लूट को गोपाल प्रधान ने जाति व्यवस्था का मूल बताया।

गोपाल जी ने कहा कि अंतरजातीय विवाह केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को चुनौती देने वाला क्रांतिकारी कदम है।

जब तक स्त्रियों को वरण की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, तब तक जाति का ढांचा टूट नहीं सकता।

 

उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि संसाधनों का पुनर्वितरण केवल ज़मीन या धन तक सीमित नहीं है—ज्ञान, शस्त्र, जो आज राजनीतिक शक्ति का प्रतीक हैं, और सामाजिक पूंजी भी इसमें शामिल हैं।

उन्होंने गाँवों में बंदूक का लाइसेंस पाने जैसी बातों को उदाहरण देकर यह बताया कि किस प्रकार कानूनी व्यवस्थाएं भी जातीय असमानता को संस्थागत करती हैं।

गोपाल प्रधान ने कहा कि अंबेडकर के लिए बंधुत्व का आशय था लोकतंत्र और लोकतंत्र का आशय था संसाधनों में सब की समान भागीदारी।

इसके बिना समाज में समानता और स्वतंत्रता के लक्ष्य पूरे नहीं हो सकते।

ब्राह्मणवाद को उन्होंने एक “आइडियोलॉजिकल डॉमिनेंस” कहा—एक ऐसी वैचारिक सत्ता जो समाज के प्रत्येक स्तर पर व्याप्त है और जो धर्म, संस्कृति और राजनीति को अपने अनुसार संचालित करती है।

डॉ. आंबेडकर की प्रासंगिकता पर उन्होंने जोर देते हुए कहा कि आज के लोकतंत्र में समावेशन की क्षमता घट रही है और विचारों में असहिष्णुता बढ़ रही है।

इसलिए अंबेडकर का दृष्टिकोण , जो धर्म को लोकतांत्रिक मूल्यों के अधीन लाने की बात करता है, वह आज भी सबसे अधिक प्रासंगिक है।

दोनों वक्ताओं के व्याख्यान पर टिप्पणी करते हुए आशुतोष कुमार ने कहा कि डॉ. आंबेडकर की ‘Annihilation of Caste’ केवल एक किताब नहीं, बल्कि बहस की शुरुआत है।

उन्होंने बताया कि सामाजिक न्याय केवल संवैधानिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति है।

उन्होंने दलित पैंथर, नक्सल आंदोलन और अमेरिका के ब्लैक मूवमेंट से प्रेरणा की चर्चा करते हुए यह रेखांकित किया कि ज़मीन का पुनर्वितरण जब तक नहीं होगा, तब तक जातिविहीन समाज की कल्पना अधूरी है।

कांशीराम द्वारा राजनीतिक शक्ति को सामाजिक परिवर्तन का उपकरण बनाने की रणनीति का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि राजनीतिक सत्ता तो हासिल हुई, परंतु वैचारिक संघर्ष पीछे छूट गया।

“हाथी नहीं गणेश है” जैसे नारों के माध्यम से ब्राह्मणवादी प्रतीकों का पुनःस्थापन कर उस आंदोलन की आत्मा को ही निष्प्रभ कर दिया गया।

उन्होंने बल दिया कि जाति उन्मूलन केवल राजनीतिक मसला नहीं है, यह सांस्कृतिक और आर्थिक लड़ाई भी है।

वेद, गीता, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थन की आलोचना करते हुए उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जब तक इन शास्त्रों की सत्ता को चुनौती नहीं दी जाएगी, जाति की जड़ें नहीं उखड़ेंगी।

गीता में वर्ण व्यवस्था को शाश्वत और दैवीय बताने के विरुद्ध उन्होंने आह्वान किया कि हमें ऐसी धार्मिक अवधारणाओं को अस्वीकार करना होगा।

आज जबकि राम मंदिर को राष्ट्र का सांस्कृतिक प्रतीक बनाया जा रहा है, यह और भी ज़रूरी हो गया है कि सांस्कृतिक प्रतिवाद को मज़बूत किया जाए।

उन्होंने अंबेडकर की उस मूल अवधारणा को रेखांकित किया जिसमें पुराने समाज की मरम्मत नहीं, बल्कि उसका पूर्ण विघटन और नए समाज की सर्जना ही समाधान है।

कार्यक्रम के अंत में आलोचक संजीव कुमार ने एक संक्षिप्त टिप्पणी प्रस्तुत की।

 

 

पत्रकार पंकज श्रीवास्तव ने अपनी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस गोष्ठी से कुछ ठोस कार्यक्रम लेकर निकलना चाहिए, हमें मिलकर यह प्रस्ताव लेना चाहिए कि दिल्ली में हम Annihilation of Caste की एक लाख प्रतियां वितरित करनी चाहिए।

इस दौरान रेखा अवस्थी, धर्मवीर यादव गगन, कवि टेकचंद और प्रिया ने अपने सवाल रखे, वक्ताओं ने उनके सवालों का जवाब दिया।

धन्यवाद ज्ञापन दलित लेखक संघ के महासचिव बलविन्द्र सिंह ‘बलि’ द्वारा किया गया।

इस कार्यक्रम को जाति उन्मूलन और ‘Annihilation of Caste’ के विचार को विमर्श के केंद्र ने लाने की शुरुआत के बतौर देखा गया।यह तय हुआ कि आगे इस विषय पर नियमित आयोजन होते रहेंगे।

इस कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि मदन कश्यप, देवी प्रसाद मिश्र, आलोचक रेखा अवस्थी, कथाकार योगेन्द्र आहूजा, नाटककार राजेश कुमार, टिप्पणीकार व मीडिया विशेषज्ञ पंकज श्रीवास्तव, कवि अनुपम सिंह, कवि-आलोचक-अनुवादक डॉ. मृत्यंजय, कथाकार टेकचंद, संपादक-आलोचक धर्मवीर यादव ‘गगन’, स्त्रीवादी लेखिका रश्मि रावत, प्रिया गोस्वामी, आलोचक-प्राध्यापक अभय कुमार, कवि-प्राध्यापक डॉ. मनोज कुमार सामाजिक कार्यकर्ता सत्य प्रकाश, इप्टा रंगकर्मी जसपाल, आमिर खान, इन्द्रजीत, सौरभ, मनीषा कौसर, तूलिका, समेत कई महत्वपूर्ण लेखक, साहित्यकार, अध्येता व शोधार्थी उपस्थित रहे।

रपट प्रस्तुति : अंशु चौधरी व रामायन राम

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