Monday, October 3, 2022
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डोलो 650 स्कैंडल : देशी दवा कंपनी के खिलाफ साज़िश या सड़ती हुई चिकित्सा व्यवस्था का लक्षण ?

कोरोना महामारी के दौरान मरीजों के इलाज के लिए कई दवाएं और मल्टी-विटामिनों के साथ देशी नुस्खे सुर्ख़ियों में रहे. उनमें ही बुख़ार और शरीर दर्द की दवा- डोलो 650 भी थी जोकि एक पैरासिटामोल फार्मूलेशन है. उसे डाक्टरों ने खूब प्रेस्क्राइब किया, उत्साही लोगों ने उसे सोशल मीडिया और व्हाट्सएप्प पर वायरल किया. दवा घर-घर पहुँच गई और दवा कंपनी- माइक्रो लैब्स ने जमकर मुनाफा काटा.

जी, कोविड के दौरान डोलो 650 की बिक्री में रिकार्डतोड़ 290 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. हालाँकि इस दौरान (2020 की दूसरी तिमाही से 2021 की दूसरी तिमाही में) सभी ब्रांडेड और जेनेरिक पैरासिटामोल टैबलेट्स की बिक्री में 138 फीसदी की बढ़ोतरी हुई लेकिन अकेले डोलो 650 की बिक्री में इसकी दोगुनी बढ़ोतरी हुई.

असल में, बीमारी के दौरान हो रही मौतों से घबराए मरीजों और उनके तीमारदारों ने डोलो 650 को जमकर ख़रीदा और इस्तेमाल किया. बहुत से लोगों ने उसका स्टाक भी किया ताकि बुरे वक्त में किल्लत न हो और न ही इधर-उधर भागना पड़े. ऐसा ही कई और कथित चमत्कारी दवाइयों और रेम्डेसिविर जैसे इंजेक्शनों के साथ भी हुआ जिनकी जमकर कालाबाजारी हुई. दवा कंपनियों के साथ बहुतेरे थोक विक्रेताओं और केमिस्टों ने मौके का फायदा उठाया और जमकर मुनाफाखोरी की.

विडम्बना देखिए कि इस महामारी में लाखों लोगों की जान गई और न जाने कितने घर उजड़ गए. लेकिन दवा उद्योग और मल्टी-विटामिन और न्यूट्रीएंट्स का धंधा चमक गया. बिजनेस टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले एक पैरासिटामोल ब्रांड- डोलो 650 की मार्च, 2020 के बाद 567 करोड़ रूपये की बिक्री हुई. महामारी के दौरान देशी ब्रांड डोलो 650 ने बाज़ार में कई जमे-जमाए मल्टी-नेशनल दवा कंपनियों के ब्रांडेड पैरासिटामोल टेबलेट्स जैसे क्रोसिन और काल्पोल आदि को काफी पीछे छोड़ दिया. डोलो 650 की लोकप्रियता का आलम यह था कि उसपर कई सारे मीम्स भी बने और सोशल मीडिया पर छाए रहे.

डोलो 650 पर एक और मीम

 

इसी तरह प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, महामारी के दौरान साल 2020 में लोगों ने इम्यूनिटी बढ़ाने के नाम पर 500 करोड़ रूपये के मल्टी-विटामिन खाए. इसी दौरान डोलो 650 की तरह एक मल्टी-विटामिन जिंक सप्लीमेंट- जिन्कोविट खूब सुर्ख़ियों में रहा. बहुत संभव है कि आपके भी पड़ोसियों, मित्रों, रिश्तेदारों और सहकर्मियों ने इसकी सिफारिश की हो. नतीजा, इसकी बिक्री में 93 फीसदी की वृद्धि हुई और इसके 54 करोड़ रूपये के टेबलेट्स बिके.

लेकिन डोलो 650 की कहानी में एक ट्विस्ट आ गया है.

बीते सप्ताह सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता एफएमआरएआई- फेडरेशन आफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोशियेशन आफ इंडिया के वकील संजय पारीख ने आरोप लगाया है कि डोलो 650 बनानेवाली दवा कम्पनी- माइक्रो लैब्स लिमिटेड ने इसे लोकप्रिय बनाने और डाक्टरों को इसे प्रेस्क्राइब करने के लिए प्रेरित करने के पिछले सालों में 1000 करोड़ रूपये के उपहार आदि बांटे हैं. एफएमआरएआई ने माइक्रो लैब्स पर यह आरोप इस साल कंपनी पर पड़े आयकर के छापे और उससे सामने आई रिपोर्ट के आधार पर लगाया है.

एफएमआरएआई के वकील ने कोर्ट में कहा कि डोलो एक ऐसी पैरासिटामोल टैबलेट है जो 650 मिलीग्राम की है. नियमों के मुताबिक, 500 मिलीग्राम तक के पैरासिटामोल टैबलेट की कीमत रेगुलेटेड है लेकिन उससे ऊपर के पैरासिटामोल टैबलेट की कीमत कंपनी खुद तय करती है. वकील संजय पारीख ने कहा कि माइक्रो लैब्स ने डाक्टरों को उपहार आदि बांटकर डोलो 650 के अतार्किक इस्तेमाल को आगे बढ़ाया. जाहिर है कि इस दावे ने सुप्रीम कोर्ट के जज डी वाई चंद्रचूड को भी चौंका दिया. उन्होंने कहा कि डाक्टरों ने उन्हें भी कोविड के दौरान यही दवा प्रिस्क्राइब की थी.

क्या यह डोलो 650 के खिलाफ विदेशी दवा कंपनियों की साज़िश है?

डोलो 650 बनानेवाली माइक्रो लैब्स का कहना है कि ये आरोप सही नहीं हैं. उसके मुताबिक, डोलो 650 ब्रांड एक पुराना और प्रतिष्ठित ब्रांड है. कंपनी का यह भी दावा है कि उसने उसे प्रोमोट करने के लिए डाक्टरों को उपहार/पैसे आदि नहीं बांटे हैं. डाक्टरों ने डोलो 650 के बेहतर और ज्यादा प्रभावी होने के कारण कोविड के दौरान उसे प्रिस्क्राइब किया. बहुतेरे डाक्टर भी मानते हैं कि कोविड के दौरान वह काफी कारगर साबित हुई.

संभव है कि एक देशी दवा कंपनी के ब्रांड की सफलता से परेशान बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनियों ने उसके खिलाफ यह अभियान छेड़ा हो. दवा उद्योग में तीखी और गलाकाट प्रतियोगिता है. दवा कंपनियों की लाबी और कार्टेल हैं. वे एक-दूसरे के खिलाफ कैम्पेन चलाती रहती हैं. संभव है कि माइक्रो लैब्स भी निशाने पर हो.

इस मामले की सच्चाई एक उच्चस्तरीय और पारदर्शी जांच में ही सामने आ सकती है. इसमें सुप्रीम कोर्ट की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. जांच उसकी निगरानी में हो और उससे व्यवस्थागत सुधार का रास्ता खुले तो भारतीय स्वास्थ्य और चिकित्सा व्यवस्था की साख बढ़ेगी और लाखों मरीजों के लिए इलाज बेहतर, सस्ता और सुलभ हो सकता है.

यह जांच और सुधार इसलिए भी जरूरी हैं कि इस कड़वी सच्चाई को अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि देशी-विदेशी दवा कंपनियां अपनी ब्रांडेड दवाइयों को आगे बढ़ाने और बिक्री को प्रोमोट करने के लिए डाक्टरों को उपहार/पैसे और दूसरी फ़्रीबिज बांटती हैं.

महँगी और गैर जरूरी ब्रांडेड दवाइयों और जांचों की कीमत मरीज चुका रहे हैं           

दरअसल, एफएमआरएआई सुप्रीम कोर्ट ने यह याचिका लेकर गई है कि कोर्ट केंद्र सरकार को दवा मार्केटिंग के तौर-तरीकों के यूनिफार्म कोड को कानूनी आधार देने का निर्देश दे ताकि दवाओं की मार्केटिंग की निगरानी की चाक-चौबंद व्यवस्था बनाई जा सके, उसमें पारदर्शिता हो, जवाबदेही और उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान हो.

एफएमआरएआई के मुताबिक, बड़ी दवा कम्पनियाँ डाक्टरों को घूस देकर उन्हें अपनी ब्रांडेड दवाइयां प्रिस्क्राइब करने के लिए प्रेरित करती रही हैं जिसके कारण डाक्टर्स न सिर्फ ऊँची कीमत वाली ब्रांडेड दवाइयां लिख रहे हैं बल्कि जरूरत से ज्यादा दवाइयां लिख रहे हैं जिसकी वजह से उन दवाइयों का गैर-जरूरी और अत्यधिक इस्तेमाल भी हो रहा है.

डोलो 650

यह लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है. यह उनके भरोसे को धोखा है. अधिकांश मरीज डाक्टरों के पास इस अपेक्षा और भरोसे के साथ जाते और उनके निर्देशों का पालन करते हैं कि वे उनके इलाज के लिए जरूरी और सस्ती-सुलभ दवाएं ही लिखेंगे. यह डाक्टरों की संस्था- इंडियन मेडिकल एसोशियेशन (आईएमए) की आचार संहिता का भी हिस्सा है कि वे किसी भी दवा कंपनी, मेडिकल इक्विपमेंट सप्लायर्स और जांच केन्द्रों से कोई भी उपहार, पैसा या ईनाम आदि नहीं लेंगे. इसी तरह सरकारी इंडियन मेडिकल काउन्सिल की ओर से जारी रेगुलेशन में भी यह साफ़-साफ लिखा हुआ है कि जहाँ तक संभव होगा, डाक्टर दवा का जेनेरिक नाम ही लिखेंगे.

लेकिन व्यवहार में इसके बिलकुल उल्टा हो रहा है. बहुतेरे डाक्टर्स न सिर्फ ब्रांडेड दवाएं लिख रहे हैं, प्रिस्क्रिप्शन में ढेरों गैर-जरूरी दवाइयां लिख रहे हैं बल्कि दवा कंपनियों से उपहार, पैसे और अपने और अपने परिवार के लिए ट्रिप के लिए टिकट और होटल बुक करा रहे हैं. मेडिकल कान्फ्रेंसेज को दवा और मेडिकल सेक्टर से जुड़ी दूसरी कम्पनियाँ स्पांसर कर रही हैं या उसमें डाक्टरों की यात्राएँ भी स्पांसर की जा रही हैं.

हालाँकि यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि सभी डाक्टर्स ऐसे नहीं हैं. आज भी ऐसे बहुत डाक्टर्स हैं जो ईमानदारी से मरीजों की सेवा कर रहे हैं. लेकिन ऐसे डाक्टरों की संख्या लगातार कम हो रही है. उनका मज़ाक उड़ाया जाता है. उन्हें परेशान किया जाता है.

पूरी चिकित्सा व्यवस्था अन्दर से सड़ रही है

दूसरी ओर, चिकित्सा व्यवस्था के अन्दर यह बीमारी कितनी गंभीर और फ़ैल चुकी है, इसका अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है कि बहुतेरे डाक्टर डायगोनिस्टिक सेंटर/कम्पनियों से कमीशन लेकर गैर जरूरी और मंहगे टेस्ट लिख रहे हैं. कई बार दर्जनों की संख्या में जांच लिख दी जाती है. मरीजों को खास लैब से ही जांच कराने के लिए कहते हैं. बहुतेरे मामलों में डाक्टरों के अपने प्राइवेट अस्पताल/क्लिनिक/नर्सिंग होम्स हैं जहाँ दवा की दूकान और जांच केंद्र भी होता है और मरीजों को दबाव डालकर वहीँ से जांच कराने और दवा ख़रीदने को कहा जाता है.

इसमें साफ़ तौर पर एक कनफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट है क्योंकि जिस डाक्टर ने अपने अस्पताल/नर्सिंग होम में निवेश किया है, उसके ऊपर उसकी सफलता के लिए जरूरी है कि मरीज उसी के यहाँ से दवा खरीदे और जांच कराए. साथ ही, जितनी अधिक जांच और जितनी अधिक और ब्रांडेड दवाएं, उतना अधिक मुनाफा. लेकिन यह मरीज की कीमत पर होता है.

अफ़सोस यह कि यह सब खुलेआम और धड़ल्ले से चल रहा है. उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में स्थिति दिन पर दिन बदतर होती जा रही है. कई इलाकों में प्राइवेट अस्पतालों-डायगोनिस्टिक सेंटरों-दवा दूकानों-डाक्टरों का माफिया खड़ा हो गया है जिसके आगे मरीजों के साथ-साथ सरकार-प्रशासन भी लाचार से हो गए हैं. इस सबके बीच, डाक्टरों के कोड आफ एथिक्स यानी आचार संहिता की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं लेकिन कार्रवाई करना तो दूर कोई बोलने को भी तैयार नहीं है.

क्या चिकित्सा व्यवस्था सड़ रही है? (साभार: बीबीसी)

लोकप्रिय भाषा में कहें तो ये अनैतिक व्यवहार एक “ओपन सीक्रेट” जिसे सरकार, रेगुलेटर और आईएमए सभी देख और जानकर भी आँखें मूंदें हुए हैं.

विज्ञान और हेल्थ रिपोर्टर बनजोत कौर ने “डाउन टू अर्थ” ने 2019 में एक लम्बी और खोजी रिपोर्ट की है जिससे पता चलता है कि दवा कंपनियों-डाक्टरों के अनैतिक गठजोड़ की जड़ें कितनी गहरी हैं और यह पूरी व्यवस्था अन्दर से कितनी सड़ चुकी है. जाहिर है कि इसकी कीमत आमलोग खासकर गरीब मरीज चुका रहे हैं जिनके लिए इलाज और दवाएं लगातार उनकी पहुँच से बाहर होती जा रही हैं.

साफ़ है कि डोलो 650 स्कैंडल इस अन्दर से सड़ती व्यवस्था का एक उपरी लक्षण भर है. असल में, पूरी चिकित्सा व्यवस्था गंभीर मर्ज/बीमारी का शिकार हो चुकी है. इसका कुछ-कुछ अंदाज़ा बनजोत कौर की ऊपर जिक्र की गई रिपोर्ट से भी लगता है. इस रिपोर्ट में लगभग सभी बड़ी देशी-विदेशी दवा कंपनियों का नाम है जिनके खिलाफ सरकार को यह शिकायत मिली कि वे डाक्टरों को उपहार और दूसरी महंगी सुविधाएँ आदि बाँट रही हैं.

लेकिन किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई. उलटे सरकारी एजेंसियों ने इन शिकायतों को कार्रवाई के लिए दवा कंपनियों के लाबी संगठन- इंडियन फार्मास्युटिकल्स एसोशियेशन (आईपीए) को भेज दिया. जाहिर है कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई.

नतीजा, दवा कंपनियों-डाक्टरों का अनैतिक गठजोड़ मजबूत और बेलगाम होता जा रहा है जिसकी कीमत आम मरीजों और उनके परिवारजनों को चुकानी पड़ रही है.

आनंद प्रधान
लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली में पत्रकारिता के प्रोफ़ेसर हैं
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