लखनऊ। छात्र, युवा, महिला, मज़दूर और नागरिक संगठनों ने कोई कारण बताए बिना लाल बारादरी को सील किये जाने के खिलाफ आज परिवर्तन चौक से जिलाधिकारी कार्यालय तक प्रतिरोध मार्च निकाला। पुलिस ने इस मार्च को बीच रास्ते में ही रोक दिया।
यह मार्च 23 फ़रवरी को विश्वविद्यालय प्रशासन को दिए गए 48 घंटे के अल्टीमेटम के बाद आयोजित किया गया था, जिसमें लाल बारादरी को सील किए जाने के संबंध में पारदर्शिता की मांग की गई थी। प्रशासन की ओर से 48 घंटे बीत जाने के बाद भी कोई जवाब नहीं दिया गया।
प्रतिरोध मार्च में आइसा, ऐपवा, एक्टू , बीएपीसीए, बीसएम, भाकपा माले लिबरेशन, जन संस्कृति मंच, इन्कलाबी नौजवान सभा, रिहाई मंच, सोशलिस्ट पार्टी और नेशनलिस्ट यूथ पार्टी शामिल थे।
22 फ़रवरी को लगभग 200 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक संरचना लाल बारादरी को बिना किसी सार्वजनिक कार्यपालक आदेश, बिना संरचनात्मक सुरक्षा रिपोर्ट और बिना विधिक औचित्य के सील कर दिया गया। जिन छात्रों ने केवल दस्तावेज़ दिखाने की मांग की, उन्हें भारी पुलिस तैनाती, कारण बताओ नोटिस और आपराधिक मुकदमों का सामना करना पड़ा। प्रशासन की चुप्पी अब भी जारी है।
परिरोध मार्च में शामिल संगठनों ने राज्यपाल संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी को दिया। ज्ञापन में लाल बारादरी को सील करने से संबंधित कारणयुक्त कार्यपालक आदेश तत्काल सार्वजनिक करने, स्वतंत्र संरचनात्मक तकनीकी निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक करने, प्रधानमंत्री-उषा योजना के अंतर्गत स्वीकृत 5 करोड़ रुपये के उपयोग का विस्तृत लेखा-जोखा सार्वजनिक करने, छात्रों के विरुद्ध दर्ज सभी मुकदमे, कारण बताओ नोटिस और दंडात्मक कार्रवाइयाँ तत्काल वापस लेने, छात्र प्रतिनिधियों, तकनीकी विशेषज्ञों और नागरिक समाज के सदस्यों को शामिल करते हुए एक स्वतंत्र समीक्षा समिति गठित करने की मांग की गई है। यह भी मांग की गई कि यदि कोई तात्कालिक संरचनात्मक खतरा सिद्ध नहीं होता है, तो आवश्यक सुरक्षा उपायों के साथ लाल बारादरी को पुनः खोला जाए।
मार्च में शामिल आइसा के प्रदेश अध्यक्ष मनीष कुमार ने कहा कि जब प्रशासन लिखित आदेश नहीं दिखा सकता, लेकिन पुलिस बल दिखा सकता है, तो समस्या छात्रों में नहीं, बल्कि अपारदर्शिता में है। ”
लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र अहमद रज़ा खान ने कहा कि हमने आदेश और निरीक्षण रिपोर्ट देखने की मांग की। इसके बदले हमें अपराधी की तरह व्यवहार मिला। पारदर्शिता मांगना अपराध नहीं हो सकता। ऐपवा नेता
सरोजिनी बिष्ट ने कहा कि जब बिना स्पष्टीकरण के स्थानों को सील किया जाता है और सवाल उठाने वालों को निशाना बनाया जाता है, तो असुरक्षा का माहौल बनता है। लोकतांत्रिक संस्थानों को समानता की रक्षा करनी चाहिए।
ऐक्टू के सचिव मधुसूदन मगन ने कहा कि यदि सुरक्षा का प्रश्न है तो रिपोर्ट दिखाइए। यदि कानूनी आदेश है तो उसे सार्वजनिक कीजिए। शासन मौखिक निर्देशों पर नहीं चल सकता।
बीएपीएसए के अध्यक्ष मानव रावत ने ने कहा कि कानून का चयनात्मक प्रयोग समान संरक्षण के सिद्धांत को कमजोर करता है। मानदंड सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए।
बीएसएम की अध्यक्ष आकांक्षा आज़ाद ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध को अपराध बनाना पूरे परिसर में डर का संदेश देता है। भाकपा माले के जिला प्रभारी
रमेश सिंह सेंगर ने कहा कि कारणयुक्त कार्यपालक आदेश के अभाव में यह कार्रवाई संवैधानिक रूप से संदिग्ध प्रतीत होती है। जन संस्कृति मंच लखनऊ के सचिव फरज़ाना मेहदी, ने कहा कि विश्वविद्यालय संवाद और साझा विरासत के स्थल होने चाहिए, अपारदर्शिता के नहीं।
इंजलबी नौजवान सभा के संयुक्त सचिव राजीव गुप्ता ने कहा कि युवा जवाबदेही मांग रहे हैं, टकराव नहीं। रिहाई मंच के राजीव यादव, ने कहा कि शांतिपूर्ण मार्च को रोकना और मूल प्रश्नों की अनदेखी करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रश्न खड़ा करता है।”
मार्च में सोशलिस्ट पार्टी के नेता संदीप पांडेय, नेशनलिस्ट यूथ पार्टी के राजकुमार ने शामिल होते हुए संबोधित किया।

