भोपाल के इतवारा मोहल्ले में 7 जुलाई 1854 को बरकतुल्लाह की पैदाइश हुई। उनका बचपन इसी शहर की गलियों में बीता। शुरुआती तालीम भी यहीं हुई। बरकतुल्लाह के जन्म के सिर्फ़ तीन साल बाद 1857 का इंक़लाब हुआ। वह उस इंक़लाब को समझने की उम्र में नहीं थे। मगर 1857 की हार की टीस जिस समाज में मौजूद हो, वहाँ बड़े होते हुए किसी भी संवेदनशील बच्चे से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपने वक़्त के सवालों से बेख़बर रहे।
बरकतुल्लाह 1887 तक लंदन पहुँच चुके थे। यही वह दौर था जब बरकतुल्लाह का सामना ब्रिटिश समाज में मौजूद उस इस्लाम-विरोधी और औपनिवेशिक मानसिकता से भी हुआ जो मुसलमानों को पिछड़ा, हिंसक और असभ्य साबित करने की कोशिश करती थी। उस वक़्त ब्रिटेन में इस्लाम और मुसलमानों को लेकर लोकप्रिय साहित्य, कार्टून, संगीत और मज़हबी लेखन में तरह-तरह के पूर्वाग्रह मौजूद थे। 1895 में वे लिवरपूल पहुँचे और वहाँ लिवरपूल मुस्लिम इंस्टीट्यूट से जुड़ गए। इस संस्था की स्थापना अब्दुल्ला क्विलियम ने की थी, एक अंग्रेज़ जिसने इस्लाम क़ुबूल किया था और ब्रिटेन में एक सक्रिय मुस्लिम संस्था और मस्जिद कायम की थी। बरकतुल्लाह वहाँ अरबी, उर्दू और फ़ारसी पढ़ाने लगे और इमाम की भूमिका भी निभाई। वे 1895 से 1899 या 1893 से 1896 तक संस्थान से जुड़े रहे। इसी दौर में उनका संपर्क अफ़ग़ानिस्तान के अमीर के भाई सरदार नसरुल्लाह ख़ान से हुआ, जो 1895 में उनसे जुड़े। 1896 से 1898 के बीच बरकतुल्लाह इंग्लैंड की सियासी परिस्थितियों के बारे में अफ़ग़ान अमीर के एजेंट तक साप्ताहिक गुप्त सूचनाएँ भेजते थे। 1897 में वे लंदन में थे और वहाँ मुस्लिम पैट्रीयोटिक लीग की गतिविधियों में हिस्सा लेते थे।
उसी वक़्त लंदन में भारतीय राष्ट्रवादियों और साम्राज-विरोधी लोगों का एक छोटा मगर महत्वपूर्ण ग्रुप बन रहा था। उससे बरकतुल्लाह का रिश्ता इसी दौर में जुड़ा। लंदन में वे ब्रिटिश उदारवादियों और सुधारवादियों के बीच भी जाते थे। साउथ प्लेस इंस्टिट्यूट में 1895 से 1898 के बीच होने वाली व्याख्यान-श्रृंखला में उन्होंने भी भाषण दिया। वहाँ उदारवादी, समाजवादी, नास्तिक, थियोसोफिस्ट और दूसरे सुधारवादी विचारक आते थे। इसी सिलसिले में उनका एक व्याख्यान इस्लाम में महिलाओं की स्थिति पर था, जिसे बाद में दी ब्रिटिश एम्पायर सीरीज में शाया किया गया। 1890 के दशक के इंग्लैंड में बरकतुल्लाह ब्रिटिश नीतियों के आलोचक थे, मुसलमानों के खिलाफ़ नस्लवादी और पूर्वाग्रही धारणाओं का विरोध करते थे और भारतीयों के अधिकारों की बात करते थे, लेकिन उस वक़्त उनका रुख़ अभी सुधार और सियासी अधिकारों तक महदूद था। ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम ग्लैडस्टोन की भारत और भारतीयों के बारे में की गई नस्लवादी टिप्पणियों के जवाब में बरकतुल्लाह ने लेख और भाषणों के जरिए तीखी प्रतिक्रिया दी। इसके बाद उनकी सियासी गतिविधियों पर पाबंदियाँ बढ़ने लगीं और ब्रिटिश निगरानी भी तेज हुई। अब उन्होंने 1899 में न्यूयॉर्क जाने का फैसला किया। उनका अगला पड़ाव अमेरिका था। वे 1899 में न्यूयॉर्क पहुँचे और लगभग पाँच साल अमेरिका में रहे। अमेरिका में उन्होंने हिंदुस्तान की आज़ादी के पक्ष में प्रचार किया, हिंदुस्तानी प्रवासियों और दूसरे उपनिवेश-विरोधी लोगों से संपर्क बनाया और अपनी सियासी गतिविधियों को आगे बढ़ाया।
फरवरी 1909 में बरकतुल्लाह जापान पहुँचे। वे टोक्यो स्कूल ऑफ़ फॉरेन लैंग्वेजस में भाषा-अध्यापक थे। यह वही संस्थान था जो आगे चलकर टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ़ फॉरेन स्टडीज के रूप में विकसित हुआ। वहाँ उनकी मुलाक़ात उन लोगों से हुई जो पैन-एशियाई एकता और पश्चिमी साम्राज्यवाद के विरोध की बात कर रहे थे। वे एशिया के अलग-अलग हिस्सों से आए मुस्लिम बुद्धिजीवियों के संपर्क में आए। इसी माहौल में उनकी मुलाक़ात तातार मूल के मशहूर मुस्लिम विद्वान और यात्री अब्दुर्रशीद इब्राहीम से भी हुई। बाद में जापानी पैन-एशियावादी हलकों में ओकावा शूमेई जैसे लोगों से उनके संबंध बने। 1910 में बरकतुल्लाह और मिस्र के अहमद फ़दली ने टोक्यो से एक अंग्रेज़ी मासिक पत्रिका शुरू की, “दी इस्लामिक फ्रटेर्निटी”। यह पत्रिका पहले इस्लाम और मुसलमानों के बारे में जानकारी देने वाले एक मंच की शक्ल में सामने आई थी, लेकिन अगले दो सालों में उसका स्वर ज़्यादा खुलकर साम्राज्यवाद-विरोधी हो गया। ब्रिटिश खुफिया विभाग के अधिकारी जेम्स कैंपबेल केर ने इसे एंटी ब्रिटिश पत्र बताया था, जिसे एक मुसलमान “मुसलमानों के लिए” शाया कर रहा था। इस्लामिक फ्रटेर्निटी में उन्होंने ब्रिटिश साम्राज की आलोचना करते हुए लिखा कि अंग्रेज़ों की पुरानी लूट की प्रवृत्ति आधुनिक वक़्त में खत्म नहीं हुई है, बल्कि उसमें पाखंड की एक नई धार जुड़ गई है।
जुलाई 1912 में ब्रिटिश इंडियन सरकार ने इस्लामिक फ्राटेर्निटी को हिंदुस्तान में दाखिल होने से रोक दिया। इसके पीछे सिर्फ़ यह वजह नहीं बताया गया कि पत्रिका ब्रिटिश सरकार की आलोचना करती है, बल्कि आधिकारिक भाषा में कहा गया कि इसके, लेख रिलिजस फीलिंग को भड़काने और ब्रिटिश सरकार के प्रति नफरत पैदा करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन हिंदुस्तान में पत्रिका का प्रवेश रोक देना ब्रिटिश सरकार के लिए काफ़ी नहीं था। असली दिक्कत यह थी कि पत्रिका का संपादन उस वक़्त टोक्यो से हो रहा था और उसका संपादक एक ऐसा इंसान था जो जापान के एक सरकारी शिक्षण संस्थान से जुड़ा हुआ था। यानी ब्रिटिश नजर में यह सिर्फ़ एक अखबार नहीं था, यह एक ऐसे इंसान का सियासी मंच था जिसे जापानी सरकारी संस्थान से वैधता और रहने का आधार मिल रहा था। इस बात का सबसे दिलचस्प प्रमाण ब्रिटिश संसद की बहस में मिलता है। 14 अक्टूबर 1912 को हाउस ऑफ कॉमन्स में सर जे. डी. रीस ने सीधे ब्रिटिश सरकार से पूछा कि क्या उसने जापानी सरकार से इस्लामिक फ्रटेर्निटी को बंद कराने के लिए कोई फ्रेंडली रिप्रेजेन्टेशन की हैं। सवाल में बरकतुल्ला को साफ तौर पर “अ महोमडन प्रोफेसर इन टोक्यो ” कहा गया था। ब्रिटिश सरकार की तरफ़ से जवाब देते हुए अर्नेस्ट बेन ने कहा कि टोक्यो में ब्रिटिश राजदूत को जापानी सरकार के सामने इस मामले के तथ्य रखने का निर्देश दिया जा चुका है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि चूँकि पत्रिका का ब्रिटिश इण्डिया में प्रवेश पहले ही रोक दिया गया है, इसलिए उस वक़्त जापानी सरकार से पत्रिका को बंद करने के लिए औपचारिक अनुरोध करना ज़रूरी नहीं समझा गया।
इस्लामिक फ्रटेर्निटी पर कार्रवाई के बाद उन्होंने दूसरे रास्ते तलाश किए। उनके सहयोगी हसन हातानो के माध्यम से अल इस्लाम सामने आया। अल इस्लाम के अंग्रेज़ी हिस्से के हिंदुस्तान पहुँचने के बाद उसे बरकतुल्ला के एंटी ब्रिटिश कैंपेन की निरंतरता माना गया। बरकतुल्ला ने अंग्रेज़ी के साथ-साथ उर्दू में भी पर्चे निकालने शुरू कर दिए। 1912 में अन नज़ीर अल उरयान और उसके बाद 1913 में दी सवर्ड इज़ दी लास्ट रिसोर्ट जैसे प्रकाशन सामने आए। दी सवर्ड इज़ दी लास्ट रिसोर्ट के बारे में औपनिवेशिक रिपोर्टों में कहा गया कि उसमें अंग्रेज़ी सत्ता के खिलाफ गुप्त संगठनों की स्थापना और सशस्त्र विद्रोह की तैयारी का आह्वान था। 1913 तक टोक्यो स्थित ब्रिटिश दूतावास को उनकी गतिविधियों की चिंता इतनी बढ़ चुकी थी कि ब्रिटिश खुफिया तंत्र जापान में उनके संपर्कों और गतिविधियों पर जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहा था। टोक्यो में ब्रिटिश दूतावास बरकतुल्ला की गतिविधियों से इतना परेशान था कि उसने ब्रिटिश विदेश कार्यालय से हिंदुस्तान से एक खुफिया एजेंट जापान भेजने के लिए कहा। बरकतुल्ला की मुश्किल यही थी कि वे जापान को सिर्फ़ नौकरी की जगह नहीं, बल्कि एशिया में साम्राजवाद-विरोधी सियासत के एक संभावित केंद्र की शक्ल में देख रहे थे। 31 मार्च 1914 को जापानी अधिकारियों ने बरकतुल्ला की शिक्षकीय नियुक्ति ख़त्म कर दी। स्कूल ने 1911 में उनका कॉन्ट्रैक्ट नवीनीकृत किया था, लेकिन उसके बाद ब्रिटिश दूतावास के सियासी दबाव के बीच उन्हें संस्थान से हटा दिया गया। बरकतुल्ला के बाद जापानी भाषा-शिक्षण संस्थान ने हिंदुस्तानी शिक्षकों की नियुक्ति में ज़्यादा सावधानी बरतनी शुरू की और ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी जिनके भारत के शैक्षिक संस्थानों से स्थापित संबंध थे। 6 मई 1914 को वे जापान से अमेरिका के लिए रवाना हुए। कुछ ही वक़्त बाद वे सैन फ्रांसिस्को पहुँचे और वहाँ ग़दर आंदोलन से जुड़े हिंदुस्तानी इंकेलाबियों के साथ काम करने लगे।
बरकतुल्ला के अमेरिका पहुँचने के कुछ ही वक़्त बाद एक ऐसी घटना सामने आई जिसने ग़दर आंदोलन को और व्यापक सियासी मुद्दा दे दिया। कनाडा के नस्ली आव्रजन कानूनों के खिलाफ गुरदित सिंह के जहाज़ में सैकड़ों हिंदुस्तानी सवार होकर कनाडा पहुँचे, लेकिन उन्हें वैंकूवर के बंदरगाह में उतरने नहीं दिया गया। जहाज़ को लगभग दो महीने तक रोके रखा गया और आख़िरकार वापस भेज दिया गया। ग़दर नेताओं ने इस घटना को प्रवासी हिन्दुस्तानियों के बीच प्रचारित किया और यह समझाने की कोशिश की कि विदेश में हिन्दुस्तानियों का अपमान और भारत में अंग्रेज़ी शासन, दो अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक ही साम्राजी निज़ाम के दो चेहरे हैं। इसी वक़्त बरकतुल्ला ने अमेरिका के अलग-अलग शहरों में सभाएँ करना शुरू किया। सैन फ्रांसिस्को, कैलिफोर्निया और ओरेगन में हिंदुस्तानी मजदूरों और किसानों के बीच बैठकों का सिलसिला चला। 5 जुलाई को एल्टन और 7 जुलाई को जर्सी, कैलिफोर्निया में बैठकें हुईं।
इन सभाओं में बरकतुल्ला और दूसरे ग़दर नेता हिन्दुस्तानियों से हिंदुस्तान लौटकर आंदोलन में शामिल होने की अपील कर रहे थे। फिर 26 जुलाई 1914 को ऑक्सनार्ड, कैलिफोर्निया में एक महत्वपूर्ण सभा हुई। इस सभा में बरकतुल्ला और भगवान सिंह ने भाषण दिया। यूरोप में जंग शुरू हो चुकी थी और बरकतुल्ला ने इस जंग को हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए एक तारीखी मौके की शक्ल में देखा। उन्होंने कहा कि अब वक़्त आ गया है कि अंग्रेज़ों को हिंदुस्तान से बाहर निकाला जाए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ब्रिटेन को यूरोप में जंग में उलझना पड़ेगा और इस मौके का फायदा उठाकर हिंदुस्तान में विद्रोह शुरू किया जा सकता है। बरकतुल्ला ने यह अनुमान व्यक्त किया कि जंग की हालत में सिर्फ़ हिंदुस्तान ही नहीं, बल्कि मिस्र, आयरलैंड, दक्षिण अफ्रीका और दूसरे इलाकों में भी ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ विद्रोह हो सकते हैं। ग़दर नेताओं को मालूम था कि उनके पास हिंदुस्तान के भीतर न तो कोई बड़ी सियासी मशीनरी है और न ही हथियारों की पर्याप्त व्यवस्था। लेकिन उनके सामने ब्रिटिश इंडियन सेना थी, जिसमें लाखों हिंदुस्तानी सैनिक काम करते थे। इसलिए उनकी रणनीति यह थी कि जंग के वक़्त जब ब्रिटेन अपनी सेना को यूरोप और दूसरे मोर्चों पर लगाएगा, तब हिंदुस्तानी सैनिकों को अंग्रेज़ों के खिलाफ खड़ा किया जाए। बैठकों में हिंदुस्तान लौटने के लिए लोगों से प्रतिज्ञाएँ ली जाती थीं और क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए चंदा इकट्ठा किया जाता था।
1915 की शुरुआत में बरकतुल्ला जर्मनी पहुँचे। वहाँ उनका परिचय एक ऐसे इंसान की तरह कराया गया जिसकी खासियत सिर्फ़ उसका हिंदुस्तानी होना नहीं थी। उनके बारे में यह कहा गया कि वे “अ पर्सन ऑफ़ कॉन्फिडेन्स” और “द मोस्ट इम्पॉर्टेंट लीडर ऑफ़ द मुस्लिम नैशनलिस्ट्स ऑफ़ इंडिया” हैं । उनके पक्ष में यह भी बताया गया कि वे काबुल के प्रभावशाली लोगों से परिचित थे, अमीर के भाई सरदार नसरुल्ला ख़ान से उनके संबंध थे और वे अफ़ग़ानिस्तान के प्रमुख अखबार सिराज-उल-अख़बार के संपादक से परिचित थे। इसी दौरान वे बर्लिन की हिंदुस्तानी क्रांतिकारी समिति से सक्रिय रूप से जुड़ गए। यह समिति आगे चलकर इंडियन इंडिपेंडेंस कमिटी के नाम से जानी गई। बरकतुल्ला इस समूह के उन सदस्यों में थे जिनकी ख़ास ज़िम्मेदारी हिंदुस्तानी मुसलमानों, अफ़ग़ानिस्तान और मुस्लिम दुनिया से संपर्क बनाने में थी। समिति का एक ख़ास मक़सद ये था कि अफ़ग़ान अमीर को ब्रिटेन के खिलाफ खड़ा करना और अफ़ग़ान क्षेत्र से भारत में प्रवेश का रास्ता हासिल करना। बरकतुल्ला की सियासी सोच में तुर्की की भूमिका भी इसी वक़्त अहम हो गई। उस्मानी सुल्तान को (सुन्नी) मुसलमानों का खलीफा माना जाता था और जब तुर्की जर्मनी के साथ ब्रिटेन के खिलाफ जंग में आया तो जर्मन रणनीति में पैन-इस्लामिक भावना को इस्तेमाल करने की संभावना बढ़ गई। जर्मनी में हिंदुस्तानी जंगी क़ैदियों के लिए हिंदुस्तान जैसे अखबार निकाले गए, जिनमें राष्ट्रीयता के साथ-साथ पैन-इस्लामी विचार भी दिए जाते थे। बरकतुल्ला और उनके साथियों ने इन प्रचार की गतिविधियों में भाग लिया। अब जर्मनी में उन्हें हिंदुस्तानी जंगी क़ैदियों तक पहुँचने का मौक़ा मिला। वुन्सडॉर्फ और ज़ोसेन के शिविरों में हजारों हिंदुस्तानी फ़ौजी कैद थे। जर्मन और हिंदुस्तानी क्रांतिकारियों की योजना थी कि इन सैनिकों को यह समझाया जाए कि वे ब्रिटिश साम्राज के लिए क्यों लड़ रहे हैं और उन्हें अंग्रेज़ों के खिलाफ हिंदुस्तान की आज़ादी के संघर्ष में शामिल होने के लिए तैयार किया जाए। बरकतुल्ला वुन्सडॉर्फ के युद्धबंदी शिविर में गए, वहाँ भाषण दिए और महेंद्र प्रताप और दूसरे साथियों के साथ सैनिकों से बातचीत की। लेकिन बरकतुल्ला की असली मंजिल जर्मनी नहीं थी। उनकी नजर अफ़ग़ानिस्तान पर थी। उन्हें मालूम था कि अगर अफ़ग़ानिस्तान ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध में उतरता है तो भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा अंग्रेज़ों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन सकती है। बरकतुल्ला के पुराने संबंध यहाँ काम आ सकते थे। यही वजह थी कि उन्हें महेंद्र प्रताप के साथ अफ़ग़ान मिशन में शामिल किया गया। जर्मन अधिकारियों ने अफ़ग़ानिस्तान की दिशा में एक मिशन भेजने पर सहमति दी। इस मिशन में महेंद्र प्रताप, बरकतुल्ला और जर्मन राजनयिक अधिकारी शामिल हुए। मिशन का रास्ता यूरोप से होकर तुर्की और फिर ईरान की तरफ था। इसके बाद उसे अफ़ग़ानिस्तान पहुँचना था।
मिशन, 1915 में हेरात पहुँचा और वहाँ उसे अफ़ग़ान अधिकारियों की तरफ़ से सम्मान मिला। इसके बाद काबुल पहुँचा गया। अमीर हबीबुल्लाह ख़ान ने प्रतिनिधिमंडल को सम्मान दिया, लेकिन वे ब्रिटेन के खिलाफ खुलकर जंग करने के लिए तैयार नहीं हुए। यह बरकतुल्ला और उनके साथियों के लिए सबसे बड़ी सियासी निराशाओं में से एक थी। अफ़ग़ानिस्तान में ब्रिटिश-विरोधी भावना मौजूद थी, अमीर के आसपास के कुछ लोग भी इस योजना के प्रति सहानुभूतिशील थे, लेकिन ख़ुद अमीर अपनी तटस्थता छोड़ने को तैयार नहीं थे। फिर भी बरकतुल्ला ने हार नहीं मानी। काबुल में मौजूद हिंदुस्तानी क्रांतिकारियों और उलेमा का संपर्क बढ़ा। उबैदुल्लाह सिंधी पहले ही काबुल पहुँच चुके थे। देओबंद के शेख़ुल-हिंद महमूद हसन की योजना भी ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की थी। 1 दिसंबर 1915 को काबुल में भारत की अस्थायी सरकार यानी प्रोविशनल गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया की स्थापना की गई। महेंद्र प्रताप उसके अध्यक्ष बने और बरकतुल्ला को प्रधानमंत्री बनाया गया। उबैदुल्लाह सिंधी को गृह विभाग की जिम्मेदारी मिली, मौलवी बशीर युद्ध विभाग से जुड़े और चंपकरमन पिल्लै विदेश विभाग से। इस सरकार का मक़सद प्रतीकात्मक घोषणा भर नहीं था। इसका मकसद भारत की आज़ादी के लिए विदेशी सरकारों से मान्यता और मदद हासिल करना और ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सियासी केंद्र तैयार करना था। पहली बार हिंदुस्तानी क्रांतिकारियों ने विदेश की धरती पर ब्रिटिश इंडिया के सामने एक वैकल्पिक हुकूमत-ए-हिंद की कल्पना को औपचारिक रूप दे दिया था। फिर भी यह योजना अंततः अपने सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य—अफ़ग़ानिस्तान को ब्रिटेन के खिलाफ जंग में उतारने और हिंदुस्तान में एक व्यापक सशस्त्र विद्रोह खड़ा करने में सफल नहीं हो सकी। जिस अंतरराष्ट्रीय जाल को बरकतुल्ला और उनके साथियों ने ब्रिटिश साम्राज को चारों तरफ से घेरने के लिए बनाया था, वह धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा।
काबुल की कोशिशों के बाद बरकतुल्लाह की निगाहें अब उस रूस की तरफ़ थीं जहाँ 1917 में एक ऐसी क्रांति हुई थी जिसने दुनिया की सियासत का नक्शा बदल दिया था। ज़ार की सदियों पुरानी बादशाहत गिर चुकी थी। बोल्शेविक सत्ता में आ चुके थे और नई सोवियत सरकार खुले तौर पर साम्राजियत के खिलाफ़ बोल रही थी। बरकतुल्लाह के लिए यह महज़ रूस में सत्ता परिवर्तन की घटना नहीं थी। उन्हें इसमें वह उम्मीद दिखाई दे रही थी जिसकी तलाश वे कई सालों से कर रहे थे—l ऐसी बड़ी सियासी ताक़त, जो ब्रिटिश साम्राजियत के खिलाफ़ हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई में मदद कर सके। मार्च 1919 में वे सोवियत रूस पहुँचे। उस वक़्त वे अफ़ग़ानिस्तान की तरफ़ से अनौपचारिक प्रतिनिधि की हैसियत से भी काम कर रहे थे, लेकिन उनका अपना सबसे बड़ा मक़सद हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए सोवियत मदद हासिल करना था। 7 मई 1919 को बरकतुल्लाह, राजा महेंद्र प्रताप, अब्दुर रब और एम. पी. टी. आचार्य आदि की लेनिन से मुलाक़ात हुआ। जुलाई में बरकतुल्लाह की लेनिन से एक और मुलाक़ात का भी उल्लेख मिलता है। बरकतुल्लाह ने सोवियत क्रांति में अपने सियासी संघर्ष के लिए एक नया साथी देख लिया था। मई 1919 में ही बरकतुल्लाह ने लेनिन को एक पत्र भेजा। उसमें उन्होंने हिंदुस्तान में ब्रिटिश साम्राजियत के खिलाफ़ संघर्ष की चर्चा की और अपनी एक रचना को प्रकाशित करने का अनुरोध किया। वह रचना थी “बोलशीविस्म एंड इस्लामिक डेमोक्रेसी”, जिसे बाद में इस्लाम एंड बोलशीविस्म के नाम से भी जाना गया। उनका मक़सद बिल्कुल साफ़ था, वे चाहते थे कि बोल्शेविज़्म और इस्लाम के बीच ऐसे साझा बिंदु सामने रखे जाएँ जिनके आधार पर मुसलमानों को सोवियत सत्ता के प्रति आकर्षित किया जा सके। 3 जून 1919 के आसपास लेनिन ने विदेश मामलों के जन-कमिसार जॉर्जी चिचेरिन को एक छोटा-सा नोट लिखा: “इस भारतीय की मदद करने के लिए तुमने क्या किया है? उसका लेख प्रकाशित करने के मामले में? और दूसरे मामलों में?”
उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि इस्लाम और बोल्शेविज़्म के बीच सिर्फ़ सियासी गठजोड़ नहीं, कुछ नैतिक और समाजी समानताएँ भी हैं। उनका तर्क था कि इस्लाम इंसानों की बराबरी, भाईचारे और समाजी इंसाफ़ की बात करता है। बोल्शेविज़्म भी शोषण और विशेषाधिकार के खिलाफ़ खड़ा है। इसलिए यूरोपीय साम्राजियत के खिलाफ़ मुसलमानों और सोवियत सत्ता के बीच सहयोग को मज़हबी सिद्धांतों के ख़िलाफ नहीं माना जाना चाहिए। इसी विचार को उन्होंने अपने पैम्फलेट इस्लाम एंड बोलशीविस्म में विस्तार दिया। यह पैम्फलेट अक्टूबर 1919 में लिखा गया था और बाद में मध्य एशिया की कई ज़बानों में इसका प्रचार किया गया। बरकतुल्लाह ने मुसलमानों से कहा कि वे लेनिन और सोवियत सत्ता की तरफ़ से आने वाली दैवी पुकार का जवाब दें। 1919 में वे वोल्गा क्षेत्र और बश्कोर्तोस्तान के मुस्लिम इलाक़ों में गए। सोवियत नेतृत्व ने उन्हें वहाँ प्रचार के काम में लगाया। नवंबर 1919 में सोवियत विदेश मंत्रालय के मध्य-पूर्व विभाग के प्रमुख नरिमान नरिमानोव की रिपोर्ट में लिखा गया कि बरकतुल्लाह को एक पुराने कार्यकर्ता इस्माइलो के साथ वोल्गा क्षेत्र में प्रचार के लिए भेजा गया था। मक़सद था मुसलमानों को पूर्व की सियासी हालत के बारे में बताना और उन्हें संयुक्त कार्रवाई के लिए जगाना। 4 नवंबर 1919 को कज़ान में तातार और बश्किर आबादी की एक बड़ी सभा हुई। उसी दौर में बरकतुल्लाह के भाषणों में सोवियत सत्ता और मुस्लिम मुक्ति के बीच संबंध को बहुत साफ़ ढंग से पेश किया गया।
आधुनिक इतिहासकार नोरीहिरो नागानावा ने अपने अध्ययन में बरकतुल्लाह के इसी भाषण का एक महत्वपूर्ण अंश उद्धृत किया है: “अगर तुम मुसलमान आज़ाद ज़िंदगी चाहते हो, अगर तुम भारत, फ़ारस, अफ़ग़ानिस्तान और तुर्की में अपने भाइयों की आज़ादी चाहते हो, तो पूरी ताक़त से सोवियत सत्ता का समर्थन करो; क्योंकि दुनिया के मुसलमानों के लिए सोवियत सत्ता से ज़्यादा भरोसेमंद, ईमानदार और क़रीबी दोस्त कोई नहीं है।”
बरकतुल्लाह सोवियत सत्ता के समर्थक थे, मगर वे उसके भीतर मौजूद राष्ट्रीय सवाल से भी चिंतित थे। मध्य एशिया में रूसी और मुस्लिम आबादी के बीच सत्ता के सवाल पर उनकी अपनी राय थी। 1919 में उन्होंने तुर्किस्तान के भविष्य के बारे में एक योजना रखी जिसमें उन्होंने स्थानीय मुसलमानों और रूसियों की बराबर हिस्सेदारी वाली ख़ुद मुख़्तार सियासी निज़ाम की वकालत की। उन्होंने तुर्किस्तान को कई स्वायत्त क्षेत्रों में बाँटने का प्रस्ताव भी रखा। लेनिन ने इस प्रस्ताव पर ज़ेकी वेलिदी तोगान से राय माँगी। तोगान ने बरकतुल्लाह की बराबर हिस्सेदारी वाली बात का समर्थन किया और उसे आगे विकसित किया। बरकतुल्लाह ने देखा कि रूस की क्रांति ने साम्राजियत-मुख़ालिफ़ सोच को सिर्फ़ एक क़ौमी सवाल नहीं रहने दिया है। उसे उसने दुनिया के मजदूरों, किसानों और उपनिवेशित क़ौमों के सवाल से जोड़ दिया है। बरकतुल्लाह ने इस विचार को अपनी भाषा में, अपनी इस्लामी पृष्ठभूमि के साथ और अपने भारतीय राष्ट्रवादी मक़सद के भीतर क़ुबूल किया। बरकतुल्लाह का यक़ीन था कि अगर भारत, अफ़ग़ानिस्तान, फ़ारस, तुर्की और मध्य एशिया के लोग अपनी-अपनी लड़ाइयों को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक बड़े साम्राज-मुख़ालिफ़ संघर्ष के हिस्से के रूप में देखें, तो ब्रिटिश और यूरोपीय साम्राजों की ताक़त को चुनौती दी जा सकती है।
1926 में उन्होंने लखा सिंह के साथ भारत भेजने के लिए बीस हज़ार रुपये की रकम जुटाई, जिसका इस्तेमाल सिख सियासी कैदियों के परिवारों की मदद के लिए किया जाना था। 1927 में वे फिर राजा महेंद्र प्रताप के साथ अमेरिका पहुँचे और वहाँ बसे हिन्दुस्तानियो से संपर्क करने लगे। बरकतुल्लाह और राजा महेंद्र प्रताप ने अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों में हिन्दुस्तानियो से मिलने और आज़ादी के आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने का काम शुरू किया। वे डेट्रॉयट भी गए, जहाँ भारतीय समुदाय के बीच सियासी संपर्क स्थापित किए गए। बरकतुल्लाह की उम्र उस समय लगभग तिहत्तर साल की थी। लगातार यात्राओं, निर्वासन और सियासी संघर्ष ने उनके शरीर को थका दिया था, लेकिन उनके सियासी जोश में कोई कमी नहीं आई थी। उनकी पूरी ज़िंदगी जिस तरह गुज़री थी, उसके आख़िरी दिनों में भी वही सिलसिला जारी रहा। उनकी ज़िन्दगी का आख़िरी सार्वजनिक दौर कैलिफ़ोर्निया में बीता। वे सैन फ्रांसिस्को और मैरीज़विल के हिंदुस्तानी समुदायों के बीच गए। मैरीज़विल में हिन्दुस्तानियो की एक सभा में उनका स्वागत बहुत उत्साह के साथ किया गया। वे उस वक़्त बेहद कमज़ोर हो चुके थे। सभा में मौजूद लोगों ने जब उस बूढ़े क्रांतिकारी को देखा, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी हिंदुस्तान की आज़ादी के नाम कर दी थी, तो माहौल भावुक हो गया। वे सभा में पहुँचे, मंच पर गए, लेकिन अपनी बिगड़ती सेहत की वजह से बोल नहीं सके। 20 सितंबर 1927 को सैन फ्रांसिस्को में उनका निधन हो गया।
उन्हें कैलिफ़ोर्निया में ही दफ़नाया गया। उनके दफ़्न की कहानी भी उनके निर्वासित जीवन की तरह असाधारण है। सैक्रामेंटो के आधिकारिक अभिलेख के मुताबिक़ उन्हें पहले सैन फ्रांसिस्को से मैरीज़विल ले जाया गया, जहाँ उन्हें एक मुस्लिम कब्रिस्तान में दफ़नाया गया। बाद में उनके अवशेष सैक्रामेंटो के हिस्टोरिक ओल्ड सिटी सेमेटेरी में स्थानांतरित किए गए। उस वक़्त यह उम्मीद थी कि हिंदुस्तान की आज़ादी के बाfद उनके शव को उनकी मातृभूमि भोपाल ले जाया जाएगा। लेकिन वह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। हिंदुस्तान 1947 में आज़ाद हुआ, मगर बरकतुल्लाह के अवशेष भोपाल नहीं लाए जा सके। वे आज भी सैक्रामेंटो के उसी तारीखी कब्रिस्तान में दफ़्न हैं। उनकी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जिस देश की आज़ादी के लिए उन्होंने दुनिया भर में भटककर अपनी ज़िंदगी लगा दी, उस देश की मिट्टी उन्हें कभी नसीब न हो सकी।

