समकालीन जनमत
स्मृति

इलाहाबाद में प्रो. राजेन्द्र कुमार को गहरी आत्मीयता से याद किया गया

इलाहाबाद। कवि-आलोचक प्रोफेसर राजेंद्र की स्मृति में रविवार को अंजुमन रुहे अदब परिसर में स्मृति सभा आयोजित हुई। स्मृति सभा में  प्रोफेसर राजेंद्र कुमार को याद करने के लिए इलाहाबाद का प्रगतिशील समाज उमड़ पड़ा। सबके पास बहुत सी यादें थीं। वे एक दूसरे से मिलकर प्रोफेसर राजेंद्र कुमार के न होने के दुख को साझा किया। उनके व्यक्तित्व के विभिन्न आयाम को उजागर किया जिसमें एक शिक्षक, कवि, साहित्यकार, आलोचक, विचारक, संगठक और सबसे बढ़कर एक मनुष्य ऐसा जो आज के समय में दुर्लभ हो। इनमें छात्र, नौजवान, महिलाएं, बुजुर्ग, साहित्यकार सामाजिक कार्यकर्ता के साथ इलाहाबाद के बाहर से आए उनके साथी आदि शामिल थे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अली अहमद फातमी ने कहा कि प्रोफेसर राजेंद्र हिंदी और उर्दू के सेतु की तरह थे। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद केवल नदियों का संगम नहीं बल्कि भाषाओं और संस्कृतियों का संगम भी है।

कार्यक्रम के शुरुआत में प्रो. कुमार वीरेंद्र ने कहा कि उनका परिवार बहुत बड़ा था और उनके शिष्यों की एक लंबी सूची है। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था और एक शिक्षक के रूप में ही नहीं एक कवि, एक आलोचक, एक संस्कृतिकर्मी के रूप में भी हम उन्हें याद करते हैं। उनकी कविता की एक पंक्ति ही है कि ‘हम हों या ना हों साबुत दिल के वारिस हरदम रहेंगे दुनिया में।’

 विशिष्ट अतिथि ‘साखी’ के संपादक प्रो सदानंद शाही ने कहा कि प्रोफेसर राजेंद्र अपने समय के समाज का यथार्थ लिखते थे। उन्होंने अपनी कविता ‘शब्द और कवि’ में लिखा कि शब्दों को पहुंचना है कविता के बाहर भी। कविता में शब्दों का अर्थ कितना होना चाहिए प्रो. राजेंद्र ने अपनी कविता ‘अर्थ कितना’ से सिखाया। उन्होंने कहा कि बाहर तो बुद्ध को खोजना ही अपने भीतर भी बुद्ध की तलाश हमें करनी चाहिए, प्रो. राजेंद्र की कविताओं में हमें बुद्ध की झलक मिलती है। प्रोफेसर राजेंद्र को कवि, आलोचक, नाट्यकर्मी कहते हुए एक बेहतरीन इंसान बताया।

रांची से आए वरिष्ठ उपन्यासकार रणेंद्र ने कहा कि प्रोफेसर राजेंद्र की सादगी हमें सबसे ज्यादा आकर्षित करती थी। आपातकाल के दौरान का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जिस समय सभी डरे हुए थे, उस समय उनकी कविता सत्ता से संवाद कर रही थी। प्रो. राजेंद्र हाईस्कूल में एक कविता लिखे थे जिसे प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पुरस्कृत किया था। आलोचना दृष्टि पर बात करते हुए उन्होंने कहा, प्रोफेसर राजेंद्र की आलोच्य दृष्टि कबीर के निकट थी। उनके यहां सामाजिकता की आलोचना को आसानी से देखा जा सकता है। उनका मानना था की आलोचना दृष्टि का विकास केवल हिंदी से नहीं बल्कि इतिहास और दर्शन में जाने पर होगा।

लखनऊ से आए जन–संस्कृति मंच के सदस्य कौशल किशोर ने त्रिलोचन की कविता ‘जीवन की शय्या पर मरण सो गया’ के माध्यम से प्रोफेसर राजेंद्र और आलोचक वीरेंद्र यादव को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि  प्रो. राजेंद्र 1978 में प्रकाशित ‘ऋण गुणा ऋण’ में इंदिरा गांधी के समाजवाद से टकराते हैं। वह खुद को पीड़ा और संघर्ष में उतार देते थे, इस प्रकार आज के दौर में प्रो. राजेंद्र होना खुद में एक चुनौती है।

 रांची से आए प्रो रवि भूषण ने कहा कि प्रोफेसर राजेंद्र में जो विवेकशीलता, संवेदनशीलता, निष्कपटता, मनुष्यता और गहरी आत्मीयता थी, सही अर्थों में आचरण की सभ्यता थी। उन्होंने कहा कि प्रोफेसर राजेंद्र की साहित्य, समाज, नीति, विज्ञान आदि सभी दृष्टियों को मिला लिया जाए तो इससे हम राजेंद्र दृष्टि कह सकते हैं। प्रो. राजेंद्र की रचना ‘यथार्थ और कथार्थ’ के माध्यम से कहा कि प्रोफेसर राजेंद्र ने कथार्थ शब्द की जो व्याख्या की है शायद ही किसी साहित्यकार ने किया हो। उन्होंने यथार्थ के साथ कथार्थ को सर्वाधिक महत्व दिया। आज हमारा समय और समाज असंवादी होता जा रहा है, ऐसे में प्रोफेसर राजेंद्र और भी प्रासंगिक हो जाते हैं उन्होंने सदैव संवाद को महत्व दिया।

उत्तराखंड के वरिष्ठ कवि शैलेय ने कहा कि यह मेरा सौभाग्य है की प्रोफेसर राजेंद्र ने अपनी रचना ‘हर कोशिश है एक बगावत’ के प्रकाशन के लिए हमें चुना। मेरा प्रोफेसर राजेंद्र से संवाद ‘अभिप्राय’ में छपी मेरी एक कविता के माध्यम से हुआ, जिस पर उन्होंने मुझे एक पत्र के द्वारा प्रतिक्रिया भेजी थी। उनकी चिंताएं सरोकारों को लेकर होती थी। मेरे जो अपने सरोकार थे, उन्होंने उसको एक दृष्टि दी।

वरिष्ठ  रंगकर्मी और कथाकार प्रोफेसर अनीता गोपेश ने कहा कि वह जीवन भर मेरे एक बड़े भाई की तरह रहे। उनका जाना मेरे लिए एक व्यक्तिगत क्षति है। वह मेरे पिताजी के शिष्य थे और उन्होंने पिताजी के लिए एक नया शब्द ‘गुरु दोस्त’ ईजाद किया था। उनके जाने से साहित्य जगत सुना तो हुआ ही यह शहर भी सूना हो गया।

 प्रोफेसर संतोष भदौरिया ने कहा कि इलाहाबाद में तीन लोग मेरे गार्जियन की तरह रहे— कॉमरेड जिया भाई, अकील रिजवी साहब, और प्रोफेसर राजेंद्र जी। इन तीनों लोगों ने मुझको मनुष्य बने रहने में बड़ी मदद की। आज प्रोफेसर राजेंद्र की याद में कानपुर और इलाहाबाद में एक ही समय पर आयोजन हो रहे हैं। प्रोफेसर राजेंद्र की सबसे बड़ी विशेषता थी विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य बने रहना। वह सब को साथ लेकर चलते थे उन्हें किसी भी रूप में याद करना सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रोफेसर लालसा यादव ने विभाग के सभी शिक्षकों, छात्रों, कर्मचारियों की तरफ से श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि प्रोफेसर राजेंद्र की यह विराटता ही है कि आज जलेस प्रलेस और जसम शहर के तीनों लेखक संगठन उन्हें याद कर रहे हैं।

 नरेश सहगल ने उनकी रचना ‘ऋण गुणा ऋण’ का जिक्र करते हुए कहा कि गणित की भाषा में ऋण और ऋण गुड़ा करके धन बन जाते हैं। ठीक इसी तरह प्रोफेसर राजेंद्र ने अपने जीवन में सभी रन को जोड़कर धन बना दिया।

प्रोफेसर राजेंद्र के बड़े बेटे डॉक्टर प्रियम अंकित ने कहा कि पिताजी मेरे लिए एक मजबूत किला थे। उनकी सादगी और सरलता को किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता। कैंसर से जूझते हुए भी वह मृत्यु से आंख–मिचौली खेलते थे। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद की धरती से उन्हें बेइंतहा प्यार मिला।

 डॉक्टर आशीष मित्तल ने कहा कि प्रोफेसर राजेंद्र का देश के मेहनतकश मजदूरों से गहरा संबंध था। कामरेड अविनाश मिश्रा ने प्रोफेसर राजेंद्र कुमार को एक सशक्त एवं सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में याद किया।

वरिष्ठ कवि सुधांशु मालवीय ने कहा कि प्रोफेसर राजेंद्र के साथ मेरा 40 वर्षों से संबंध रहा। वह ‘सम्मुख’ पत्रिका के संस्थापक संचालक सदस्यों में से थे। वह अपने लेख और विचारों में बहुत सशक्त रूप से उपस्थित होते हैं। उनके प्रतिरोध की प्रतिबद्धता को नवीन पीढ़ी को आगे बढ़ाना है। वरिष्ठ उपन्यासकार मेवाराम ने उनके साथ अपने संबंध को याद किया।

प्रोफेसर राजेंद्र की बहू रिचा निगम ने कहा कि वह स्त्रियों के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते थे।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय से आए डॉक्टर महेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने कहा कि प्रोफेसर राजेंद्र सामाजिक संस्कृति को बचाकर रखने वाले समृद्ध और विरल व्यक्ति थे।

प्रोफेसर राजेंद्र के शिष्य धीरेंद्र तिवारी और शिष्या रूबी सिंह ने अपने अध्ययन के दौरान एक गुरु के रूप में उन्हें याद किया।
इस दौरान कोरस की तरफ से बंटू और अंकुर ने ‘यकीं से काम लो’ जनगीत प्रस्तुत किए।

समृति सभा का संचालन प्रोफेसर प्रणय कृष्ण ने किया।

समकालीन जनमत के संपादक रामजी राय, डॉ.रमायान राम, डॉ. विंध्याचल यादव, डॉ. रविशंकर सोनकर, डॉ. रेखा पांडेय, ऋचा निगम, सबद की सुनीता, रश्मि श्रीवास्तव, यश्या, डॉ. अंशुमान कुशवाहा, डॉ. सुधांशु मालवीय, कथाकार मेवाराम आदि ने भी अपने विचार साझा किए।

कवि आलोचक अशोक वाजपेयी, वरिष्ठ आलोचक विजय बहादुर सिंह, कवि देवी प्रसाद मिश्र ने अपने लिखित संस्मरण प्रेषित किए, जिन्हें पढ़कर सुनाया गया।

इस दौरान प्रो. राजेंद्र पर आधारित 40 पृष्ठों की ‘लघुता में आकाश’ नामक स्मारिका जनार्पित की गयी। परिसर में चारों ओर प्रो. राजेंद्र कुमार की कविताओं, आलोचनात्मक टिप्पणियों और उनके व्यक्तित्व–कृतित्व आधारित प्रदर्शनी लगाई गयी थी।

कार्यक्रम में प्रो. कृष्ण मोहन, प्रो.अजय जैतली, प्रो. आशुतोष पार्थेश्वर, डॉ. सूर्यनारायण, डॉ. विवेक निराला, प्रो. बसंत त्रिपाठी,डॉ. वीरेंद्र मीणा, डॉ.जनार्दन,डॉ. गाजुला राजू, डॉ.अंशुमान कुशवाहा, प्रो. धनंजय चोपणा,  डॉ.लक्ष्मण प्रसाद गुप्त, डॉ.विंध्याचल यादव, प्रकाश मालवीय, अंकित पाठक, प्रेमशंकर सिंह, शिवानंद मिश्रा, सुनील ग्रोवर, हितेश कुमार सिंह, रणवीर सिंह चौहान, धारवेंद्र प्रताप त्रिपाठी, श्रीरंग, अनुपम परिहार, अशोक भौमिक, डॉ. सुरभि त्रिपाठी, प्रो. शिव प्रसाद शुक्ल, डॉ. झरना मालवीय, डॉ. ऋतंभरा मालवीय समेत बड़ी संख्या में शोधार्थी, विद्यार्थी, संस्कृतिकर्मी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।

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