समकालीन जनमत
संस्मरण

नागफ़नी का दोस्त (8)

( भानु कुमार दुबे ‘मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी’ एक तरक्कीपसंद शायर रहे हैं। उनका जन्म 26 सितंबर 1953 को हुआ था।  दो साल पहले 28 जनवरी 2023 को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। अपने उतार-चढ़ाव भरे जीवन में उन्हें तीन बार मानसिक चिकित्सालय में भर्ती होना पड़ा था। एक बार वह टीबी में ऐसे मुब्तिला हुए कि सेकंड स्टेज तक पहुँच गए थे पर यह उनकी जिजीविषा ही थी जिसके चलते वह इन सारी बाधाओं को पार करते हुए अपना लेखन जारी रख सके। भाकपा(माले) के वह समर्पित कार्यकर्ता थे। छपने-छपाने के मामले में वह बेहद संकोची रहे इसलिए उनका केवल एक ग़ज़ल संग्रह ‘सांस्कृतिक संकुल’ से “क़तरे की रवानी” नाम से प्रकाशित हो सका। लेखक, अनुवादक  दिनेश अस्थाना ने  संस्मरण की इस शृंखला में बहुत डूब कर अपने यार ‘मुंतज़िर मिर्ज़ापुरी’ को याद किया है। )

मैं एक बार फिर बेकार हो गया था, पुरानी दिनचर्या फिर शुरू हो गयी थी- वही दिन भर भानु के घर या संजय रेस्टोरेन्ट में। भानु के घर में संगीत की महफ़िल जमने लगी थी। भानु खुद वायलिन बजाता, साथ में हारमोनियम, तबला और बाँसुरी भी होती थी। गाना-बजाना होता रहता था। इसी तरह दिन कट रहे थे।

मार्च 1977 में मुझे बिजली-विभाग में नौकरी मिल गयी, ओबरा तापीय विद्युत-गृह में। मैंने ज्वाइन कर लिया। मिर्जापुर से और भानु से भी दूरी एक बार फिर बढ़ गयी। हाँलाकि यह दूरी कुल 118 किमी है पर मुश्किल यह थी कि सुविधा सिर्फ रोडवेज़ बस की थी और सफर में 4 घंटे लगते थे। नयी नौकरी में ज्यादा छुट्टियाँ ले भी नहीं सकता था। फिर भी महीने में एक बार मिर्जापुर आ ही जाता था, लेकिन वह मटरगश्ती अब सम्भव नहीं थी। सिर्फ रविवार का दिन मिलता था मिलने-मिलाने के लिये और सोमवार को मुँह अँधेरे निकल जाना पड़ता था।

इधर-उधर गप्पें हाँकने की जगह भानु ने भी अपना पूरा समय बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने में झोंक दिया। चूँकि इंग्लिश मीडियम के बच्चों के ट्यूशन की फीस ज्यादे मिलती थी, इसलिये ऐसे बच्चों को ही उसने प्राथमिकता दी। ज़हीन तो था ही, जल्द ही वह इस क्षेत्र का माहिर हो गया। पूरे शहर से उसे बुलाया जाने लगा। भानु यह काम साइकिल से ही करता था। एक लम्बे अर्से बाद 1981 में उसे मिर्जापुर ट्रेज़री में नौकरी मिल गयी परन्तु ट्यूशन का काम उसने जारी रखा।

इसी दौर में उसकी शादी हो गयी, 1983 में। पत्नी खूब सुघड़ और सुशील थी, यह बताने के लिये मैं दो वाकयात का जिक्र करूँगा। 1992 में मैं स्थानान्तरित होकर मिर्जापुर आ गया था। भानु से मुलाकात लगभग रोज की बात हो गयी। एक शाम भानु के घर जाकर मैंने आवाज दी। भानु बहुत तेजी से बाहर आया और बोला, ‘‘ अबहीं हम बाबूजी से बतियावत हई, अबहीं तु जा।’’

मुझे भानु के स्वभाव और उसके मूडी होने की जानकारी थी, इसलिये कुछ अजीब नहीं लगा। मैं लौट गया। अगले दिन शाम को जब भानु से मुलाकात हुयी तो उसने बताया, ‘‘ कल तु चला गया त ओकरे बाद तोहार भाभी हमके बहुत डाँटिन कि अइसे नीरज (मेरा घर का नाम नीरज है) के काहे भगाइ दीहा ? ओन्है बतावै पड़ा कि तु एकर बुरा न मनबा। ’’

और दूसरी घटना है मेरे इलाहाबाद में आ जाने के बाद की। एक दिन मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं अपने घर में सबके प्रति केवल अपने कर्तव्यों का पालन करता हूँ, बिना किसी लगाव की भावना के। मेरा घर में किसी के साथ कोई भावनात्मक लगाव नहीं है- माँ, पत्नी, बच्चों किसी से भी नहीं। मैं किसी से प्यार नहीं करता। दो-तीन दिन इसी तरह बीते तो मैं घबरा गया कि यह कोई मानसिक बीमारी तो नहीं। मुझे लगा कि मेरी इस समस्या का हल केवल भानु के पास ही मिल सकता है। मैं कार्यालय से छुट्टी लेकर मिर्जापुर चला गया। ज्यों ही भानु ने मुझे असमय देखा, उसने दौड़कर मुझे गले लगा लिया। उस पल के सुख का जिक्र करते हुये आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रात में मैं भानु के साथ एक ही बिस्तर पर सोया। बिस्तर की जो सज्जा भाभी ने की थी वह लाजवाब थी, साफ धुली हुयी चादर, तकियों के गिलाफ़ और उनपर बिछे हुये छोटे-छोटे तौलिये मुझे खासतौर पर बहुत आकर्षक लगे।

रात में मैंने भानु से अपनी समस्या के बारे में बताया। भानु ने पूछा, ‘‘ तुम्हें खुद से प्यार है कि नहीं ?  ’ मैंने कहा, ‘‘ है ’’। तो भानु ने समझाया कि तुम्हारे अपने में ही तुम्हारे अजीज़ भी शामिल हैं। तो यदि तुम खुद से प्यार करते हो तो ज़ाहिर सी बात है कि तुम अपने सारे अजीज़ों से भी प्यार करते हो। मेरा मन बहुत हल्का हो गया था। अगला पूरा दिन भानु-भाभी की खातिरदारी का लुत्फ़ उठाया और तीसरे दिन तरोताज़ा होकर फिर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया।

9 जनवरी से 19 जनवरी 1978 तक उ0प्र0 में अध्यापकों की एक प्रदेशव्यापी हड़ताल हुयी थी। इस दौरान हड़ताली शिक्षकों की जगह बाहर से लोगों को बुलाकर शिक्षण व्यवस्था जारी रखी गयी थी। बाद में जब हड़ताल खत्म हो जाने पर वे शिक्षक काम पर लौट आये तो बाहर से बुलाकर नियुक्त किये गये शिक्षकों को बाहर कर दिया गया, लेकिन ऐसे शिक्षकों का एक रिज़र्व-पूल बनाया गया था ताकि भविष्य में कहीं जगह खाली होने पर नियुक्ति में उन्हें प्राथमिकता दी जाय। उस दौर में भानु का नाम भी रिज़र्व-पूल में आ गया था। इसीलिये 1984 में उसे स्थानीय राजस्थान इंटर काॅलेज़ में लेक्चररशिप मिल गयी थी। पर अगले ही साल मैनेजिंग कमेटी से मतभेद होने के कारण उसे निकाल दिया गया। इसके खिलाफ़ भानु के पिताजी ने उसकी ओर से इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दाखिल कर दी। अपने जीते जी मुकदमे की पैरवी वह खुद करते रहे और 2001 में उनकी मृत्यु के बाद यह मोर्चा उसके छोटे भाई रवि (मंटू) ने संभाला। 18 साल की मुतवातिर पैरवी के बाद अक्तूबर 2003 में फैसला भानु के पक्ष में आया, नौकरी फिर शुरू की और पूरी नौकरी करके रिटायर हो गया।

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