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फासीवाद को सांस्कृतिक चुनौती : जसम सम्मेलन की पांच बड़ी उपलब्धियां

ऐसी कई बातें हैं जिनके लिए जन संस्कृति मंच का 17वां राष्ट्रीय सम्मेलन याद किया जाएगा। यह सम्मेलन 12 और 13 जुलाई 2025 को रांची में हुआ।
पहली बात। एक सांस्कृतिक प्रतिक्रान्ति के रूप में भारतीय फासीवाद की पहचान। उसे परास्त करने के तरीकों की खोज।
भारत की आजादी की लड़ाई अंग्रेजी राज के ख़िलाफ़ केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं थी। यह भारत के सामाजिक सांस्कृतिक रूपांतरण की लड़ाई भी थी।
इसने भारतीय समाज में जड़ जमाए श्रद्धा, भक्ति, समर्पण, वर्ण धर्म, पितृ पूजा, विवेक विरोध, सामाजिक विभाजन और युद्ध गौरव जैसे मूल्यों को स्वतंत्रता, समानता, जन एकजुटता, अहिंसा , लोकतंत्र, वैज्ञानिक चेतना, धर्म निरपेक्षता और समाजवादी स्वप्न को प्रतिस्थापित करने की चेष्टा की है।
इस सांस्कृतिक प्रतिक्रान्ति के खिलाफ एक संगठित सांस्कृतिक प्रतिरोध की जरूरत आज सबसे ज्यादा है।
अपने उद्घाटन भाषण में नवशरण सिंह ने वैश्विक पूंजीवाद के संकट के साथ फासीवाद के गहरे रिश्ते की छानबीन की। उनके भाषण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि उन्होंने फासीवाद के खिलाफ भारत में उठ खड़े हुए शक्तिशाली जन आंदोलनों का गहराई से मूल्यांकन किया।
उन्होंने दिखाया कि शाहीन बाग़ और किसान आंदोलन ने देश के समूचे सांस्कृतिक राजनीतिक वातावरण को बदलने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इन आंदोलनों ने प्रतिरोध की नई भाषा और नई कलाओं का विकास किया है।
इन आंदोलनों में स्त्रियों की नेतृत्वकारी भूमिका ने प्रतिरोध का स्त्रीकरण किया। अधिक मानवीय, लोकतांत्रिक, रचनात्मक और टिकाऊ बनाया। इन आंदोलनों से सीखते हुए देश भर में एक ऐसी लहर पैदा की जा सकती है जो फासीवाद को फैसलाकुन तरीके से शिकस्त दे सके।
उन्होंने जन संस्कृति मंच के संस्थापक अध्यक्ष और अपने पिता गुरु शरण सिंह के योगदान को याद करते हुए बताया कि किस तरह वे नाटक, साहित्य और कलाओं को मजदूरों और किसानों के बीच ले गए। इन कलाओं ने मजदूरों को लड़ने की प्रेरणा, ताकत और वैचारिक -भावनात्मक सहारा दिया। बदले में पंजाब के किसानों और मजदूरों ने गुरु शरण सिंह को अपने दिलो दिमाग में बसाया।
इस मानीखेज चर्चा में संजय काक, बीजू टोप्पो, राशिद अली, महादेव टोप्पो ( प्रगतिशील लेखक संघ ), एम जेड खान ( जनवादी लेखक संघ), शैलेंद्र ( इप्टा) और निवर्तमान अध्यक्ष रवि भूषण ने विभिन्न आयाम जोड़े।
रवि भूषण जी ने आजादी के बाद के समूचे इतिहास की समीक्षा करते हुए दिखाया कि हिंदूत्ववादी शक्तियों ने किस तरह भारत की सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को ध्वस्त करने की कोशिश की है।
जसम दिल्ली के अध्यक्ष कवि मदन कश्यप ने सांगठनिक सत्र में बाजार और सत्ता के नए दबावों के बीच प्रतिरोध की कला के विकास के लिए लेखकों कलाकारों के बीच सच्ची एक जुट और सही नजरिए के विकास की जरूरत पर जोर दिया।
इस सम्मेलन की दूसरी बड़ी उपलब्धि देश के विभिन्न प्रांतो से लगभग 300 प्रतिबद्ध संस्कृति कर्मियों की भागीदारी थी। इनमें झारखंड के 80 प्रतिनिधियों की टोली सबसे बड़ी थी। सम्मेलन में आए प्रतिनिधियों में जोशीले युवाओं की भारी संख्या उत्साह बढ़ाने वाली थी। भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों के साथ सम्मेलन में स्त्रियों की भागीदारी भी पहले की तुलना में सबसे अधिक थी।
तीसरी बड़ी उपलब्धि यह रही कि सम्मेलन में कवियों लेखकों के अलावा रंगकर्मी, गायक, चित्रकार, मूर्तिकार और फिल्मकार बड़ी संख्या में शरीक हुए।
विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए हम इनके रचनात्मक तेज से परिचित हुए और इनकी नई सोच से भी।
झारखंड के मूर्धन्य फिल्मकार मेघनाथ की भागीदारी ने सांस्कृतिक प्रतिरोध की एक पूरी परंपरा से इस सम्मेलन को जोड़ दिया।
चौथी उपलब्धि। सम्मेलन की सबसे यादगार घटनाओं में एक थी कवि देवी प्रसाद मिश्र द्वारा उनकी कई ताज़ा कविताओं की संगीतमय प्रस्तुति। भारतीय धुनों के साथ जैज और रैप का रचनात्मक सम्मिश्रण करते हुए जब उन्होंने भरे हुए सभागार में मंच से अपनी प्रतिरोधी कविताएं गाकर सुनाईं, एक जादुई समाँ बंध गया। हिंदी में आज से पहले किसी कवि ने ऐसा साहसिक प्रयोग नहीं किया। इसकी सफलता से हिंदी कविता के लोक- विस्तार की नई रोमांचक संभावनाएं पैदा हुई हैं।
पांचवी उपलब्धि। जन संस्कृति मंच के नए अध्यक्ष के रूप में जहूर आलम का चुनाव अपने आप में एक बड़ा संदेश लेकर आया है। यह प्रतिरोध की संस्कृति के क्षेत्र में अभिजन उन्मुख साहित्य के आधिपत्य को जन संस्कृति की तरफ से दी गई चुनौती है।
नए अध्यक्ष जहूर आलम ने सशक्त सांस्कृतिक प्रतिरोध के निर्माण के लिए सभी समानधर्मा संगठनों और समूहों को एकजुट करने का संकल्प घोषित किया है। उनके नेतृत्व में संगठन की सांस्कृतिक गतिविधियों में भी विविध विधाओं और नई दिशाओं के उन्मेष की उम्मीद की जा सकती है।
निश्चय ही सम्मेलन की सफलता के लिए प्रतिभागियों की मेहनत के साथ-साथ संगठन के महासचिव मनोज कुमार सिंह के विज़न और उनकी सांगठनिक क्षमता की सराहना होगी।
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