अल्लामा जमील मज़हरी उर्दू अदब के उन अहम शायरों में हैं जिन्होंने अपनी शायरी को महज़ जज़्बात और ख़ूबसूरती की अभिव्यक्ति तक महदूद नहीं रखा, बल्कि अपने दौर के समाजी, सियासी और इंसानी सवालों से उसे गहरे तौर पर जोड़ा। उनका असल नाम सैयद काज़िम अली था। 2 सितम्बर 1904 को बिहार में पैदा हुए जमील मज़हरी ने शायरी के साथ-साथ सहाफ़त, शिक्षा और सियासी-समाजी लेखन में भी अपनी अलग पहचान बनाई।
उनकी ज़िन्दगी ऐसे दौर से गुज़री जिसमें हिंदुस्तान एक गहरे सियासी उथल-पुथल से गुज़र रहा था और इन तमाम हलचलों की गूँज उनकी शायरी में सुनाई देती है। 2 सितंबर उनकी यौम-ए-पैदाइश है; इसलिए आज उन्हें याद करना महज़ एक बड़े शायर को याद करना भर नहीं, बल्कि उस अदबी और फ़िक्री विरासत की तरफ़ लौटना भी है जिसमें ज़ुल्म के ख़िलाफ़ प्रतिरोध और इंसान की गरिमा के सवाल लगातार मौजूद हैं। अल्लामा जमील मज़हरी ने वैसे तो उर्दू अदब की कई सिन्फों में अपनी क़लमकारी के जौहर दिखाए, लेकिन मर्सिये में उन्होंने अपनी एक अलग और ख़ास पहचान बनाई। मीर अनीस के बाद मर्सिये का जो एक क्लासिकी पैटर्न और दायरा तय हो गया था, उसमें बाद के कई शायरों ने बेहतरीन और यादगार मर्सिये कहे, लेकिन वे उसी तयशुदा दायरे के भीतर रहे।
आधुनिक मर्सिये के विकास में इस बने-बनाए पैटर्न से आगे निकलने की पहली बड़ी कोशिश जोश मलीहाबादी के यहाँ दिखाई देती है, ख़ास तौर पर उनके मर्सिये ‘हुसैन और इंक़लाब’ में, जहाँ कर्बला को अपने दौर के इंक़लाबी और समाजी सवालों से जोड़ने की कोशिश की गई। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अल्लामा जमील मज़हरी के यहाँ भी ऐसे कई मर्सिये दिखाई देते हैं जो मीर अनीस से चली आ रही क्लासिकी परंपरा को महज़ दोहराते नहीं, बल्कि उसके दायरे को तोड़कर उसमें अपने दौर की नई सियासी और समाजी हक़ीक़तों को शामिल करते हैं। उनके यहाँ मर्सिया सिर्फ़ कर्बला के वाक़ये का बयान या शहादत का मातम नहीं रहता, बल्कि अपने ज़माने के सवालों से सीधे मुख़ातिब होता है। इसी लिहाज़ से अल्लामा जमील मज़हरी का मिज़राब-ए-शहादत (मिज़राब उस पिक को कहते हैं जिससे सितार, गिटार या दूसरे तार वाले इस्टुमेंट के तार पर चोट करके संगीत पैदा किया जा सके.) आधुनिक उर्दू मर्सिये की परंपरा में एक ख़ास अहमियत रखता है और कर्बला को अपने दौर की सियासी और समाजी चेतना से जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आता है।
मिज़राब-ए-शहादत सिर्फ़ कर्बला के शहीदों को याद करने वाला मर्सिया नहीं है। इसमें कर्बला अतीत की एक घटना मात्र नहीं रहती, बल्कि अपने ज़माने को समझने का एक आईना बन जाती है। शायर कर्बला के वाक़ये को बयान करने से पहले उसके बुनियादी सवालों को अपने वक़्त में ले आता है। मर्सिये के शुरुआती बंद ही इस बात का इशारा करते हैं कि शायर का मक़सद सिर्फ़ रोना रुलाना नहीं है। वह अपने क़लम को जागृति का ज़रिया बनाता है। वह लिखता है:
” जुंबिश से मेरे ख़ामा-ए-अफ़सूँ-तराज़ की,
खुलती है आँख उस गिरह-ए-नीम-बाज़ की,
दम जिसका घुट रहा था कशाकश से राज़ की,
सतरे नहीं, शिकन हैं हिजाबात-ए-नाज़ की,
दिल के दिए जलेंगे मोहब्बत के देस में।
निकला है हुस्न लफ़्ज़-ओ-मआनी के भेस में।।”
यहाँ क़लम सिर्फ़ लिखने का औज़ार नहीं है। उसकी जुंबिश से आँख खुलती है। यानी शायरी का पहला काम बेहोशी को तोड़ना और सोई हुई निगाह को जगाना है। गिरह-ए-नीम-बाज़ में बंद आँख का जो रूपक है, वह बहुत अर्थपूर्ण है। समाज के सामने सच्चाई मौजूद है, लेकिन आँख पूरी तरह खुली हुई नहीं है। शायर का क़लम उस आधी खुली आँख को पूरी तरह खोलने की कोशिश करता है। वह अपनी सतहों को सिर्फ़ सतरे नहीं कहता, बल्कि शिकन कहता है। ये शिकनें हिजाबात-ए-नाज़ को चीरती हैं। यानी शायरी का काम सजावट करना नहीं, पर्दे हटाना है। मर्सिया यहाँ एक ऐसी शायरी बन जाता है जो सच्चाई पर पड़े हुए पर्दों को हटाती है। आख़िरी दो मिसरों में मोहब्बत और हुस्न आते हैं, लेकिन यह हुस्न महज़ शब्दों का हुस्न नहीं है। यह वह हुस्न है जो इंसानी ज़िंदगी में रोशनी पैदा करता है। इसलिए दिल के दिए जलने की बात आती है। यही विचार अगले बंद में और खुलता है:
“आवाज़ में भी हुस्न है और ख़ामोशी में भी,
तंज़ीम में भी हुस्न है, आशुफ़्तगी में भी,
यूँ तो ज़ुहूर हुस्न का है रास्ती में भी,
एक बाँकपन ज़रूर है लेकिन कजी में भी,
सच पूछिए अगर तो बसीरत में हुस्न है।
आँखों में रोशनी हो तो ज़ुल्मत में हुस्न है।।”
यहाँ जमील मज़हरी हुस्न की परंपरागत धारणा को उलट देते हैं। हुस्न सिर्फ़ सीधे, व्यवस्थित और ख़ूबसूरत दिखाई देने वाली चीज़ में नहीं है। आवाज़ में भी है और ख़ामोशी में भी, तंज़ीम में भी है और आशुफ़्तगी में भी। यानी दुनिया को देखने की निगाह अगर गहरी हो तो उसके उलझाव में भी अर्थ दिखाई दे सकता है। आख़िरी दो मिसरे यानी बैत तक पहुँचते पहुँचते वो अपनी बात को और ज़्यादा साफ़ तौर पर पेश करते हैं यहाँ हुस्न का संबंध सीधे बसीरत और रोशनी से जुड़ जाता है। अंधेरा अपने आप सुंदर नहीं हो जाता; उसे देखने वाली आँख में रोशनी होनी चाहिए। इस तरह शायर सौंदर्य को चेतना से जोड़ देता है। यह बात आगे चलकर उसके पूरे समाजी और सियासी नज़रिये की बुनियाद बनती है। वह सिर्फ सुंदरता की चर्चा करके नहीं रुकता। वह पूछता है कि जिस समाज में इंसान की बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं हैं, वहाँ बसीरत और फ़न कैसे पैदा होंगे। वह कहता है:
“लेकिन शऊर हुस्न का इस आगही के साथ,
मुमकिन नहीं है तबअ की आशुफ़्तगी के साथ,
पनपेगा ख़ाक ज़ौक़-ए-नज़र मुफ़लिसी के साथ,
होती है फ़न की नश्व-ओ-नुमा ज़िंदगी के साथ,
सौ भेंट चढ़ रहे हों जहाँ चार के लिए।
उस मुल्क में जगह नहीं फ़नकार के लिए।।”
यहाँ मर्सिया अचानक बहुत साफ़ समाजी मायने ग्रहण कर लेता है। मुफ़लिसी यानी ग़रीबी और फ़न यानी कला के बीच शायर सीधा रिश्ता स्थापित करता है। वह यह नहीं मानता कि कलाकार समाज से बाहर की कोई ऐसी आत्मा है जो भूख, ग़रीबी और समाजी संकट से बेअसर रहकर कला पैदा कर सकती है। वह पूछता है कि जब ज़िन्दगी ही संकट में हो तो देखने और महसूस करने का ज़ौक़ कैसे विकसित होगा? फ़न ज़िन्दगी से पैदा होता है और ज़िन्दगी की हालत से उसका गहरा संबंध है। जब वो ये कहता है ‘इस मुल्क में जगह नहीं फ़नकार के लिए’ तो ये सिर्फ़ कलाकार की व्यक्तिगत शिकायत नहीं है; यह उस समाजी निज़ाम पर टिप्पणी है जिसमें इंसान की रचनात्मकता, स्वतंत्रता और संवेदना के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जाती है। यहीं से मर्सिया अपने वक़्त के हिंदुस्तान की तरफ़ सीधा मुड़ता है। शायर के लिए कर्बला कोई अलग दुनिया नहीं है। वह अपने सामने मौजूद मुल्क को देखता है और कहता है:
” ज़ुल्मत-कदे में हिंद के महशर बपा है आज,
तहज़ीब अपने ख़ून से रंगीँ क़बा है आज,
रफ़्तार-ए-वक़्त मुद्दई-ए-इर्तिक़ा है आज,
लेकिन जो हो रहा था वही हो रहा है आज,
जिन्स-ए-ख़ुदी जहाँ में है अरज़ाँ उसी तरह।
इंसान का ग़ुलाम है इंसां उसी तरह।।”
यह बंद मिज़राब-ए-शहादत की पूरी वैचारिक बुनावट को समझने के लिए केंद्रीय है। हिंद का नाम लेकर शायर अपने वक़्त और अपने समाज से सीधे मुख़ातिब है। एक तरफ़ इर्तिक़ा यानी तरक़्क़ी का दावा है, दूसरी तरफ़ इंसान की हालत में बुनियादी बदलाव नहीं आया। यहाँ शायर तारीख़ को रैखिक ढंग से नहीं देखता कि पुराना ज़माना बुरा था और नया ज़माना अपने आप बेहतर हो गया। उसके लिए सवाल यह है कि अगर सत्ता के रिश्ते, दौलत के रिश्ते और इंसान-इंसान के बीच ग़ुलामी के रिश्ते बने हुए हैं, तो सिर्फ़ वक़्त बदल जाने से समाज कैसे बदल गया? इसी बात को वह अगले हिस्से में और ज़्यादा साफ़ और तीखे अंदाज़ में कहता है:
” है हुक्मरान अक़्ल पे दौलत अभी तलक,
ईमां की हो रही है तिजारत अभी तलक,
जागीर अहरमन की है जन्नत अभी तलक,
इब्लीस है मुअल्लिम-ए-फ़ितरत अभी तलक,
पामाली-ए-हुक़ूक़ का तहज़ीब नाम है।
इंसानियत की रूह का एक क़त्ल-ए-आम है।।”
यह महज़ नैतिक शिकायत नहीं है। इसमें आर्थिक ताक़त और समाजी सत्ता के रिश्ते की तरफ़ बहुत साफ़ इशारा है। शायर देख रहा है कि इंसानी अक़्ल, इंसानी फ़ैसले और इंसानी मूल्य किस तरह दौलत के दबाव में हैं। जिसके पास दौलत है, उसके पास असर है; जिसके पास दौलत नहीं, उसकी आवाज़ कमज़ोर कर दी जाती है। साथ ही वह मज़हबी नैतिकता के बाज़ारीकरण पर भी चोट करता है। ईमान जो इंसान को ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा कर सकता था, वही जब तिजारत का हिस्सा बन जाए तो उसका नैतिक अर्थ कमज़ोर हो जाता है। यहाँ कर्बला का संदर्भ और भी अर्थपूर्ण हो जाता है, क्योंकि कर्बला में सवाल केवल सत्ता का नहीं था; सवाल यह भी था कि सत्ता के सामने ईमान और ज़मीर की क्या जगह होगी। तहज़ीब शब्द आम तौर पर इंसानी तरक़्क़ी, सभ्यता और शाइस्तगी के अर्थ में इस्तेमाल होता है। लेकिन जमील मज़हरी यहाँ तहज़ीब के दावे को उलट देते हैं। अगर तहज़ीब के नाम पर इंसान के हक़ कुचले जा रहे हैं, तो ऐसी तहज़ीब किस काम की? अगर इंसानियत की रूह ही मारी जा रही है, तो सभ्यता का बाहरी विकास कोई असली तरक़्क़ी नहीं है। अब कर्बला का मूल सवाल ज़ुल्म के सामने इंसान के हक़ और ज़मीर की हिफ़ाज़त आधुनिक समाजी सवालों से जुड़ जाता है। लेकिन शायर के लिए यह समस्या सिर्फ़ आर्थिक नहीं है। इसका एक गहरा नैतिक और मनोवैज्ञानिक पहलू भी है। वह अपने वक़्त की इंसानी संवेदना के पतन को इस तरह दर्ज करता है:
“ छाई है दिल पे मौत की सर्दी उसी तरह,
है चेहरा-ए-हयात पे ज़र्दी उसी तरह,
पा-ए-हवस की दश्त-नवर्दी उसी तरह,
ज़ौक़-ए-तलब की मयकदा-गर्दी उसी तरह,
एहसास का ज़वाल वही, पस्तियाँ वही।
साक़ी वही है, जाम वही, मस्तियाँ वही।।”
इस बंद में उसी तरह और वही की लगातार वापसी बहुत ख़ास है। शायर बार-बार कहता है कि बहुत कुछ सुधारने के बावजूद बुनियादी हालत वही है। दुनिया की शक्ल बदल सकती है, हुकूमतों के नाम बदल सकते हैं, लेकिन अगर इंसान के भीतर की हवस, बेदिली और बे-हिसी वही रहे तो असली तब्दीली कहाँ हुई? ज़िंदगी का चेहरा पीला पड़ गया है और इंसान के एहसास में ज़वाल आ गया है। दूसरी तरफ़ हवस की दश्त-नवर्दी और मयकदा-गर्दी उस वर्ग और मानसिकता की तरफ़ इशारा करती है जो अपने सुख और अपने मतलब की तलाश में लगी हुई है। यानी एक तरफ़ इंसानी दुख है, दूसरी तरफ़ उससे बेपरवाह हवस है। एक तरफ़ ज़िंदगी की ज़र्दी है, दूसरी तरफ़ उसी समाज में मस्ती और ऐश है। और फिर शायर उस समस्या की जड़ तक पहुँचता है :
” फ़ितरत वही है गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार की,
सिमटी है एक बाग़ में रौनक़ बहार की,
मुट्ठी में एक शख़्स के क़िस्मत हज़ार की,
तौहीन है अदालत-ए-परवरदिगार की,
बदला नहीं निज़ाम-ए-मशीयत अभी तलक।
करवट ही ले रही है क़यामत अभी तलक।।”
एक शख्स के हाथ में हज़ारों लोगों की किस्मत का सिमट जाना सत्ता और दौलत के केंद्रीकरण की तस्वीर है। यहाँ शायर का सवाल यह है कि ऐसी व्यवस्था क्यों है जिसमें एक शख्स या एक छोटा-सा तबक़ा दूसरों की ज़िंदगी के फैसले कर सकता है। अगले मिसरे में वे निज़ाम की बात करते हैं कि अगर समस्या सिर्फ़ किसी एक शख्स में होती तो उस शख्स को बदल देना काफी होता। लेकिन जब निज़ाम वही रहे तो चेहरे बदलने के बावजूद हालात फिर उसी जगह लौट आते हैं। इंसानी ग़ुलामी सिर्फ़ ज़ंजीरों में नहीं होती। आर्थिक निर्भरता, सत्ता का केंद्रीकरण, ग़रीबी, सामाजी बदहाली और हक़ूक़ की पामाली भी ग़ुलामी की शक्लें हैं। इस मायने में जमील मज़हरी कर्बला को एक बड़े समाजी रूपक में बदल देते हैं। मर्सिये में यह आलोचना और आगे बढ़ती है:
“आलम ख़राब-ए-फ़लसफ़ा-ए-नावो-नोश है,
शायर है और मातम-ए-तमकीन-ओ-होश है,
एहसास को ज़वाल है, फ़ितनों को जोश है,
हर मौज हादसाद की तूफां-बदोश है,
दुनिया तलाश करती है साहिल नजात का।
दिखला दे उसको कोई किनारा फ़ुरात का।।”
यहाँ दुनिया एक ऐसे संकट में है जिसमें एहसास का ज़वाल हो रहा है और फ़ितनों को जोश मिल रहा है। यानी संवेदना कम हो रही है, लेकिन हिंसा, अशांति और संकट बढ़ रहे हैं। हादसे की हर लहर अपने साथ तूफ़ान लिए हुए है। यह किसी एक घटना का वर्णन नहीं, बल्कि एक ऐसे वक़्त की तस्वीर है जिसमें संकट लगातार पैदा हो रहे हैं। लेकिन इस पूरे अंधेरे के बीच आख़िरी दो मिसरे अचानक कर्बला को वर्तमान के सामने खड़ा कर देते हैं: “दुनिया तलाश करती है साहिल नजात का/दिखला दे उसको कोई किनारा फ़ुरात का।” यहाँ फ़ुरात का किनारा सिर्फ़ कर्बला का एक मुक़ाम नहीं रह जाता। वह नैतिक चुनाव का प्रतीक बन जाता है।
दुनिया नजात का रास्ता तलाश कर रही है और शायर उसे फ़ुरात की तरफ़ देखने को कहता है। यानी कर्बला में सिर्फ़ शहादत नहीं हुई थी; वहाँ एक ऐसे इंसानी इख़्तियार का प्रदर्शन हुआ था जिसमें ज़ुल्म के सामने झुकने से इनकार किया गया। मिज़राब-ए-शहादत में कर्बला कोई मज़हबी रस्म या अतीत की याद भर नहीं है। वह हर उस वक़्त में मौजूद है जहाँ इंसान को अपने ज़मीर और सत्ता के बीच चुनाव करना पड़ता है। यज़ीद यहाँ सिर्फ़ सातवीं सदी का एक शासक नहीं रह जाता और हुसैन सिर्फ़ एक तारीखी शहीद नहीं रह जाते। दोनों एक बड़े नैतिक और सियासी प्रतीक में बदल जाते हैं। एक तरफ़ ऐसी सत्ता जो अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए इंसानी हक़ को कुचलती है और दूसरी तरफ़ वह इंसान जो अपनी जान की कीमत पर भी उस सत्ता के सामने झुकने से इनकार करता है।
ये मर्सिया आज़ादी के बाद के हिंदुस्तान को भी सवालों के घेरे में लाता है। सियासी आज़ादी मिल जाने के बाद भी अगर आर्थिक और समाजी गैर-बराबरी कायम रहे, अगर दौलत कुछ हाथों में सिमटती रहे, अगर ग़रीब और कमज़ोर इंसान अपने बुनियादी हक़ के लिए संघर्ष करता रहे, अगर कलाकार और विचारक के लिए जगह कम होती जाए, अगर धर्म भी तिजारत का हिस्सा बन जाए और अगर इंसान इंसान का ग़ुलाम बना रहे, तो फिर सिर्फ़ हुकूमत बदल जाने को मुकम्मल आज़ादी कैसे कहा जा सकता है ?
मिज़राब-ए-शहादत को सिर्फ़ मज़हबी मर्सिया कहना उसके दायरे को छोटा करना होगा। यह एक समाजी और सियासी मर्सिया है, जिसमें कर्बला के ज़रिए आधुनिक दुनिया की आलोचना की गई है। जमील मज़हरी का एक कारनामा ये भी रहा है कि उन्होंने आधुनिक मर्सिये तो लिखे साथ ही अपनी पहचान जोश मलीहाबादी से काफ़ी अलग रखी। जोश की शायरी में इंक़लाब का लहजा अक्सर ज़्यादा ऐलानी और सीधे टकराव वाला दिखाई देता है। उनका अंदाज़ पाठक को झकझोरता है और सीधे कार्रवाई की तरफ़ धकेलता है। जमील मज़हरी का तरीका कुछ अलग है। वह सवाल को दार्शनिक और समाजी स्तर पर खोलते हैं। उनकी आवाज़ में भी प्रतिरोध है, लेकिन वह प्रतिरोध लगातार सोचने के लिए मजबूर करता है। इस मर्सिये की सबसे बड़ी ताक़त यही है कि वह पाठक को सिर्फ़ अतीत का शोक मनाने नहीं देता। वह उसे अपने वक़्त की तरफ़ देखने के लिए मजबूर करता है। वह पूछता है कि अगर हम कर्बला को याद करते हैं तो क्या हम उसके मूल नैतिक सवाल को भी क़ुबूल करते हैं? अगर हम हुसैन की शहादत को हक़ और इंसाफ़ की जीत मानते हैं तो अपने वक़्त के ज़ुल्म, गैर-बराबरी और बेइंसाफ़ी के बारे में हमारी स्थिति क्या है? अल्लामा जमील मज़हरी के नज़दीक कर्बला एक ऐसी रोशनी है जिसके सहारे हर दौर अपनी सियासत, अपनी तहज़ीब और अपने इंसानी रिश्तों को परख सकता है। इसलिए शायर की चिंता सिर्फ़ यह नहीं कि कर्बला में क्या हुआ था; उसकी असली चिंता यह है कि आज हमारे आसपास क्या हो रहा है।

