Category : देसवा

जनमत देसवा

मियों का मोहल्ला- एक

समकालीन जनमत
मोहम्मद उमर ‘उखड़ी हुई खोड़हीं सी सड़कें, ये बारिशों में नदी होने का हुनर रखती हैं। चौराहे के एक तरफ गोश्त की दुकान तो एक...
देसवा

आदिवासी स्कूल वाया बाईपास

मनोज कुमार सिंह
( पत्रकार मनोज कुमार के साप्ताहिक कॉलम ‘देसवा’ की 11 वीं क़िस्त ) 28 नवम्बर 2011। दिन रविवार। नेपाल जाने वाली सोनौली बाइपास सड़क के...
देसवा

एक लड़की का सुसाइड नोट

मनोज कुमार सिंह
( पत्रकार मनोज कुमार के साप्ताहिक कॉलम ‘देसवा’ की दसवीं क़िस्त  ) पांच वर्ष पहले सितम्बर महीने की नौ तारीख को गोरखपुर-बड़हलगंज मुख्य मार्ग पर...
देसवा

बूढी गंडक नदी और एक विस्थापित बूढ़ा

मनोज कुमार सिंह
खाली हो गए लोगों की झोपड़ियां एक पतली सड़क के उत्तर और दक्खिन पानी में डूबी हुई हैं। शाम हो रही है। सड़क पर कुछ...
देसवा

सरसो का खेत और मोहम्मदीन का उदास चेहरा

समकालीन जनमत
( पत्रकार मनोज कुमार के साप्ताहिक कॉलम ‘देसवा’ की आठवीं क़िस्त  )    इसी हफ्ते खबर आयी कि कुशीनगर के हवाई अड्डे से सितम्बर महीने...
देसवा

क्या वे सिर्फ समोसा बना रहे थे

मनोज कुमार सिंह
( पत्रकार मनोज कुमार के साप्ताहिक कॉलम ‘देसवा’ की सातवीं क़िस्त  ) जुलाई 2016 के पहले हफ़्ते एक दिन एक अख़बार की छोटी सी खबर...
देसवा

गाँव की औरतों का कुबूलनामा- तीन

समकालीन जनमत
कीर्ति   “कत्ले हुसैन असल में मरगे यज़ीद है इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद।” ये वही हुसैन हैं, जिनके लिए उनकी माँ...
देसवा

फूलमनहा में फूल का जनाज़ा

समकालीन जनमत
( पत्रकार मनोज कुमार के साप्ताहिक कॉलम ‘देसवा’ की छठवीं क़िस्त  ) तीन वर्ष पहले की बात है। मैं जब महरजगंज जिले के बृजमनगंज क्षेत्र...
देसवा

गाँव की औरतों का कुबूलनामा- दो

समकालीन जनमत
कीर्ति (कीर्ति, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बी.ए. अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रही हैं। कोरोना और लाॅकडाउन के दौरान उन्होंने गाँव की औरतों के जीवन को...
देसवा

गाँव की औरतों का कुबूलनामा-एक

समकालीन जनमत
कीर्ति  (कीर्ति इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बी.ए तृतीय वर्ष की छात्रा हैं। गाँव की औरतों के जीवन को लेकर उन्होंने एक आलेख-श्रृंखला प्रारम्भ की है। इसमें...

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More

Privacy & Cookies Policy