ये तारा , वो तारा , हर तारा : लाइट्स बन्द , कैमरा ऑन , एक्शन

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डॉ. स्कन्द शुक्ला

जब दुनिया में विश्वयुद्ध चल रहा हो और हर जगह बत्ती गुल करने का आदेश हो , तब कोई दूर-सुदूर की ज्योतियों में जीवन टटोल सकता है ? जब आसमान में घुप्प अँधेरा कर दिया गया हो , तब कोई दूरबीनों में नज़रें गड़ाकर तारों की हथेलियाँ देखकर उनकी उम्रें बता सकता है ? और इस तरह तारों को पढ़कर भला क्या ऐसा हासिल हो जाएगा कि उसपर इतनी मग्ज़मारी की जाए !

वॉल्तर बादे और उन जैसे वैज्ञानिक ख़ब्ती नहीं हैं , संसार की चुनिन्दा समझदार उम्मीद हैं। वे राष्ट्रवादी उन्माद में नहीं बहे हैं , वे ज्ञान-आलोक में नित्य स्थिर स्नात हैं। उनकी नज़रें फैलते जाते ब्रह्माण्ड पर हैं , जिसके बारे में एडविन हबल पहले ही बता चुके हैं। उन्हें फटकर मरते सुपरनोवीय विस्फोटों पर काम करना है , जो सूर्य से बड़े-बहुत बड़े तारों की स्वाभाविक मृत्यु है।

हमारा सूर्य अन्तरिक्ष का एक मामूली अधेड़ तारा है , जो अभी पाँच बिलियन साल यों ही चमका करेगा। आसमान में दिखने वाले बिलियनों तारों को वैज्ञानिक अलग-अलग ढंग से पढ़ते और वर्गीकृत करते हैं। उनकी कान्ति के आधार पर , उनके द्रव्यमान के आधार पर , उनसे निकलते विद्युतचुम्बकीय विकिरण व उसके स्पेक्ट्रम के आधार पर , उनके तापमान और उसके कारण होने वाले रंग के आधार पर , इत्यादि। इस तरह से तारों को अलग-अलग बिरादरियों में सुविधा और समझ के लिए बाँटा जाता है।

एक दिलचस्प वर्गीकरण तारों में मौजूद ‘धातु’ और उनकी उम्र का भी है। और जब तारों के सन्दर्भ में हम ‘धातु’ शब्द का प्रयोग करें , तो इसका अर्थ केवल लोहा-ताँबा-जस्ता ही नहीं होता। बल्कि हाइड्रोजन और हीलियम के अतिरिक्त हर रासायनिक तत्त्व को खगोलविद् सुविधा के लिए धातु ही कह दिया करते हैं। सो कार्बन वैसे तो धातु नहीं है , न ऑक्सीजन और नाइट्रोजन धातुएँ हैं ; लेकिन खगोल और तारक-अध्ययन के समय इन्हें धातु मानकर ही चर्चा हम जारी रखते हैं।

ब्रह्माण्ड में तारों की दो बिरादरियाँ हैं। जनसंख्या 1 और जनसंख्या 2। इनमें जनसंख्या 2 कहलाने वाले तारे अपेक्षाकृत अधेड़ हैं और जनसंख्या 1 कहलाने वाले तारे युवा। ( यहाँ ‘अधेड़’ और ‘युवा’ शब्द समझाने के लिए ही प्रयोग किये जा रहे हैं और इनका आशय मिलियनों-बिलियनों सालों समझना चाहिए। ) जनसंख्या 2 तारों में धातुएँ कम हैं , जबकि जनसंख्या 1 तारों में अधिक। इतना हम जानते ही हैं कि तारे हाइड्रोजन की वे भट्ठियाँ हैं , जिनमें इसे परस्पर संलयित करके हीलियम में बदला जा रहा है। यों समझें कि तारों पर एक साथ मिलियनों-मिलियन हाइड्रोजन बम एक-साथ फट रहे हैं ! हाइड्रोजन परस्पर जुड़कर हीलियम बनती है और फिर इसी क्रम में एक-से-भारी-एक तत्त्व क्रमशः तारों के भीतर बनते चले जाते हैं।

जनसंख्या 2 तारे सूर्य की तुलना में बहुत अधिक द्रव्यमान ( सैकड़ों गुणा ) वाले हैं। ये बहुत तेज़ जलते हैं और मात्र कुछ मिलियन वर्षों में अपना ईंधन खपा देते हैं। नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया के दौरान ये पहले अपनी हाइड्रोजन को हीलियम में बदलते हैं और फिर इससे अधिक भारी तत्त्वों ऑक्सीजन-नाइट्रोजन-कार्बन-लोहा-इत्यादि का निर्माण भी कर देते हैं। फिर ये सुपरनोवा की मौत मरते हैं ; एक प्रचण्ड विस्फोट होता है और इनके भीतर बने ये सभी तत्त्व अन्तरिक्ष में बिखर जाते हैं।

इन्हीं मृत हो चुके तारों से फिर तारों की नयी पीढ़ी जन्म लेती है। इन्हीं में एक हमारा सूर्य है। नयी पीढ़ी के तारे जनसंख्या 1 कहलाते हैं। चूँकि इनको धातुएँ विरासत में मिलती हैं , सो जाहिर है कि इनमें धातु-मात्रा जनसंख्या 2 के तारों से कहीं अधिक होती है।

मगर हम क्यों तारों की इन पीढ़ियों को समझें-जानें ? हमारे लिए इनका क्या महत्त्व और क्या मूल्य ? क्यों न हम भी अतीत का मण्डन-वन्दन करते हुए जीवन गुज़ारा करें आनन्द से ?

उत्तर यह है कि इस तारक-ज्ञान का महत्त्व है। नयी पीढ़ी के तारे यानी जनसंख्या 1 तारे ही वे हैं , जिनके चारों ओर ग्रहों का निर्माण होता पाया गया है। यानी जब इन तारों का पिछले विस्फोटित जनसंख्या 2 के तारों की धूल और गैसों से निर्माण होता है , तो उसी समय ग्रह भी बनना शुरू होते हैं। ग्रहों के निर्माण के लिए ( विशेषकर पृथ्वी-जैसे ग्रहों के लिए ) धातुओं की बड़ी आवश्यकता है। तारों की तरह वे केवल हाइड्रोजन-हीलियम से नहीं बन सकते।

सो वैज्ञानिक जनसंख्या 1 तारों के आसपास परिक्रमा करते ग्रहों को टटोलते हैं। उनमें जीवन या जीवन की अनुकूलता तलाशते हैं। हमारा मुखिया सूर्य है। जहाँ हमें हम-सा मुखिया और हम-सा घर मिलेगा , वहीं हम जाकर बस सकते हैं। शायद वहाँ पहले से लोग हों। लेकिन फिर भी जीवन की तलाश में जीवन की शर्तों की तलाश आवश्यक है। सो तारों की धात्वीयता की तलाश इसीलिए हमारे महत्त्व की है।

वॉल्तर बादे-जैसे वैज्ञानिक हमें निराशा में आशान्वित रहना सिखाते हैं। जब दुनिया में एकमात्र जीवनपोषी ग्रह पर मारकाट मची हो , तो विज्ञान कहीं दूर किसी कोने में बिना हताश हुए जीवन तलाशता है। मौत के बीच खड़े होकर भी उम्मीद की किरण क़ायम है। जर्मनी में एक एडॉल्फ़ हिटलर है , तो एक वॉल्तर बादे भी हैं।

( अब आप अगर इस लेख को पढ़ते यहाँ तक आ गये हैं , तो यह भी जानिए कि एक समूह जनसंख्या 3 तारों का भी है जो मिले नहीं हैं , महज़ कल्पित हैं। इनमें धातुएँ हैं ही नहीं। ये ब्रह्माण्ड के सबसे बूढ़े तारे हैं। लेकिन चूँकि ब्रह्माण्ड फ़ैल रहा है , इसलिए अगर ये हैं , तो हमसे बहुत-बहुत-बहुत दूर हैं। इनकी उपस्थिति के कुछ प्रत्यक्ष तो नहीं , किन्तु परोक्ष प्रमाण वैज्ञानिकों के पास हैं और इनपर हम आगे बात करेंगे। )

 


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