संस्कृत साहित्य में स्वाधीन स्त्रियाँ

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राधावल्लभ त्रिपाठी

 

संस्कृत साहित्य की परंपरा पाँच हजार साल से अधिक पुरानी है। कविता और शास्त्र की विविध विधाओं में यह बहुत संपन्न साहित्य है। पर यह प्रायः पुरुषों के द्वारा और पुरुषों के लिए लिखा गया साहित्य है। इसके बावजूद इसमें स्वाधीन मन वाली, स्वाधीनता के लिए संघर्ष करती या पुरुष के वर्चस्व के आगे न झुकने वाली स्त्रियों की अनेक छवियाँ हैं। इसके दो कारण हैं। एक,  जिस वैदिक समाज में इस साहित्य का उपक्रम हुआ उस समाज में मातृसत्तात्मक आदिम कबीलों का सातत्य बना हुआ था। दो, चिंतन और संवेदना के स्तर पर दार्शनिकों तथा कवियों ने स्त्री की गरिमा को पहचाना और उसकी स्वाधीनता का सम्मान किया।

किसी भी समाज में व्यक्ति की स्वाधीनता की पहचान निम्नलिखित कारकों से हो सकती है – एक, वह व्यक्ति अपनी सर्जनात्मकता, संकल्पों और अभीप्साओं को स्वयं की तथा समाज की बेहतरी के लिए स्वायत्त अभिव्यक्ति दे सके; दो, वह अन्य व्यक्तियों से वाद, विवाद और संवाद कर सके; तथा तीन, वह अपना योगक्षेम स्वयं वहन  कर पाए।

ऋग्वेद तथा अन्य वैदिक ग्रंथों में कतिपय स्त्रियों का ऋषि के रूप में उल्लेख है। स्त्री के ऋषि होने का अर्थ है कि वह मंत्रों का साक्षात्कार कर लेती है।  हरिपद चक्रवर्ती (1981: 54) ने लोपामुद्रा, अपाला तथा घोषा को महिला ऋषि माना है। मांधात्री, अगस्त्य की अज्ञातनाम बहिन, वसुक्र की पत्नी, शाश्वती, गोधा विश्ववारा भी ऐसी ही महिला ऋषि हैं। मंत्रों की रचनाकार कवि के रूप में घोषा का उल्लेख ऋग्वेद (1.117.7, 10.40.5, 10.39.3.6) में आता है। घोषा राजा कक्षीवत की बेटी थी। अपाला तथा विश्ववारा आत्रेय वंश की थीं। ऋग्वेद के पंचम मंडल में आत्रेय ऋषियों के मंत्र हैं। अपाला तथा विश्वारा के भी मंत्र इनमें हैं। इन महिला ऋषियों में से कुछ ने तो पूरे पूरे सूक्त (बहुसंख्य मंत्रों का एक अध्याय) भी रचे।

मंत्रों का साक्षात्कार कर सकना या काव्य रच लेना – वैदिक काल में ऐसा कर्म है, जो स्वाधीनता की परम स्थिति को प्रकट करता है। जो स्त्री ऋषि के रूप में मंत्रद्रष्टा हो सकती है, वेद उसके लिए जन्मजात अधिकार बन जाता है। कौषीतकि ब्राह्मण में बताया गया है कि वेद में पारंगत स्त्रियों को पथ्यस्वस्ति वाक् की उपाधि से सम्मानित किया जाता था। वैदिक यज्ञों में, जहाँ यजमान के साथ उसकी पत्नी की सहभागिता अनिवार्य थी, सीतायज्ञ तथा रुद्रयज्ञ ये दो यज्ञ ऐसे बताए गए हैं, जिनका अनुष्ठान केवल स्त्रियों के द्वारा  ही किया जा सकता था। स्त्री अपनी पुरोहित स्वयं है, और अपना कर्मकांड वह स्वयं ही करती है – यह स्थिति वैदिक समाज के भीतर भी मातृसत्ताक समाज की मौजूदगी साबित करती है।

यह कहना गलत होगा कि  इन स्त्री ऋषियों का प्रेरणा के स्पंदित क्षणों में कुछ मंत्र रच लेना उनकी स्वाधीनता का लक्षण नहीं है। वस्तुतः मंत्रद्रष्टा स्त्री ऋषियों ने अपने कर्तृत्व व रचनाशीलता के द्वारा ऋषि के रूप में मान्यता हासिल की। ऋषि होने का अर्थ अपनी प्रज्ञा की सक्रियता से समाज में सार्थक हस्तक्षेप के लिए स्वाधीन होना भी है। जिन महिला ऋषियों का उल्लेख यहाँ किया गया है, उनमें से कुछ बाद में ब्रह्मवादिनी हो गईं। ब्रह्मवादिनी बुद्धिजीवी महिला है, जो वाद या खुली बहस में शिरकत कर सकती है, शास्त्र रच सकती है या धर्मोपदेश कर सकती है। पूर्ववैदिक काल में घोषा और इला इसी तरह की महिलाएँ थीं। उत्तर-वैदिक काल में जब उपनिषद रचे जा रहे थे, उस समय इनकी संख्या और बढ़ी होगी। काशकृत्स्ना मीमांसा दर्शन की आचार्य थी। उपनिषदों में गार्गी, मैत्रेयी, कात्यायनी और सुवर्चला – ये महिलाएँ अपनी जीवनशैली स्वयं चुनती हैं। गार्गी ब्रह्मवादिनी है, वह अकेली याज्ञवल्क्य के सामने उस समय के बुद्धिजीवियों के कदाचित् सब से बड़े जमावड़े बहस में टिकी रहती है। मैत्रेयी घर-बार और अटूट संपदा का त्याग कर याज्ञवल्क्य के साथ जाने का निर्णय लेती है, कात्यायनी अपने पति को छोड़ कर भी इसी घर-बार और ऐश्वर्य में रमने का।

ऋग्वेद में ऐसी अनेक महिलाओं का उल्लेख है, जो पुरुषों के साथ सहज रूप में युद्ध में शरीक होती हैं। स्त्री का हथियार उठाना यहाँ उसका एक स्वैच्छिक कर्म है, इसमें न कोई अनहोनी बात है, न लड़ाई में शामिल होने के लिये उसे मजबूर ही किया गया है।  ऋग्वेद में विश्पला का वर्णन आया है। विश्पला राजा खेल की रानी थी। वह अपने पति के साथ युद्ध में लड़ी, उसकी जंघा (घुटने के नीचे का अंग) कट गई। अश्विनी कुमारों ने, जो वैद्य होने के साथ  सर्जरी में भी माहिर कहे गए हैं, उसके आयसी जंघा (घुटने में लगाने के लिये लोहे का बना पाँव) लगा दी। मुद्गल की पत्नी मुद्गलानी (इन्द्रसेना) तीरंदाजी में माहिर थी। वह भी मुद्गल के साथ गाएँ चुरा कर ले जाते दस्युओं से भिड़ंत में धनुष-बाण ले कर मैदान में उतरी। वेदों के अंतर्गत पंचविंश ब्राह्मण में (25.13.3) रुशमा की कथा आती है। रुशमा कुरुक्षेत्र की रहने वाली थी, उसने इंद्र से युद्ध किया।

ऋग्वेद में ऐसी अनेक महिलाओं का भी वर्णन है, जो अपनी यौनिकता को सहज उन्मुक्त अभिव्यक्ति देती हैं। स्त्री के खुल कर दैहिक संसर्ग की कामना को पुरुष के आगे प्रकट करना उस समय बुरा भी नहीं माना गया। अगस्त्य ऋषि की महत्ता तो संस्कृत के वेदों और पुराणों में ही नहीं, तमिल साहित्य में वर्णित है। अगस्त्य उत्तर को दक्षिण से जोड़ने के अपने अभियान में या असुरों से संघर्ष में इतने व्यस्त रहते थे कि अपनी पत्नी लोपामुद्रा की ओर ध्यान देने का समय ही उनके पास न था। फिर वे बूढ़े भी हो गये थे। ऋग्वेद के पहले मंडल का 179वाँ सूक्त अगस्त्य और लोपामुद्रा का संवाद है। लोपामुद्रा कहती है कि काया बुढ़ा जाए, फिर भी एक पति को कामना करती हुई पत्नी के पास आना चाहिए। इस सूक्त में लोपामुद्रा देह की जिस भाषा में बोलती है,  वह इतनी बेबाक है कि ऋग्वेद का अँग्रेजी में अनुवाद करने वाले यूरोप के संस्कृत विद्वान ग्रिफिथ साहब को इस सूक्त के कतिपय मंत्रों का अंग्रेजी उल्था करने में शर्म लगी, तो उन्होने इन मंत्रों का लैटिन में अनुवाद कर दिया, और जिन मंत्रों में उन्हें शर्म नहीं लगी, उनका अंग्रेजी में करते गये। अंग्रेजी में क्रिश्चियनिटी की बदौलत जो पापबोध आ मिला है, उसके कारण वहाँ देह को ले कर पाखंड से भरी शर्म और झिझक हो सकती है, संस्कृत और लैटिन की अपनी परंपरा में शर्म का यह पाखंड नहीं है। इस पाखंड से मुक्त होने की वजह से ऋग्वेद के ऋषि वाणी की भव्यता का वर्णन करते हुए यह कह सके – ʻजानकार व्यक्ति के सामने वाणी अपनी काया को ऐसे ही अर्पित कर देती है, जैसे कामना से भरी पत्नी अपनी देह को अपने पुरुष के आगे।ʼ यहाँ पत्नी के लिये विशेषण ʻउशतीʼ है, जिसका उन आधुनिक भाषाओं में अनुवाद थोड़ा मुश्किल है, जिन्हें बोलने वालों ने पाखंडमयी लज्जा का लबादा ओढ़ लिया है। इंद्र की पत्नी इंद्राणी के वर्णन भी वेदों में एक प्रखर अभिव्यक्ति वाली महिला के रूप में हैं। कामसूत्रकार वात्स्यायन तो इंद्राणी का अपने शास्त्र की एक आद्य प्रवक्त्री के रूप में स्मरण करते हैं।

संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त गृहिणी और दंपती जैसे शब्द घर पर स्त्री के स्वामित्व के बोधक रहे हैं। मातृसत्ताक समाजों में स्त्री अपने घर की मालकिन है, घर का प्रबंध वही करती है, कमाई भी वह अपने पास रखती है। अपना पुरुष या पति चुन कर उसे अपने घर ला कर रखने का अधिकार भी वह रखती है। वेदों और उपनिषदों के समय तक किसी लड़की के द्वारा अपना पति स्वयं चुनना एक सहज बात बनी हुई है। इसीलिए उपनिषदों की सुवर्चला जब अपने पिता से कहती है कि वह जाँच-परख कर अपने लिए अपना पति स्वयं चुनेगी, तो पिता उसे इसके लिए बिना ननुनच के छूट देते हैं। सुवर्चला अपने चयन का मानक भी स्वयं बनाती है – जो युवक उसके सामने अपने आप को उसकी बराबरी का ब्रह्मज्ञानी या बुद्धिजीवी साबित कर देगा, वह उससे विवाह करेगी। श्वेतकेतु जैसा तेजस्वी युवा चिंतक उसकी कसौटी पर खरा साबित होता है, सुवर्चला उसे पसंद कर के उसे ब्याह लेती है। सावित्री के पिता अश्वपति अपनी बेटी के गुणों के कुछ ऐसे कायल थे कि उन्हें लगा वे उसके लायक लड़का नहीं ढूँढ सकेगें। उन्होंने सावित्री के लिए यात्रा करने की व्यवस्था कर के उसे रवाना कर दिया कि वह दुनिया भर में घूम कर देख-भाल कर अपने लिये लड़का चुन ले। सावित्री ने अपनी इस वरण की स्वतंत्रता का सही-सही उपयोग किया। पर सारे पिता सुवर्चला और सावित्री के पिताओं जैसे उदार और समझदार नहीं होते। ऐसे हद दर्जे के गँवार पिता भी हमारे समाज में रहे हैं कि लड़की कायदे का लड़का अपने लिए जान-परख कर उससे विवाह कर ले तो वे वरवधू दोनों की बनी-बनाई  दुनिया को नेस्तनाबूद करने के लिए  कमर कस लें।

दूल्हे को वर कहा जाता था। वर का अर्थ ʻचुना गयाʼ भी होता है और ʻचुनने वालाʼ भी। पर मेरी समझ से मूल अर्थ ʻचुना गयाʼ ही होगा, क्योंकि लड़की अपना लड़का चुनती थी। मजे की बात यह है कि वर का स्त्रीलिंग संस्कृत में नहीं बनता, क्योंकि लड़की चुनने वाली है, चुनी जाने वाली नहीं। लड़की के लिये स्वयंवरा (स्वयं वरण करने वाली) या पतिंवरा शब्द हैं। आगे चल कर लड़की के लिए वरण की अपनी स्वतंत्रता को स्वयंवर के रूप में एक औपचारिक जश्न बना दिया गया। स्वयंवर में मूलतः तो चुनने की स्वतंत्रता लड़की के पास ही है, विवाहार्थी पुरुषों को उसके आगे नुमाइश की तरह पेश होना है, और उसके द्वारा खारिज किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने का उन्हें अधिकार नहीं है।  महाभारत में दमयंती या कालिदास के रघुवंश महाकाव्य में इंदुमती के स्वयंवर इसी तरह के हैं।

स्त्री स्वाधीन मन के साथ ही जन्म लेती है। पुरुष या समाज उसकी स्वाधीनता को अक्षुण्ण रहने दे – यह भी संभव है; और जैसा होता रहा है, यह भी कि अपनी वर्जनाओं, पाबंदियों और जड़ नैतिक मान्यताओं के तहत उसकी स्वाधीनता का वह हनन करता जाए। संस्कृत साहित्य में स्त्री की स्वाधीनता और स्वाधीनता के हनन की सभी स्थितियों के अक्स हैं। इस दृष्टि से तीन तरह की स्त्रियाँ संस्कृत साहित्य में देखी जा सकती हैं – एक तो वे जिन्होंने स्वाधीनता को एक मूल्य की तरह आत्मसात कर के उसे अपने जीवन में चरितार्थ किया; दूसरी वे जिन्हें इस मूल्य को हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ा और उसकी कीमत चुकानी पड़ी; तीसरी वे जिनके लिए स्वाधीनता एक सपना बन कर रह गया। यदि वाल्मीकि की रामायण से तीनों के उदाहरण देना हो, तो पहले का उदाहरण कैकेयी, दूसरे का सीता, तारा, मंदोदरी और  अहल्या; तथा तीसरे का उदाहरण कौसल्या, सुमित्रा आदि बहुसंख्य नारियाँ हैं।

कैकेयी के जैसी स्वाधीन मन वाली तथा स्वाधीनता के मूल्य को सत्यापित करने वाली स्त्री रामायण में तो दूसरी नहीं है। वाल्मीकि ने जितनी रामायण की कथा बताई है, उसी को ध्यान में रखें, तब इस कथन की सचाई समझी जा सकेगी। कैकेयी विश्पला, मुद्गलानी, रुशमा आदि वैदिक काल की नारियों की तरह युद्ध के मैदान में दशरथ के साथ उतरी थी। वाल्मीकि के अनुसार युद्ध में दशरथ घायल हो कर मरणासन्न हो गए, तो कैकेयी उनके प्राण बचाने के लिए उन्हें युद्धभूमि से उठा लाई। दशरथ इस बात से प्रसन्न हुए और उन्होंने कैकेयी से दो वर माँगने के लिये कहा। कैकेयी ने कई साल बाद राम के ऐन राज्याभिषेक की तैयारी के मौके पर ये वर माँगे – इसमें न चालाकी है, न मौकापरस्ती; यह दशरथ को उनकी ऐतिहासिक भूल के लिए दिया गया दंड अवश्य है। वाल्मीकि बताते हैं कि दशरथ ने कैकेयी के साथ विवाह राज्यशुल्क दे कर किया था, अर्थात उन्होंने कैकेयी के पिता को वचन दिया था कि उनकी लड़की से यदि लड़का होगा, तो अयोध्या का राजपद उसी को दिया जाएगा। इस बात को कैकेयी जानती थी, इस बात को राम भी उस समय जानते थे जब उनके राज्याभिषेक के लिए तैयारियाँ की जा रहीं थीं। तभी तो वे कैकेयी के वर की बात पता चलते ही वन जाने के लिए इस तरह तैयार हुए जैसे मन से एक बोझ हट गया हो। दशरथ के मन में राम के लिये मोह था, वे कैकेयराज को दिए वचन पर सुविधा के साथ लीपापोती कर सकते थे, और उन्होंने राम को समझा-बुझा कर राजपद स्वीकार कर लेने की साजिश में शामिल भी कर लिया था।

अहल्या ने इंद्र से प्रेम  किया था। योगवासिष्ठ वेदांत का ग्रंथ होते हुए भी इंद्र और अहल्या के प्रेम के अपार आनंद का रोमांचक वर्णन करता है। एक समय अहल्या और इंद्र के प्रेम की कहानी एक लोककथा बन गई होगी, क्योंकि दक्षिण के मंदिरों में अहल्या और इंद्र के प्रेमनिरत युगल अंकित हैं। अहल्या को गौतम ने छोड़ दिया, और वह वर्षों अकेली रही। राम जब दंडकारण्य जा रहे थे, तो वे अहल्या से मिले, उसे माँ कह कर पुकारा और उसे प्रणाम किया। फिर उन्होंने गौतम ऋषि को भी समझा-बुझा कर अहल्या को फिर से स्वीकार कर लेने का अनुरोध किया। वाल्मीकि की इस कथा में अहल्या सचमुच का पत्थर नहीं बनती, न ʻछुअत सिला भइ नारिʼ की ही कोई बात है।

रामायण की सीता, तारा और मंदोदरी और महाभारत की द्रौपदी अपने पतियों से वाद, विवाद और संवाद करती हैं। सीता राम के साथ वन जाने की जिद करती हुई कहती हैं – ʻमैं तुम्हारे रास्ते के कुशकाँटे रौंदती हुई आगे आगे चलूँगी (अग्रतस्ते गमिष्यामि मृद्नन्ती कुशकण्टकान्)।ʼ अपहरण करते रावण से वह जूझती है। अशोकवाटिका में अकेली उसे चुनौती देते हुए वह कहती है – ʻअरे दुर्मति, तू गीदड़ है, जो मुझ सिंहिनी की कामना कर रहा है (त्वं पुनर्जम्बुकः सिंहीं मामिहेच्छसि दुर्मते)।ʼ रावण उसके सामने सहमता है। रावणवध के बाद राम सीता को सामने देख कर आपे से बाहर हो कर कुछ का कुछ बोलने लगते हैं, सीता तब भी उनसे वाद और संवाद करती है। द्रौपदी का एक पति जुआ खेल कर अपने भाइयों के साथ गुलाम बन चुका है, द्रौपदी अपने बुद्धिवैभव से उन्हें गुलामी से  निजात दिलाती है, पर उनकी मानसिक गुलामी का वह क्या करती?

सीता के तेज से रावण घबराता है, राम उसके आगे निरुत्तर रहते हैं; द्रौपदी के एक सवाल के सामने महावीर भीष्म परेशान और पसीने पसीने हो जाते हैं।  कौन अधिक स्वाधीन है – सीता या राम और रावण? द्रौपदी या भीष्म और युधिष्ठिर?

मंदोदरी रावण को सलाह देती रही है कि वह सीता को राम को लौटा कर उनसे संधि कर ले। पर युद्ध में अपने सारे भाई-बंधुओं के मारे जाने पर पूरी तरह से हताश रावण जब उसके पास सलाह माँगते हुए पूछता है कि क्या अब राम से संधि कर लूँ और सीता को लौटा दूँ, तो वही मंदोदरी हनुमन्नाटक में रावण से कहती है – अब क्या संधि करना? और दशानन, अब यदि तुम लड़ने से डर रहे हो, तो मैं तलवार उठा कर युद्ध में कूदने के लिये तैयार हूँ।ʼ ये संस्कृत साहित्य की मनस्विनी नारियाँ हैं, भक्तिकाल की वे भक्तिनें नहीं तो बार-बार हाथ जोड़ कर या पैर पड़ कर पति से कहें कि ʻबिनती बहुत करों का स्वामीʼ

दुष्यंत शकुंतला
महाभारत की शकुंतला को विवाह कर के भी दुष्यंत ने पहचानने से इंकार किया तो दोनों के बीच जम कर झड़प हुई। शकुंतला अंत में यह कह कर चल दी, मैं अपने बेटे को इतना बड़ा वीर बनाऊँगी कि यह अपने बूते पर तुझसे आर्यावर्त का राज्य ले लेगा।

कालिदास की जिस शकुंतला को उन्नीसवीं सदी के फ्रेंच आपेरा में नारी की मुक्ति के प्रतीक के रूप में  उद्धृत किया गया, उसमें महाभारत वाली शकुंतला की आँच नहीं है। बाद के संस्कृत साहित्य में स्त्री का तेज मंदा होता गया है, स्वाधीन स्त्रियाँ कम होती गईं हैं। पर स्त्री की स्वाधीनता का सपना बाण, शीला भट्टारिका और भवभूति जैसे कवियों में जागता दिखता है। बाणभट्ट की महाश्वेता और कांदबरी तो उस जादुई यथार्थ का हिस्सा लगती हैं, जो पुरुषतंत्र के परे है। भवभूति के नाटकों की दुनिया में एक लड़की आत्रेयी है, जो प्रयाग के पास वाल्मीकि के तपोवन से चलती चलती दंडकारण्य में अकेली वेदांत पढ़ने के लिए दूसरे तपोवन में जा रही है। वासंती है, जो सीता पर राम के द्वारा किए गए अत्याचार को ले कर उनसे कड़ी बहस करती है, एक महिला कामंदकी है, जो अपने गुरुकुल में वह शास्त्र (आन्वीक्षिकी) पढ़ाती है, जिस पर पुरुषों का एकाधिकार माना जाता रहा है। मालती है, जो पिता का घर छोड़ कर माधव से विवाह करती है।

वेदों में इंद्र को अहल्याजार (अहल्या का यार) कहा गया। पिछले दो हजार सालों में संस्कृत में रचित काव्यों में स्त्री के जारज संबंधों के रोमांचक वर्णन किये जाते रहे, विज्जिका और शीलाभट्टारिका जैसी महिला कवियों के द्वारा भी और अन्य कवियों के द्वारा भी। ये संबंध पुरुषों के आधिपत्य और वर्जनाओं के संसार को छिन्न-भिन्न करने वाले ओपन सीक्रेट थे।

1975 के आसपास उज्जैन के कालिदास समारोह में महादेवी वर्मा का व्याख्यान सुनने को मिला। महादेवी की कविता जितना कोमल, करुणामय और रहस्यमय लगी, मंच पर उतने ही बेबाक और दबंग स्वर में उन्हें बोलते देखा और सुना। अपनी संस्कृत के अध्ययन को ले कर उन्होने बताया कि उनकी वेद पढ़ने की बड़ी लालसा थी, पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वेद के गुरुजी को यह मान्य नहीं था कि कोई लड़की या महिला वेद का अध्ययन करे, लिहाजा उनका संस्कृत का अध्ययन जारी नहीं रह पाया।

विश्पला और रुशमा जैसी योद्धा नारियों या अपाला और गार्गी जैसी मंत्र रचने वाली या वेदज्ञ स्त्रियों के देश में स्त्री को वेद पढ़ने का निषेध करने की स्थिति क्यों और कैसे आई – यह अलग से विचार का विषय है।

(राधावल्लभ त्रिपाठी : संस्कृत साहित्य के विद्वान  तथा प्रगतिशील चिंतक )

One Thought to “संस्कृत साहित्य में स्वाधीन स्त्रियाँ”

  1. राम नरेश राम

    राधा वल्लभ त्रिपाठी जी का समकालीन जनमत पोर्टल पर छपा लेख बहुत उम्दा और बहुत सारे प्रश्नों को जन्म देने वाला है। संस्कृत साहित्य के बारे में जैसी धारणा आमतौर पर बनी हुई है उसको तोड़कर उसके बारे में नए सिरे से सोचने समझने को प्रेरित करने वाला लेख है। यह लेख कुछ निष्कर्षों को प्रस्तावित करता है। जैसे वैदिक काल में मातृसत्तात्मक समाज होने के तथ्य को न केवल रेखांकित करता है बल्कि इस तथ्य को सत्य की तरह स्थापित करता है। दूसरा यह कि यह लेख इस बात को भी स्थापित करता है कि जिस मध्यकाल (भक्तिकाल) के स्त्री स्वाधीनता की चर्चा हमारे साहित्य में की जाती है वह संस्कृत साहित्य में वर्णित स्त्री स्वाधीनता की तुलना में समर्पण वादी प्रवृत्ति का है।
    लेख को पढ़ते हुए जिन सवालों से सामना हो रहा था उसमें एक सबसे प्रमुख सवाल यह था कि आखिर जिन स्त्रियों के जीवन प्रसंगों के हवाले से स्त्री स्वधीनता की ऐतिहासिक स्थिति को रेखांकित किया जा रहा है वे स्त्रियां किन जातियों की हैं? क्या संस्कृत साहित्य में जो स्त्रियां हैं उनमें गैर ब्राह्मण और गैर क्षत्रिय स्त्रियों का उल्लेख है? अगर है तो उनकी स्वाधीनता की प्रकृति लेख में उल्लिखित स्त्रियों की स्वधीनता से किस प्रकार भिन्न है। अगर ये सभी स्त्रियां सवर्ण हैं तो संस्कृत साहित्य में स्त्री स्वाधीनता की खोज अधूरी है। यह तभी मुकम्मल होगी जब इस में गैर सवर्ण स्त्रियों के भी जीवन प्रसंग आएं। क्या कारण है कि सबरी के जीवन प्रसंग का कोई उल्लेख नहीं है।
    लेख में वैदिक समाज को मातृसत्तात्मक समाज कहा गया है। और इसके लिए पहले से यह सूत्रीकरण दिया गया है कि चुकि जिस दौर में वेदों की रचना हो रही थी उस समय तक मातृसत्तात्मक कबीलों का सातत्य बना हुआ था और इसी को ऋषियों और कवियों ने वेदों और शास्त्रों में व्यक्त किया है। दरसल यही वह समय है जिसकी उपलब्द्धियों को गिनवाते कुछ लोग थकते नहीं हैं। लेकिन सच्चाई क्या है आखिर इसमें परसुराम की माँ का जिक्र क्यों नहीं है। क्या उसका उल्लेख संस्कृत साहित्य में नहीं है। कहने का मतलब यह है कि यह लेख इतिहास की चयनित उपलब्द्धियों पर तो बात करता है लेकिन उस ऐतिहासिक दौर के अंतर्विरोधों पर बात नहीं करता है। लेख की समझ यह है कि स्त्री स्वाधीनता जैसी स्थिति तो पहले से ही मौजूद थी लेकिन बाद की सामाजिक और सांस्कृतिक स्थितियों ने उन्हें गुलामी की जंजीरों में जकड लिया। संघ जाति के संदर्भ में इसी तरह के तर्क देता है और यह कहता है कि पहले जाति नहीं थी , छुआछूत नहीं था वह तो मुग़ल थे जो इन चीजों को लेकर आये या लागू किया।
    इस लेख में संस्कृत साहित्य की कथाओं के लोक संस्करण को भी ध्यान में रखना चाहिए था। लोक में संस्कृत साहित्य की कथाओं के अनेक अनेक संस्करण हैं और स्त्रियों के हवाले से स्वाधीनता के अनेक पाठ भी हैं। ये लोक कथाएं संस्कृत साहित्य के आडंबर और आभिजात्य को चुनौती देती हैं और स्त्री स्वाधीनता के लिए प्रतिरोध भी रचती हैं। कुल मिलाकर संस्कृत साहित्य के भीतर से कुछ अच्छा निकालने की प्रक्रिया में बहुत कुछ उपेक्षित न हो जाय और जिसको गौरवान्वित न होना था वह बेवजह ही प्रतिष्ठा न प्राप्त कर जाए। वैसे भी इतिहास एकांगी तो होता नहीं है।

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