एक समाज के रूप में कहाँ पहुँच गए हैं हम ?

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18 अगस्त को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में एक 12 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार करने के बाद हत्या की बात सामने आई.पहले-पहल बाहरी मजदूरों पर संदेह गया.इस पूरे मामले को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश बाहरी मजदूरों पर संदेह की बात सामने आते ही शुरू हो गयी.अफवाहबाजी का दौर इतना तीव्र था कि प्रशासन ने 28 घण्टे के लिए गढ़वाल के पांच जिलों में इंटरनेट सेवा बंद कर दी.21अगस्त को पुलिस ने नया खुलासा किया कि एक स्थानीय व्यक्ति इस घटना में संलिप्त था.
उत्तरकाशी के पूरे मामले पर यह टिप्पणी :

उत्तरकाशी में अबोध बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के आरोपी को पुलिस ने पकड़ने का दावा किया है. इस पूरे प्रकरण से कई सारे सवाल खड़े होते हैं. पहला तो उन पर, जो सिर्फ इतना भर से तोड़-फोड़,हिंसा,उन्माद अफवाहबाजी पर उतर आए कि कुछ दूसरे धर्म वाले लोगों पर संदेह जताया गया. क्या बच्ची के साथ हुई वीभत्स घटना से उन्हें वाकई पीड़ा होती है ? या कि धार्मिक आधार पर विभाजन पैदा करने के पहले से जारी एजेंडे को पुष्ट करने का एक और ऐसा अवसर,वे ऐसी घटनाओं को समझते हैं ?

सोशल मीडिया पर फैले विष बुझे संदेश तो पीड़ा की तरफ इंगित नहीं करते. वे तो यही संकेत करते हैं कि उन्मादी,ऐसी घटनाओं से उपजे आक्रोश की लहर में, अपनी घृणा की राजनीति में तटस्थ या निरपेक्ष लोगों को लपेट लेना चाहते हैं. यह हद है कि किसी वीभत्स पीड़ादायक घटना से उन्मादियों को दर्द नहीं महसूस होता,बल्कि अपने निर्धारित एजेंडे को आगे बढ़ाने का अवसर दिखाई देता है.

सवाल तो पुलिस पर भी है,जो गिरफ़्तारी को अपनी पीठ थपथपाने के अवसर के रूप में देख रही होगी. जो विवरण सामने आया है,उसके अनुसार जिस आरोपी को आज गिरफ्तार किया गया है,वह बीते दिनों इस हत्या के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में शामिल था.

कहा तो यहाँ तक जा रहा है,बाहरी मजदूरों को संदिग्ध बनाने में उसी की भूमिका है. प्रश्न यह है कि हमारी पुलिस इतनी भोली-भाली क्यूँ है ? एक आदमी पुलिस को बताता है कि मजदूर आरोपी हैं. पुलिस लपक कर मजदूरों को पकड़ लेती है. फिर दो-तीन दिन बाद दुराचार के बाद मारी गयी लड़की की बहन का बयान आता है और उसके आधार पर वर्तमान आरोपी को पुलिस गिरफ्तार कर लेती है. एक बयान पर कुछ लोगों की धरपकड़ तो दूसरे बयान पर दूसरे व्यक्ति की गिरफ़्तारी ! क्या इतनी भर ही होनी चाहिए पुलिस की भूमिका ? जब आरोपी यह कहता है कि उसने अकेले ही सारी घटना को अंजाम दिया तो यह स्वाभाविक बयान नहीं,कुछ सिखाये-पढ़ाये जैसा होने का संदेह पैदा करता है. अभी इस घटना की स्वतंत्र,निष्पक्ष जांच की मांग अपनी जगह खड़ी है. उम्मीद है कि जांचकर्ता घटना की गंभीरता को समझते हुए,अपराध में शामिल किसी व्यक्ति को कानून की पकड़ से छूटने नहीं देंगे.

इस घटना में पहले दिन से जैसे आरोपियों को भीड़ के हवाले करने की मांग की गयी,वह चिंताजनक संकेत हैं. कल्पना करके देखिये कि पहले दिन जो लोग संदिग्ध बताए गए,यदि वे भीड़ के हाथ पड़ गए होते तो क्या होता ? निश्चित ही वे भीड़ द्वारा बेहद भयानक तरीके से मार डाले गए होते. भीड़ उन्हें मारती और मारने वालों में वह व्यक्ति भी शामिल होता,जिसे अब हत्यारा बताया जा रहा है. क्या यह न्याय होता ? वही न्याय,जिसके नाम पर भीड़,पुलिस द्वारा पकड़े गए लोगों को अपने हाथों सौंपने की मांग कर रही थी ? दुर्दांत अपराधी ने एक मासूम बच्ची के साथ दुराचार करके उसकी हत्या कर दी. भीड़ चाहती है कि उसे भी हत्या करने दी जाये. वह जिसने बच्ची को मारा,वह हत्यारा है और जो भीड़ बिना यह जाने कि व्यक्ति दोषी है या नहीं,पीट-पीट कर किसी को मार डालना चाहती है,उसके भीतर क्या संभावित हत्यारा नहीं छुपा हुआ है ?

यह भी जरा सोचिए कि यह जो हत्या करने की हद तक जाने वाला गुस्सा है,क्या यह सिर्फ किसी घटना विशेष से उपजा हुआ है ? या जीवन में ढेर सारी नाकामियों, तकलीफ़ों, कुंठाओं ने दिमाग में इतना गुस्सा भर दिया है कि वह,किसी सामूहिक हत्या के जरिये उस गुस्से,दिमाग में भरे उस जहर से मुक्ति पाना चाहता है. परपीड़न से सुख पाने की यह प्रवृत्ति तो मनोरोग है. लेकिन ऐसी अवस्था में तो भीड़ हत्या में शामिल हो कर,यह गुस्सा शांत नहीं होगा,बल्कि और मनोरोगी,और कुंठित बनाएगा. सोच कर देखिये तो कि जब भीड़ का अंग हो कर लोग हत्या करने को अधिकार के रूप में चाहें तो यह कितनी भयावह परिस्थिति है ! एक समाज के रूप में कहाँ पहुँच गए हैं हम ?

(पोस्ट में प्रयुक्त तस्वीर गूगल से साभार)

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