कविता

वह कौन सी आग है जिससे अपने आप को बचाने का आह्वान करते हैं विद्रोही

कविता में जीवन तभी आती है जब कवि जनता के जीवन से सीधे जुड़ा हुआ हो। अकादमिक परिक्षेत्र में अक्सर वे ही कवि चर्चा के केंद्र में रहे जो जनता के जीवन से सीधे नहीं जुड़े थे। यही कारण है कि कविता के मूल्यांकन की कसौटी भी इसी को ध्यान में रखकर तय की जाती रही। इसका परिणाम यह हुआ कि जो कवि आम जनता की शक्ति और संघर्ष को अपनी कविता का विषय बनाता है, उसे बहुत आसानी से उच्च और अभिजन संस्थानों और व्यापक सांस्कृतिक परिदृश्य में जगह नहीं मिलती। बहुधा उस कवि को कवि का दर्जा भी संघर्ष के बाद ही मिल पाता है।

इस कारण से आम जन की बात और उनके दुःख दर्द को दर्ज करने वाले लोक कवियों और गायकों को नेपथ्य में धकेल दिया गया। इस पूरी प्रक्रिया में अभिजनवाद काम करता दिखाई देता है। इसके बरक्स ऐसे कवि जनता के संघर्षों में उसके हिस्से बन गए और आने वाली पीढ़ियों के लिए पथ प्रदर्शक भी बन गए।

ऐसे ही कवि थे रामशंकर यादव ‘विद्रोही’। एकदम लीक से हटकर चलने वाले कवि, जनता के जीवन को न केवल अपनी कविता में व्यक्त करने वाले बल्कि उसके संघर्ष में सड़क पर जनता के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर प्रतिरोध की इबारत लिखने वाले कवि। उनकी कविताएं अखिल सभ्यता में मनुष्य के पराजय की जड़ तक पहुँचती हैं और वहीं से जीवन का मानवीय पक्ष रचती हैं।

मैं सोचता हूँ और बार बार सोचता हूँ
ताकि याद आ सके-
प्राचीन सभ्यताओं के मुहाने पर
एक औरत की जली हुई लाश मिलती है और
इंसानों की बिखरी हुई हड्डियाँ
इसका सिलसिला सीरिया के चट्टानों से लेकर
बंगाल के मैदानों तक चला जाता है
और जो कान्हा के जंगलों से लेकर
सवाना के वनों तक फैला हुआ है.

वे सिर्फ करुणा विगलित नहीं होते बल्कि आवयविक ढंग से उसके हिस्से बनकर उसकी समीक्षा करते हैं। उनकी कविताओं में उनके जीवन के विपरीत एक तर्क पद्धति और व्यवस्था है। जो स्थापित व्यवस्था का विकल्प तलाशने की बेचैनी से उपजी हैं और पाठकों को भी इसके लिए प्रेरित करती हैं।

‘ औरतें ’ शीर्षक कविता में जब वह कहते हैं कि ‘ वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया/मैं नहीं जानता’ तो यहाँ उनकी यह गुलामी और दमन के इतिहास की जड़ की तलाश की बेचैनी ही दिखाई देती है।

वामपंथी आंदोलन में जनता ने अपने पेशे से जुड़े कामकाजी हथियारों को संघर्ष के प्रतीक में बदल दिया जिससे उनका अपने जीवन और संघर्ष से जुड़ाव और गहरा हुआ । उसी तरह विद्रोही ने अपने जातिगत श्रम संस्कृति में गर्व और स्वाभिमान का भाव इस तरह से व्यक्त किया कि वह जातिवादी होने के यथास्थिवादी सम्भावना का अंत हो गया। जब वह कहते हैं-

मैं अहीर हूँ
और ये दुनिया मेरी भैंस है
मैं उसे दुह रहा हूँ
और कुछ लोग कुदा रहे हैं

तो वह अपने अहीर होने पर गर्व नहीं करते और न ही उस विभाजनकारी अमानवीय जाति व्यवस्था को बनाये रखने की आकांक्षा व्यक्त करते हैं बल्कि वह जाति को एक ऐसे रूपक की तरह इस्तेमाल करने लगते हैं जिसमें भरा हुआ अर्थ संपूर्ण भारतीय आम जन के जीवन को व्यक्त करने लगता है। इस तरह के रूपक के प्रयोग का साहस सिर्फ और सिर्फ उत्तर छायावादी कवियों के यहाँ ही देखने को मिलता है जहाँ रूपक के अर्थ को सामान्यीकृत करने की कोशिश तो मालूम पड़ती है लेकिन वह हो नहीं पाता । इसके विपरीत तथाकथित उच्च जातीय अभिमान का ही प्रतीक बनकर रह जाता है। और अंततः वह जातिवादी वर्चस्व की संस्कृति को मजबूत ही करने लगता है। लेकिन यह चीज विद्रोही की कविताओं में नहीं है।

विद्रोही की कविताओं में यह उनकी अपनी कृषि श्रम संस्कृति के कारण आता है। विद्रोही की कविताओं में एक विशेष तरह की शक्ति का एहसास है और आक्रोश ऐसा की धरती को भी पटक देने की तक। उनकी कविता संघर्ष करने वाली जनता की लाठी है जो केवल भांजने के काम नहीं आती बल्कि सहारा का भी काम करती है। लाठी,लाठी में फर्क है। एक लाठी है जो कविता की तरह प्रेणादायी,रक्षक और सृजन करने वाली और उससे बढ़कर जीवन का सृजन करने वालीे बन जाती है।

और मेरी नानी की नाक,
नाक नहीं पीसा की मीनार थी,
और मुंह, मुंह की मत पूछो,
मुंह की तारे थी मेरी नानी,
और जब चीख कर डांटती थीं,
तो जमीन इंजन की तरह
हांफने लगती थी।
जिसकी आंच में आसमान का लोहा
पिघलता था,
सूरज की देह गरमाती थी,
दिन धूप लगती थी,
और रात को जूड़ी आती थी।

रामस्वरूप चतुर्वेदी ने निराला के काव्य में ओज गुण की प्रधानता और वैकल्पिक शक्ति की तलाश की बेचैनी के कारण उसे शक्ति काव्य कहा था। उसी तर्ज पर विद्रोही की कविताओं में शक्ति का वह स्वरूप आता है जिसको कभी पहचान ही नहीं मिली। निराला ने वह तोड़ती पत्थर में श्रमशील स्त्री के कारुणिक जीवन स्थिति का तो चित्रण किया लेकिन उसकी शक्ति को उभार न सके क्योंकि उनकी दृष्टि में उस स्त्री की जीवन दशा ही केंद्र में है। जबकि विद्रोही की कविता में जीवन दशा केंद्र में तो है लेकिन वह करुणा पैदा नहीं करती बल्कि शक्ति का एहसास कराती है।

दरअसल श्रमशील जनता की शारीरिक शक्ति तो धरती फाड़ने वाली है लेकिन सांस्कृतिक और सामाजिक वर्चस्व के मूल्य उसकी पहचान नहीं होने देते। नहीं तो एवरेस्ट के खूंटे से अपनी गाय बांधने वाली और हिमालय पर मूंग दलने वाली नानी के जीवन में लगी आग को अब तक बुझाया जा चुका होता-

मैं देखता हूं कि मेरी नानी
हिमालय पर मूंग दल रही है,
और अपनी गाय को
एवरेस्ट के खूंटे से बांधे हुए है

विद्रोही की कविताएँ ऐतिहासिक सभ्यताओं से लेकर वर्तमान सभ्यताओं के भीतर लगी हुई आग की पहचान कराती हैं। यह इसी आग को बुझाने की बेचैनी और छटपटाहट उनके भीतर सर्जनात्मक आक्रोश को जन्म देती है। इसी आग से अपने आप को भी बचाने का वह आह्वान करते हैं।

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