इतिहास खबर

नेहरू की छवि के साथ खिलवाड़ छद्म इतिहास निर्माण की कोशिश है

रमा शंकर सिंह

यह इतिहास की बिडम्बना है कि जिस जवाहरलाल नेहरु ने जीवन भर इतिहास पढ़ा, लिखा और इससे बढ़कर इतिहास बनाने का काम किया, उसी नेहरु को हमारे समय में निरादृत होना पड़ा है, विशेषकर उसके अपने देशवासियों से ही- उन देशवसियों से जिन्हें वे बेपनाह मोहब्बत करते थे. उनकी यह मोहब्बत उनके पूरे जीवन, कर्म और विचार में व्याप्त है. नेहरु ने जो कुछ भी लिखा, बोला और किया- वह सब प्रकाशित है. इस सबके बावजूद उन्हें दुष्प्रचार का सामना करना पड़ा है.
पहले तो उनके व्यक्तित्व को लेकर दुष्प्रचार है और उसके बाद उनकी नीतियों को लेकर.
उनके व्यक्तित्व को लेकर जो दुष्प्रचार है, वह वास्तव में भारत की आजादी की लड़ाई की जो विरासत रही है, उसे नकारकर एक क्षद्म इतिहास के निर्माण की कोशिश है. इसके बाद क्षद्म नायक सृजित किए जाने हैं. इस तरह लगभग एक शताब्दी की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्मृति को पोंछकर हिंदू राष्ट्रवाद की एक ऐसी स्मृति का सृजन करना है जिसके केंद्र में सावरकर और गोलवलकर हैं. यह ऐसी कोशिश है जो कभी सफल नहीं हो सकती है क्योंकि नेहरु और उनके समानधर्मा लोगों ने जो किया, अपने जीवन को राष्ट्र की वेदी पर अर्पित कर दिया वह सबके सामने है. उस पर कुछ समय के लिए पर्दा डाला जा सकता है, उसे मिटाया नहीं जा सकता है.
नेहरु की नीतियों को लेकर दुष्प्रचार 1975 के बाद ही शुरू हो गया था. वास्तव में इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी ने जवाहरलाल नेहरु को भारतीय मध्यवर्गीय घरों में एक निन्दित नाम बना दिया. जवाहरलाल नेहरु के शानदार जीवनीकार एस. गोपाल ने अपने लेख ‘ द माइंड ऑफ जवाहरलाल नेहरु’ में इस बात को रेखांकित किया है कि कैसे इन दोनों के कारनामों के कारण नेहरु के चेहरे पर धूल डालना आसान हो गया. इसी लेख में वे यह भी बताते हैं कि अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद नेहरु ने इस देश को बनाया है. वे कहते हैं कि विश्वयुद्ध के समय के एक सेनापति को इसलिए मात्र दोष नहीं दिया जा सकता है कि उसने युद्ध में भाग लिया. इसी प्रकार नेहरु ने गलतियाँ कीं लेकिन यह उन्होंने यह देश बनाने के क्रम में कीं. जो लोग उनकी छोटी-छोटी बातों की शिकायत करते हैं और आलोचना करते हैं- यह वही दुनिया थी जिसे उन्होंने बदला था.
आज लगभग हर सार्वजनिक संस्था को या तो समाप्त किया जा रहा है, बिगाड़ा जा रहा है या उसे निजी हाथों में सौंपा जा रहा है. ऐसे में संस्था निर्माता नेहरु और उनके साथी याद आने स्वाभाविक हैं. जवाहरलाल नेहरु ने 1930 के दशक में ही यह बात जान ली थी कि आजाद भारत में उन संस्थाओं की जरूरत पड़ेगी जहाँ विज्ञान, तकनीक और उद्योग की पढ़ाई हो. 1938 में जब कांग्रेस का अधिवेशन हुआ तो उस समय कांग्रेस के सभापति सुभाषचन्द्र बोस थे. उन्होंने कई समितियां गठित की थीं. जवाहरलाल नेहरु को नियोजन समिति का अध्यक्ष बनाया गया था. इसमें मेघनाद साहा और एम. विश्वेशरैया भी शामिल थे. बाद में योजना आयोग के गठन के साथ साहा और विश्वेशरैया ने आधुनिक भारत के निर्माण में महती भूमिका निभाई. साहा सुभाषचन्द्र बोस के बहुत करीबी थे, और भारत में कैलेंडर सुधारों के जनक माने जाते हैं लेकिन कभी भी न तो उन्होंने और न ही विश्वेशरैया ने इस बात का जिक्र किया कि नेहरु ने सुभाष के प्रति कोई व्यक्तिगत दुश्मनी पाल ली हो. इधर हाल के वर्षों में दोनों को जानी दुश्मन के रूप में चित्रित करने का फैशन चाल पड़ा है जबकि इतिहासकार रुद्रांग्शु मुखर्जी ने अपनी किताब ‘नेहरु एंड बोसः पैरलेल लाइव्स’ में इस बात को रेखांकित किया है कि दोनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में कई बातें समान थीं लेकिन उनकी राहें जुदा थीं. दोनों एक दूसरे का आदर करते थे. और अगर ऐसा न होता तो भारतभूमि से दूर जाने पर जब सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज बनायी तो उसमें एक ब्रिगेड का नाम नेहरु ब्रिगेड रखा.

नेहरु को क्यों याद करें? विशेषकर युवाओं के लिए वे क्यों जरुरी हैं?
यदि आप आज़ादी के आंदोलन को देखें तो पाएंगे कि 1920 के दशक से ही भारत के युवा औपनिवेशिक शासन के प्रति काफी क्षुब्ध थे. कालेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले युवाओं ने औपनिवेशिक शैक्षिक संस्थाओं का बहिष्कार किया और इसके साथ ही साथ भारतीय जनों ने कई शैक्षिक संस्थान स्थापित किए. जामिया मिलिया और काशी विद्यापीठ इसी दौर में स्थापित हुए. यहाँ पढ़ने वाले विद्यार्थी आजादी के आंदोलन की रीढ़ साबित हुए, विशेषकर 1931 और 1942 के अखिल भारतीय आंदोलनों में. महात्मा गाँधी, सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरु ने इस दौरान विद्यार्थियों को लगातार संबोधित किया. 31 दिसम्बर 1946 को नेहरु ने दिल्ली में हुए अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन में कहा कि नया एशिया वही बनेगा जो उसके युवक और युवतियां बनाएंगे. आज इसी एशिया में तालिबान के लड़ाके घूम रहे हैं. प्रायः नेहरु के अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण की आलोचना की जाती है. क्या हमें यह स्वीकार नहीं करना चाहिए कि भारत के युवाओं का भविष्य श्रीलंका, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के युवाओं के भविष्य के साथ जुड़ा है? और यदि ऐसा न होता तो एक शांतिपूर्ण भारत के लिए देश के नीति-निर्माता तालिबान के लड़ाकुओं से बातचीत क्यों करते?

(रमा शंकर सिंह भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला में रिसर्च फेलो हैं ।)

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