त्रासदी बनते इतिहास का आख्यानः मदन कश्यप का काव्य

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प्रणय कृष्ण

(कवि मदन कश्यप को जनमत टीम की ओर से जन्मदिन की हार्दिक बधाई। इस अवसर पर पढ़िए ‘नीम रोशनी में’ संग्रह पर लिखा गया प्रणय कृष्ण का आलेख और साथ में ही संग्रह की कुछ कविताएं भी)

कवि मदन कश्यप द्वारा 1990 के दशक में लिखी कवितायें आज़ाद भारत के सबसे विलक्षण कालखंड के बीच खड़े ‘कालयात्री’ की संत्रस्त सभ्यता-परिक्रमा की द्योतक हैं. नब्बे के दशक , खास कर सन ‘93 से लेकर सन ‘97 के बीच लिखी उनकी कविताओं का प्रतिनिधि संकलन है ‘नीम रोशनी में’ (2000). 1990 के दशक के धुंधलके को भी ‘नीम रोशनी’ कहना, रोशनी की आकांक्षा ही बताता है. कम कविता संग्रह ऐसे होते हैं जो एक बहुत ही छोटे कालखंड में इतिहासतः घनीभूत हो उठी भयावह सच्चाइयों को वक्त की बेहद स्पष्ट शिनाख्त के साथ सामने लाते हों-

किसे पता था/ शताब्दी के इस अंतिम दशक में/ झूठ इतना फलेगा फूलेगा / कि अपने ही भेजे में नहीं धंसेगा अपनी भूख का सच (भयावह समय)

यह वह समय है जब इतिहास, विचारधारा, समाजवाद और कविता के अंत की दुन्दुभी बज रही है, सभ्यताओं के संघर्ष की भविष्यवाणियां हो रही हैं, अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी ताकतों ने एशियाई मुल्कों के बाजार और प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने के साथ-साथ आज़ादी, लोकतंत्र और संप्रभुता तक पर सदल-बल हमला बोल दिया है, और कवि के शब्दों में-‘ एक लम्बी सुरंग से गुजराती हुई ट्रेन की तरह/ लग रहा है हमारा महादेश’.

जब चकाचौंध और अन्धेरा एक साथ मिलकर गुमराह कर रहे हों , ऐसे समय में ‘जोकर’ और ‘निर्बल शिखंडी‘ जैसी कविताओं में भारत के शासक वर्ग के रंगरूप और भंगिमाओं की बेहद स्पष्ट और असंदिग्ध शिनाख्त दर्ज है. लालू से लेकर अटल-अडवाणी तक, शासक वर्ग के सारभूत चरित्र का जटिल विन्यास मानों कविताओं में ही सर्वाधिक विश्वसनीय हो उठा हो. यह प्रखर राजनीतिक चेतना संग्रह की अधिकांश कविताओं में अंतरवर्ती सूत्र के रूप में विद्यमान है. बिहार की आबोहवा कविता को यों भी अराजनैतिक होने की स्वतंत्रता नहीं देती.

जब परिवर्तन तेज हों और अदृश्य भी, ज्ञान-विज्ञान जब मनुष्यमात्र से अपना मुंह मोड़ कर दहशतगर्द पूंजी के चाकर हो जाएं, जब मनुष्य स्वयं हद से हद संसाधन के रूप में ही खुद को पहचानना शुरू कर दें , जब विद्यमान जगत के कार्य-कारण संबंधों के सूत्र ही गुम हो जाएं और जब विचारधारा की पुख्ता जमीन पांव के नीचे से खिसक रही हो, ऐसे समकाल में मदन जी की कविता लम्बे और कठिन सफरनामे का रूप ले लेती है.

मैं भाषा के समुद्र का सिंदबाद/ अपने पास रखना चाहता हूं केवल/यात्राओं की पीड़ा/बाकी सब कुछ तुम्हें दे देना चाहता हूं /तुम्हें दे देना चाहता हूं / अपने अच्छे दिनों में संचित सारे शब्द अपनी बोली की तमाम महाप्राण ध्वनियां (‘गोरी सोयी सेज पर’)

1990 के दशक की अधिकांश वयस्क और महत्वपूर्ण कवितायें धटनाओं की बेहद तेज किन्तु निरर्थक गति में गुम हो गई आत्मवत्ता को खोजती हुई दर्शन और आत्म-साक्षात्कार की और उन्मुख हैं. इन कविताओं में सभ्यता के इतिहास की सघन स्मृतियों का एक उदात्त संसार समकाल की क्रूरताओं, तुच्छताओं और खंडित आत्मबोध का सामना करता है. न तो ये स्मृतियां आत्मपरक हैं और न ही ये कवितायें प्रगीतात्मक. इन कविताओं में एक सधी हुई दार्शनिकता अमूर्तन से बचती है. कई जगह तो कविताएं ‘हृदयहीन विश्व का हृदय’ सी धर्मवत प्रतीत होती हैं और सूक्तिमय शिल्प धारण कर लेती हैं. लेकिन समकाल की तीक्ष्ण सजगता इन्हें अफीम की नियति से चौकस और सतर्क बनाए रखती है. इस बिंदु पर मदन जी की बहुतेरी कवितायें अपनी परिणति में शिल्प से बाहर आ जाती हैं- बिम्ब, रूपक या आप्तवचन कुछ भी नहीं- बस एक सीधा और निरावरण कथन मात्र बच रहता है. अनेक कविताओं की अंतिम पंक्तियां इस प्रवृत्ति का उदाहरण हैं –

(1) अब खोने की कविता इतनी लम्बी नहीं होनी चाहिए

कि पाठकों को अपना धैर्य खोना पड़े

सो समाप्त करता हूं

वैसे भी खोने की चर्चा क्या करना एक ऐसे समाज में

जिसने अपना गौरव खो दिया हो! (खोई हुई चीजों की नज्म)

(2) इस तदर्थ युग की

सबसे उन्नत कला है रफूगरी

जिसके सामने हम नतमस्तक हैं! (रफूगरी)

 

(3)यहां क्रिया ही क्रिया है

पर कर्ता गायब

और कर्म का तो कोई ठिकाना नहीं

हर वह आदमी तेज-तेज भाग रहा है

जिसे कहीं नहीं जाना है ! (ऊब)

 

(4) सच पराजित तो होता रहा है

मगर इतना हताश पहले कभी नहीं दिखा! (झूठ)

(5) आदमी ही नहीं बाज़दफा रास्ते भी भूल जाते हैं अपनी राह

जब रास्ता गलत हो

मंजिल तक वही पहुंच पाता है जो रास्ता भटक जाता है! (रास्तों की नज्म)

(6) हंस दूध का दूध और पानी का पानी नहीं करता

करता यह है कि सारा दूध पी जाता है

और छोड़ देता है पानी! (कहावतें)

अंतिम कविता ‘कालयात्री’ संग्रह की सबसे लम्बी कविता होने के साथ साथ पूरे संग्रह का चरमोत्कर्ष और निचोड़ भी है. यहां कविता का कालयात्री सभ्यताओं का यात्रा वृत्तांत उस नायिका को सुना रहा है जिसे वह ‘हे निर्वासिते’, ‘हे चकितनयने’, ‘हे सुभगे’, ‘हे मृदुबयनी’, ‘हे कल्याणी’, ‘हे गुणवंती’, आदि रूपों में संबोधित करता है. ये पुराने से लगते संबोधन इंसानी सौन्दर्य और सभ्यता के उजड़ चुके उस स्वप्निल संसार के बोधक हैं जो सिर्फ काव्य में जीवित हैं. ये सारे संबोधन वास्तव में कविता के लिए ही हैं-

वे कविता का अंत कर रहे थे और मैं डर गया

मेरी भटकन में हजारों वर्षों से

केवल कविता ही तो थी मेरे साथ (कालयात्री)

कविता अस्तित्वमात्र के सबसे मूलभूत प्रश्नों को उठाने के चलते दर्शन की तरह और बेहद बुरे समय में भटकते हुए विकल हृदय को धीरज देते हुए धर्म की तरह आचरण करती है. लेकिन समूचे मानवीय इतिहास द्वारा रचे हुए भौतिक संसार के समानान्तर एक अधिक न्यायपरक, अधिक सुन्दर और अधिक स्वतन्त्र प्रतिसंसार की सतत रचनाशीलता के रूप में कविता अपनी परिभाषा खुद है. किसी भी युग का अच्छा काव्य सदैव ही काव्यमात्र की भूमिका को परिभाषित करता है. 1990 के दशक ने सभ्यता के जिस अभूतपूर्व संकट को सामने ला दिया है, उसने कविता को एक अलग तरह के जीवन-ज्ञान की भूमिका में उतरने को प्रेरित किया है. ‘कालयात्राी कविता सभ्यताओं के नए मिथक रचती है जिनके स्रोत न तो धर्म या पुराण हैं और न ही ऐतिहासिक घटनाएं. आक्रामक साम्राज्यवादी/पश्चिमी/यूरो-अमेरिकी सभ्यता से संक्रांत और आक्रान्त होते-होते और धीरे-धीरे एक अंधेरी गुफा में बदले से पहले हमारा देश कैसा था इसका मिथक कवि यों रचता है-

मछलियां समुद्र से उछलकर बादलों में घूम जाती थी/चिड़ियां सागरतल में घोंसले बनातीं थीं / जंगली हिरन सुनाने आते थे ऋचाएं / नील से पीली तक सभी नदियां आपस में बतियाती थीं/ जलपक्षी पहुंचाते थे उनकी चिट्ठी -पतरी / सूरज उगने के साथ मुस्कुराकर/ अभिवादन करता था धरती का/ बादल मांगते थे बरसने की अनुमति/ लोग किसी एकांत स्थल पर लिख आते थे /अपनी अपनी व्यथा/ जिसे रोज रात में बांचता था ईश्वर (कालयात्री)

कवि एशिया में पनपी नदी घाटी सभ्यताओं से अपनी पूर्वी/ एशियाइ/ भारतीय अस्मिता ग्रहण करता था, जिसे साम्राज्यवादी अर्थतंत्र, वैचारिकी, तकनीक और मूल्यबोध ने आक्रामकता के साथ मिटा डालने का संकल्प कर रखा है. कवि का बयान है-

वे गली-गली डगर-डगर मिटाएंगे/ पिफर भी बचे रहेंगे मेरे कदमों के निशान/ पृथ्वी की स्मृतियों में/ मैं चला हूं इस पर / रौंदा नहीं है इसकी छाती को/ कोई भी नरम डूब/ मेरे तलुओं से आहत नहीं हुई/ पंछियों के अंडे नहीं तोड़े मैनें/ पिल्लों को कान पकड़ कर नहीं उठाया / चिड़ियों, फूलों और पेड़ों से बतियाते/ बीता मेरा बचपन. (कालयात्री)

इसके बरअक्स विजेता का दम्भ लिए उस आततायी सभ्यता का चरित्र देखें-

वे बांटते रहे प्लेग के पिस्सुओं वाले कम्बल/ भोले रेड इंडियनों में/ और मैं भटकता रहा/ वे फेंकते रहे बीमार हब्शियों को/ जहाज से समुद्र में/और मैं भटकता रहा/ वे करते रहे मनुष्यों का शिकार / हांका लगाकर अफ्रीका के जंगलों में/ और मैं भटकता रहा. (कालयात्री)

इस ‘कालयात्रा’ के महत्वपूर्ण सिर्फ वे ही मंज़र नहीं हैं जिन्हें ‘कालयात्री’ ने अपने भाव-डगों से मापा है, बल्कि कालयात्रा में अनुपस्थितियों का भी गंभीर महत्त्व है. मसलन, कवि भारतीय अस्मिता के स्रोतों में कहीं भी ‘आर्य-वैदिक‘ अथवा पौराणिक सन्दर्भों का जिक्र नहीं करता. ठीक इसी तरह एशिया अथवा योरप दोनों सभ्यताओं की अस्मिताओं का चित्र खडा करने में धार्मिक सन्दर्भ लगभग अदृश्य हैं. ऐसा वैचारिक दृष्टिकोण मात्र के कारण नहीं बल्कि ‘कविदृष्टि‘ की समग्र संरचना के कारण है. कविता में ईश्वर एक जगह आता है ‘रोज़ रात में किसी एकांत स्थल पर लिखी गई लोगों की व्यथाएं‘ बांचता हुआ. दुनिया की ‘पवित्रा किताबों‘ में भी इब्राहीम गड़ेरिए के पसीने की खुशबू है और ‘ऋचाओं‘ को सुनने आते हैं जंगली हिरन. कवि की ‘ऋचाओं‘ से वैदिक यज्ञों का कोई सम्बन्ध नहीं जिनके ‘बलि पशुओं की दस हजार वर्ष लम्बी चिघाड़ें‘ कविता की आरम्भिक पंक्तियों में कालयात्री को पुकारतीं हैं. ऐसा ईश्वर जो लोगों की व्यथाएं बांचता हो, ऐसी पवित्र किताबें जिनमें पसीने की खुशबू हो और ऐसी ‘ऋचाएं‘ जिन्हें जंगली हिरन भी भयहीन हो सुन सकें ऐसे ‘कवि समयों‘ की तरह लगते हैं जहां धर्म ऐहिक सन्दर्भों में ही अर्थवान बन पाता है. कवि जहां पूर्वी सभ्यता की समग्र पहचान नए, गैर परम्परित मिथकों में रचता है वहीं पश्चिमी सभ्यता के आतंकमय साम्राज्यवादी स्वरूप को कुछ बर्बर ऐतिहासिक दृश्य-बिम्बों में उभारता है. ऐसा इसलिए है कि पश्चिमी सभ्यता एक अर्ध- औपनिवेशिक देश-काल में इसी रूप में अनुभव की जा सकती है. पूर्वी अथवा एशियाई अस्मिता की मिथकीय सम्पूर्णता भी ‘समकाल‘ के धरातल पर साम्राज्यवाद के साथ मुठभेड़ में खंड-खंड हो बिखर जाती है-

कहां है पसीने से तर-ब-तर मेरी वह मातृभूमि / मेरा महान एशिया/ यह पानी की जगह रक्त क्यों बह रहा है दजला-फरात में/ यह त्येन-हेन -मन चैक है या शिकागो की सड़क/ तेल के साथ क्यों बहती जा रही है अरबी अस्मिता/ कराची की सडकों पर दो कदम भी नहीं चल पाती है कविता/भूखी आबादी की पथरीली छाती पर/ उगते आ रहे हैं पबों, जुआघरों और/ मालिशघरों के कैक्टस. (कालयात्री)

इतिहास त्रासदी में बदलता है-

यह गुफा है और इसका इतिहास चाहे जितना बड़ा हो/ इतिहास से बड़ी है इसकी त्रासदी/ फूल यहां नहीं खिल सकते हरियाली यहां नहीं फैल सकती. (कालयात्री)

साम्राज्यवादी सामानों , फैशनों, विचारों, और मूल्यों के आक्रमणों के बीच खुद को अजनबी सा महसूस करता कवि सतत इस अजनबियत से लड़ते हुए न केवल सभ्यतागत स्मृतियों की पुनर्रचना करता है बल्कि लोकजीवन में भी गहरे पैठता है. ‘आंझुलिया‘ जैसी कविता में नव धनाढ्य और पापी पुरुष नैसर्गिक लोकसौन्दर्य की प्रतीक आंझुलिया को लुभाने रिझाने में नाकाम होने पर उसे पकड़ने दौड़ता है. गन्ने के खेत में भागती आंझुलिया के अंग-प्रत्यंग पत्तों की धार से कट कर लहुलुहान हो जाते हैं –

बड़े -बुजुर्ग कहते हैं / आज भी आधी रात को/ गन्ने के खेतों में भागती रहती है आंझुलिया / फंस जाती है ऐसी भूल-भुलैया में/ कि कभी निकल नहीं पाती है बाहर (आंझुलिया)

नव धनाढ्य वर्ग की लोकजीवन से खूनी मुठभेड़ का बेहद शक्तिशाली मिथक है ‘आंझुलिया’.

इस संग्रह की भाषा समसामयिक सजगता के बीच से उपजी है. यह भाषा सभ्यता की कालयात्रा में प्रवृत्त, स्मृतियों की पुनर्रचना करती कविता को कहीं भी अतीतग्रस्त नहीं होने देती. 20वीं सदी के अवसान पर प्रकाशित यह कविता संग्रह इस संक्रमण काल के देशान्तर-अक्षांश के बीच अपनी जगह पहचानने में हर हिन्दुस्तानी के लिए अवश्य ही मददगार है.

(2001)

कविताएं:

नीम रोशनी में
(1)
नीम रोशनी में कुछ भी नहीं किया जा सकता
बातें कही और सुनीं तो जा सकती हैं
बतियाया नहीं जा सकता
कविता नहीं लिखी जा सकती
प्‍यार तो हरगिज नहीं किया जा सकता

नीम रोशनी में
अपने समय को भी नहीं देखा जा सकता
फिर इतिहास को देखने की तो बात ही बेमानी है

घुप्‍प अंधेरा हो
और कुछ भी न दिखे आंखों को
तो हाथ खोज लेते हैं दिशा
पांव ढूंढ लेते हैं रास्‍ता
कितनी खतरनाक है यह नीम रोशनी
सबकुछ दीखता है
पर कुछ भी साफ-साफ नहीं दीखता!

(2)
जब आदमी सिर्फ आवाजों के पीछे दौड़ने लगे
और रोशनी इतनी मद्धिम हो
कि पुकारने वाले छायाओं की तरह दिखें
तब किसी भी चीज को धुंधलाया जा सकता है
इतिहास को
विश्‍वास को
किसी भी चीज को

पीछे-पीछे भागते आदमी के साथ यह सुविधा है
कि वह सोचता हुआ नहीं होता !

(3)
सबसे पहले रोशनी धुंधली की
फिर पसीने की तरह इत्‍मीनान से पोंछ डाले
अपने चेहरे से खून के छींटे
और रक्‍त के फव्‍वारों को
इतिहास की ओर मोड़ दिया
वे सदी के सबसे चालाक हत्‍यारे हैं
उनका दावा है
उन्‍होंने दुनिया भर की बेहतरी के लिए की हैं
दुनिया भर की हत्‍याएं!

आँझुलिया

आँझुलिया आँझुलिया
तुम्हारी आँखें कितनी सुंदर
सुबह की ओस ने कहा आँझुलिया से
और आँखों से ढेर सारी चमक
उड़ेल गई आँझुलिया

आँझुलिया आँझुलिया
तुम्हारे होंठ कितने सुंदर
सुबह के फूलों ने कहा आँझुलिया से
और होंठों से ढेर सारी हँसी
बिखेर गई आँझुलिया

आँझुलिया आँझुलिया
तुम्हारा सुर कितना मधुर
भोर की चिड़ियों ने कहा आँझुलिया से
और देर तक चहचहाती रही आँझुलिया

आँझुलिया आँझुलिया
तुम्हारे पांव कितने कोमल
प्रातः की किरणों ने कहा आँझुलिया से
और दूर तक नाचती चली गई आँझुलिया

आँझुलिया आँझुलिया
तुम्हारे बाल कितने सुंदर
सुबह की हवाओं ने कहा आँझुलिया से
और ढेर सारी खुशबू
उलीच गई आँझुलिया

आँझुलिया आँझुलिया
तुम कितनी सुंदर
तुम रहो मेरे पास
जैसे मेरे घर में पीतल की थाली
झाँसी कुतिया
लोहे की पलंग चांदी का कटोरा
जैसे मेरी जेब में रूपया-पैसा
इत्र की डिबिया
रेशमी रूमाल मुकदमे के कागजात
जैसे जैसे
मेरे पनबट्टे में पान बगीचे में फूल
पाँव में जूते

तुम रहो मेरे पास
पापी पुरूष ने कहा आँझुलिया से
और गन्ने के खेत में भागती चली गई आँझुलिया

पत्तों की धार से कट गए अंग-अंग
तार-तार हो गए कपड़े
अपने ही लहू का वस्त्र पहने
भागती रही भागती रही
जब तक भाग सकी आँझुलिया

बड़े-बुजुर्ग कहते हैं
आज भी आधी रात को
गन्ने के खेतों में भागती रहती है आँझुलिया
फँस जाती है ऐसी भूल-भुलैया में
कि कभी निकल नहीं पाती है बाहर

बड़े-बुजुर्ग झूठ नहीं कहते
मैंने भी कई बार देखे हैं सुबह-सुबह
गेंड़ों पर रक्त के ताजा निशान

गोरी सोयी सेज पर

मैं एक ऐसे टीले पर चक्कर काट रहा हूँ
जिसके नीचे एक सभ्यता ही नहीं एक भाषा भी दफ्न है
मुझे ढूँढने हैं हजारों शब्द
जो कहीं उतनी छोटी-सी जगह में दुबके हैं जितनी-सी जगह
तुम्हारे नाखून और उस पर चढ़ी पालिश के बीच बची होती है

तुम्हारे दुपट्टे को लहराने वाली हवा ने ही
उन नावों के पालों को लहराया था
जिन पर पहली बार लदे थे हड़प्पा के मृदभाँड

इतिहास की अजस्त्र धारा पर अध्यारोपित तुम्हारी हँसी
काल की सहस्त्र भंगिमाओं का मोंताज तुम्हारा चेहरा

सबसे लंबे समयखंड को
अपनी नन्हीं भुजाओं में समेट लेने को आतुर मेरा मन
तुम्हें ढूंढता रहता है अक्षरों से भी पुराने गुफाचित्रों में

मुझे याद आ रहे हैं अमीर खुसरो
सुनो वे तब भी याद आए थे
जब पहली और आखिरी बार मैंने तुम्हारे होंठों को चूमा था
वह एक यात्रा थी एक भय से दूसरे भय में
और इस तरह भय का बदल जाना भी कम भयानक नहीं होता

‘गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केस
चल खुसरो घर आपने, रैन भयी चहुं देस’

छह सौ बहत्तर वर्षों में भी जब तुम्हारे मुख पर से केश हटा नहीं सका
तब जाकर एहसास हुआ कि यह रैन इतनी लंबी है
सुबह तो उस रात की होती है जो सूरज के डूबने से हुई हो

जिसे रच रहे थे अमीर खुसरो
कुछ शब्द गुम हो गए उस भाषा के
और कुछ आततायी व्याकरण की जंग लगी बेड़ियों में कैद हो गए

एकल कोशिकीय अनुजीवों के जगल से गुजरते हुए
मुझे पहुंचना है उस पनघट पर
जहां स्वच्छ जामुनी जल की तरह तरल शब्द कर रहे हैं मेरी प्रतीक्षा

मैं धीरे-धीरे एक विषाल स्पाइरोगाइरा में बदलते जा रहे
इस महादेश के जेहन में अपनी कविता के साथ जाना चाहता हूँ
अंधेरी सुरंगों में सपनों के कुछ गहरे रंग भरना चाहता हूँ

एक शून्य जो पसरता जा रहा है हमारे चारों ओर
मैं उसे पाटना चाहता हूँ
कविता की आँखों में तैर रहे नये छंदों से

मैं भाषा के समुद्र का सिंदबाद
अपने पास रखना चाहता हूं केवल यात्राओं की पीड़ा
बाकी सबकुछ तुम्हें दे देना चाहता हूँ
तुम्हें दे देना चाहता हूँ
अपने अच्छे दिनों में संचित सारे शब्द
अपनी बोली की तमाम महाप्राण ध्वनियाँ

मैं चाँद के रैकेट से सारे सितारों को उछाल देना चाहता हूं तुम्हारी ओर!

‌खोई हुई चीज़ों की नज़्म

शायद अब वह अंतड़ियों से भी ज्यादा लंबी हो गई हो
फिर भी मेरी स्मृति के छोटे से कोने में रहती है
खोयी हुई चीजों की एक गुड़मुड़ी फेहरिस्त
जैसे पाँच फुट आठ इंच लंबे शरीर में
रह लेती हैं मीलों लंबी नसें

वैसे खामख्वाह कुछ खोते रहने की आदत नहीं है
कोशिश करता हूँ कि रहूँ चाक-चैकस
केवल जरूरी चीजें ही ले जाता हूँ यात्रा में
जाने से पहले अपने बक्स
तथा लौटने से पहले कमरे का अच्छी तरह मुआइना करता हूँ
फिर भी कभी-कभी कोई गलती हो ही जाती है

पत्नी कहती है कि बेशऊर हूँ
बटन लगाना तक भूल जाता हूँ
कभी-कभी बस या ऑटो में चलते हुए
चला जाता हूँ एक-दो पड़ाव आगे

पैसों के खोने का हिसाब नहीं है
उन्हें तो रहना नहीं होता
खोते नहीं तो खर्च हो जाते हैं

मुझे लगता है भूलता बहुत हूँ इसीलिए खोता हूँ
परंतु कुछ खोना ऐसा होता है जिसे भूल नहीं पाता

खोने का दुख अक्सर छोटा होता है
मगर कभी-कभी बहुत लंबा भी होता है
एक बार जब घर में केवल एक ही छाता था
मैंने खो दिया और खुद यात्रा पर चला गया
तब पत्नी को बेटे की दवा के लिए
बारिश में भींगते हुए डिस्पेंसरी जाना पड़ा
आप कहीं बारिश में घिर जाएँ और भींगते हुए
घर लौटें उसकी बात और है
लेकिन आप उस वेदना की कल्पना नहीं कर सकते
जो छाते के अभाव में घर से भींगते हुए निकलने से होती है
मैं अपनी पत्नी की बारिश से ज्यादा अपमान में
भींगते हुए चेहरे की कल्पना करके अब भी डर जाता हूँ

कभी-कभी हम व्यर्थ की चीजों के लिए बेचैन होते हैं
बचपन में स्कूल में याददाश्‍त बढ़ाने की दवा खरीदी थी
दो रूपए की पूरी दवा कहीं खो गई
मैं बहुत रोया-चिल्लाया
और अपने छोटे भाई की फजीहत भी की
तब मुझे लग रहा था कि मैं याददाश्‍त बढ़ाने की
एक महान अवसर से वंचित हो गया
अब उसे याद करके शर्म आती है और भाई के प्रति
जो अब इस दुनिया में नहीं है
अपने व्यवहार के लिए दुख होता है

कुछ खोना सुई की चुभन जैसा होता है
जिसमें दर्द बहुत तेज उठता है पर जल्दी मिट जाता है
जैसे चाबी का गुच्छा खो जाना
कलम खो जाना
चश्‍मा खो जाना
डॉक्टरी पर्ची खो जाना
किशोरी अमोनकर का कैसेट खो जाना
वैकल्पिक व्यवस्था के साथ ही
खत्म हो जाता है खोने का गम

परंतु, कुछ ऐसा खोना भी होता है
जो नासूर की तरह टपकता रहता है
और बिलआखिर छोड़ जाता है एक गहरा निशान

मैंने कई बार ऐसी चीजें खोयी हैं
जो फिर मुझे कभी नहीं मिलीं

किताबों का खोना बिल्कुल अलग तरह का मामला है
अक्सर किताबें खोती नहीं टपा दी जाती हैं
कई बार हम टपानेवाले को जानते होते हैं
पर कुछ कर नहीं पाते

मैंने चीजें खोयी हैं
बहुत-बहुत चीजें खोयी हैं
मगर चीजों से ज्यादा अवसर खोया है
यह चीजों के खोने की कविता है
अतः अवसरों के खोने का ब्यौरा नहीं दूँगा
पर कई बार अवसर भी चीजों की तरह होता है
अथवा चीजें अवसर की तरह होती हैं

पता नहीं तब मैंने चीज खोयी थी या अवसर खोया था
पर एक खोना ऐसा भी है
जिसे मैं अब भी अतीत में लौटकर
पा लेने के लिए बेचैन हो जाता हूँ

वे लोग कुछ नहीं खोते जो समय की अंगुलियों पर नचाते हैं
खोना मुझ जैसों के हिस्से होता है जिन्हें समय नचाता है

अब खोने की कविता इतनी भी लंबी नहीं होनी चाहिए
कि पाठकों को अपना धैर्य खोना पड़े
सो समाप्त करता हूँ

वैसे भी खोने की चर्चा क्या करना एक ऐसे समाज में
जिसने अपना गौरव खो दिया हो!

झूठ

झूठ के पास है सबसे सुंदर परिधान
कीमती आभूषणों से लदा है झूठ
झूठ की अदाएँ सबसे मारक हैं
उसके इशारे पर नाच रही है दुनिया

चारों ओर बज रहा है झूठ का डंका
सोने की जल गई
पर आबाद है झूठ की लंका

झूठ के हवाले ट्राय का किला
झूठ के हवाले नील का पानी
हड़प्पा की मुद्राएं
बेबीलोन का वैभव
फारस की बादषाहत
इब्राहिम की तदबीर
जरथुस्त्र का चिंतन
बुद्ध की करूणा
कन्फ्यूसियस का दर्षन
कलिंग का युद्ध
संयोगिता की प्रेमलीला
पानीपत की पराजय
पलासी का षड्यंत्र
सब झूठ के हवाले

सच पराजित तो होता रहा है
मगर इतना हताश पहले कभी नहीं दिखा!

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