पटना में प्रेमचंद जयंती पर हिरावल ने ‘निर्वासन’ का मंचन किया

पटना.कथा सम्राट प्रेमचंद जयंती के अवसर पर आज स्थानीय छज्जूबाग में हिरावल के कलाकारों ने प्रेमचंद की कहानी ‘निर्वासन’ का नाट्य प्रदर्शन किया। साथ ही, फिरकापरस्ती के विरुद्ध रचनाओं का गायन किया. इस अवसर पर हिरावल की ओर से ‘निर्वासन’ के आधार पर निर्मित फिल्म को भी जारी किया गया.  नाटक और फिल्म में काम करनेवाले कलाकार प्रीति प्रभा और राम कुमार हैं. महिलाओं पर बढ़ रही हिंसा और सांप्रदायिक फासीवादी माहौल के खिलाफ आयोजित इस कार्यक्रम के मौके पर उपस्थित दर्शकों को संबोधित करते हुए लेखक संतोष सहर ने…

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प्रेमचंद ने राष्ट्रवाद की अवधारणा के फासीवादी चरित्र को काफी पहले ही देख लिया था : प्रो. रविभूषण

प्रेमचंद ने आज से काफी पहले ही आवारा पूंजी के ग्लोबल चरित्र और उसके साम्राज्यवादी गठजोड़ की शिनाख्त कर ली थी . उन्होंने राष्ट्रवाद की अवधारणा के फासीवादी चरित्र को काफी पहले ही देख लिया था.

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‘ बलिदान ’ : किसान-जीवन त्रासदी और प्रेमचंद की कहानी कला

मेरी अपनी समझ से हिंदी कहानी में ‘जादुई यथार्थवाद’ कला का भ्रूण इस कहानी में देखा जा सकता हैं ,साथ ही कहानी कला की ऊँचाई और उत्कृष्टता भी. और इसका उपयोग करके प्रेमचंद यह सच्चाई बता जाते हैं कि किसान की आत्मा उसके खेतों में होती है, और उसे किसी छल-बल से उसके हक से वंचित नहीं किया जाना चाहिये.

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प्रेमचंद और अक्तूबर क्रांति

साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद विरोधी रवैये का एक निरंतरता में अनुपालन जितना प्रेमचंद के यहाँ दीखता है, वैसा हिंदी के किसी और लेखक में नहीं. असंख्य मजदूर, किसान, स्त्रियाँ पहले-पहल जबकि समाज में उनके नायकत्व की संभावना क्षीण थी प्रेमचंद की रचनाओं में यह नायकत्व हासिल कर रहे थे. उनके उपन्यास ‘ रंगभूमि ’ के केंद्र में नायक सूरदास हैं.

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हेमन्त कुमार की कहानी ‘ रज्जब अली ’ में सामंती वैभव देखना प्रतिक्रियावाद को मजबूत करना है

कहानी में मूल समस्या साम्प्रदायिकता है. यह कहानी हमारे समय के लिहाज से एक बेहद जरूरी कहानी है. इसलिए जरूरी यह है कि इस कहानी के मूल मन्तव्य पर बात हो. कहानी के मूल मन्तव्य पर बात न करके हम उन्ही प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ मजबूत करते दिखेंगे.

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‘वे दर्ज होंगे इतिहास में/पर मिलेंगे हमेशा वर्तमान में/लड़ते हुए/और यह कहते हुए कि/स्वप्न अभी अधूरा है

भारतीय जनता के महानायक और भाकपा माले के संस्थापक महासचिव कामरेड चारू मजूमदार की 46 वें शहादत दिवस को लखनऊ के लेनिन पुस्तक केन्द्र में संकल्प दिवस के रूप में मनाया गया.

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अमरेंद्र की अवधी कविताएँ: लोकभाषा में संभव राजनीतिक और समसामयिक अभिव्यक्तियाँ

( कवि-कथन : अवधी में कविता क्यों ? मुझसे मुखातिब शायद यही, किसी का भी, पहला सवाल हो। जवाब में कई बातें हैं लेकिन पहला कारण यही है कि जैसी सहजता मैं अपनी मातृभाषा अवधी में पाता हूँ वैसी कहीं दूसरी जगह नहीं। यह सहजता ‘प्रथम भाषा’ होने की सहजता है। यह सहजता वैसे ही है जैसे घर-गाँव में किसी रहवासू की होती है। नागर व औपचारिक जीवन के बरअक्स। सभ्यता के बहुत से भाषायी आवरण भी होते हैं जिनकी लपेट में भाषा अक्सर बँध जाती है। भाषायी मानकीकरण भी…

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सामंती वैभव के प्रति नॉस्टेल्जिया से ग्रस्त है कहानी ‘ रज्जब अली ’

‘ रज्जब अली ’ कहानी में कथाकार बड़ा आख्यान रचने की कोशिश में कई ऐसी गलतियाँ कर बैठे हैं जिसकी वजह से अपने बड़े उद्देश्य के बावजूद इसकी विश्वसनीयता सन्देह के घेरे में आ जाती है. सबसे पहली बात यह कि आज के भारत का फासीवाद निश्चित तौर पर मुसलमानों और दलितों के दमन के जरिये आगे बढ़ रहा है लेकिन आज के दमन का रूप वह नहीं है जो प्रेमचंद के जमाने मे था या आज से चार-पांच दशक पहले तक था. आज दलित पीड़ित हैं लेकिन मजलूम नहीं हैं.

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मोहन भारद्वाज ने मैथिली साहित्य में आधुनिक-प्रगतिवादी दृष्टिबोध स्थापित किया: जसम

जन संस्कृति मंच ने मैथिली के वरिष्ठ आलोचक मोहन भारद्वाज के निधन पर शोक संवेदना जाहिर करते हुए कहा है कि उनका निधन भारतीय साहित्य की प्रगतिशील साहित्यिक धारा के लिए एक अपूरणीय क्षति है. नागार्जुन और राजकमल चौधरी के बाद की पीढ़ी के जिन प्रमुख साहित्यकारों ने मैथिली साहित्य में आधुनिक-प्रगतिवादी मूल्यों और नजरिये के संघर्ष को जारी रखने की चुनौती कुबूल की थी, मोहन भारद्वाज उनमें से थे.

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रज्जब अली: कहानी: हेमंत कुमार

रज्जब अली तेज कदमों से गेहूँ की सीवान के बीच से मेंड़ पर सम्हलते हुए नदी के पास कब्रिस्तान की तरफ बढ़े जा रहे थे। आज के सिवा इसके पहले वह आहिस्ता-आहिस्ता पूरी सीवान के एक-एक खेत की फसलों का मुआयना करते, लेकिन इस वक्त उन्हें सिर्फ नजीब की अम्मी की कब्र दिखाई पड़ रही थी। उनके दिलोदिमाग में काफी उथल-पुथल मची हुई थी। दिमाग सायं-सायं कर रहा था और कलेजा रह-रह कर बैठा जा रहा था। शाम का वक्त था और मौसम तेजी से बदल रहा था। अभी तीन…

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वह पीड़ा का राजकुंवर था

नीरज प्यार की अहमियत और अपरिहार्यता पर बराबर इसरार करते रहे और वास्तविक जीवन में उसे असंभव जानकर उसकी करुणा से भी आप्लावित रहे. यथार्थ का एहसास न होता, तो यह शोक कहाँ से उपजता ? अहम बात यह है कि इसका उन्हें मलाल नहीं, गर्व है; क्योंकि यह पीड़ा उनके नज़दीक सच्ची मनुष्यता या जन-पक्षधरता और उससे भी अधिक जन से एकात्म होने की निशानी है.

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आसिफ़ाओं के लिए

पिछले पाँच सालों से देश में जो धर्म-ध्वजा फहर रही है, और सांप्रदायिकता का जो उन्माद लोगों की नसों में घुल रहा है, उसी का प्रारम्भिक नतीजा है कठुआ का मामला. उससे भी चिंताजनक बात यह है कि जिस तरह से संवैधानिक-प्रशासनिक संस्थाओं एवं सेना का सांप्रदायीकरण किया जा रहा, उसका दुष्परिणाम भी कठुआ मामले में देखा जा सकता है.

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आधुनिक जीवन की विसंगतियों के मध्य मानवीय संवेदना की पहचान की कवितायें

विनय दुबे की कविताओं में सहजता और दृश्य की जटिलताओं का जो सहभाव नज़र आता है, वह उन्हें अपनी पीढ़ी का अप्रतिम कवि बनाता है. अर्थ की लयात्मकता और भाषा के आरोह-अवरोह से कविता का एक नया सौंदर्य-पक्ष उभरकर सामने आता है.

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एक कविता: हिंग्लिश [शुभम श्री]

शुभम श्री हमारे साथ की ऐसी युवा कवि हैं जिनकी कविताओं में बाँकपन की छब है। एक ख़ास तंज़ भरी नज़र और भाषा को बरतने की अनूठी सलाहियत। आज पढ़िए उनकी एक कविता ‘हिंग्लिश‘। हमारे संगी कवियों को यह सवाल बेहद परेशान करता है कि भाषा का क्या करें ? इतनी अर्थसंकुचित और परम्पराक्षीण शब्द सम्पदा वाली भाषा में कविता कैसे सम्भव हो ? यह सवाल हिंदी में लगभग हर दौर के कवि को तंग करता रहा है और हर दौर में इसके जवाब मुख़्तलिफ़  आये। मैथिलीशरण गुप्त से लेकर…

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कबूतरी देवीः पहाड़ी बेगम अख़्तर का मज़दूर चेहरा

बुलन्द आवाज़ और खनकदार गले की मलिका स्वर कोकिला लोक गायिका कबूतरी देवी 7 जुलाई की सुबह दुनिया से विदा हो गईं और फ़िज़ाओं में छोडकर गईं अनगिनत गीत और ढेर सारा सुमधुर संगीत. उनकी लाजवाब गायिकी के सुरीले बोल हमेशा उनके चाहने वालों के कानों में गूंजते रहेंगे,

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लस्ट स्टोरीज : अपनी राह तलाशती स्त्रियाँ

‘लस्ट स्टोरीज’ पिछले तीन दशकों में हुए सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक गहमागहमी से बनती गई नयी स्त्री और उसके पुरुष के साथ संबंधों को एक्सप्लोर करती है. यह स्त्री जो अलग-अलग तबकों से आती है लेकिन वह अपनी पूरी शारीरिकता के साथ मौजूद है और उसमें कोई और तरह का गिल्ट हो सकता है लेकिन अपनी शारीरिकता को लेकर आई सहजता के मामले में उसे कोई गिल्ट नहीं है.

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प्रेम के निजी उचाट से लौटती स्त्री की कविता : विपिन चौधरी की कवितायेँ

  विपिन की कवितायेँ लगातार बाहर-भीतर यात्रा करती हुईं एक ऐसी आंतरिकता को खोज निकालती हैं जो स्त्री का अपना निजी उचाट भी है और दरख्तों, चिड़ियों, पीले-हरे पत्तों से भरा पूरा एक नगर भी, जिसके अपने रास्ते हैं, गालियाँ हैं और मैदान भी . उसके यहाँ यह शब्दचित्र गठित इलाका अवसाद का नहीं, नहीं ही वह अवचेतन का ढंका तुपा कोई संस्तर है, बल्कि अपना खोजा हुआ संरचित कोना जिसे वह मन की संज्ञा देती है . इस खोजे हुए कोने में वह बार-बार प्रेम तलाशती है। उसके कितने ही…

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संजू: इसे बायोपिक की तरह न देख कर देखिए

फ़िल्म संजय दत्त की ज़िंदगी की तमाम सचाइयों को दिखाती हो या नहीं, जिस कहानी को वह सचमुच दिखाती है, वह भरोसेमंद, मार्मिक और इतिहास-संगत है या नहीं ? फ़िल्म के मूल्यांकन की सही कसौटी यह होनी चाहिए.

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प्रो तुलसीराम का चिन्तन अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद के बीच पुल – वीरेन्द्र यादव

प्रो तुलसी राम ने जहां मार्क्सवाद के रास्ते दलित आंदोलन का क्रिटिक रचा, वहीं उन्होंने वामपंथ के अन्दर मौजूद जातिवादी प्रवृतियों का भी विरोध किया. आज जिस तरह हिन्दुत्ववादी शक्तियां आक्रामक हैं, तुलसी राम के विचार मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद के बीच पुल का काम करते हैं.

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पठनीयता का संबंध वास्तविकता से होता है

(प्रेमचंद की परंपरा को नये संदर्भ और आयाम देने वाले हिंदी भाषा के कहानीकारों में अमरकांत अव्वल हैं। अमरकांत से शोध के सिलसिले में सन् 2002 की शरद में मिलना हुआ।अमरकांत के प्रस्तुत बात-विचार उसी मुलाकात और वार्तालाप से निकले हैं-दुर्गा सिंह ।) प्रेमचंद की परंपरा- प्रेमचंद ने ग्रामीण जीवन से विषय उठाया है। शहरी जीवन पर भी लिखा लेकिन मुख्य जोर ग्रामीण जीवन और समाज पर रहा। ग्रामीण जीवन से उन्होंने जो पात्र उठाए उसमें भी दबे-कुचले, शोषित, गरीब पर केंद्रित हैं। इन पात्रों के जरिये प्रेमचंद ने सामाजिक…

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