ज़माना नाक़ाबिले-बर्दाश्त है…

मंटो की लगभग प्रत्येक कहानी दारूण यथार्थ से आंख मिलाने का साहस रखती है। ऐसी गूँज पैदा करती है कि वह मानवता के पक्ष में जाए। यथार्थ की दारूणता का पीछा करते हुए मंटो कहीं भी मौका नहीं देते कि दारूणता को छिपा लिया जाय। लेकिन यह भी सच है कि यथार्थ का रूप सामने रखकर वह उसके सामने समर्पण नहीं कर देते। यह संदेश देते हैं कि दारूणता का प्रतिकार भी हो सकता है।

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मंटो को याद करने का मतलब

अभी तक भारतीय साहित्य का व्यवस्थित और विश्वसनीय इतिहास नहीं लिखा गया है। जब कभी इसका इतिहास लिखा जाएगा उर्दू अफसानानिगार सआदत हसन मंटो का साहित्य बिल्कुल हाशिए के लोगों, जिन पर आम रूप से लोग खुसुर-फुसुर भी नहीं करना चाहते उनकी जिंदगी में घुसकर उनकी तल्ख और तुर्श सचाइयों से रू-ब-रू कराने में सबसे आगे प्रमाणित होंगे।

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कार्ल मार्क्स : एक जीवन परिचय

दुनिया के मजदूरों के, सिद्धांत और कर्म दोनों मामलों में, सबसे बड़े नेता कार्ल मार्क्स (1818-1883) का जन्म 5 मई को त्रिएर नगर में हुआ जो प्रशिया के राइन प्रदेश में था । पिता पेशे से वकील थे, यहूदी थे लेकिन बाद में प्रोटेस्टेंट धर्म स्वीकार कर लिया था । त्रिएर नगर में प्रारंभिक शिक्षा जिम्नेजियम यानी विशिष्ट पाठशाला में हुई । जिम्नेजियम में ही उन्होंने पेशे के चुनाव पर विचार करते हुए एक लेख लिखा था जिससे आगामी जीवन की उनकी गतिविधियों का अनुमान होता है । इसमें उन्होंने…

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मार्क्स ने खुद के दर्शन को निर्मम और सतत आलोचना के रूप में विकसित किया : दीपंकर भट्टाचार्य

मार्क्स के दबे हुए लोग और अंबेडकर के बहिष्कृत लोग एक ही हैं। इसी तरह मार्क्स ने भारत में जिसे जड़ समाज कहा, अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद-मनुवाद कहा, एक ही है। उन्होंने कहा कि बुद्ध, अंबेडकर और मार्क्स अगर पूरक लगते हैं तो ऐसा मानने वालों को ही यह काम करना है, नई लड़ाई को चलाना है।

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भारतीय समाज के बदलते वर्गीय एवं जातीय चरित्र को बारीकी से व्यक्त करने वाले कथाकार हैं मार्कण्डेय

मार्कंडेय ने भारतीय समाज के बदलते वर्गीय एवं जातीय चरित्र को बहुत ही बारीकी से अपनी कथाओं में व्यक्त किया है. सामाजिक ताने-बाने एवं राजनीतिक अर्थशास्त्र पर उनकी गहरी पकड़ रही जिसके कारण आदर्श कल्याणकारी लोकतान्त्रिक नीतियाँ हों या ग्रामीण जीवन, किसी के प्रति उनका रोमान एक स्तर से आगे नहीं बढ़ता. उनकी सचेत समाजशास्त्रीय दृष्टि उन्हें तुरंत यथार्थ की ज़मीन पर खींच लाते हैं.

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न्याय के लिए आजीवन लड़ने वाले शख्स के रूप में पहचाने जाएंगे सच्चर साहेब : एनएपीएम

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) की जस्टिस राजेन्द्र सच्चर को श्रद्धांजलि   नई दिल्ली.  आज न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर जी पंचतत्व में विलीन हुए. सच्चर साहेब  न्याय के लिए आजीवन लड़ने वाले शख्स के रूप में पहचाने जाएंगे. वे पीयूसीएल जैसे मानव अधिकार संगठनों के साथ तो थे ही , वे देश के मुस्लिमों पर बनी सच्चर कमेटी के अध्यक्ष भी रहे. देश के जन आंदोलनों में शायद ही कोई ऐसा जनपक्षीय और पर्यावरणपक्षीय आंदोलन होगा जिसके हक में सच्चर साहेब खड़े ना हुए होंगे . 90 वर्ष से ऊपर की उम्र…

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‘ राष्ट्रीय खलनायक ’ राजिंदर सच्चर

  राजघाट पर वह सन दो हज़ार बारह के मार्च की एक सुबह थी. सोरी सोनी के पुलिसिया उत्पीड़न का विरोध करने के लिए वहाँ कुछ लोग गांधीवादी कर्मकर्ता हिमांशु कुमार के साथ भूख हड़ताल पर बैठे थे. इनमें से एक लगभग नब्बे बरस के जस्टिस राजिंदर सच्चर भी थे. वे दो नौजवानों के कंधों का सहारा लेकर धीरे धीरे चलते हुए वहाँ आए थे. देख कर कुछ क्षण को ऐसा लगा जैसे ख़ुद महात्मा गांधी अपनी समाधि से उठकर चले आ रहे हों. सत्य की रक्षा के लिए सब…

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तीन शोक चित्र

( प्रख्यात चित्रकार रामकुमार का  14 अप्रैल को निधन हो गया. उन्होंने मृत्यु शैया पर मुक्तिबोध का एक चित्र बनाया था. उनको नमन करते हुए विश्व चित्रकला के दो शोक चित्रों के साथ रामकुमार द्वारा बनाये गए मुक्तिबोध के चित्र के बारे में   ‘ तस्वीरनामा ’ में  बता रहे हैं प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ) कहानी , कविता , चित्रकला और अन्य कला विधाओं में कई बार कृतियों के बीच समानताऐं हमें चकित करती हैं । पश्चिम में चित्रकला के क्षेत्र में बड़े से बड़े चित्रकारों ने अपन पूर्ववर्ती चित्रकारों…

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हिंदुत्व, हिन्दू राष्ट्र और डॉ. अम्बेडकर

डॉ. रामायन राम 90 के दशक के शुरुआत से ही संघ के नेतृत्व में हिंदुत्ववादी शक्तियां  अपनी राजनैतिक परियोजना के हिसाब से डॉ. अंबेेडकर का पुनर्पाठ करने में लगी थीं। अंबेेडकर को हिन्दू राष्ट्र का समर्थक, आरएसएस का शुभचिंतक और पाकिस्तान विरोधी अखण्ड भारत का समर्थक सिद्ध करने की लगातार कोशिश की जाती रही है। अंबेेडकर को ’फॉल्स गॉड’ और अंग्रेज समर्थक साबित करने की प्रक्रिया में मुँह की खा चुके संघ के विचारकों ने अंबेेडकर को गले लगाने का नया पैंतरा अपनाया है। इसके तहत झूठ पर आधारित अनर्गल तथ्यों…

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जलियांवाला बाग नरसंहार को याद रखना ज़रूरी है ताकि सनद रहे! : प्रो. चमनलाल

आज से 99 साल पहले इसी दिन पंजाब के अमृतसर शहर में एक ऐसी घटना हुई जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक लोकगाथा बन गई थी ।यह घटना थी, 13 अप्रैल 1919 को वैशाखी के हँसी-खुशी के त्योहार के अवसर पर ब्रिटिश शासकों द्वारा एक ऐसा हत्याकांड , जिसकी बर्बरता ने पूरे विश्व में उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के असली चेहरे को दिखा दिया । जलियावाला बाग हत्याकांड इसके बाद एक उदाहरण बन गया और आज भी देश में जब किसी भी जगह से पुलिस के भयानक अत्याचारों के समाचार आते…

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8 अप्रैल 1929: एक दिन जिसे याद रखा जाना चाहिए : प्रो. चमनलाल

8 अप्रैल 1929 को भारत के राजनितिक इतिहास का एक ऐतिहासिक दिन था, जिसके बारे में एल.के. आडवाणी जी ने भारी तथ्य्तात्मक चूक करते हुए अपनी किताब ‘माय लाइफ माय कंट्री’ में भगत सिंह की फांसी के कारण को इस दिन से जोड़ा था, जिसके कारण उनकी इतिहास के प्रति समझदारी पर भी कई सवाल खड़े हुए. 8 अप्रैल के इस दिन के महत्व को हमें ऐतिहासिक दस्तावेजों के माध्यम से समझने और भगत सिंह और साथियों के योगदान से जुडी याद को आज भी फिर से याद करने की…

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क्रान्ति के मोर्चे का सिपाही कामरेड गंगा प्रसाद

पहली पुण्यतिथि 4 अप्रैल पर कौशल किशोर कुछ लोग साधारण दिखते हैं पर वे साधारण होते नहीं। इसी बात को ‘ प्रतिरोध का सिनेमा ’ के सूत्रधार संजय जोशी ‘ गोमती के शहर में गंगा ’ के रूपक में कहते हैं। यह गंगा कोई और नहीं श्रमिक नेता और लेनिन पुस्तक केन्द्र के प्रबंधक कामरेड गंगा प्रसाद हैं। बीते साल 4 अप्रैल को उनका निधन हुआ। एक साल बीत गया लेकिन उनके जाने से जो गैप पैदा हुआ है, वह आज तक भरा नहीं जा सका है। कम्युनिस्ट आदर्शों में…

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केदार बाबू की कविताएँ बुंदेलखंड की सांस्कृतिक गजेटियर हैं

रमाशंकर सिंह आज केदारनाथ अग्रवाल का जन्मदिन है. आज ही के दिन 1911 में उनका जन्म हुआ था. युग की गंगा, लोक और आलोक, फूल नहीं रंग बोलते हैं, आग का आईना, गुलमेंहदी,पंख और पतवार, हे मेरी तुम, अपूर्वा, बोले बोल अबोल, जो शिलाएं तोड़ते हैं, आत्म गंध, अनहारी हरियाली जैसे सुंदर कविता संग्रह उनके नाम है. तेजी से उजाड़ होते जा रहे बुंदेलखंड, मेहनतकश बुंदेलखंड को प्रवासी मजदूरों के हिन्टरलैंड में बदल जाने की कहानी को अगर शुरू से जानना हो तो केदारनाथ अग्रवाल को जरुर पढ़ा जाना चाहिए.…

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कर्मकर्ता और कवि रजनी तिलक ने पूरी ज़िंदगी मेहनतकशों की शोषण मुक्ति और सम्मान के नाम कर दिया- जसम

गंगाधर पान तावड़े का जाना प्रतिरोध के एक महत्वपूर्ण स्तंभ का जाना है- जसम सामाजिक कार्यकर्ता और प्रख्यात साहित्यकार रजनी तिलक का 30 मार्च 2018 को रात 11 बजे दिल्ली के सेंट स्टीफंस हॉस्पिटल में देहांत हो गया। पिछले दिनों एक यात्रा में स्लिप डिस्क हो जाने से जटिलता बढ़ गयी। अंततः उनका आधा से अधिक शारीर पैरालाइज हो गया। उन्हें सेंट स्टीफंस हॉस्पिटल में भर्ती किया गया। ऑपरेशन के बाद भी हालात में कोई खास सुधार नहीं हुआ। अंततः उनको बचाया न जा सका। आप का जन्म 27 मई…

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आधी रात कांपते हाथों, रुंधे कंठ और बहते हुए आंसुओं के बीच लिखा गया एक पत्र

 प्रधानमंत्री के नाम शहीद चन्द्रशेखर की मां का पत्र संतोष सहर   17 अप्रैल 1997 की वह शाम कभी नहीं भूलती जब मैं ‘ समकालीन लोकयुद्ध ‘ के एक साथी को लेकर दरौली क्षेत्र के विधायक कॉ. अमरनाथ यादव के विधायक आवास पहुंचा था। मां कौशल्या वहीं ठहरी हुई थीं। जब हम पहुंचे, उनको एक चौकी पर बैठा पाया। उन्होंने मुझे अपनी ही बगल में बिठाया। उनके सामने कुछ खाने को रखा हुआ था। लेकिन, वो लगातार रोये जा रही थीं और बोले जा रही थीं। डेढ़- दो घण्टे गुजर…

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‘ संस्कृति खरगोश की तरह है, जो आने वाले खतरे का आभास देती है ’

कौशल किशोर   यह कैसा समय है कि साथ के लोग साथ छोड़े जा रहे हैं. कुंवर जी और दूधनाथ सिंह को हम ठीक से अभी याद भी नहीं कर पाये थे कि हमारे अत्यंत प्रिय कवि केदारनाथ सिंह के निधन की बुरी खबर मिली. कई बार लगता है कि हम पके आम के बाग में हैं. कब कौन टपक पड़े कहना मुश्किल है. अब तो अधपके और कच्चे भी गिर रहे हैं. सुशील सिद्धार्थ के दाह संस्कार की राख अभी ठण्डी भी नहीं हो पाई कि दूसरे ही दिन…

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‘आदमी के उठे हुए हाथों की तरह’ हिन्दुस्तानी अवाम के संघर्षों को थामे रहेगी केदारनाथ सिंह की कविता : जसम

कवि केदारनाथ सिंह को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि जनतांत्रिक मूल्यों की अकाल-वेला में केदारनाथ सिंह की कविता जनप्रतिरोध के सारसों की अप्रत्याशित आवाज़ थी. उनका संग्रह ‘अकाल में सारस’ 1988 में प्रकाशित हुआ था, जिसमें इसी शीर्षक की एक कविता है. कविता इस तरह शुरू होती है- “तीन बजे दिन में आ गए वे जब वे आए किसी ने सोचा तक नहीं था कि ऐसे भी आ सकते हैं सारस एक के बाद एक वे झुंड के झुंड धीरे-धीरे आए धीरे-धीरे वे छा गए सारे आसमान में धीरे-धीरे उनके…

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‘ कविता भविष्य में गहन से गहनतर होती जाएगी ’

  ( प्रख्यात कवि प्रो. केदारनाथ सिंह ने 26 फरवरी 2016 को गोरखपुर के प्रेमचंद पार्क में प्रो परमानंद श्रीवास्तव की स्मृति में ‘ कविता का भविष्य ’ पर व्याख्यान दिया था. यह आयोजन प्रेमचंद साहित्य संस्थान ने किया था. इस व्याख्यान में भविष्य की कविता पर उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें की थी. प्रस्तुत है व्याख्यान का प्रमुख अंश )   आज का समय अपने सारे गड्डमड्ड स्वरूप के भीतर से अपनी सच्ची कविता खोज रहा है. इस कविता की तलाश बड़े पैमाने पर जारी है. यह कार्य नई पीढ़ी…

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मै गांव-जवार और उसके सुख-दुख से जुड़ा हुआ हूं

(ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के बाद डॉ केदारनाथ सिंह से यह संक्षिप्त बातचीत टेलीफ़ोन पर हुई थी. यह साक्षात्कार दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ था. )   प्रश्न: ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के बाद आपको कैसा लग रहा है. डा. केदारनाथ सिंह: अच्छा लग रहा है. अच्छा लगने का कारण यह है कि यह केवल हिन्दी नहीं बल्कि देश की सभी भाषाओं के बड़े साहित्यकारों को मिल चुका है. इन सभी साहित्यकारों के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है. भारतीय साहित्य के मनीषियों की परम्परा से जुड़ कर अच्छा लग रहा…

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अलविदा, स्टार गुरु जी !

  मैंने 1989 के जुलाई महीने में जे एन यू के भारतीय भाषा विभाग के हिंदी विषय में एडमिशन लिया. कोर्स एम ए का था. इससे पहले मैं इलाहाबाद में गधा पचीसी के 23 साल बिता चुका था पूरब के तथाकथित ऑक्सफ़ोर्ड से काफ़ी अच्छी तरह से ऊब चुका था. जे एन यू के हिंदी विभाग में एडमिशन के लिए कोशिश का बड़ा आकर्षण नामवर जी, केदार नाथ सिंह और मैनेजर पाण्डेय थे जो न सिर्फ़ भारतीय भाषा केंद्र के आकर्षण थे बल्कि समाज विज्ञान, इतिहास और विज्ञान के छात्र…

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