सरकारी खजाने से चुनावी यात्रा का औचित्य

  जावेद अनीस मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान अपने लम्बे कार्यकाल के दौरान बेहिसाब घोषणाओं, विकास के लम्बे-चौड़े  दावों और विज्ञापनबाजी में बहुत आगे साबित हुये है, वे हमेशा घोषणा मोड में रहते हैं और उनकी सरकार के चमचमाते विज्ञापन प्रदेश के साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी खुले जेब के साथ प्रसारित होते हैं जिसमें मुख्य रूप से शिवराज और उनकी सरकार की ब्रांडिंग की जाती है. अब विधान सभा चुनाव से ठीक पहले सीएम शिवराज सिंह द्वारा ‘जन आशीर्वाद यात्रा’ निकली जा रही है यह पूरी तरह से एक…

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उसका भाषण था कि मक्कारी का जादू…

सौरभ यादव, शोध छात्र, दिल्ली विश्वविद्यालय 15 अगस्त, नई दिल्ली ।आज देश के 72 वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रचलित परम्परा के अनुसार प्रधानमंत्री ने डालमिया के गोद लिए लाल किले से देश को पहली बार संबोधित किया। यहां पहली बार शब्द का प्रयोग दो वजहों से किया जा रहा है । पहला तो ये कि मोदी जी को इस ‘पहली बार’ शब्द से विशेष प्रेम है, दूसरा इसलिए क्योंकि इससे पहले के प्रधानमन्त्रियों ने भारत सरकार के अधीन आने वाले लाल किले से देश को सम्बोधित किया था लेकिन हाल…

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एक और मार्क्स: वर्तमान को समझने के लिए मार्क्स द्वारा उपलब्ध कराए गए उपकरणों की जरूरत

  2018 में ब्लूम्सबरी एकेडमिक से मार्चेलो मुस्तो की इतालवी किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘एनादर मार्क्स: अर्ली मैनुस्क्रिप्ट्स टु द इंटरनेशनल’ प्रकाशित हुआ । अनुवाद पैट्रिक कैमिलर ने किया है । मुस्तो कहते हैं कि नए विचारों की प्रेरक क्षमता को यदि युवा होने का सबूत माना जाए तो मार्क्स बेहद युवा साबित होंगे । उनका कहना है कि पूंजीवाद के जीवन में सबसे हालिया 2008 के संकट के बाद से ही कार्ल मार्क्स के बारे में बातचीत शुरू हो गई है । बर्लिन की दीवार गिरने के बाद मार्क्स…

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समाज का सच सामने लाती है हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’

(कथाकार हेमंत कुमार की कहानी  ‘ रज्जब अली  ’ पत्रिका ‘ पल-प्रतिपल ’ में प्रकाशित हुई है. इस कहानी की विषयवस्तु, शिल्प और भाषा को लेकर काफी चर्चा हो रही है. कहानी पर चर्चा के उद्देश्य से समकालीन जनमत ने 22 जुलाई को इसे प्रकाशित किया था. कहानी पर पहली टिप्पणी युवा आलोचक डॉ. रामायन राम की आई  जिसे हमने प्रकाशित किया है,  दूसरी टिप्पणी जगन्नाथ दुबे की आई जो डॉ. रामायन राम द्वारा उठाए गए सवालों से भी टकराती है . इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है…

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हेमन्त कुमार की कहानी ‘ रज्जब अली ’ में सामंती वैभव देखना प्रतिक्रियावाद को मजबूत करना है

कहानी में मूल समस्या साम्प्रदायिकता है. यह कहानी हमारे समय के लिहाज से एक बेहद जरूरी कहानी है. इसलिए जरूरी यह है कि इस कहानी के मूल मन्तव्य पर बात हो. कहानी के मूल मन्तव्य पर बात न करके हम उन्ही प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ मजबूत करते दिखेंगे.

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समलैंगिक और ट्रांस जेंडर लोगों के सम्मान और बराबरी के अधिकार पर हमला है सेक्शन 377

1917 के रूसी क्रांति के बाद रूस की क्रांतिकारी सरकार ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर किया. भारत में समलैंगिकता को अपराध बनाने वाले तो अंग्रेज़ ही थे. अंग्रेज़ चले गए पर अपना कानून छोड़ गए, जिसे भेदभावपूर्ण लोग ‘भारत की संस्कृति ‘ कहते हैं !

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झारखंड के कोचांग में नुक्कड़ नाटक दल की महिलाओं के साथ हुए बलात्कार कांड पर जसम का निंदा प्रस्ताव व बयान

जन संस्कृति मंच झारखंड के खूंटी जिले के कोचांग में नुक्कड़ नाटक करने गईं नाटक टीम की लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना की निंदा करता है।यह कृत्य बेहद अमानवीय और सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। जिस तरह पूरे देश में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा हो रही है वह राष्ट्र के सामने एक बड़ी चुनौती है जो भारतीय लोकतंत्र को आइना दिखाती है। निर्भया के बाद पूरे देश मे फैले महिलाओं की बेख़ौफ़ आज़ादी के आंदोलन के बाद बने कड़े कानूनों के बावजूद देश मे बलात्कार की…

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उन्नीस की बलिवेदी पर कश्मीर

कश्मीर को एक बार फिर चुनावी राजनीति की बलिवेदी पर चढ़ा दिया गया है. कश्मीर की निरन्तर जारी त्रासदी का सबसे बड़ा कारण यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में यह चुनावी वैतरणी का सबसे बड़ा सहारा बना रहा है.

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नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 और कुछ नहीं पिछले दरवाजे से लाया गया ‘ हिन्‍दू राष्‍ट्र बिल ’ है

नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 इजरायली मॉडल पर बना है. यह और कुछ नहीं पिछले दरवाजे से लाया गया एक ‘हिन्‍दू राष्‍ट्र बिल ‘ ही है।

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माँ तुझे सलाम !

(माँ केवल ममता का ही खज़ाना नहीं है बल्कि समझदारी का भी स्रोत होती है.  समाज के बारे में, नैतिकता, यौनिकता, सही और गलत के विवेक के बारे में हमें एक नयी दृष्टि देने का भी निमित्त हो सकती है. आइये  ‘मदर्स डे’ के उपलक्ष्य में माँ की रूढ़ हो चुकी छवि से इतर कविता कृष्णन के इस लेख के माध्यम से माँ की एक नयी छवि से परिचित होते हैं, उस पर बात और बहस करते हैं) ‘टू किल अ मॉकिंगबर्ड’ उपन्यास 1950 के दशक के अमेरिका के दक्षिणी…

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दलितों के घर भोजन: मकसद क्या है, वोट या कुछ और?

जिस समय दलितों के घर भोजन की यह नौटंकी चल रही है उसी समय एससी/एसटी एक्ट को कमजोर किया जा रहा है।उसी समय विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर भर्ती में आरक्षित तबकों को बाहर करने की साजिश चल रही है।चन्द्रशेखर रावण जैसे युवा दलित आंदोलनकारी को छल-प्रपंच के जरिये जबरन जेल में रखा गया है। पूरे देश भर में दलितों के खिलाफ हिंसा की बाढ़ आई हुई है।

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हरम सरा नहीं कविता चाहिए

‘ जेंडर बाइनरिज़्म ’ दोनों ध्रुवों के बीच पड़ने वाली सारी चीज़ों को परिधि पर फेंक देता है. यह स्थापित करता है कि स्याह और सफ़ेद के बीच दूसरे रंग नहीं होते. यह यौनिकता को तमाम रंगों की एक पट्टी मानने के बजाय दो स्थायी रंगों में कील देता है. सौंदर्यबोध के स्तर पर यह समान्य व्यवहार का हिस्सा है और कवि समय की तरह प्रचलित है. पूरा सौंदर्यशास्त्र इस दो-ध्रुवीय युग्म को मज़बूत करता है.

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दलितों का भारत बंद : दलित आन्दोलन का नया दौर और नया रूप

  पिछले चार सालों में भारत में दलित आन्दोलन नए रूप में विकसित होना प्रारम्भ कर चुका है.रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या,गुजरात का ऊना आन्दोलन,सहारनपुर में भीम आर्मी का आन्दोलन,महाराष्ट्र के भीमा कोरे गांव का संघर्ष और 2 अप्रैल का दलितों द्वारा किया गया स्वत:स्फूर्त भारत बंद,इन सभी आंदोलनों ने यह साबित किया है कि भारत में दलित आन्दोलन अब नए दौर में प्रवेश कर चुका है. आज के समय में दलित आन्दोलन ज्यादा व्यापक मुद्दों,विस्तृत नजरिये और उग्र तेवर के साथ सामने आया है. लोकतंत्र पर बढ़ते फासीवादी हमले और…

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देश विरोधी व्यावसायिक मंसूबा है लाल किला को डालमिया समूह की गोद में देना

हमारी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित करना न केवल सरकार की संस्थाओं की जिम्मेदारी है बल्कि हम नागरिकों का भी दायित्व है। सरकार के इस देश विरोधी व्यावसायिक मंसूबो को सफल होने से रोकना चाहिए। इस पूरे मामले पर संस्कृति कर्मियों और लेखकों को ‘ सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विरासत को बचाओ, सरकार के जन विरोधी व्यावसायिक मंसूबों को हराओ ‘ जैसा व्यापक अभियान चलाना चाहिए।

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लाल किला को नीलाम करने की इजाजत नहीं दी जा सकती : दीपंकर भट्टाचार्य

भाजपा को देश व बिहार से भगाना कितना जरूरी हो गया है, यह इससे भी साबित हो रहा है कि इस सरकार ने लाल किला नीलाम कर दिया है. 15 अगस्त को जिस लाल किले पर प्रधानमंत्री झंडा फहराते हैं, उसे डालमिया ग्रुप के हवाले कर दिया गया है. यह वहीं डालमिया ग्रुप है जिसने बिहार को लूटकर बर्बादी की गर्त में धकेल दिया था.

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एससी /एसटी एक्ट : दुरुपयोग की चिंता या कानून की जड़ ही खोदने की कोशिश

उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989  के संदर्भ में फैसला दिए जाने के बाद पूरे देश में इस फैसले के पक्ष और विपक्ष में बहस-मुबाहिसे का माहौल गर्म है. फैसले का विरोध करने वाले मानते हैं कि यह फैसला,अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम को और कमजोर कर देगा. इससे इन जातियों को, जो थोड़ी बहुत कानूनी सुरक्षा हासिल है, उसका भी क्षरण हो जायेगा. इस फैसले का विरोध करने के लिए अनुसूचित जाति के संगठनों ने दो अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया, जिसका समर्थन वामपंथी पार्टियों समेत…

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उदारमना संस्कृति का सामर्थ्य

  पंकज चतुर्वेदी: मशहूर कथन है कि ”Interpretation depends on intention.” यानी व्याख्या इरादे पर निर्भर है। अगर आपकी नीयत नफ़रत और हिंसा फैलानेे की है, तो आप इतिहास से वे ही तथ्य चुनकर लायेंगे, जिनसे ऐसा किया जा सकता हो। ऐसा नहीं है कि वे तथ्य नहीं हैं, लेकिन समग्र सत्य की सापेक्षता में देखे जाने पर तथ्य सत्य नहीं रह जाते। इसलिए किसी ख़ास मक़सद या निहित स्वार्थ की नज़र से इतिहास का चयनधर्मी इस्तेमाल इतिहास नहीं है। सत्य से न्याय तभी हो सकता है, जब तथ्यों के…

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यूनिवर्सिटी और हाज़िरनामा

चिंटू कुमारी हाल ही में देश के सबसे बेहतरीन शैक्षणिक संस्थानों में से एक जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी में 80 प्रतिशत हाज़िरी को अनिवार्य करने का आदेश जारी किया गया है . जेएनयू के सन्दर्भ में अगर हम बात करें तो इसके स्थापना काल से ही इस यूनिवर्सिटी को अपने अकादमिक परफॉरमेंस के लिए ‘अटेंडेंस ’ का मोहताज नहीं रहना पड़ा है. अब तक तो यहाँ के खुले वातावरण , आम तौर पर शोधार्थी और अध्यापक के बीच अनौपचारिक, मित्रतापूर्ण माहौल ने ही जेएनयू को एक बेहतरीन यूनिवर्सिटी बनाया है. ‘लड़ो…

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मातृभाषा की नागरिकता

  सदानन्द शाही   जाने कब से लोकमन कहता चला आ रहा है-कोस कोस पर पानी बदले नौ कोस पर बानी. जैसे धरती के भीतर छुपा पानी एक कोस पर बदल जाता है ,वैसे ही नौ कोस की दूरी तय करने पर भाषा बदल जाती है. भाषा का यह बदलाव स्वाभाविक और प्राकृतिक है. इसीलिए भाषाई बहुलता और विविधता भारत का वैभव है लेकिन इसके उलट तीन सौ साल की औपनिवेशिक गुलामी हमें यह समझाने में सफल रही है कि विभिन्न भाषाओं का होना अभिशाप है. हमारे औपनिवेशिक प्रभु हमको…

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देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अच्छे दिन कब आएंगे ?

जाहिद खान ‘‘देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हुए हमलों की भरोसेमंद जांच कराने या उन्हें रोकने में मोदी सरकार पूरी तरह से नाकाम रही है।’’ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ ने हाल ही में साल 2018 की ‘वल्र्ड रिपोर्ट’ जारी करते हुए ये बात की है। 643 पन्नों की वल्र्ड रिपोर्ट के 28वें संस्करण में ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ ने 90 से ज्यादा देशों में मानवाधिकारों की स्थिति का जायजा लिया और इस नतीजे पर पहुंचा कि सभी भारतीयों के बुनियादी अधिकारों की कीमत पर सत्तारूढ़ बीजेपी के कुछ…

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