कार्ल मार्क्स : एक जीवन परिचय

दुनिया के मजदूरों के, सिद्धांत और कर्म दोनों मामलों में, सबसे बड़े नेता कार्ल मार्क्स (1818-1883) का जन्म 5 मई को त्रिएर नगर में हुआ जो प्रशिया के राइन प्रदेश में था । पिता पेशे से वकील थे, यहूदी थे लेकिन बाद में प्रोटेस्टेंट धर्म स्वीकार कर लिया था । त्रिएर नगर में प्रारंभिक शिक्षा जिम्नेजियम यानी विशिष्ट पाठशाला में हुई । जिम्नेजियम में ही उन्होंने पेशे के चुनाव पर विचार करते हुए एक लेख लिखा था जिससे आगामी जीवन की उनकी गतिविधियों का अनुमान होता है । इसमें उन्होंने…

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मार्क्स ने खुद के दर्शन को निर्मम और सतत आलोचना के रूप में विकसित किया : दीपंकर भट्टाचार्य

मार्क्स के दबे हुए लोग और अंबेडकर के बहिष्कृत लोग एक ही हैं। इसी तरह मार्क्स ने भारत में जिसे जड़ समाज कहा, अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद-मनुवाद कहा, एक ही है। उन्होंने कहा कि बुद्ध, अंबेडकर और मार्क्स अगर पूरक लगते हैं तो ऐसा मानने वालों को ही यह काम करना है, नई लड़ाई को चलाना है।

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भारतीय समाज के बदलते वर्गीय एवं जातीय चरित्र को बारीकी से व्यक्त करने वाले कथाकार हैं मार्कण्डेय

मार्कंडेय ने भारतीय समाज के बदलते वर्गीय एवं जातीय चरित्र को बहुत ही बारीकी से अपनी कथाओं में व्यक्त किया है. सामाजिक ताने-बाने एवं राजनीतिक अर्थशास्त्र पर उनकी गहरी पकड़ रही जिसके कारण आदर्श कल्याणकारी लोकतान्त्रिक नीतियाँ हों या ग्रामीण जीवन, किसी के प्रति उनका रोमान एक स्तर से आगे नहीं बढ़ता. उनकी सचेत समाजशास्त्रीय दृष्टि उन्हें तुरंत यथार्थ की ज़मीन पर खींच लाते हैं.

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लेनिन : जो समय से प्रभावित ही नहीं, जिसने समय को प्रभावित भी किया

गोपाल प्रधान (व्लादिमीर इल्यिच उल्यानोव जो लेनिन के नाम से लोकप्रिय हैं , के जन्म दिवस पर गोपाल प्रधान का लेख ) 1917 के अक्टूबर/नवम्बर महीने में रूस में एक ऐतिहासिक अश्रुतपूर्व प्रयास हुआ। वह प्रयास उन्नीसवीं सदी की क्रांतियों को पूर्णता प्रदान करने वाला था और बीसवीं सदी का चेहरा इससे निर्मित हुआ. सारी दुनिया का शायद ही कोई मुल्क होगा जिसकी चेतना में इस क्रांति की मौजूदगी न हो. हमारे देश में भी रवींद्रनाथ ठाकुर की ‘ रशियार चिठी ’ और प्रेमचंद के तमाम लेखन में इसका समर्थन मिलता…

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‘ राष्ट्रीय खलनायक ’ राजिंदर सच्चर

  राजघाट पर वह सन दो हज़ार बारह के मार्च की एक सुबह थी. सोरी सोनी के पुलिसिया उत्पीड़न का विरोध करने के लिए वहाँ कुछ लोग गांधीवादी कर्मकर्ता हिमांशु कुमार के साथ भूख हड़ताल पर बैठे थे. इनमें से एक लगभग नब्बे बरस के जस्टिस राजिंदर सच्चर भी थे. वे दो नौजवानों के कंधों का सहारा लेकर धीरे धीरे चलते हुए वहाँ आए थे. देख कर कुछ क्षण को ऐसा लगा जैसे ख़ुद महात्मा गांधी अपनी समाधि से उठकर चले आ रहे हों. सत्य की रक्षा के लिए सब…

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बुझात बा कि भगवन जी हो गइलें दूगो / हजूरन के दोसर, मजूरन के दोसर

    संतोष सहर बाबा साहब के जन्मदिन के अवसर पर बेतिया में आयोजित हुई ‘ भूमि अधिकार यात्रा ‘ के सभा मंच से मैंने उनको यह गीत गाते सुना. नाम-सरफुद्दीन शाह, गांव-पकड़िया, प्रखंड-छौड़ादानो, जिला पूर्वी चंपारण. पिता अमीन दीवान और मां रतेजा खातून की दूसरी संतान जो 1955 में जन्मे.  चार भाइयों व तीन बहनों के साथ पले-बढ़े. छोटा-सा कद, पतली-सी काठी, सांवला चेहरा और 60 साल से ऊपर की उम्र. दमदार आवाज सबका कान खींच लेती है, जब वे गाते हैं। पिछले 20-25 सालों से हर छोटे-बड़े कार्यक्रम…

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हिंदुत्व, हिन्दू राष्ट्र और डॉ. अम्बेडकर

डॉ. रामायन राम 90 के दशक के शुरुआत से ही संघ के नेतृत्व में हिंदुत्ववादी शक्तियां  अपनी राजनैतिक परियोजना के हिसाब से डॉ. अंबेेडकर का पुनर्पाठ करने में लगी थीं। अंबेेडकर को हिन्दू राष्ट्र का समर्थक, आरएसएस का शुभचिंतक और पाकिस्तान विरोधी अखण्ड भारत का समर्थक सिद्ध करने की लगातार कोशिश की जाती रही है। अंबेेडकर को ’फॉल्स गॉड’ और अंग्रेज समर्थक साबित करने की प्रक्रिया में मुँह की खा चुके संघ के विचारकों ने अंबेेडकर को गले लगाने का नया पैंतरा अपनाया है। इसके तहत झूठ पर आधारित अनर्गल तथ्यों…

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हम सबके गंगा जी

वामपंथी आन्दोलनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नब्बे के दशक में एक व्यक्ति को बहुत शिद्दत से मार्क्सवादी साहित्य की किताबों का स्टाल लगाए देखा करता था. बाद में जब प्रतिरोध का सिनेमा और गोरखपुर फ़िल्म फेस्टिवल की सक्रियता बढ़ी तब इस शख्स से सीधी मुलाक़ात संभव हुई. ये थे हम सबके गंगा जी. हमारे पहले गोरखपुर फ़िल्म फेस्टिवल में भी गंगा जी का स्टाल लगा और फिर वे अपने एक अन्य सहयोगी और मित्र गौड़ साहब के साथ आगे चार फेस्टिवलों में शरीक होते रहे. मैं आदतन उनसे हर रोज…

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उठो कि बुनने का समय हो रहा है

केदारनाथ सिंह की कुछ कवितायेँ   मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिला मैं लिखने बैठ गया हूँ मैं लिखना चाहता हूँ ‘पेड़’ यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है मैं लिखना चाहता हूँ ‘पानी’ ‘आदमी’ ‘आदमी’ – मैं लिखना चाहता हूँ एक बच्चे का हाथ एक स्त्री का चेहरा मैं पूरी ताकत के साथ शब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाका जो शब्द और आदमी की टक्कर से…

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वह चला गया, जिसने कहा था कि जाना सबसे खौफनाक क्रिया है

आशीष मिश्रा, युवा आलोचक   हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह हमारे बीच नहीं रहे . कवि केदारनाथ सिंह के जाने के साथ ही न सिर्फ़ ‘तीसरा सप्तक’ के कवियों में से अब कोई हमारे बीच नहीं रहा बल्कि उनके साथ हिन्दी कविता के एक युग का अवसान हो गया . केदारनाथ सिंह ने नई कविता आन्दोलन के साथ अपनी पहचान बनाई. अज्ञेय द्वारा संपादित और 1959 में प्रकाशित, हिन्दी के महत्त्वपूर्ण काव्य संकलन ‘तीसरा सप्तक’ के सात कवियों में केदारनाथ सिंह भी एक थे. इस संकलन के कई गीत…

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कॉमरेड कुंती देवी : क्रांतिकारी महिला आंदोलन का चेहरा

  संतोष सहर, कवि एवं संस्कृति कर्मी पिछले साल मई माह के आखिरी दिनों मैं जहानाबाद में था। हमारी पार्टी भाकपा-माले के दिवंगत महासचिव कामरेड विनोद मिश्र अक्सर कहा करते थे – ” दिल्ली का रास्ता जहानाबाद से होकर जाता है।” मैंने नोन्ही-नगवां, दमुहाँ-खगड़ी और इस्से बिगहा नाम के गांव-टोलों की यात्रा की। मगही-उर्दू के शायर वसी अहमद ‘तालिब’ की रचनाओं को हासिल किया और कॉ.  कुंती देवी से एक संक्षिप्त बातचीत भी की। कॉ.  कुंती देवी अभी हो रहे जहानाबाद विधान सभा उपचुनाव में भाकपा-माले की प्रत्याशी हैं। वे…

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