सुरों के उस्ताद, सुनने की उस्तादी

दिनेश चौधरी हरिभाई यानी पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी हमेशा थोड़ी जल्दी में होते हैं। वे आँधी की तरह आये, बाँसुरी की तान छेड़ी, खाना खाये बगैर किसमिस के चार दाने मुंह में डाले और तूफान की तरह चले गये। गाड़ी से उतरकर मंच पर विराजने और लौटकर फिर अपने वाहन में सवार होने तक लोगों ने उन्हें घेरे रखा था। किसी को उनके आटोग्राफ चाहिये थे तो किसी को उनके साथ फोटू खिंचानी थी। कुछ लोग एक सेलिब्रिटी के साथ महज चंद पल गुजारने का सुख लूटना चाहते थे, सो…

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एक और मार्क्स: वर्तमान को समझने के लिए मार्क्स द्वारा उपलब्ध कराए गए उपकरणों की जरूरत

  2018 में ब्लूम्सबरी एकेडमिक से मार्चेलो मुस्तो की इतालवी किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘एनादर मार्क्स: अर्ली मैनुस्क्रिप्ट्स टु द इंटरनेशनल’ प्रकाशित हुआ । अनुवाद पैट्रिक कैमिलर ने किया है । मुस्तो कहते हैं कि नए विचारों की प्रेरक क्षमता को यदि युवा होने का सबूत माना जाए तो मार्क्स बेहद युवा साबित होंगे । उनका कहना है कि पूंजीवाद के जीवन में सबसे हालिया 2008 के संकट के बाद से ही कार्ल मार्क्स के बारे में बातचीत शुरू हो गई है । बर्लिन की दीवार गिरने के बाद मार्क्स…

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वीरेन डंगवाल की याद और सृजन, कल्पना, रंगों, शब्दों और चित्रों की दुनिया

डॉ. कामिनी त्रिपाठी शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय बैकुंठपुर में आयोजित त्रिदिवसीय ‘वीरेन डंगवाल जन्म दिन समारोह’ का समापन 8 अगस्त को छात्राओं द्वारा वीरेन दा की कविताओं का पोस्टर बनाते हुए सम्पन्न हुआ | कार्यक्रम के पहले दिन लगभग 30 छात्राओं ने ‘नवारुण’ द्वारा प्रकाशित वीरेन दा की संपूर्ण कविताओं के संग्रह ‘कविता वीरेन’ से अपनी पसंद की कविताओं का चयन कर अपने अंदाज़ में उनका पाठ किया | छात्राओं द्वारा चयनित कविताओं को देखने से एक बात बहुत आसानी से समझी जा सकती है कि वीरेन दा की कविताएं…

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कवि वीरेन डंगवाल के 71वें जन्मदिन पर बरस रही थी कवि की याद

(पांच अगस्त को हिंदी के कवि वीरेन डंगवाल का जन्म दिन होता है । देश भर में कवि की याद में हुए आयोजनों में से कुछ झलकियाँ यहां प्रस्तुत हैं ।) बरस रही थी कवि की याद  कल पांच अगस्त को कवि वीरेन डंगवाल का जन्मदिन था .कवि तो बहुत हैं और उनकी यादें भी ,परन्तु मैंने लोगों को जिस तरह वीरेन डंगवाल को याद करते हुए सुना है ,देखा है वैसा किसी को नहीं .जो उनसे एक बार भी मिला है ,जो उनसे लोगों को मिलते हुए देखा भर…

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वत्सल उम्मीद की ठुमक के साथ मैं तो सतत रहूँगा तुम्हारे भीतर नमी बनकर: वीरेन डंगवाल

करीब 16 बरस पहले वीरेन डंगवाल के संग्रह ‘दुश्चक्र में स्रष्टा’ पर लिखते हुए मैंने उल्लास, प्रेम और सौंदर्य को उनकी कविता के केंद्रीय तत्वों के रूप में रेखांकित किया था- यह कहते हुए कि मूलतः अनाधुनिक मान लिए गए ये तत्व दरअसल वीरेन की काव्य-दृष्टि में एक वैकल्पिक आधुनिकता की खोज करते लगते हैं। अब उनके निधन के बाद जब उनका समग्र ‘कविता वीरेन’ के नाम से मेरे सामने पड़ा है तो यह देखना मेरे लिए प्रीतिकर है कि वीरेन की कविता ने उन दिनों जो प्रभाव मुझ पर…

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वीरेन दा की याद: ‘नदी’ कविता के बहाने से

शिव प्रकाश त्रिपाठी “ लंबे और सुरीले नहीं थे मेरे गान मेरी सांसे छोटी थी पर जब भी गाए मैंने बसंत के ही गान गाए अपनी फटी हुई छाती के बावजूद” बसंत आ चुका है पर न तो हवा में रवानगी ही आई और न फूलों में भौरें. फूल खिले तो हैं पर उनमें कालिख की एक पूरी परत चढ़ी हुई है. ये अंधकार युग की पदचाप भी हो सकती है. एक ऐसा समय गति में है, जहाँ एक तरफ पूरे विश्व में वैश्वीकरण बनाम संरक्षणवाद पर छाती-पीट बहस चल…

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प्रेमचंद किसान जीवन की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार धरम, महाजन और साहूकार की भूमिका की शिनाख्त करते हैं

31 जुलाई 2018 को प्रेमचंद जयंती के अवसर पर शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय , बैकुंठपुर(छत्तीसगढ़) में ‘प्रेमचंद और हमारा समय’ विषयक संगोष्ठी आयोजित की गई | इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए डॉ. पीयूष कुमार ने कहा कि किसानों की जिस स्थिति को प्रेमचंद ने आज से बहुत साल पहले अपने कथा साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया था, वह आज भी बदली नहीं है बल्कि और ज्यादा भयावह हुई है | उदारीकरण ने लूट का जो तंत्र खड़ा किया है उसने अनंत जीवटता वाले किसानों…

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मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ़, ये के सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा

मीना कुमारी (1 अगस्त, 1933 – 31 मार्च, 1972) का असली नाम महजबीं बानो था , इनका जन्म मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था. वर्ष 1939 से 1972 तक इन्होंने फ़िल्मी पर्दे पर काम किया. मीना कुमारी अपने दौर की एक बेहतरीन अदाकारा होने के साथ-साथ शायरा और पार्श्वगायिका भी थीं. आइए इनकी 85 वीं सालगिरह पर भारतीय सिने जगत की इस महान अदाकारा को उनकी कुछ चर्चित ग़ज़लों की मार्फ़त याद करें. मीना कुमारी की ग़ज़लें- चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा, दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा…

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सत्ता संपोषित मौजूदा फासीवादी उन्माद प्रेमचंद की विरासत के लिए सबसे बड़ा खतरा:डॉ. सुरेंद्र प्रसाद सुमन

लोकतंत्र, संविधान और साझी संस्कृति के नेस्तनाबूद करने की हो रही है गहरी साजिश-कल्याण भारती प्रेमचंद के सपनों के भारत से ही बचेगी हमारी साझी संस्कृति-डॉ. राम बाबू आर्य 31 जुलाई, दरभंगा । आज स्थानीय लोहिया चरण सिंह कॉलेज के सभागार में “मौजूदा फासीवाद उन्माद और प्रेमचंद की विरासत” विषय पर संगोष्ठी आयोजित कर जन संस्कृति मंच, दरभंगा द्वारा महान कथाकार प्रेमचंद की 138वीं जयंती मनाई गई । इस अवसर पर बोलते हुए जसम राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य सह ‘समकालीन चुनौती’ के संपादक डॉ. सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने कहा कि “हमारे…

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अदनान को ‘क़िबला’ कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार

युवा कवि अदनान कफ़ील ‘ दरवेश ‘ को वर्ष 2018 के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है. 30 जुलाई 1994 को बलिया उत्तर-प्रदेश में जन्में अदनान इस समय जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली में एम. ए. हिंदी के छात्र हैं. तारसप्तक के कवि भारत भूषण अग्रवाल की स्मृति में 1979 में इस पुरस्कार को दिए जाने की शुरुआत की गयी थी. तब से हर साल समकालीन कविता में अपने योगदान और विशिष्ट पहचान बनाने वाले युवा कवि को यह पुरस्कार दिया जाता है. 17 जून…

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रंगों और कूचियों के अनोखे उस्ताद उर्फ़ अशोक दा !

बिना किसी कला स्कूल से शिक्षित हुए बिना किसी बड़े गुरु के शिष्य हुए अपनी कला भाषा की खोज करना और उसमे एक बड़ा मुकाम हासिल करना अशोक दा की बड़ी उपलब्धि है. यह भाषा उन्होंने वर्षों काले रंग से बहुत मेहनत से कैनवास पर इचिंग करते हुए हासिल की जिसकी वजह से आज हम उनके चित्र देखते ही अनायास कह उठते हैं कि ‘अरे यह तो अशोक भौमिक का चित्र है.’

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राजेन्द्र कुमार : जैसा मैंने उन्हें देखा

उनका अलंकरण मुश्किल है. उनके बारे में अतिशयोक्ति संभव नहीं. ध्यान से देखें तो उन्होंने अपने जीवन और अपनी रचना में कुछ भी अतिरिक्त, कुछ भी surplus बचाकर रखा नहीं है. जो कुछ भी अर्जित रहा, वह इतने इतने रूपों में बंटता रहा कि कोई चाह कर भी उसका लेखा-जोखा नहीं तैयार कर सकता. सामाजिक सक्रियताओं, लेखकीय प्रतिबद्धताओं, अध्यापकीय और पारिवारिक जिम्मेदारियों के दरम्यान उनका सारा अर्जन मानों खुशबू की तरह बिखर गया है.

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पठनीयता का संबंध वास्तविकता से होता है

(प्रेमचंद की परंपरा को नये संदर्भ और आयाम देने वाले हिंदी भाषा के कहानीकारों में अमरकांत अव्वल हैं। अमरकांत से शोध के सिलसिले में सन् 2002 की शरद में मिलना हुआ।अमरकांत के प्रस्तुत बात-विचार उसी मुलाकात और वार्तालाप से निकले हैं-दुर्गा सिंह ।) प्रेमचंद की परंपरा- प्रेमचंद ने ग्रामीण जीवन से विषय उठाया है। शहरी जीवन पर भी लिखा लेकिन मुख्य जोर ग्रामीण जीवन और समाज पर रहा। ग्रामीण जीवन से उन्होंने जो पात्र उठाए उसमें भी दबे-कुचले, शोषित, गरीब पर केंद्रित हैं। इन पात्रों के जरिये प्रेमचंद ने सामाजिक…

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भुलाए नहीं भूलेगा यह दिन

कमरे में चौकी पर बैठे थे नागार्जुन. पीठ के पीछे खुली खिड़की से जाड़े की गुनगुनी धूप आ रही थी. बाहर गौरैया चहचहा रही थी. तभी पहुंचे कॉ. विनोद मिश्र, कवि से मिलने कवि के पास. समय ठिठका-सा रहा, शब्द चूक-से गए. नागार्जुन ने वीएम के चेहरे को कांपती उंगलियों से टटोला. देर तक नाक, कान, ठुड्डी को छूते रहे। उनकी भाव विह्वल आंखें चमक से भर गईं.

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खैनी खिलाओ न यार! /उर्फ / मौत से चुहल (सखा, सहचर, सहकर्मी, कामरेड महेश्वर की एक याद)

अपने प्रियतर लोगों- कृष्णप्रताप (के.पी.), गोरख, कामरेड विनोद मिश्र, महेश्वर पर चाहते हुए भी आज तक कुछ नहीं लिख सका। पता नहीं क्यों? इसकी वज़ह शायद उनसे एक जरूरी दूरी नहीं बन पाई आज तक, ताकि उसे देख सकूँ। शायद वे सब लोग स्मृतियों में आज भी वैसे ही साथ रहते-चलते चल रहे हों जैसे तब। शायद यह भी कि ये चारों लोग मिल कर स्मृति का एक वृत्त बन जाते हैं, इस तरह कि अलगा कर इनमें से किसी एक पर नहीं लिखा जा सकता। आज महेश्वर की पुण्य-तिथि…

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जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है !

इस ख़त की कोई भूमिका नहीं हो सकती। इरफ़ान, जिनके सिरहाने की एक तरफ़ ज़िंदगी है और दूसरी तरफ़ अंधेरा, ने आत्मा की स्याही से यह ख़त लिखा है। उम्मीद की ओस। एक काव्यमय दर्शन। जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है! यह ख़त इरफ़ान भाई ने वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज को भेजा है। -(अविनाश दास, लेखक-निर्देशक .) कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरोएंडोक्रिन कैंसर से ग्रस्त हूं। मैंने पहली बार यह शब्द सुना था। खोजने पर मैंने पाया कि…

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अमन की शहादत

हम मीडिया के लोग आराम कुर्सियों पर बैठकर भी संघर्षविराम के पक्ष में नहीं खड़े हो पाते हैं, लेकिन जिस शख्स ने अपने कश्मीर को जलते देखा था, जिसने युवाओं को गुस्से में पत्थर मारते देखा था, जिसने अलगाववादियों और आतंकियों की गोली से कश्मीरियों को मरते देखा था और आतंकियों और सेना के संघर्ष में आम नागरिको को मरते देखा था, वह शख्स संघर्ष विराम के पक्ष में पुरजोर तरीके से खड़ा था.

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जनकवि सुरेंद्र प्रसाद की 84वीं जयंती मनाई गई

बी. आर. बी. कालेज , समस्तीपुर के सभागार में 17 मई, 2018 को जन संस्कृति मंच और आइसा के संयुक्त तत्वावधान में मिथिलांचल के दुर्धर्ष राजनीतिक-संस्कृतिक योद्धा एवं जनकवि सुरेन्द्र प्रसाद की 84वीं जयंती मनाई गई.

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यातना का प्रतिकार प्रेम

मंगलेश की कविता ने प्रेम को बराबर एक सर्वोच्च मूल्य के तौर पर प्रतिष्ठित किया है । लेकिन एकान्त में नहीं, यातना के बरअक्स; क्योंकि प्रेम को नष्ट किया जाना ही यातना का सबब है और मुक्ति अगर सम्भव है, तो प्रेम की ही मार्फ़त । इसलिए न उन्होंने प्रेम और यातना की अलग–अलग कोटियाँ निर्मित कीं, न कला और प्रतिबद्धता की ।

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महावीर प्रसाद द्विवेदी का स्मरण आज भी क्यों ज़रूरी है

द्विवेदी जी उस ईश्वर को ‘भ्रष्ट ईश्वर’ कहते हैं, जिसकी दुहाई छुआ-छूत मानने वाले देते हैं. द्विवेदी जी का निर्भीक आह्वाहन है- ‘ऐसे भ्रष्ट ईश्वर का संसार छोड़ देना चाहिए.’ द्विवेदी जी ने ही सरस्वती में हीरा डोम की कविता छापी. इसी तरह स्त्री-अस्मिता के सवाल को द्विवेदी जी ने उठाया, ‘कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता’ शीर्षक लेख लिखकर.

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