कृषि अर्थव्यवस्था पर हमला है गौ रक्षा कानून

देश के जिन राज्यों में भी गौ रक्षा कानून लागू किया गया है मेरे खुद के सर्वे के अनुसार उन राज्यों में गौ-वंश की संख्या दो तिहाई तक कम हो गयी है. इससे देश भर में घाटे की खेती की मार झेल रहे छोटे व मध्यम किसानों के सामने आर्थिक संकट ज्यादा गहरा गया है. हमारे देश में छोटी व माध्यम जोतों की संख्या अस्सी प्रतिशत के करीब है. इसमें भी बहुतायत छोटी जोतों की है. यही कारण है कि यहाँ छोटी खेती या ग्रामीण मजदूरी पर निर्भर हर परिवार…

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मुजफ्फरपुर बालिका गृह रेप कांड :बिहारी समाज पहले दिन से आंदोलित है

कुमार परवेज मुजफ्फरपुर बालिका गृह रेप कांड को मीडिया में अब जगह मिल रही है क्योंकि इसे अब दबाया नहीं जा सकता. दबाने के बहुत प्रयास हुए थे, लेकिन बिहारी समाज ने ऐसा होने नहीं दिया. घटना की जानकारी के पहले दिन से ही वह लड़ रहा है, पता नहीं रवीश कुमार ने ने अपने लेख में ऐसा क्यों लिखा कि सांस्थानिक यौन उत्पीड़न की ऐसी वीभत्स घटना पर बिहारी समाज सोता रहा. नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. मुजफ्फरपुर के अखबारों में 2 जून को यह घटना सामने आई. उसके…

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वैज्ञानिक-चित्त की खोज में पूरे जीवन बेचैन रहने वाला एक शिक्षाविद्

यशपाल बराबर इस बात को रेखांकित करते थे कि देश में सभी अपने बच्चों को विज्ञान पढ़ाना चाहते तो हैं किंतु वैज्ञानिक दृष्टि नहीं देना चाहते. बच्चों के आगे समाज की पूरी संरचना विज्ञान के प्रतिकूल है. बगैर दृष्टि और समझ के विज्ञान शिक्षा का मूल्य उनके लिए नहीं था. विज्ञान शिक्षा का मतलब उनके लिये सभी तरह की संकीर्णताओं, कूपमंडूकताओं और क्षुद्रताओं को विज्ञान की कसौटी पर जांचना-परखना है.

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फासीवाद के खिलाफ संघर्ष में मार्क्स के विचार से बेहतर विचार नहीं- दीपंकर भट्टाचार्य

क्रोनी पूंजीवाद, सांप्रदायिक विभाजन और मनुवादी के बीच गठजोड़ है. लिचिंग स्थाई परिघटना बना दी गई है. लिचिंग करने वालों को पता है कि उन्हें सत्ता का संरक्षण मिला है. यह फासीवाद राज्य नही तो क्या है. ऐसे राज्य या तानाशाही के खिलाफ संघर्ष में मार्क्स के विचार से बेहतर विचार नहीं.

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सभ्यता का परदा हटातीं हैं आर. चेतन क्रांति की कवितायेँ

2004 में आए अपने पहले कविता  संग्रह ‘शोकनाच’ के साथ आर चेतन क्रांति ने इक्कीसवीं सदी की दुनिया के पेच शायद सबसे करीने से पकड़े। इक्कीसवीं सदी में जीने की कुंजी प्रबंधन है- सबकुछ प्रबंधित-प्रायोजित-परिभाषित है- प्रकृति हो या मनुष्य, उसकी उत्पादकता को प्रबंधन के दायरे में लाना, उसे उपयोगी बनाना इकलौता लक्ष्य है। जो इस लक्ष्य से बाहर है, इसे अस्वीकार करता है, वह विफल है, पीछे छूट जाने को अभिशप्त है। सत्ता राजनीति की हो या कविता की- यह एकमात्र सच है। उस संग्रह की पहली ही कविता…

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स्वामी अग्निवेश पर हमले के विरोध में लखनऊ, रांची, गोरखपुर में विरोध प्रदर्शन

जन आंदोलनों के सम्मानित नेता स्वामी अग्निवेश पर झारखण्ड में हुए प्राणघातक हमले का जगह-जगह प्रतिरोध हो रहा है. विभिन्न संगठनों ने लखनऊ, रांची और गोरखपुर में विरोध प्रदर्शन आयोजित किया.

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भीड़-दंड को प्रोत्साहित करता राज्य तंत्र

लिंचिंग में शरीक अधिकांश के लिए यह दंडमुक्त अपराध है. राज्यतंत्र ने इस दोहरेपन के साथ तालमेल बिठा लिया है. विभिन्न राजनीतिक संगठनों, सोशल मीडिया की पहलकदमियों और नागरिक संगठनों ने इसके खिलाफ चौतरफा प्रतिवाद किया है. घृणा-राजनीति फैलाने की मशीनरी के खिलाफ जन-विमर्श को परिपक्व करना लिंचिंग पर लगाम के लिए जरूरी हो गया है.

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भीड़ हमला-हत्या की घटनाएँ निर्देशित घटनाएँ हैं

इन निर्देशित गिरोहों को बाकायदे हत्या की मशीन में तब्दील किया जा रहा है. गौरी लंकेश के हत्यारे का बयान इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिसमें वह कहता है कि उसे पता भी नहीं था कि जिसकी हत्या करने वह जा रहा है वो आदमी है कौन, सिवाय इसके कि उसे जिसकी हत्या करनी है वह हिन्दू-विरोधी है. स्वामी अग्निवेश पर हमला करने वाले भी यही कह रहे थे कि ये हिंदू-विरोधी हैं.

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फासीवाद का परीक्षण पूरे सवाब पर है

“अभी पूरी दुनिया में क्या चल रहा है इसे समझने के लिए हमें दो चीजों पर गौर करने की जरूरत है। पहला यह है कि हम परीक्षण के दौर में हैं। दूसरा यह है कि जो चल रहा है वह फासीवाद है – एक ऐसा शब्द जिसे सचमुच बहुत सावधानी से इस्तेमाल करने की जरूरत है, लेकिन जब यह क्षितिज पर इतना साफ दिखाई दे रहा है तो इसका प्रयोग करने से परहेज भी नहीं होना चाहिए. ” फासीवाद के बाद ” के वक्त को भूल जाइए – हम जिस समय में जी रहे हैं वह पूर्व-फासीवाद का दौर है.

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जाति, धर्म और व्यवस्था की कोख से पैदा हो रही मॉब लिंचिंग जैसी बर्बर संस्कृति

गरीब और कमजोर पर जुल्म करने की प्रवृत्ति का फैलाव इसलिए बढ़ा है कि न्यायिक व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही है. जब तक अत्याचारी आगे बढते जायेंगे और सीधा-सादा समाज पीछे ढकेला जायेगा, यह प्रवृति रुकेगी नहीं. जब हम लिंचिंग करने वालों को मिठाई खिलायेंगे तब समाज में हिंसा स्वीकार्य होती जायेगी.

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बथानी टोला जनसंहार : न्याय का इंतजार कब तक ?

22 साल पहले 11 जुलाई, 1996 को दो बजे दिन में रणवीर सेना के कोई 50-60 हथियारबन्द लोगों ने बथानी टोला को घेर कर हमला किया और दलितों, अपसंख्यको , मजदूर – किसानों, शोषितों के घर मे आग लगा कर 21 लोगों को मार डाला. महिलाओं और बच्चों को खास निशाना बनाया गया. मृतकों में 16 महिलाएं और 7 बच्चे- बच्चियाँ थीं. 3 वर्ष से लेकर 70 वर्ष तक की महिला को भी नही छोड़ा गया. हमलवार पूरे तीन घंटों तक मौत का खेल खेलते रहे. इस टोला के सौ…

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पेप्सी को सण्डीला में पानी लूटने की छूट क्यों

ऐसा अनुमान है कि पेप्सी संयंत्र 5 से 15 लाख लीटर पानी रोजाना जमीन के नीचे से निकाल रहा है. एक लीटर शीतल पेय बनाने में 2.5 से 3 लीटर पानी खर्च होता है. पेप्सी व कोका कोला कम्पनियों के 1,200 बोतलबंद पानी के व 100 के करीब शीतल पेय बनाने के कारखाने हैं. ये पानी के 50 प्रतिशत बाजार पर काबिज हैं.

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सारण के स्कूल में छात्रा के साथ सात महीने से गैंग रेप

सारण जिले के एकमा थाने क्षेत्र के परसागढ़ स्थित एक प्राइवेट स्कूल में 10 वीं क्लास की एक छात्रा के साथ सात महीने से लगातार गैंग रेप की घटना सामने आई है. बलात्कारियों में स्कूल का प्रिंसिपल, कुछ शिक्षक व छात्रों सहित 18 लोग शामिल हैं. एपवा और भाकपा माले ने 10 जुलाई को सारण जिलाधिकारी के समक्ष प्रदर्शन करने का ऐलान किया है.

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प्रेम के निजी उचाट से लौटती स्त्री की कविता : विपिन चौधरी की कवितायेँ

  विपिन की कवितायेँ लगातार बाहर-भीतर यात्रा करती हुईं एक ऐसी आंतरिकता को खोज निकालती हैं जो स्त्री का अपना निजी उचाट भी है और दरख्तों, चिड़ियों, पीले-हरे पत्तों से भरा पूरा एक नगर भी, जिसके अपने रास्ते हैं, गालियाँ हैं और मैदान भी . उसके यहाँ यह शब्दचित्र गठित इलाका अवसाद का नहीं, नहीं ही वह अवचेतन का ढंका तुपा कोई संस्तर है, बल्कि अपना खोजा हुआ संरचित कोना जिसे वह मन की संज्ञा देती है . इस खोजे हुए कोने में वह बार-बार प्रेम तलाशती है। उसके कितने ही…

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देशी-विदेशी पूँजी के मुनाफे को बढ़ाने के लिए उच्च शिक्षा के ऊपर लगातार हमले होंगे

उच्च शिक्षा में हो रहे बदलावों को मात्र भाजपा-कांग्रेस के नजरिए से नहीं, बल्कि शासक वर्ग के नजरिए से देखना ही ठीक होगा. तभी हम प्रतिरोध के स्वरूप को भी सही दिशा में ले जा सकते हैं.

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हजारीबाग : बागों से कंक्रीट में बदलता शहर

हजारीबाग के पर्यावरण की बात है, अब पहले जैसी बात नहीं रही. यह शहर कंक्रीट में बदलता जा रहा है. इस बार की यात्रा में यह देखने को मिला. हमने गौर किया कि परिन्दे भी कम हो गये हैं. हरियाली के बावजूद वे कम दिख रहे थे.

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संजीव कौशल की कवितायेँ : प्रतिगामी विचारों का विश्वसनीय प्रतिपक्ष

जागृत राजनीतिक चेतना, समय और समाज की विडम्बनाओं की गहरी समझ और भाषा की कलात्मक पारदर्शिता के कारण संजीव कौशल की कवितायेँ नयी सदी की युवा पीढ़ी के बीच अपनी अलग पहचान बनाती हैं. कविता और अन्य सभी सृजनात्मक लेखन के लिए यह समय इस मायने में संकटपूर्ण है कि एक तरफ, धीरे धीरे हमारा समाज नवजागरण के मूल्यों को खोते हुए, प्रतिगामी विचारों से आक्रांत होकर सत्ता के उन्माद का शिकार होता जा रहा है, तो दूसरी तरफ हमारे कवि, लेखक, यानी मशालें लेकर चलनेवाले लोग ज्ञान मीमांसात्मक विभ्रम से ग्रस्त…

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देवदरबार जागीर मठ और पाकिस्तानी मुरीद

बणदेवनाथ जी का कहना था कि आमतौर पर दोनों मुल्क के लोग बहुत प्रेमी है बस बहुत कम लोग है जो हमलोगों के बीच नफरत फैलाने का काम करते है, अगर दोनों मुल्क में आपसी प्रेम भाईचारा और सौहार्द बनता है तो इससे दोनों देश बहुत तरक्की करेंगे और खुशहाल रहेंगे.

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कबीर और नागार्जुन की जयंती से जन एकता सांस्कृतिक यात्रा आरम्भ

बेगूसराय. आज ज्येष्ठ पूर्णिमा दिनांक 28/06/2018 को जन संस्कृति मंच की ओर से कबीर और आधुनिक कबीर नागार्जुन की सम्मिलित जयंती मनायी गयी। इस जयंती के अवसर पर जसम ने जन एकता सांस्कृतिक यात्रा का आयोजन किया, जो वर्तमान व्यवस्था में पल रहे फासीवादी तत्त्व के खिलाफ जन-जागृति का अभियान था। जन एकता सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत बेगूसराय से हुई, जहां नागार्जुन जी की छोटी बेटी मंजू देवी तथा दामाद अग्निशेखर जी ने झंडी दिखाकर जत्था को विदा किया। इस प्रथम जत्थे का नेतृत्व जसम के राज्य उपाध्यक्ष दीपक सिन्हा…

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अनुपम सिंह की कविताओं पर जसम की घरेलू गोष्ठी की रपट

अनुपम की कविताएँ अपने वक्त, अपने समाज और अपनी काया के अनुभव से उपजी हुई कविताएँ हैं- योगेंद्र आहूजा पिछली 23 जून 2018 को जसम की घरेलू गोष्ठी के तहत प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक के घर पर युवा कवयित्री अनुपम सिंह की कविताओं का पाठ और उस पर परिचर्चा आयोजित हुई। कायर्क्रम की शरुआत अनुपम सिंह द्वारा उनके काव्य पाठ से हुई। उन्होंने काव्यपाठ की शुरुआत ‘तलैया’ से की इसके बाद ‘मूढ़ महिलाएं’ , ‘अधिकारहीन बुआएं’ , ‘लड़कियाँ जवान हो रही हैं’, ‘जुए की पारियां’, ‘रंग जहाँ अपराधी होते हैं’,…

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