प्रदर्शनकारियों को मारने के इरादे से शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पूर्वनियोजित हमला थी तूतीकोरिन की घटना

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तूतीकोरिन में स्टरलाइट कॉपर प्लांट के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस गोलीबारी की घटना पर आल इंडिया पीपुल्स फोरम ( एआईपीएफ ) की जाँच रिपोर्ट

आल इंडिया पीपुल्स फोरम ( एआईपीएफ ) की जाँच टीम जिसमें सामाजिक वैज्ञानिक आर विद्यासागर, बेंगलुरु के अधिवक्ता क्लिफ्टन, तिरुनेलवेली के अधिवक्ता जी रमेश, अब्दुल निजाम और सामाजिक कार्यकर्ता सुंदरराज, शामिल थे,  ने 27 मई 2018 को तूतीकोरिन कस्बे में कुमारेड्डीपुरम, वीरापांडीपुरम, अन्ना नगर की बस्तियों और थेरेसपुरम का दौरा किया. टीम ने तूतीकोरिन के सरकारी अस्पताल का भी दौरा किया और पुलिस की गोलियों और लाठी चार्ज के कारण गंभीर रूप से घायल लोगों से बातचीत की।

रिपोर्ट का सारांश

लोग क्यों स्टरलाइट प्लांट बन्द कराना चाहते हैं

यह एक निर्विवाद तथ्य है कि स्टरलाइट तांबा गलाने के संयंत्र के संचालन से क्षेत्र में भयंकर प्रदूषण फैला है जिसने भूमिगत जल और हवा को जहरीला बनाया है. भूजल, जो आसपास के गांवों में पानी का एकमात्र स्रोत है,  गंभीर रूप से प्रदूषित हो गया है. ग्रामीण अब या तो निजी आपूर्तिकर्ताओं से 10 रुपये प्रति बर्तन पर पानी खरीदने को मजबूर हैं या कंपनी द्वारा अनिश्चित आपूर्ति पर भरोसा करने को. अधिकतर गांवों ने कंपनी द्वारा आपूर्ति जल से इनकार कर दिया है और इसलिए पीने योग्य पानी की खरीद के लिए रोज पैसे खर्च कर रहे हैं. संयंत्र के प्रदूषित उत्सर्जन से कृषि पूरी तरह से नष्ट हो गई है. हवा की गुणवत्ता खतरनाक रूप से बेहद कम हो गई है. परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में कैंसर, गर्भपात , सांस की बीमारियां, चकत्ते, त्वचा रोग के मामले बहुत अधिक पाए जा रहे हैं. कैंसर के कारन बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई है.

स्टरलाइट कॉपर,  वेदांत लिमिटेड की एक व्यावसायिक यूनिट है, जो लंदन स्थित वेदांत रिसोर्सेज पीएलसी की सहायक कम्पनी है, जिसके मालिक अनिल अग्रवाल हैं. अप्रैल 2003 में,  भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यूनिट द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण के कारण इस पर 100 करोड़ रुपये का जुर्माना ठोंका था जो यह साबित करता है कि स्टरलाइट क्षेत्र को प्रदूषित कर रहा है. राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान की 1998, 1999, 2003 और 2005 की रिपोर्ट से पता चलता है कि स्टरलाइट कॉपर कारखाने के उत्सर्जन से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है जो TNPCB  द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है. एनवायरमेंट लॉ वर्ल्ड एलायंस की 2010 की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि तांबा गलाने की सुविधाओं के प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव दासियों किलोमीटर तक  मानव स्वास्थ्य को खतरे में डाल सकते हैं और पानी की आपूर्ति को दूषित कर सकते हैं.

अपनी स्थापना के समय से ही कंपनी ने पर्यावरण के हर मानकों का उल्लंघन किया है। संयंत्र द्वारा प्रदूषण फ़ैलाने और पर्यावरण के मानकों का उल्लंघन के खिलाफ अभियान,  जिसमें कानूनी लड़ाई भी शामिल है, शुरू हो गई । वर्ष 2010 में मद्रास उच्च न्यायालय ने कानून के उल्लंघन का हवाला देते हुए पर्यावरण प्रदूषण के कारण स्टरलाइट कारखाने को बंद करने का आदेश दिया लेकिन इस आदेश के तीन दिन के भीतर सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश पर स्टे लगा दिया और स्टरलाइट के काम को जारी रखने की अनुमति दे दी.  इसके बाद अप्रैल 2013 में,  सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों से सहमत होने के बावजूद मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले को दरकिनार कर दिया और कंपनी को बंद करने से इनकार कर दिया.

जनांदोलन

 22 मई, 2018 के बड़े पैमाने पर आंदोलन को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. जनता ने संयंत्र को बंद कराने के लिए हर तरह के लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढांचे के भीतर उपलब्ध विकल्प अपनाए। यह एक स्वीकृत तथ्य यह है कि ग्रामीण लगभग दो दशकों से संयंत्र का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने सभी संबंधित अधिकारियों और राज्य / केंद्र सरकार के समक्ष याचिका दायर की। उन्होंने न्याय के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है. धरना,  विरोध-प्रदर्शन,  घरों पर काले झंडे फहराने सहित संघर्ष के अहिंसक रूपों को अपनाया है. इस घटना से पहले,  इस तरह के प्रदर्शनों में हजारों लोगों ने भाग लिया लेकिन इस तरह की अप्रिय घटनाएं कभी नहीं घटीं. हाल ही में 28  मार्च  को प्लांट के आसपास के 20 गांवों और तूतीकोरिन कस्बे से दसियों हजार पुरुषों,  महिलाओं,  बच्चों,  वरिष्ठ नागरिकों,  कृषि समुदायों, मछली पालकों, कारीगर, व्यवसायियों, छात्रों,  नमक निर्माताओं , बस चालकों, फेरीवालों सहित जीवन के सभी क्षेत्रों से लोगों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आयोजन किया  जो शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुआ।

 पिछले एक-दो साल में, संयंत्र बन्द कराने के लिए तूतीकोरिन में आंदोलन तेज हुआ. हमने विभिन्न गांवों में लोगों को संयंत्र तत्काल बंद करने की मांग वाले विशाल बैनर के साथ छोटे शामियानों को खड़ा देखा.  लोग 100 से अधिक दिनों से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लिए हर रोज इन संघर्ष स्थलों पर इकट्ठे होते रहे हैं. लोग अपनी मांगो को लेकर हर हफ्ते तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला कलेक्टर को ज्ञापन देने के लिए जा रहे हैं. अभी तक वहाँ इन प्रतिवेदनों कोई जवाब नहीं दिया गया है.

फ़ायरिंग का दिन

22 मई को चटाइयों, चद्दरों और भोजन के पैकेट के साथ, वरिष्ठ नागरिकों, पुरुषों, महिलाओं, नौजवानों और बच्चों ने कलेक्टर के कार्यालय तक की यात्रा शुरू की। इस शांतिपूर्ण आन्दोलन पर पुलिस ने दिन में कार्रवाई शुरू कर दी. पुलिस ने,  बड़ी संख्या में,  मनमाने ढंग से दक्षिण वीरापांडीपुरम, कुमाररेड्डीपुरम के लोगों को हिरासत में ले लिया. कुछ गांवों में लोगों को जबरन पुलिस वाहनों और बसों में भरकर कलेक्टर के कार्यालय से दूर छोड़ आई. दक्षिण वीरापांडीपुरम में गांव के बाहर लाठीचार्ज किया गया और इन लोगों को पुलिस वाहनों में ठूंस दिया गया। पुलिस की दमनात्मक कार्रवाई से विचलित हुए बिना लोग लंबी दूरी चलकर कलेक्टर के कार्यालय पर पहुंच गए और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने लगे. जिला प्रशासन द्वारा अन्य जिलों से सैकड़ों पुलिसकर्मियों को बुलाकर तैनात किया गया था। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोग ज्ञापन देने के लिए जिला कलेक्टर के कार्यालय के अंदर गए लेकिन तभी पुलिस ने अंधाधुंध लाठीचार्ज और फायरिंग  शुरू कर दी जिसमें 13 व्यक्तियों की मौत हो गई और सैकड़ों घायल हो गए।

जान बचाने के लिए भाग रहे लोगों का पुलिस ने पीछा किया गया और उन्हें पीटा गया। पुलिस की यह हिंसात्मक कार्रवाई देर सुबह से लेकर दोपहर तक चलता रही. इसके बाद क्या हुआ, यह मीडिया रिपोर्टों और सामाजिक मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से सभी को पता है.  लोगों को बेरहमी से पुलिस द्वारा राइफल की गोलियों का निशाना बनाया गया.

टीम के निष्कर्ष :

लोगों को मारने के इरादे से शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पूर्वनियोजित हमला था। लोगों पर गोली चलने के पहले भीड़ को तितर-बितर करने के लिए कोई भी प्रयास नहीं किया गया और न ही कोई पूर्व चेतावनी दी गई. जाहिर है संयंत्र के खिलाफ किसी भी विरोध को हतोत्साहित करने के लिए, लोगों के दिलोदिमाग में भय पैदा करने के उद्देश्य से यह एक पूर्वनियोजित हमला था.

लोगों ने आरोप लगाया कि स्टरलाइट कापर के गुंडों और सादे कपड़ों में पुलिस ने भीड़ में घुसपैठ की और भीड़ को हिंसा के लिए उकसाया. लोगों के कलेक्टर कार्यालय पहुंचने से पहले ही वाहन और इमारतें जल रही थीं ।

लोगों का कहना  है कि प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पानी की बौछार या आंसू गैस के गोले के प्रयोग के बिना कलेक्ट्रेट ऑफिस तक जाने दिया गया था. हिंसा का औचित्य साबित करने के लिए कुछ स्थानों पर बाद में आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया ।

यह जताने के लिए कि आसपास दंगे की स्थिति है, पुलिस ने  जानबूझ कर अन्ना नगर, थ्रेसपुरम और आसपास गोलीबारी की. पुलिस का कहना है कि वह अस्पताल में उन लोगों का पीछा कर रही थी जिन्होंने अस्पताल में परेशानी पैदा की। असल में अस्पताल और पुलिस गोलीबारी का स्थान काफी दूर हैं। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि अन्ना नगर में एक तमाशाई कलियप्पन, जिसे पुलिस ने गोली मारी थी उसकी गर्दन पर पुलिस वाले चढ़ गए और उसकी मौत हो गई ।

आरोप है कि हत्या के लिए आंदोलन के  नेताओं की पूर्व पहचान स्पष्ट रूप स्टरलाइट के गुंडों और पुलिस द्वारा कर ली गई थी. (उनकी तस्वीरें  पहले से ही गांवों से स्टरलाइट  के गुंडों द्वारा  एकत्र की गईं थीं,  जब वे गांवों में बैठकें कर रहे थे)

जैसा कि लोगों ने बताया, यह स्पष्ट है कि पुलिस ने फायरिंग के दौरान किसी भी प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया। घुटनों से नीचे गोली मारने के बजाय, ज्यादातर लोगों की मौत उनके सिर, छाती, और चेहरे में गोली लगने से हुई। बिना वर्दी वाली पुलिस ने अपने वाहनों से और जमीन से गोलियां चलायीं. उन्होंने लोगों पट गोली चलने के लिए स्नाइपर्स का इस्तेमाल किया गया जो पूरी तरह से गैर कानूनी है.

17 साल की एक स्कूली लड़की के मुंह में गोली मारी गई. इस तरह की क्रूर हत्याओं के बारे में वीडियो  के माध्यम से लोग जान चुके हैं.

थेरासपुरम  के लोगों के अनुसार झांसी (47  वर्ष) की हत्या एक कोल्ड ब्लडेड मर्डर है. जब वह अगली गली में अपनी बेटी को मछली देने के बाद लौट रही थी,  उसके भेजे में गोली मारी गई. उसका मस्तिष्क पूरी  तरह से नष्ट हो गया था. झांसी की बेटी ने कहा कि उसे शरीर की पहचान करने की अनुमति नहीं दी गई और पुलिस झांसी की हत्या के बारे में उसे चुप कराने की कोशिश में लगी थी। लंबे संघर्ष के बाद ही उसे अपनी माँ के शरीर की पहचान करने की अनुमति दी गई।

लोगों का मानना है कि पुलिस गोलीबारी में 13  से ज्यादा मौतें हुई हैं, क्योंकि कई शव सरकारी अस्पताल के मुर्दाघर में रखे हैं। चूंकि सभी पुरुष गांवों और शहर से फरार  हैं, वास्तविक मौत का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है, जब तक कि वे सभी वापस न आ जाएं ।

यह भी आरोप है कि कुछ शव बिना पोस्टमार्टम और मौत के कारणों का खुलासा किए बिना परिवारों को सौंप दिए गए। ऐसे ही एक मामला पुधियामुथूर में हुआ था।

एआईपीएफ की मांग :

-स्टरलाइट संयंत्र को तत्काल स्थायी रूप से बंद किया जाय

-TNPCB  अपने आदेश में संशोधन करे और स्टरलाइट संयंत्र द्वारा किये गए अवैध और गैरकानूनी कृत्यों को उसमें जोड़े. साथ ही यह सुनिश्चित करे कि आदेश मजबूत कानूनी जांच का सामना करने के लिए पर्याप्त हैं.

-22 मई को हिंसा में शामिल आरोपियों को हत्या के मामले में सजा दी जाए ।

-अभी भी गोलीबारी का आदेश देने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों  के बारे में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. राज्य सरकार को सबका नाम उजागर करना चाहिए, और स्नाइपर्स को आदेश देने वाले हर जिम्मेदार अधिकारी को, जिन्होंने गोलीबारी का आदेश दिया,  को तुरंत सेवा से बर्खास्त किया जाना चाहिए.

-लोगों पर दर्ज किये गए केस बिना शर्त वापस लिया जाए

 -पुलिस फायरिंग में मारे गए लोगों और स्थायी रूप से  अक्षम हुए लोगों  के परिवारों  को 1 करोड़ रू का मुआवजा दिया जाए ।

-इसके अलावा उन्हें 15000  रुपये की मासिक पेंशन भुगतान किया जाना चाहिए, जब तक कि वे फिर से अपनी आजीविका न शुरू कर लें ।

-पुलिस फायरिंग और कार्रवाई में जख्मी और प्रभावित लोगों को निशुल्क कानूनी सहायता प्रदान की जाए

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